Cyavana’s Tapas, Sukanyā’s Curiosity, and Śaryāti’s Appeasement (च्यवन-सुकन्या-उपाख्यान आरम्भ)
तथा स संवृतो धीमान् मृत्पिण्ड इव सर्वश: । तप्यते सम तपो घोरं वल्मीकेन समावृत:,इस प्रकार लता-वेलोंसे आच्छादित हो बुद्धिमान् च्यवन मुनि सब ओरसे केवल मिट्टीके लोंदेके समान जान पड़ने लगे। दीमकोंद्वारा जमा की हुई मिट्टीके ढेरसे ढके हुए वे बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे
ครั้นถูกปกคลุมดังนั้น ฤๅษีผู้มีปัญญาก็ดูประหนึ่งก้อนดินทั้งมวลทั่วกาย แม้ถูกดินแห่งจอมปลวกห่อหุ้ม เขาก็ยังทรงตบะอันน่าครั่นคร้ามอย่างมั่นคงมิหวั่นไหว
लोगश उवाच