Āraṇyaka-parva, Adhyāya 17 — Śālva’s encampment and the Yādava counter-engagement at Dvārakā
तस्य विक्षिपतश्चापं संदधानस्य चासकृत् । नानन््तरं ददृशे कश्रिन्निघ्नतः शात्रवान् रणे,वे बारंबार धनुषको खींचते, उसपर बाण रखते और उसके द्वारा शत्रुसैनिकोंको युद्धमें मार डालते थे। उनकी उक्त क्रियाओंमें किसीको थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं दिखायी देता था
当他不断挥转神弓、屡屡搭箭连发,在战场上斩杀敌军之时,旁人竟看不出这些动作之间有丝毫间隙,也见不到半点差错与变换。
वायुदेव उवाच