अध्याय ३३ — कर्म, दैव, हठ, स्वभाव और पुरुषार्थ पर द्रौपदी का उपदेश
Draupadī on Action, Fate, and Human Effort
सतत यश्च कामार्थी नेतरावनुतिष्ठति । मित्राणि तस्य नश्यन्ति धर्मार्थभ्यां च हीयते,“इसी प्रकार जो निरन्तर कामकी ही अभिलाषा रखकर धर्म और अर्थका सम्पादन नहीं करता, उसके मित्र नष्ट हो जाते हैं (उसको त्यागकर चल देते हैं) और वह धर्म एवं अर्थ दोनोंसे वंचित ही रह जाता है
Cũng vậy, kẻ luôn chỉ ham muốn kāma mà không gây dựng dharma và artha thì bạn bè sẽ tiêu tan (bỏ đi), và bản thân hắn bị tước mất cả dharma lẫn artha.
वैशम्पायन उवाच