Udyoga-parva Adhyāya 30: Sañjaya’s Departure and Yudhiṣṭhira’s Commission of Greetings
'शत्रुदमन नरेश! जब वे बालक थे, तब आपकी ही कृपासे उन्हें राज्य मिला था। पहले उन्हें राज्यपर बिठाकर अब अपने ही आगे उन्हें नष्ट होते देख उपेक्षा न कीजिये” ।। सर्वमप्येतदेकस्य नालं संजय कस्यचित् | तात संहत्य जीवामो द्विषतां मा वशं गम:,संजय! उन्हें यह भी बताना कि “तात! यह सारा राज्य किसी एकके ही लिये पर्याप्त हो, ऐसी बात नहीं है। हम सब लोग मिलकर एक साथ रहकर सुखपूर्वक जीवन-निर्वाह करें, इसके विपरीत करके आप शत्रुओंके वशमें न पड़े!
sarvam apy etad ekasya nālaṃ saṃjaya kasyacit | tāta saṃhatya jīvāmo dviṣatāṃ mā vaśaṃ gamaḥ ||
“噢,制敌的君王啊!当他们还是孩童之时,正因您的恩惠才得此国。请先将他们安置于王位之上,切莫冷眼旁观他们在您面前走向毁灭。”桑阇耶,你还要告诉他:“父王啊,这整个王国并非只为一人而设。让我们同心共处,安宁度日;切勿反其道而行,落入仇敌之手!”
युधिछिर उवाच