कृपवाक्यं तथा नीत्युपदेशः
Kṛpa’s Counsel and a Discourse on Statecraft
तत्र बुद्धि प्रवक्ष्यामि पाण्डवान् प्रति भारत । न तु नीति: सुनीतस्य शक््यते<न्वेषितुं परै:,“भरतनन्दन! पाण्डवोंके विषयमें मेरी बुद्धिका जो निश्चय है, उसे बताता हूँ। जो उत्तम नीतिसे सम्पन्न है, उसकी उस नीतिका अनुसंधान दूसरे (अनीतिपरायण) मनुष्य नहीं कर सकते
โอ้ผู้เป็นความชื่นใจแห่งภารตะ! ข้าพเจ้าจะกล่าวความเห็นอันแน่วแน่ในใจเกี่ยวกับปาณฑพทั้งหลาย นโยบายของผู้มีสุ-นีติ (ปรีชารอบคอบอันงาม) นั้น ผู้อื่นย่อมสืบค้นให้ถึงแก่นแท้ไม่ได้
वैशम्पायन उवाच