Adhyāya 222 — ब्रह्मस्थानप्राप्ति: मोक्षधर्मे समत्वव्रतम्
Attaining the Brahman-Station: The Vow of Equanimity in Mokṣadharma
ममता, अहंकार तथा कामनाओंसे शून्य और सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित हो आत्मनिष्ठ एवं असंग रहकर मैं प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाशको सदा देखता रहता हूँ ।। कृतप्रज्ञस्य दान्तस्य वितृष्णस्य निराशिष: । नायासो विद्यते शक्र पश्यतो लोकमव्ययम्,इन्द्र! मैं शुद्ध-बुद्धि तथा मन और इन्द्रियोंको अपने अधीन करके स्थित हूँ। मैं तृष्णा और कामनासे रहित हूँ और सदा अविनाशी आत्मापर ही दृष्टि रखता हूँ, इसलिये मुझे कभी कष्ट नहीं होता
kṛtaprajñasya dāntasya vitṛṣṇasya nirāśiṣaḥ | nāyāso vidyate śakra paśyato lokam avyayam ||
โอ้ศักระ (อินทรา) สำหรับผู้มีปัญญามั่นคง ผู้สำรวมอินทรีย์ ผู้ปราศจากความกระหายและความหวังในผลตอบแทน—ผู้เห็นอาตมันอันไม่เสื่อมสูญท่ามกลางโลก—ย่อมไม่มีความฝืดเคืองหรือทุกข์ภายในเลย
प्रह्माद उवाच