Ādi-parva Adhyāya 33: Vāsuki’s Council on Averting the Sarpa-satra
प्रहसउश्लक्षणया वाचा तथा वज़्समाहत: । ऋषेर्मान करिष्यामि वज् यस्यास्थिसम्भवम्,विहंगप्रवर गरुडने उस युद्धमें वज्जाहत होकर भी हँसते हुए मधुर वाणीमें इन्द्रसे कहा --'देवराज! जिनकी हड्डीसे यह वज्र बना है, उन महर्षिका सम्मान मैं अवश्य करूँगा। शतक्रतो! ऋषिके साथ-साथ तुम्हारा और तुम्हारे वज़का भी आदर करूँगा; इसीलिये मैं अपनी एक पाँख, जिसका तुम कहीं अन्त नहीं पा सकोगे, त्याग देता हूँ
prahasann uślakṣaṇayā vācā tathā vajreṇa samāhataḥ | ṛṣer mānaṃ kariṣyāmi vajrasya yasyāsthi-sambhavam ||
แม้ถูกวัชระกระแทก ครุฑก็หัวเราะแล้วกล่าวด้วยวาจาอ่อนโยนเป็นมงคลว่า “ข้าจักเคารพฤๅษีผู้ซึ่งกระดูกของท่านเป็นกำเนิดแห่งวัชระนี้อย่างแน่นอน.”
शौनक उवाच