नरोत्तमौ केशवपाण्डुनन्दनौ तदाहितावग्निदिवाकराविव । रणाजिरे वीतभयौ विरेजतु: समानयानाविव विष्णुवासवौ,तदनन्तर नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन समरांगणमें रथपर आरूढ़ हो अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी एक ही वाहनपर बैठे हुए भगवान् विष्णु और इन्द्रके सदूश भयरहित हो विशेष शोभा पाने लगे। वे जिस रथसे यात्रा करते थे, उससे मेघसमूहोंकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि होती थी, वह रथ शरत्-कालके मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेजसे उद्दीप्त हो रहा था, उसपर पताका फहराती थी और उसकी ध्वजापर भयानक शब्द करनेवाला वानर बैठा था। उसकी कान्ति हिम, चन्द्रमा, शंख और स्फटिकमणिके समान सुन्दर थी। वह रथ वेगमें अपना सानी नहीं रखता था और देवराज इन्द्रके रथके समान तीव्रगामी था। उसपर बैठे हुए दोनों नरश्रेष्ठ देवराज इन्द्रके समान शक्तिशाली और पुरुषार्थी थे तथा सुवर्ण, मुक्ता, मणि, हीरे और मूँगेके बने हुए आभूषण उनके श्रीअंगोंकी शोभा बढ़ाते थे
narottamau keśavapāṇḍunandanau tadāhitāv agnidivākarāv iva | raṇājire vītabhayau virejatuḥ samānayānāv iva viṣṇuvāsavau ||
Śalya nói: “Rồi hai bậc nhân kiệt—Keśava và con trai của Pāṇḍu—cùng lên một chiến xa, rực sáng trên chiến địa như Lửa và Mặt Trời. Giữa vòng binh đao họ không hề sợ hãi, hiện ra như Viṣṇu và Vāsava (Indra) cùng ngự trên một cỗ xe.”
शल्य उवाच