कर्णपर्व — अध्याय ४०
Karṇa’s Pressure on the Pāñcālas; Duryodhana Disabled; Arjuna’s Counter-Advance
यथैव मनत्तो मद्येन त्वं तथा लक्ष्यसे वृष | तथाद्य त्वां प्रमाद्यन्तं चिकित्सेयं सुहृत्तया,किंतु वृषभस्वरूप कर्ण! जैसे कोई मदिरासे मतवाला हो गया हो, उसी प्रकार तुम भी उन्मत्त दिखायी दे रहे हो; अतः मैं हितैषी सुहृद् होनेके नाते तुम-जैसे प्रमत्तकी आज चिकित्सा करूँगा
โอ้กรรณะผู้ดุจพฤษภ! เจ้าดูประหนึ่งคนเมามายด้วยสุรา; เพราะฉะนั้น ในฐานะสหายผู้หวังดี วันนี้เราจักรักษาและแก้ความประมาทของเจ้า
संजय उवाच