द्रौपदीश्रमः तथा घटोत्कचस्मरणम्
Draupadī’s Exhaustion and the Summoning of Ghaṭotkaca
निर्जग्मुस्ते शनै: सर्वे समाजम्मुश्न भारत । प्रतस्थिरे पुनर्वीरा: पर्वत॑ गन्धमादनम्,भारत! थोड़ी देर बाद जब तूफानका कोलाहल शान्त हुआ, वायुका वेग कम एवं सम हो गया, पर्वतका सारा जल बहकर नीचे चला गया और बादलोंका आवरण दूर हो जानेसे सूर्यदेव प्रकाशित हो उठे, उस समय वे समस्त वीर पाण्डव धीरे-धीरे अपने स्थानसे निकले और गन्धमादन पर्वतकी ओर प्रस्थित हो गये
vaiśampāyana uvāca |
nirjagmus te śanaiḥ sarve samājaṃ muśna bhārata |
pratastire punar vīrāḥ parvataṃ gandhamādanam ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า ข้าแต่ภารตะ ครั้นนั้นพวกเขาทั้งหมดค่อย ๆ ออกมาและมาชุมนุมพร้อมกัน แล้วเหล่าวีรชนก็ออกเดินทางอีกครั้งสู่เขาคันธมาทนะ
वैशम्पायन उवाच