Adhyāya 188: Mārkaṇḍeya’s Account of Yuga-Decline and the Restoration Motif
Kali-yuga to Kalki
अस्मिन् हिमवत: शृज्रे नावं बध्नीत मा चिरम् | सा बद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ,भरतकुलभूषण नरेश्वरर! आकाश और द्युलोक सब कुछ जलमय ही प्रतीत होता था। इस प्रकार जब सारा विश्व एकार्णवके जलमें डूबा हुआ था, उस समय केवल सप्तर्षि, मनु और मत्स्य भगवान्--ये ही नौ व्यक्ति दृष्टिगोचर होते थे। राजन! इस तरह बहुत वर्षोतक भगवान् मत्स्य आलस्यरहित होकर उस अगाध जलराशिमें उस नौकाको खींचते रहे। भरतकुलतिलक! तदनन्तर हिमालयका जो सर्वोच्च शिखर था, वहाँ मत्स्यभगवान् उस नावको खींचकर ले गये। कुरुनन्दन! तब वे धीरे-धीरे हँसते हुए उन समस्त ऋषियोंसे बोले --“आपलोग हिमालयके इस शिखरमें इस नावको शीघ्र बाँध दें।” भरतश्रेष्ठ! मत्स्यका वह वचन सुनकर उन महर्षियोंने तुरंत वहाँ हिमालयके शिखरमें वह नौका बाँध दी। तभीसे हिमालयका वह उत्तम शिखर “नौका-बन्धन' के नामसे विख्यात हुआ
mārkaṇḍeya uvāca | asmin himavataḥ śṛṅge nāvaṃ badhnīta mā ciram | sā baddhā tatra tais tūrṇam ṛṣibhir bharatarṣabha ||
มารกัณฑेयกล่าวว่า “‘จงผูกเรือนี้ไว้บนยอดหิมวัตนี้—อย่าชักช้า’ โอ้ยอดแห่งภารตะ แล้วเหล่าฤๅษีก็ผูกเรือไว้ ณ ที่นั้นโดยพลัน”
मार्कण्डेय उवाच
In a time of overwhelming crisis, dharma is protected through prompt, disciplined action and trust in higher guidance; delay and disorder endanger collective survival.
Mārkaṇḍeya recounts the flood episode: the sages are instructed to quickly tie the boat to a Himalayan peak, and they immediately secure it there.