
Kārtavīrya–Samudra Saṃvāda and the Jāmadagnya Precedent (आश्वमेधिक पर्व, अध्याय २९)
Upa-parva: Exemplum on Kārtavīrya Arjuna, Samudra, and Jāmadagnya Rāma (Bhārgava) — Didactic Itihāsa Insert
A brāhmaṇa introduces an ancient itihāsa concerning Kārtavīrya Arjuna and Samudra. The king, famed for vast power, roams the seashore and discharges volleys into the ocean; Samudra approaches with folded hands, requesting cessation because ocean-dependent beings are harmed. Arjuna demands an equal opponent in battle; Samudra directs him toward the well-known sage Jamadagni and indicates that Jamadagni’s son can render the demanded reception. The king proceeds in anger to the āśrama and behaves antagonistically toward Rāma (Jāmadagnya). Rāma’s energy flares; he cuts down the many-armed king, and then routs surrounding forces. Some kṣatriyas, after killing Jamadagni, flee to mountain strongholds; the text frames ensuing disorder as a failure to perform prescribed duties, describing social decline and groups said to have fallen from kṣatra-dharma. The narrative continues with repeated cycles of kṣatra being reconstituted by dvijas and then cut down by Jāmadagnya, culminating after twenty-one ritual acts when a bodiless divine voice and ancestral figures urge Rāma to desist; Rāma replies that he cannot tolerate his father’s killing, and the ancestors argue that it is improper for a brāhmaṇa to repeatedly kill rulers. The chapter thus functions as a jurisprudential-ethical case on restraint, retaliation, and the limits of punitive action.
Chapter Arc: विद्वान् के भीतर भी राग-द्वेष और इन्द्रिय-प्रवृत्तियाँ बनी रहती हैं—फिर भी वह कैसे धर्म-मार्ग पर टिकता है, इसी प्रश्न के साथ अध्याय एक उपदेशात्मक कथा की ओर मुड़ता है। → पूर्वकाल के बाहुसहस्रवान् राजा कार्तवीर्यार्जुन का वैभव और बल-गर्व उभरता है—समुद्र-तट पर विचरते हुए वह शर-वर्षा से समुद्र तक को ‘वश’ में करने का दर्प दिखाता है। उसके प्रताप से क्षत्रिय-समाज भयभीत होकर अपने स्वधर्म से डिगने लगता है; ब्राह्मण-आचार का लोप और प्रजा का वृषलता की ओर झुकाव संकेतित होता है। → परशुराम धनुष उठाकर रथ पर चढ़ते हैं और शर-वर्षा से पार्थिव-बल को व्यधमित करते हैं; आगे चलकर ‘एक-एक करके’ इक्कीस बार क्षत्रियों के संहार का चरम बिंदु आता है—जहाँ प्रतिशोध, न्याय और अतिरेक एक ही ज्वाला में मिलते हैं। → इक्कीस यज्ञों/मेधों के अंत पर दिव्य वागशरीरिणी मधुर वाणी से परशुराम को संबोधित करती है—मानो हिंसा-चक्र के बाद आत्मसंयम और उच्चतर दृष्टि की ओर संकेत। ऋषि/पितृ-स्वर उन्हें रोकते हैं: ‘ब्राह्मण होकर नृपों का वध युक्त नहीं’; परशुराम पिता-वध का असह्य शोक/क्रोध प्रकट कर कहते हैं कि वे रोके नहीं जा सकते। अध्याय का निष्कर्ष इस तनाव को खुला छोड़ते हुए नैतिक विवेक की कसौटी पर कथा को टिकाता है। → पितृ/ऋषि-उपदेश और परशुराम के प्रतिज्ञा-क्रोध के बीच—क्या प्रतिशोध धर्म है या धर्म का अतिक्रमण—यह प्रश्न अगले प्रसंगों में गूंजता रहता है।
Verse 1
अपन बछ। है २ >> - यह अध्याय क्षेपक हो तो कोई आश्चर्य नहीं; क्योंकि इसमें यह बात कही गयी है कि बुद्धि और इन्द्रियोंमें राग-द्वेषके रहते हुए भी विद्वान् कर्मोंमें लिप्त नहीं होता और यज्ञमें पशु-हिंसाका दोष नहीं लगता। किंतु यह कथन युक्तिविरुद्ध है। एकोनत्रिशो<ड ध्याय: परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय-कुलका संहार ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । कार्तवीर्यस्य संवाद समुद्रस्य च भाविनि,ब्राह्मणने कहा--भामिनि! इस विषयमें भी कार्तवीर्य और समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है
婆罗门说道:“美人啊,在此事上,人们也援引一则古老的史例——迦尔多毗梨耶(Kārtavīrya)与大海之间的对话。”
Verse 2
कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् । येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही,पूर्वकालमें कार्तवीर्य अर्जुनके नामसे प्रसिद्ध एक राजा था, जिसकी एक हजार भुजाएँ थीं। उसने केवल धनुष-बाणकी सहायतासे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको अपने अधिकारमें कर लिया था
远古之时,有一位名为迦尔多毗梨耶·阿周那(Kārtavīrya Arjuna)的国王,生有千臂。仅凭弓矢之力,他征服大地,直至海之尽头,使四方土地尽归其统御。
Verse 3
स कदाचित् समुद्रान्ते विचरन् बलदर्पित: । अवाकिरन् शरशतै: समुद्रमिति न: श्रुतम्,सुना जाता है, एक दिन राजा कार्तवीर्य समुद्रके किनारे विचर रहा था। वहाँ उसने अपने बलके घमण्डमें आकर सैकड़ों बाणोंकी वर्षसे समुद्रको आच्छादित कर दिया
我们听闻:有一次,他在海滨徘徊,恃力而骄。竟以数百支箭如雨倾泻,连大海也被箭影所覆。
Verse 4
त॑ समुद्रो नमस्कृत्य कृताञज्जलिरुवाच ह । मा मुज्च वीर नाराचान् ब्रूहि कि करवाणि ते,तब समुद्रने प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा --वीरवर! राजसिंह! मुझपर बाणोंकी वर्षा न करो। बोलो, तुम्हारी किस आज्ञाका पालन करूँ? शक्तिशाली नरेश्वर! तुम्हारे छोड़े हुए इन महान् बाणोंसे मेरे अन्दर रहनेवाले प्राणियोंकी हत्या हो रही है। उन्हें अभय दान करो”
于是大海显现,俯首致敬,合掌而言:“勇士啊,莫再放出钢尖之箭。请说——我当为你做何事?你所射出的巨箭正在杀戮栖居于我身中的众生。愿你赐他们无畏与安护。”
Verse 5
मदाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसष्टेर्महेषुभि: । वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देहाभयं विभो,तब समुद्रने प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा --वीरवर! राजसिंह! मुझपर बाणोंकी वर्षा न करो। बोलो, तुम्हारी किस आज्ञाका पालन करूँ? शक्तिशाली नरेश्वर! तुम्हारे छोड़े हुए इन महान् बाणोंसे मेरे अन्दर रहनेवाले प्राणियोंकी हत्या हो रही है। उन्हें अभय दान करो”
“王中之虎、威能之主啊:因你所放出的这些巨箭,寄身于我体内的众生正在被杀戮。愿你赐他们免受形体伤害的安护。”
Verse 6
अजुन उवाच मत्समो यदि संग्रामे शरासनधर: क्वचित् । विद्यते तं समाचक्ष्व य: समासीत मां मृथे,कार्तवीर्य अर्जुन बोला--समुद्र! यदि कहीं मेरे समान धनुर्धर वीर मौजूद हो, जो युद्धमें मेरा मुकाबला कर सके तो उसका पता बता दो। फिर मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊँगा
阿周那说道:“大海啊,若世间某处有与我在战阵中相等的持弓之士,能在沙场上与我正面相抗者,就指给我看;否则,我便放过你,转身离去。”
Verse 7
समुद्र उवाच महर्षिर्जमदग्निस्ते यदि राजन् परिश्रुत: । तस्य पुत्रस्तवातिथ्यं यथावत् कर्तुमहति,समुद्रने कहा--राजन्! यदि तुमने महर्षि जमदग्निका नाम सुना हो तो उन्हींके आश्रमपर चले जाओ। उनके पुत्र परशुरामजी तुम्हारा अच्छी तरह सत्कार कर सकते हैं
大海说道:“大王啊,若你曾听闻大圣者阇摩达伽尼(Jamadagni)之名,便前往他的隐修林。他的儿子帕罗修罗摩(Paraśurāma)德行具足,能依礼为你尽到周全的款待。”
Verse 8
ततः स राजा प्रययौ क्रोधेन महता वृतः । स तमाश्रममागम्य राममेवान्वपद्यत
于是那位国王怀着滔天怒火启程而去。抵达那座林中道场后,他径直独自走向罗摩(Rāma),只为当面寻见他。
Verse 9
स रामप्रतिकूलानि चकार सह बन्धुभि: । आयासं जनयामास रामस्य च महात्मन:
他与宗族亲眷一道,做出种种与罗摩(Rāma)为敌之举,也使那位大心者罗摩蒙受困苦与劳顿。
Verse 10
ततस्तेज: प्रजज्वाल रामस्यामिततेजस: । प्रदहन् रिपुसैन्यानि तदा कमललोचने
随即,罗摩(Rāma)那不可测量的炽盛威光骤然腾起,开始焚烧敌军诸部。就在那一刻,莲目之人啊,他的光辉显现为压倒不义抗拒的力量。
Verse 11
ततः परशुमादाय स तं बाहुसहस्रिणम् । चिच्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्रुमम्
随后,罗摩举起战斧,倏然斩倒那千臂之敌,犹如伐倒枝杈繁多的大树。
Verse 12
(ब्राह्मणने कहा--) कमलके समान नेत्रोंवाली देवि! तदनन्तर राजा कार्तवीर्य बड़े क्रोधमें भरकर महर्षि जमदग्निके आश्रमपर परशुरामजीके पास जा पहुँचा और अपने भाई-बन्धुओंके साथ उनके प्रतिकूल बर्ताव करने लगा। उसने अपने अपराधोंसे महात्मा परशुरामजीको उद्दिग्न कर दिया। फिर तो शत्रु-सेनाको भस्म करनेवाला अमित तेजस्वी परशुरामजीका तेज प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने अपना फरसा उठाया और हजार भुजाओंवाले उस राजाको अनेक शाखाओंसे युक्त वृक्षकी भाँति सहसा काट डाला ।| ८-- ११ || तं॑ हतं पतितं दृष्टवा समेता: सर्वबान्धवा: । असीनादाय शक्तीश्च भार्गव पर्यधावयन्,उसे मरकर जमीनपर पड़ा देख उसके सभी बन्धु-बान्धव एकत्र हो गये तथा हाथोंमें तलवार और शक्तियाँ लेकर परशुरामजीपर चारों ओरसे टूट पड़े
婆罗门说道:“噢,莲华眼的女神!其后,迦尔多毗梨耶王怒火炽盛,奔至大圣者阇摩达格尼的精舍,来到帕罗修罗摩面前,并与其兄弟亲族一同行事乖逆,悖礼犯上。他以诸般罪愆扰动了大德帕罗修罗摩。于是,那位能焚灭敌军的无量威光——帕罗修罗摩的神威——骤然燃起。祂举起战斧,霎时将那千臂之王斩落,如伐多枝之树。见其被杀倒地,诸亲眷尽皆聚集,执剑持矛,从四面八方猛扑向婆罗伽婆(帕罗修罗摩)。
Verse 13
रामो5पि धनुरादाय रथमारुहा[ सत्वर: । विसृजन् शरवर्षाणि व्यधमत् पार्थिवं बलम्,इधर परशुरामजी भी धनुष लेकर तुरंत रथपर सवार हो गये और बाणोंकी वर्षा करते हुए राजाकी सेनाका संहार करने लगे
罗摩(帕罗修罗摩)亦执弓,迅疾登上战车;放出箭雨,开始歼击并驱散国王的军队。
Verse 14
ततस्तु क्षत्रिया: केचिज्जामदग्न्य भयार्दिता: । विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगा: सिंहार्दिता इव,उस समय बहुत-से क्षत्रिय परशुरामजीके भयसे पीड़ित हो सिंहके सताये हुए मृगोंकी भाँति पर्वतोंकी गुफाओंमें घुस गये
其后,一些刹帝利为阇摩达格尼之子(帕罗修罗摩)的威名所迫,惶惧不堪,逃入山中险寨与洞窟,宛如群鹿被狮子驱逼而奔窜。
Verse 15
तेषां स्वविहितं कर्म तद्धयान्नानुतिष्ठताम् । प्रजा वृषलतां प्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात्,उन्होंने उनके डरसे अपने क्षत्रियोचित कर्मोंका भी त्याग कर दिया। बहुत दिनोंतक ब्राह्मणोंका दर्शन न कर सकनेके कारण वे धीरे-धीरे अपने कर्म भूलकर शूद्र हो गये
他们为恐惧所慑,竟不再履行本应属于自身的既定职责。又因久不得见婆罗门、失其教导,民众渐渐忘却应守的规范与行持,遂堕为“弗利沙罗”(vṛṣala)之境。
Verse 16
एवं ते द्रविडा55भीरा: पुण्ड्राश्न शबरै: सह । वृषलत्वं परिगता व्युत्थानात् क्षत्रधर्मिण:,इस प्रकार द्रविड, आभीर, पुण्ड्र और शबरोंके सहवासमें रहकर वे क्षत्रिय होते हुए भी धर्म-त्यागके कारण शूद्रकी अवस्थामें पहुँच गये
因此,那些刹帝利与达罗毗荼人、阿毗罗人、奔荼罗人及舍婆罗人相与杂处;虽本为刹帝利,却因弃绝刹帝利之法的奋勉与纪律,终堕为“弗利沙罗”(vṛṣala)。
Verse 17
ततश्न हतवीरासु क्षत्रियासु पुन: पुनः । द्विजैरुत्पादितं क्षत्रं जामदग्न्यो न्यकृन्तत,तत्पश्चात् क्षत्रियवीरोंके मारे जानेपर ब्राह्मणोंने उनकी स्त्रियोंसे नियोगकी विधिके अनुसार पुत्र उत्पन्न किये, किंतु उन्हें भी बड़े होनेपर परशुरामजीने फरसेसे काट डाला
于是,当刹帝利的族系一次又一次地失去武士而几近断绝时,婆罗门又生出新的刹帝利后裔;然而阇摩达伽尼之子(帕罗修罗摩)也将他们尽数斩灭。
Verse 18
एकविंशतिमेधान्ते रामं वागशरीरिणी । दिव्या प्रोवाच मधुरा सर्वलोकपरिश्रुता,इस प्रकार एक-एक करके जब इक्कीस बार क्षत्रियोंका संहार हो गया, तब परशुरामजीको दिव्य आकाशवाणीने मधुर स्वरमें सब लोगोंके सुनते हुए यह कहा --
如此,当第二十一场祭仪完成、对刹帝利的反复屠灭也告终之时,一道无形的天声以甘美之音向罗摩(帕罗修罗摩)宣告,其声为诸世界所共闻。
Verse 19
राम राम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि । क्षत्रबन्धूनिमान् प्राणैर्विप्रयोज्य पुन: पुन:,“बेटा! परशुराम! इस हत्याके कामसे निवृत्त हो जाओ। परशुराम! भला बारंबार इन बेचारे क्षत्रियोंके प्राण लेनेमें तुम्हें कौन-सा लाभ दिखायी देता है?”
大海说道:“罗摩,罗摩——住手吧。孩子,你在此事中看见了什么‘善’?一再夺去这些可怜刹帝利的性命,究竟有何益处?回头吧,离开这屠戮之业。”
Verse 20
तथैव त॑ महात्मानमृचीकप्रमुखास्तदा । पितामहा महाभाग निवर्तस्वेत्यथाब्रुवन्,उस समय महात्मा परशुरामजीको उनके पितामह ऋचीक आदिने भी इसी प्रकार समझाते हुए कहा--“महाभाग! यह काम छोड़ दो, क्षत्रियोंको न मारो”
同样在那时,以利支迦(Ṛcīka)为首的诸位尊贵先祖也劝诫那位大士说:“有福者啊,住手吧。舍弃此途,莫再屠戮刹帝利。”
Verse 21
पितुर्वधममृष्यंस्तु राम: प्रोवाच तानूषीन् । नाहनतीह भवन्तो मां निवारयितुमित्युत,पिताके वधको सहन न करते हुए परशुरामजीने उन ऋषियोंसे इस प्रकार कहा --'आपलोगोंको मुझे इस कामसे निवारण नहीं करना चाहिये”
然而罗摩(帕罗修罗摩)因不能忍受父亲被杀,便对诸仙人说道:“你们不该在此阻我;我决不罢手。”
Verse 22
पितर ऊचु. नाहसे क्षत्रबन्धूंस्त्वं निहन्तुं जयतां वर । नेह युक्त त्वया हन्तुं ब्राह्मणेन सता नृूपान्,पितर बोले--विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ परशुराम! बेचारे क्षत्रियोंको मारना तुम्हारे योग्य नहीं है; क्योंकि तुम ब्राह्मण हो, अतः तुम्हारे हाथसे राजाओंका वध होना उचित नहीं है
祖灵(Pitṛ)说道:“噢,胜者之中最卓越者!你不应屠戮这些刹帝利。在此处,你——身为德行具足的婆罗门——去杀诸王,实非所宜。此举既不合你的身份,也不合正法(dharma)。”
Verse 28
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक अद्वाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
至此,在尊贵的《摩诃婆罗多》中,于阿湿婆梅陀篇(Āśvamedhika Parva)之内、阿努歌谛(Anugītā)部分之中,论及“婆罗门之歌”的第二十二章告终。此结语(colophon)标示一段教诲单元的完成,亦提示读者暂作停歇,反思方才所陈之伦理与灵性训诫。
Verse 29
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु एकोनत्रिंशो5ध्याय:
至此,《圣摩诃婆罗多》之阿湿婆梅陀篇(Āśvamedhika Parvan)中,阿努歌谛(Anugītā)支分内,“婆罗门歌”(Brāhmaṇa-gītā)部分第二十九章终了。此为章末结语(colophon),用以标示章节闭合,并非人物所宣说的教义偈颂。
How far punitive retaliation may extend after a grave injury: the narrative juxtaposes a claim of intolerable wrong (paternal killing) against injunctions that repeated killing of rulers by a brāhmaṇa is normatively improper and socially destabilizing.
That displays of power harming dependents invite moral and political consequences; legitimate authority is shown as requiring restraint, responsiveness to petitions for protection, and termination of escalating cycles of retribution.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter embeds meta-normative commentary through the bodiless divine voice and the Pitṛs, functioning as an internal interpretive frame that explicitly urges cessation and evaluates the propriety of continued violence.