Kailāsa-darśana, Badarī-vāsa, and Sarasvatī–Dvaitavana Transition (कैलासदर्शन–बदरीवास–सरस्वतीद्वैतवनगमनम्)
अर रत (0) है ० त्रिसप्तत्यांधिकशततमोब< ध्याय: अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन अजुन उवाच निवर्तमानेन मया महदू दृष्टं ततो5परम् पुरं कामचरं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम्,अर्जुन बोले--राजन्! तत्पश्चात् लौटते समय मार्ममें मैंने एक दूसरा दिव्य एवं विशाल नगर देखा, जो अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। वह अपने निवासियोंकी इच्छाके अनुसार सर्वत्र आ-जा सकता था
Arjuna uvāca: nivartamānena mayā mahad dṛṣṭaṃ tato 'param | puraṃ kāmacaraṃ divyaṃ pāvakārka-samaprabham ||
อรชุนทูลว่า “ข้าแต่พระราชา ครั้นข้าพเจ้ากำลังกลับมา ก็ได้เห็นสิ่งอัศจรรย์ยิ่งกว่าก่อนหน้า—นครทิพย์อันกว้างใหญ่ ซึ่งเคลื่อนไปได้ตามปรารถนา ส่องประกายดุจเพลิงและสุริยัน นครนั้นไปได้ทุกแห่งตามความประสงค์ของชาวนคร”
अजुन उवाच