Agastya’s Encounter with Ilvala and Vātāpi; Dāna, Progeny, and the Renown of Agastya-Āśrama
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ,असंशयं प्रजाहेतोर्भाया पतिरविन्दत | या तु त्वयि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमहसि “महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि पतिदेवने अपनी इस पत्नीको संतानके लिये ही ग्रहण किया है, परंतु आपके प्रति मेरे हृदयमें जो प्रीति है, वह भी आपको सफल करनी चाहिये
asaṁśayaṁ prajā-hetor bhāryāṁ patir avindata | yā tu tvayi mama prītis tām ṛṣe kartum arhasi ||
ปราศจากข้อกังขา สามีย่อมรับภรรยาเพื่อเหตุแห่งบุตร; แต่โอ้ฤๅษี ความรักที่ข้าพเจ้ามีต่อท่านนั้น ท่านก็ควรทำให้สมดังใจด้วย
लोगश उवाच