Adhyaya 67
Karna ParvaAdhyaya 6726 Versesतनावपूर्ण और अनिश्चित; कौरव पक्ष की ‘मार्ग-रक्षा’ रणनीति पाण्डवों के निर्णायक प्रहार को रोक रही है, पर अर्जुन की नई प्रतिज्ञा से पाण्डव पक्ष में आक्रामक मोड़ आता है।

Adhyaya 67

कर्णवधप्रसङ्गः / The Context of Karṇa’s Fall (Krishna’s Dharmic Recollection and the Decisive Astra)

Upa-parva: Karṇa-vadha (The Fall of Karṇa) Episode

Saṃjaya narrates a critical sequence in which Vāsudeva (Kṛṣṇa), stationed on the chariot, addresses Karṇa (Rādheya) with an ethical recollection: he notes Karṇa’s present invocation of dharma and contrasts it with Karṇa’s earlier conduct in the sabhā—especially the public crisis involving Draupadī and the dice-game dynamics where Yudhiṣṭhira was outplayed by Śakuni. This discourse functions as a moral audit, implying karmic continuity rather than isolated wartime ethics. The narrative then shifts to technical martial exchange: Karṇa deploys Brahmāstra; Arjuna counters and releases a fire-associated weapon, which Karṇa suppresses with Varuṇa’s power, creating clouded darkness; Arjuna dispels it via Vāyavya. Arjuna then severs Karṇa’s banner, symbolically collapsing prestige and morale. Preparing for finality, Arjuna draws a supreme, mantra-empowered arrow, affirming truth and earned merit (tapas, guru-toṣa, iṣṭa, śruta) as warrant for efficacy. The arrow is released, described with cosmic and destructive imagery, culminating in Karṇa’s fall; his radiance departs upward, allied forces respond with audible reactions, and the Kuru side retreats in fear and disarray, marking a pivotal psychological and strategic shift.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न और व्यथा के उत्तर में अर्जुन बताता है कि अब तक कर्ण-वध क्यों न हो सका—क्योंकि मार्ग में द्रोणपुत्र अश्वत्थामा संशप्तकों सहित वज्र-दीवार बनकर खड़ा रहा और उसे रोकता रहा। → अर्जुन युद्ध-चित्र खींचता है: मेघ-गर्जन-सा उसका रथ, सामने समस्त कौरव-सेना, और फिर द्रोणपुत्र का तना हुआ धनुष—केवल प्रत्यंचा सहित—जिससे वह पाँच तीक्ष्ण बाणों से अर्जुन और वासुदेव तक को बेधता है। अर्जुन स्वीकार करता है कि सृञ्जयों में कोई अन्य योद्धा नहीं जो आज कर्ण के विचित्र अस्त्र-प्रहार को सह सके; इसलिए निर्णायक भार उसी पर है। → अर्जुन रणभूमि में युधिष्ठिर को ललकार-सा आश्वासन देता है—‘आइए, देखिए, आज मैं सूतपुत्र के विरुद्ध विजय के लिए युद्ध करूँगा’; और प्रतिज्ञा करता है कि यदि आज कर्ण को (उसके बान्धवों सहित, युद्धरत अवस्था में) न मार सका तो वह अपने जीवन/प्रतिष्ठा का परित्याग करने को भी प्रस्तुत है। → वह अपनी युद्ध-व्यवस्था घोषित करता है—सात्यकि और धृष्टद्युम्न को चक्ररक्षक, तथा युधामन्यु और उत्तमौजा को पृष्ठ-रक्षक नियुक्त कर—और संकेत देता है कि अब उसका रथ सीधे कर्ण की ओर बढ़ेगा, बीच के अवरोधों को तोड़ता हुआ। → अर्जुन की प्रतिज्ञा के साथ अध्याय वहीं थम जाता है—अब प्रश्न यह है कि क्या वह द्रोणपुत्र/संशप्तकों की रोक को पार कर कर्ण तक पहुँच पाएगा, या प्रतिज्ञा ही उसके लिए अग्नि-परीक्षा बन जाएगी।

Shlokas

Verse 1

अपन का छा | अप्-#-र- जा सप्तषष्टितमो< ध्याय: अर्जुनका युधिष्ठिरसे अबतक कर्णको न मार सकनेका कारण बताते हुए उसे मारनेके लिये प्रतिज्ञा करना संजय उवाच तद्‌ धर्मशीलस्य वचो निशम्य राज्ञ: क्रुद्धस्यातिरथो महात्मा । उवाच दुर्धर्षमदीनसत्त्व॑ युधिष्ठिरं जिष्णुरनन्तवीर्य:,संजय कहते हैं--राजन! क्रोधमें भरे हुए धर्मात्मा नरेशकी वह बात सुनकर अनन्त पराक्रमी अतिरथी महात्मा विजयशील अर्जुनने उदारचित्त एवं दुर्जय राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा

Sabi ni Sañjaya: O Hari, nang marinig ng dakilang-loob na si Arjuna—isang atiratha na walang kapantay, di-matitinag, di-matatalo, at may walang-hanggang lakas—ang mga salita ng haring matuwid na binigkas sa galit, siya’y sumagot kay Yudhiṣṭhira, ang haring bukal ang loob at mahirap daigin, sa ganitong paraan.

Verse 2

अजुन उवाच संशप्तकैर्युध्यमानस्य मेडद्य सेनाग्रयायी कुरुसैन्येषु राजन । आशीविषाभान्‌ खगमान्‌ प्रमुज्चन्‌ द्रौणि: पुरस्तात्‌ सहसाभ्यतिष्ठत्‌,राजन! आज जब मैं संशप्तकोंके साथ युद्ध कर रहा था, उस समय कौरव-सेनाका अगुआ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंका प्रहार करता हुआ सहसा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया

Sinabi ni Arjuna: “O Hari, habang nakikipaglaban ako sa mga Saṁśaptaka, si Aśvatthāman—anak ni Droṇa at nangunguna sa hukbong Kuru—ay biglang tumindig sa aking harapan. Nagpapakawala siya ng nakapangingilabot na mga palaso na tila mga makamandag na ahas, at hinarap niya ako nang tuwiran.”

Verse 3

दृष्टवा रथं मेघरवं ममैव समस्तसेना च रणे< भ्यतिष्ठत्‌ । तेषामहं पठ्च शतानि हत्वा ततो द्रौणिमगमं पार्थिवाग्रय,भूपालशिरोमणे! इधर कौरवोंकी सारी सेना मेघके समान गम्भीर घर्घर ध्वनि करनेवाले मेरे रथको देखकर युद्धके लिये डटकर खड़ी हो गयी, तब मैंने उस सेनामेंसे पाँच सौ वीरोंका वध करके आचार्यपुत्रपर आक्रमण किया

Sinabi ni Arjuna: “Nang makita ng buong hukbong Kaurava ang aking karwaheng dumadagundong na tila ulap ng ulan, tumindig silang matatag sa labanan. Pagkaraan, matapos kong mapatay ang limandaang mandirigma mula sa kanilang hanay, lumapit ako upang salakayin ang anak ng guro—ang anak ni Droṇa. O pinakadakila sa mga hari, hiyas sa mga namumuno!”

Verse 4

स मां समासाद्य नरेन्द्र यत्तः समभ्ययात्‌ सिंहमिव डिपेन्द्र: । अकार्षीच्च रथिनामुज्जिहीर्षा महाराज वध्यतां कौरवाणाम्‌,नरेन्द्र! जैसे गजराज सिंहकी ओर दौड़े, उसी प्रकार अश्व॒त्थामाने मुझे सामने पाकर विजयके लिये प्रयत्नशील हो मुझपर आक्रमण किया। महाराज! उसने मारे जाते हुए कौरवरथियोंका उद्धार करनेकी इच्छा की

Wika ni Arjuna: “O hari, nang siya’y lumapit sa akin na ang isip ay tagumpay, dumaluhong siya nang tuwid—gaya ng dambuhalang elepanteng sumasalakay sa isang leon. At, O dakilang hari, kumilos siya na may pasyang iligtas ang mga mandirigmang nakasakay sa karwaheng Kaurava na pinapatay na.”

Verse 5

ततो रणे भारत दुष्प्रकम्प्य आचार्यपुत्र: प्रवर: कुरूणाम्‌ । मार्मर्दयामास शितै: पृषत्कै- जनार्दनं चैव विषाग्निकल्पै:,भारत! तदनन्तर कौरवोंके प्रधान वीर दुर्धर्ष आचार्यपुत्रने रणक्षेत्रमें विष और अग्निके समान भयंकर तीखे बाणोंद्वारा मुझे और श्रीकृष्णको पीड़ित करना प्रारम्भ किया

Pagkaraan, sa labang iyon, O Bhārata, ang pinakabantog sa mga Kuru—ang anak ng Ācārya, na mahirap matinag—ay nagsimulang manggipit sa akin at kay Janārdana sa pamamagitan ng matatalim na palasong kasindak-sindak na gaya ng lason at apoy.

Verse 6

अष्टागवामष्ट शतानि बाणान्‌ मया प्रयुद्धस्य वहन्ति तस्य । तांस्तेन मुक्तानहमस्य बाणै- व्यनाशयं वायुरिवा भ्रजालम्‌

Wika ni Arjuna: “Sa kasagsagan ng labanan, walong daang palaso—kasingbilis na wari’y binubuhat ng walong kabayo—ang pinakawalan niya laban sa akin. Ngunit ang mga palasong iyon ay binasag ko ng sarili kong mga palaso, gaya ng hanging nagpapangalat sa nagliliyab na ningning.”

Verse 7

मेरे साथ युद्ध करते समय अश्वत्थामाके लिये आठ-आठ बैलोंसे जुते हुए आठ छकड़े सैकड़ों-हजारों बाण ढोते रहते थे। उसके चलाये हुए उन सभी बाणोंको मैंने अपने बाणोंसे मारकर उसी तरह नष्ट कर दिया, जैसे वायु मेघोंके समूहको छिन्न-भिन्न कर देती है ।। ततो5परान्‌ बाणसंघाननेका- नाकर्णपूर्णायतविप्रमुक्तान्‌ ससर्ज शिक्षास्त्रबलप्रयत्नै- स्तथा यथा प्रावृषि कालमेघ:,तत्पश्चात्‌ जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी काली घटा जलकी वर्षा करती है, उसी प्रकार शिक्षा, अस्त्र, बल और प्रयत्नोंद्वारा धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये बहुत-से बाणसमूह उसने बरसाये

Wika ni Arjuna: “Habang nakikipaglaban sa akin, si Aśvatthāmā ay may walong karwahe, at bawat isa’y nakayuko sa walong baka, na walang tigil na nagdadala sa kanya ng daan-daan at libu-libong palaso. Ngunit ang lahat ng palasong pinakawalan niya ay tinamaan ko at winasak ng sarili kong mga palaso—gaya ng hanging pumupunit sa mga kumpol ng ulap. Pagkaraan, nagpakawala pa siya ng iba pang mga bugso: di-mabilang na mga palaso, hinila ang busog hanggang tainga at pinakawalan sa buong lakas ng pagsasanay, galing sa sandata, tibay, at pagsisikap—umuulan na parang maitim na ulap ng tag-ulan na nagbubuhos ng tubig.”

Verse 8

नैवाददानं न च संदधानं जानीमहे कतरेणास्यतीति । वामेन वा यदि वा दक्षिणेन स द्रोणपुत्र: समरे पर्यवर्तत्‌,द्रोणपुत्र अश्वत्थामा समरभूमिमें चारों ओर चक्कर लगाने लगा। वह कब बाण लेता, कब उसे धनुषपर रखता और कब किस हाथसे बायें अथवा दायेंसे छोड़ता था, यह हमलोग नहीं जान पाते थे

Wika ni Arjuna: “Hindi man lamang namin matukoy kung kailan siya kumukuha ng palaso, kailan niya ito isinasalang sa busog, o kung saang panig niya ito pinakakawalan—kaliwa man o kanan. Kaya ang anak ni Droṇa na si Aśvatthāmā ay patuloy na umiikot sa larangan ng digmaan; ang kanyang mabilis at walang humpay na pamamana ay gumugulo sa aming paningin sa gitna ng kaguluhan ng labanan.”

Verse 9

तस्याततं मण्डलमेव सज्यं प्रदृश्यते कार्मुकं द्रोणसूनो: । सो<विध्यन्मां पञ्चभिद्रोणपुत्र: शितै: शरै: पञ्चभिवईसुदेवम्‌,केवल प्रत्यंचासहित तना हुआ उस द्रोणपुत्रका मण्डलाकार धनुष ही दिखायी देता था। उसने पाँच तीखे बाणोंसे मुझको और पाँचसे श्रीकृष्णको भी घायल कर दिया

Verse 10

अहं हि तं त्रिंशता वजकल्पै: समार्दयं निमिषस्यान्तरेण । क्षणाच्छवावित्समरूपो बभूव समार्दितो मद्विसृष्टे: पृषत्कै:,तब मैंने पलक मारते-मारते वज़्के समान तीस सुदृढ़ बाणोंद्वारा उसे क्षणभरमें पीड़ित कर दिया। मेरे छोड़े हुए बाणोंसे घायल होनेपर उसका स्वरूप काँटोंसे भरे साहीके समान दिखायी देने लगा

Arjuna said: “In the space of a single blink, I struck him hard with thirty arrows, each like a thunderbolt. In a moment, wounded by the shafts I released, his form came to resemble a porcupine bristling with quills—an image of how swiftly and relentlessly the battle’s violence can transform a warrior’s body.”

Verse 11

स विक्षरन्‌ रुधिरं सर्वगात्रे रथानीक॑ सूतसूनोर्विवेश । मयाभिभूतान्‌ सैनिकानां प्रबर्हा- नसौ प्रपश्यन्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌

Bleeding from every limb, he entered the massed chariot-formation of the charioteer’s son (Karna). Seeing the warriors whom I had already overpowered—lying prostrate and smeared with blood—he pressed on, drawn into the grim spectacle of slaughter that the battle’s fury had made inevitable.

Verse 12

तब वह सारे शरीरसे खूनकी धारा बहाता हुआ मेरे द्वारा पीड़ित हुए समस्त सैनिक शिरोमणियोंको खूनसे लथपथ देखकर सूतपुत्र कर्णकी रथसेनामें घुस गया ।। ततो$भिभूतं युधि वीक्ष्य सैन्यं वित्रस्तयोध॑ द्रतवाजिनागम्‌ । पजञ्चाशता रथमुख्यै: समेत्य कर्णस्त्वरन्‌ मामुपायात्‌ प्रमाथी,तत्पश्चात्‌ युद्धस्थलमें अपनी सेनाके योद्धाओंको भयसे आक्रान्त और हाथी-घोड़ोंको भागते देख पचास मुख्य-मुख्य रथियोंको साथ ले शत्रुओंको मथ डालनेवाला कर्ण बड़ी उतावलीके साथ मेरे पास आया

Then, seeing in the midst of battle his army overwhelmed—its warriors panic-stricken and its horses and elephants in flight—Karna, the charioteer’s son, the crusher of foes, swiftly came toward me, accompanied by fifty foremost chariot-warriors. The scene underscores how a commander responds when his side falters: Karna chooses urgent, forceful intervention to restore momentum, even as the battlefield is drenched in blood and fear.

Verse 13

तान्‌ सूदयित्वाहमपास्य कर्ण द्रष्ट भवन्तं त्वरयाभियात: । सर्वे पज्चाला हाद्विजन्ते सम कर्ण दृष्टवा गाव: केसरिणं यथैव,उन पचासों रथियोंका संहार करके कर्णको छोड़कर मैं बड़ी उतावलीके साथ आपका दर्शन करनेके लिये चला आया हूँ। जैसे गौएँ सिंहको देखकर डर जाती हैं, उसी प्रकार सारे पांचाल-सैनिक कर्णको देखकर उद्विग्न हो उठते हैं

Having slain those warriors, I left Karṇa aside and hurried here to see you. All the Pāñcāla troops are thrown into agitation on seeing Karṇa—just as cattle panic at the sight of a lion. The line underscores the psychological force of a famed fighter in war: fear spreads through an army not only by weapons but by reputation, and Arjuna’s words frame Karṇa as a terror to the ranks even while Arjuna himself presses on toward his immediate duty of meeting the one he addresses.

Verse 14

मृत्योरास्य॑ व्यात्तमिवाभिपद्य प्रभद्रका: कर्णमासाद्य राजन्‌ । रथांस्तु तान्‌ सप्तशतान्‌ निमग्नां- स्तदा कर्ण: प्राहिणोन्मृत्युसझ,राजन! मृत्युके फैले हुए मुँहके समान कर्णके पास पहुँचकर प्रभद्रकगण भारी संकटमें पड़ गये। कर्णने युद्धके समुद्रमें डूबे हुए उन सात सौ रथियोंको तत्काल मृत्युके लोकमें भेज दिया था

O Hari, ang mga Prabhadraka ay sumugod kay Karṇa na wari’y pumapasok sa nakanganga na bibig ng Kamatayan, at sila’y nalugmok sa matinding kapahamakan. Noon, ipinadala ni Karṇa ang pitong daang mandirigmang nakasakay sa karwahe—na para bang lumubog na sa dagat ng digmaan—tuwid sa kaharian ng Kamatayan.

Verse 15

न चाप्यभूत्‌ क्लान्तमना: स राजन्‌ यावन्नास्मान्‌ दृष्टवान्‌ सूतपुत्र: । श्र॒त्वा तु त्वां तेन दृष्टे समेत- मश्वत्थाम्ना पूर्वतरं क्षतं च

O Hari, ang anak ng tagapagmaneho ng karwahe ay hindi nanghina hangga’t hindi pa niya kami nakikita. Ngunit nang marinig niyang nakatagpo mo siya—at nalaman din niyang si Aśvatthāmā ay nasugatan na noon pa—nabuhay ang kanyang loob at nag-alab ang kanyang diwa sa gitna ng mga bungang ibinubunga ng digmaan.

Verse 16

मन्ये कालमपयानस्य राजन्‌ क्रूरात्‌ कर्णात्‌ तेडहमचिन्त्यकर्मन्‌ । अचिन्त्यकर्मा नरेश्वर! जबतक सूतपुत्रने हमलोगोंको नहीं देखा था, तबतक उसके मनमें उद्वेग या खेद नहीं हुआ था। मैंने जब सुना कि उसने पहले आपपर दृष्टिपात किया था और आपसे उसका युद्ध भी हुआ था, साथ ही उससे भी पहले अश्वत्थामाने आपको क्षत-विक्षत कर दिया था, तब क्रूरकर्मा कर्णके सामनेसे आपका यहाँ चला आना ही मुझे समयोचित प्रतीत हुआ ।। मया कर्णस्यास्त्रमिदं पुरस्ताद्‌ युद्धे दृष्टं पाण्डव चित्ररूपम्‌

Wika ni Arjuna: “O Hari, itinuturing kong napapanahon ang pag-urong mo mula sa harap ng malupit na si Karṇa. Sapagkat nasaksihan ko na noon sa digmaan ang kamangha-mangha at nakapanghihilakbot na sandata ni Karṇa, O Pāṇḍava. Nang marinig kong naititig na niya sa iyo ang kanyang paningin at nakipaglaban pa sa iyo—at bago pa roon ay malubha kang nasugatan ni Aśvatthāmā—ang pag-alis mo mula sa harap ng malupit na si Karṇa ay wari’y siyang maingat na landas. Sa digmaan, ang pag-iingat na nagliligtas sa hari at sa adhikain ay isa ring anyo ng dharma.”

Verse 17

न हान्ययोद्धा विद्यते सृञ्जयानां महारथं योउद्य सहेत कर्णम्‌ । पाण्डुनन्दन! मैंने युद्धमें अपने सामने कर्णके इस विचित्र अस्त्रको देखा था। सूंजयोंमें दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं है, जो आज महारथी कर्णका सामना कर सके ।। शैनेयो मे सात्यकिश्रक्ररक्षौ धृष्टय्युम्नश्वञापि तथैव राजन्‌

Wika ni Arjuna: “Sa mga Sṛñjaya, wala nang ibang mandirigma na makatatagal kay Karṇa, ang dakilang mandirigmang-karwahe, sa araw na ito. O anak ni Pāṇḍu, nakita ko sa digmaan sa harap ko ang kakaibang sandata ni Karṇa. Kaya’t hayaang si Śaineya Sātyaki at ako ang tumayong mga bantay; at si Dhṛṣṭadyumna—at ikaw rin, O hari—ay gayundin.”

Verse 18

रथप्रवीरेण महानुभाव द्विषत्सैन्ये वर्तता दुस्तरेण,महानुभाव! भरतवंशी नृपश्रेष्ठ! शत्रुसेनामें विद्यमान रथियोंमें प्रमुख वीर दुर्जय सूतपुत्र कर्णके साथ, यदि इस संग्राममें आज वह मुझे दीख जाय तो युद्धस्थलमें मिलकर मैं उसी तरह युद्ध करूँगा, जैसे वज्रधारी इन्द्रने वृत्रासुरके साथ किया था

Wika ni Arjuna: “O marangal, sa hukbong kaaway na mahirap tawirin at pinangungunahan ng mga pangunahing mandirigmang-karwahe, naroon si Karṇa, anak ng tagapagmaneho—ang di-matatalong bayani, pinuno sa mga rathin. Kung sa araw na ito, sa labang ito, siya’y masilayan ko, haharapin ko siya sa larangan at lalabanan ko siya gaya ni Indra, tagapagdala ng vajra, nang labanan niya si Vṛtra.”

Verse 19

समेत्याहं सपुत्रेण संख्ये वृत्रेण वज्रीव नरेन्‍्द्रमुख्य । योत्स्याम्यहं भारत सूतपुत्र- मस्मिन्‌ संग्रामे यदि वै दृश्यतेडद्य,महानुभाव! भरतवंशी नृपश्रेष्ठ! शत्रुसेनामें विद्यमान रथियोंमें प्रमुख वीर दुर्जय सूतपुत्र कर्णके साथ, यदि इस संग्राममें आज वह मुझे दीख जाय तो युद्धस्थलमें मिलकर मैं उसी तरह युद्ध करूँगा, जैसे वज्रधारी इन्द्रने वृत्रासुरके साथ किया था

Wika ni Arjuna: “O pinakadakila sa mga hari! Kung ngayong araw, sa labang ito, masilayan ko si Karṇa—ang anak ng tagapaghatid ng karwahe—lalapit ako sa kanya sa larangan at makikipaglaban gaya ng pakikipaglaban ni Indra, tagapagdala ng kulog na sandata, kay Vṛtra. Matibay ang aking pasya na harapin siya nang tuwiran at makipagtunggali nang walang pag-urong, sapagkat ang katarungan ng digmaan ay ngayo’y nakasalalay sa pagharap sa pangunahing mandirigma sa hanay ng mga karwaheng mandirigma ng kaaway.”

Verse 20

आयाहि पश्याद्य युयुत्समानं मां सूतपुत्रस्य रणे जयाय । महोरगस्येव मुखं प्रपन्ना: प्रभद्रका: कर्णमभिद्रवन्ति,आइये, देखिये, आज मैं रणभूमिमें सूतपुत्रपर विजय पानेके लिये युद्ध करना चाहता हूँ। प्रभद्रकगण कर्णपर धावा कर रहे हैं, ऐसा करके वे मानो अजगरके मुखमें पड़ गये हैं

“Halika, masdan mo ngayon: nais kong makipaglaban sa larangan upang magwagi laban sa anak ng tagapaghatid ng karwahe. Ang mga Prabhadraka ay sumasalakay kay Karṇa; sa paggawa nito, wari’y nahuhulog sila sa bunganga ng isang dambuhalang sawa.”

Verse 21

षट्साहस्रा भारत राजपूुत्रा: स्वर्गाय लोकाय रणे निमग्ना: । कर्ण न चेदद्य निहन्मि राजन्‌ सबान्धवं युध्यमानं प्रसहु

Wika ni Arjuna: “O prinsipe ng Bhārata, anim na libong anak ng mga hari ang sumuong sa labang ito alang-alang sa langit at sa kabilang daigdig. Kaya, O Hari, kung ngayong araw ay hindi ko mapapatay si Karṇa—kahit pa siya’y nakikipaglaban nang mabangis kasama ang kanyang mga kamag-anak—magiging walang saysay ang pagdanak ng dugo at mananatiling di-natupad ang aking tungkulin sa digmaan.”

Verse 22

प्रतिश्रुत्याकुर्वतो वै गतिर्या कष्टा याता तामहं राजसिंह । भारत! छ: हजार राजकुमार स्वर्गलोकमें जानेके लिये युद्धके सागरमें मग्न हो गये हैं। राजन! राजसिंह! यदि आज मैं बन्धुओंसहित युद्धमें तत्पर हुए कर्णको हठपूर्वक न मार डालूँ तो प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करनेवालेको जो दुःखदायी गति प्राप्त होती है, उसीको मैं भी पाऊँगा ।। आमन्त्रये त्वां ब्रूहि जयं रणे मे पुरा भीम॑ धार्तराष्ट्रा ग्रसन्‍्ते,मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ। आप रणभूमिमें मेरी विजयका आशीर्वाद दीजिये। नरेन्द्रसिंह! धृतराष्ट्रके पुत्र भीमसेनको ग्रस लेनेकी चेष्टा कर रहे हैं। मैं इसके पहले ही सूतपुत्र कर्णको, उसकी सेनाको तथा सम्पूर्ण शत्रुओंकी मार डालूँगा

Wika ni Arjuna: “O leon sa mga hari, mabigat ang kapalarang dumarating sa sinumang sumumpa ngunit hindi tumutupad; ayaw kong masadlak sa gayong kapahamakan. O Bhārata, anim na libong prinsipe ang lumubog sa dagat ng digmaan upang marating ang langit. O Hari, O leon ng mga pinuno, kung ngayong araw ay hindi ko mapapatay, sa matatag na pasya, si Karṇa na handang makipaglaban kasama ang kanyang mga kamag-anak, ako man ay tatanggap ng masakit na wakas na nakalaan sa sumisira ng panata. Kaya hinihingi ko ang iyong pahintulot: pagpalain mo ang aking tagumpay sa labang ito. Sinisikap ng mga anak ni Dhṛtarāṣṭra na lamunin si Bhīmasena; bago pa iyon mangyari, uunahin kong patayin si Karṇa, ang kanyang hukbo, at ang lahat ng kaaway.”

Verse 23

सौतिं हनिष्यामि नरेन्द्रसिंह सैन्यं तथा शत्रुगणांश्व सर्वान्‌,मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ। आप रणभूमिमें मेरी विजयका आशीर्वाद दीजिये। नरेन्द्रसिंह! धृतराष्ट्रके पुत्र भीमसेनको ग्रस लेनेकी चेष्टा कर रहे हैं। मैं इसके पहले ही सूतपुत्र कर्णको, उसकी सेनाको तथा सम्पूर्ण शत्रुओंकी मार डालूँगा

Wika ni Arjuna: “O leon ng mga hari! Papatayin ko si Karṇa, ang anak ng tagapaghatid ng karwahe, kasama ang kanyang hukbo at ang lahat ng pangkat ng kaaway. Ngayon ay hinihingi ko ang iyong pahintulot—pagpalain mo ang aking tagumpay sa larangan. Sinisikap ng mga anak ni Dhṛtarāṣṭra na lamunin si Bhīmasena; bago pa iyon mangyari, ako ang unang aatake at wawasakin si Karṇa, ang kanyang mga puwersa, at ang buong hukbo ng kaaway.”

Verse 66

इस प्रकार श्रीमह्याभारत कर्णपर्वमें युधिष्िरवाक्यविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ

Sa ganitong paraan nagwakas ang ika-animnapu’t anim na kabanata ng Karṇa Parva ng banal na Mahābhārata, ang kabanatang nakatuon sa mga salitang binigkas ni Yudhiṣṭhira. Ang pangwakas na kolofon na ito ang tanda ng pagkatapos ng bahaging iyon, na inilalagay ang talumpati ni Yudhiṣṭhira bilang sentrong gabay sa dharma at sa daloy ng salaysay sa loob ng mas malawak na digmaan.

Verse 67

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनवाक्ये सप्तषष्टितमो5ध्याय:

Sa gayon, sa kagalang-galang na Mahābhārata, sa loob ng Karṇa Parva, sa bahaging naglalaman ng mga salita ni Arjuna, nagwakas ang ika-animnapu’t pitong kabanata.

Verse 176

युधामन्युश्नोत्तमौजा श्व शूरौ पृष्ठतो मां रक्षतां राजपुत्रौ । राजन! शिनिपौत्र सात्यकि और धृष्टद्युम्न मेरे चक्ररक्षक हों; युधामन्यु और उत्तमौजा --ये दोनों शूरवीर राजकुमार मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें

Sinabi ni Arjuna: “Hayaang ang mga maharlikang prinsipe na sina Yudhāmanyu at Uttamaujā—kapwa mababangis na bayani—ang magbantay sa aking likuran. O Hari, hayaang si Sātyaki, apo ni Śini, at si Dhṛṣṭadyumna ang maging tagapagtanggol ng mga gulong ng aking karwahe.” Sa siksik ng labanan, inayos ni Arjuna ang isang disiplinadong pananggalang na hanay, itinalaga ang mga kapanalig na mapagkakatiwalaan upang bantayan ang mga bahaging madaling tamaan, upang magampanan niya ang tungkulin ng mandirigma nang walang kaguluhan at walang di-kinakailangang pagkalagas.

Frequently Asked Questions

The chapter presents the dilemma of selective dharma: Karṇa’s wartime appeal to righteousness is interrogated against his earlier sabhā participation in harm and humiliation, raising the question of whether dharma can be invoked without prior ethical consistency.

Ethical continuity: actions and speech in moments of power (especially public institutions like the sabhā) generate long-term moral consequence; present claims to virtue are evaluated against historical conduct and its societal impact.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary operates narratively through consequence-imagery (loss of banner, radiance departing, army’s reaction), signaling the didactic point that moral and social order reasserts itself through cumulative causality.