Previous Verse
Next Verse

Shloka 26

Gaṅgādvāra-tīrtha, Ulūpī-saṃvāda, and Arjuna’s Dharma-Deliberation (गङ्गाद्वार-तीर्थम्, उलूपी-संवादः)

(धृतराड्ट उवाच अभिषेकस्य सम्भारान्‌ क्षत्तरानय मा चिरम्‌ | अभिषिक्तं करिष्यामि अद्य वै कुरुनन्दनम्‌ ।। ब्राह्मणा नैगमश्रेष्ठा: श्रेणीमुख्याश्व॒ सर्वश: । आहूयन्तां प्रकृतयो बान्धवाश्न विशेषतः ।। पुण्याहं वाच्यतां तात गोसहस्रं तु दीयताम्‌ । ग्राममुख्याश्न विप्रेभ्यो दीयन्तां सहदक्षिणा: ।। अड्डदे मुकुटं क्षत्त: हस्ताभरणमानय ।। मुक्तावलीश्व॒ हारं च निष्कादीन्‌ कुण्डलानि च | कटिबन्धश्च सूत्र च तथोदरनिबन्धनम्‌ ।। अष्टोत्तरसहसं्र तु ब्राह्मणाधिष्ठिता गजा: । जाह्नवीसलिलं शीघ्रमानयन्तु पुरोहितैः ।। अभिषेकोदकक्लिन्नं सर्वांभरणभूषितम्‌ । औपवाह्योपरिगतं दिव्यचामरवीजितम्‌ ।। सुवर्णमणिचित्रेण श्वेतच्छत्रेण शोभितम्‌ | जयेति द्विजवाक्येन स्तूयमानं नृपैस्तथा ।। दृष्ट्वा कुन्तीसुतं ज्येष्ठमाजमीढं युधिष्ठिरम्‌ । प्रीता: प्रीतेन मनसा प्रशंसन्तु पुरे जना: ।। पाण्डो: कृतोपकारस्य राज्यं दत्त्वा ममैव च | प्रतिक्रियाकृतमिदं भविष्यति न संशय: ।। (फिर) धृतराष्ट्रने (विदुरसे) कहा--विदुर! तुम राज्याभिषेककी सामग्री लाओ, इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये। मैं आज ही कुरुकुलनन्दन युधिष्ठिरका अभिषेक करूँगा। वेदवेत्ता दिद्वानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण, नगरके सभी प्रमुख व्यापारी, प्रजावर्गके लोग और विशेषत: बन्धु-बान्धव बुलाये जायँ। तात! पुण्याहवाचन कराओ और ब्राह्मणोंको दक्षिणाके साथ एक सहस्र गौएँ तथा मुख्य-मुख्य ग्राम दो। विदुर! दो भुजबंद, एक सुन्दर मुकुट तथा हाथके आभूषण मँगाओं। मोतीकी कई मालाएँ, हार, पदक, कुण्डल, करधनी, कटिसूत्र तथा उदरबन्ध भी ले आओ। एक हजार आठ हाथी मँगाओ, जिनपर ब्राह्मण सवार हों। पुरोहितोंके साथ जाकर वे हाथी शीघ्र गंगाजीका जल ले आयें। युधिष्ठिर अभिषेकके जलसे भीगे हों, समस्त आभूषणोंसे उन्हें विभूषित किया गया हो, वे राजाकी सवारीके योग्य गजराजपर बैठे हों, उनपर दिव्य चँवर ढुल रहे हों और उनके मस्तकके ऊपर सुवर्ण और मणियोंसे विचित्र शोभा धारण करनेवाला श्वेत छत्र सुशोभित हो, ब्राह्मणोंद्वारा की हुई जय- जयकारके साथ बहुत-से नरेश उनकी स्तुति करते हों। इस प्रकार कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्र अजमीढकुलतिलक युधिष्छिरका प्रसन्नमनसे दर्शन करके प्रसन्न हुए पुरवासीजन इनकी भ्रि-भूरि प्रशंसा करें। राजा पाण्डुने मुझे ही अपना राज्य देकर जो उपकार किया था, उसका बदला इसीसे पूर्ण होगा कि युधिष्ठिरका राज्याभिषेक कर दिया जाय; इसमें संशय नहीं है। वैशम्पायन उवाच भीष्मो द्रोण: कृपः क्षत्ता साधु साध्वित्यभाषत | वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर भीष्म, द्रोण, कृप तथा विदुरने कहा --“बहुत अच्छा! बहुत अच्छा! श्रीवायुदेव उवाच युक्तमेतन्महाराज कौरवाणां यशस्करम्‌ | शीघ्रमद्यैव राजेन्द्र यथोक्तं कर्तुमरहसि ।। (तब) भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले--महाराज! आपका यह विचार सर्वथा उत्तम तथा कौरवोंका यश बढ़ानेवाला है। राजेन्द्र! आपने जैसा कहा है, उसे आज ही जितना शीघ्र सम्भाव हो सके, पूर्ण कर डालिये। वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्त्वा वार्ष्णेयस्त्वरयामास तं तदा । यथोक्तं धृतराष्ट्स्य कारयामास कौरव: ।। तस्मिन्‌ क्षणे महाराज कृष्णद्वैपायनस्तदा । आगत्य कुरुभि: सर्व: पूजित: स सुहृदगणै: ।। मूर्धावसिक्ते: सहितो ब्राह्मुणैवेंदपारगै: । कारयामास विधिवत्‌ केशवानुमते तदा ।। कृपो द्रोणश्न भीष्मश्न धौम्यश्न व्यासकेशवौ । बाह्लीक:ः सोमदत्तश्न चातुर्वेद्यपुरस्कृता: ।। अभिषेक तदा चक्कुर्भद्रपीठे सुसंयतम्‌ । जित्वा तु पृथिवीं कृत्स्नां वशे कृत्वा नररषभान्‌ ।। राजसूयादिभिर्यज्ञि: क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै: । स्नात्वा हवभूथस्नानं मोदतां बान्धवै: सह ।। एवमुक्‍्त्वा तु ते सर्वे आशीर्भिरभिपूजयन्‌ । मूर्धाभिषिक्त: कौरव्य सर्वाभरणभूषित: ।। जयेति संस्तुतो राजा प्रददौ धनमक्षयम्‌ | सर्वमूर्धावसिक्ति श्व पूजित: कुरुनन्दन: ।। औपवाह्॒मथारुह्ा श्वेतच्छत्रेण शोभित: । रराजानुगतो राजा महेन्द्र इव दैवतै: ।। ततः प्रदक्षिणीकृत्य नगरं नागसाह्दयम्‌ | प्रविवेश ततो राजा नागरै: पूजितो भृशम्‌ ।। मूर्थाभिषिक्त कौन्तेयम भ्यनन्दन्त बान्धवा: । गान्धारिपुत्रा: शोचन्त: सर्वे ते सह बान्धवै: ।। ज्ञात्वा शोकं तु पुत्राणां धृतराष्ट्रोडब्रवीन्ञपम्‌ । समक्ष वासुदेवस्य कुरूणां च समक्षत: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--इतना कहकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन्हें जल्दी करनेकी प्रेरणा दी। विदुरजीने धृतराष्ट्रके कथनानुसार सब कार्य पूर्ण कर दिया। उसी समय, राजन! वहाँ महर्षि कृष्णद्वैपायन पधारे। समस्त कौरवोंने अपने सुहृदोंके साथ आकर उनकी पूजा की। तब वेदोंके पारंगत विद्वान ब्राह्मणों तथा मूर्धाभिषिक्त नरेशोंके साथ मिलकर भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सम्मतिके अनुसार व्यासजीने विधिपूर्वक अभिषेक-कार्य सम्पन्न किया। कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, भीष्म, धौम्य, व्यास, श्रीकृष्ण, बाह्नीक और सोमदत्तने चारों वेदोंके विद्वानोंको आगे रखकर भद्रपीठपर संयमपूर्वक बैठे हुए युधिष्ठिरा उस समय अभिषेक किया और सबने यह आशीर्वाद दिया कि 'राजन्‌! तुम सारी पृथ्वीको जीतकर सम्पूर्ण नरेशोंको अपने अधीन करके प्रचुर दक्षिणासे युक्त राजसूय आदि यज्ञ-याग पूर्ण करनेके पश्चात्‌ अवभूथ-स्नान करके बन्धु-बान्धवोंके साथ सुखी रहो।” जनमेजय! यों कहकर उन सबने अपने आशीर्वादोंद्वारा युधिष्ठिरका सम्मान किया। समस्त आभूषणोंसे विभूषित, मूर्धाभिषिक्त राजा युधिष्ठिरने अक्षय धनका दान किया। उस समय सब लोगोंने जय- जयकारपूर्वक उनकी स्तुति की। समस्त मूर्धाभिषिक्त राजाओंने भी कुरुनन्दन युधिष्ठिरका पूजन किया। फिर वे राजोचित गजराजपर आखरूढ़ हो श्वेत छत्रसे सुशोभित हुए। उनके पीछे-पीछे बहुत-से मनुष्य चल रहे थे। उस समय देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। समस्त हस्तिनापुर नगरकी परिक्रमा करके राजाने पुन: राजधानीमें प्रवेश किया। उस समय नागरिकोंने उनका विशेष समादर किया। बन्धु-बान्धवोंने भी मूर्धाभिषिक्त राजा युधिष्ठिरका सादर अभिनन्दन किया। यह सब देखकर वे गान्धारीके दुर्योधन आदि सभी पुत्र अपने भाइयोंके साथ शोकातुर हो रहे थे। अपने पुत्रोंकी शोक हुआ जानकर धृतराष्ट्रने भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा कौरवोंके समक्ष राजा युधिष्ठिरसे (इस प्रकार) कहा। धृतराष्ट्र रवाच अभिषेक त्वया प्राप्तं दुष्प्रपमकृतात्मभि: । गच्छ त्वमद्यैव नृप कृतकृत्योडसि कौरव ।। आयु: पुरूरवा राजन्‌ नहुषश्न ययातिना । तत्रैव निवसन्ति सम खाण्डवाद्दि नृपोत्तम ।। राजधानी तु सर्वेषां पौरवाणां महाभुज । विनाशितं मुनिगणैलों भाद्‌ बुधसुतस्य च ।। तस्मात्‌ त्वं खाण्डवप्रस्थं पुरं राष्ट्र च वर्धय । ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्न॒ कृतनिश्चया: ।। त्वद्भक्त्या जन्तवश्वान्ये भजन्त्वेव पुरं शुभम्‌ । पुरं राष्ट्र समृद्ध वै धनधान्यै: समावृतम्‌ ।। तस्माद्‌ गच्छस्व कौन्तेय भ्रातृभि: सहितो5नघ ।) धृतराष्ट्र बोले--कुरुनन्दन! तुमने वह राज्याभिषेक प्राप्त किया है, जो अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्लभ है। राजन! तुम राज्य पाकर कृतार्थ हो गये। अतः आज ही खाण्डवप्रस्थ चले जाओ। नृपश्रेष्ठ! पुरूरवा, आयु, नहुष तथा ययाति खाण्डवप्रस्थमें ही निवास करते थे। महाबाहो! वहीं समस्त पौरव नरेशोंकी राजधानी थी। आगे चलकर मुनियोंने बुधपुत्रके लोभसे खाण्डवप्रस्थको नष्ट कर दिया था। इसलिये तुम खाण्डवप्रस्थ नगरको पुनः बसाओ और अपने राष्ट्रकी वृद्धि करो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सबने तुम्हारे साथ वहाँ जानेका निश्चय किया है। तुममें भक्ति रखनेके कारण दूसरे लोग भी उस सुन्दर नगरका आश्रय लेंगे। निष्पाप कुन्तीकुमार! वह नगर तथा राष्ट्र समृद्धिशाली और धन-धान्यसे सम्पन्न है। अतः तुम भाइयोंसहित वहीं जाओ। वैशम्पायन उवाच प्रतिगृह्म तु तद्‌ वाक्य नृपं सर्वे प्रणम्य च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रकी बात मानकर पाण्डवोंने उन्हें प्रणाम किया और आधा राज्य पाकर वे खाण्डवप्रस्थकी ओर चल दिये, जो भयंकर वनके रूपमें था। धीरे-धीरे वे खाण्डवप्रस्थमें जा पहुँचे

vaiśampāyana uvāca |

(dhṛtarāṣṭra uvāca)

abhiṣekasya sambhārān kṣattārānaya mā ciram |

abhiṣiktaṁ kariṣyāmi adya vai kurunandanam ||

brāhmaṇā naigamaśreṣṭhāḥ śreṇīmukhyāś ca sarvaśaḥ |

āhūyantāṁ prakṛtayo bāndhavāś ca viśeṣataḥ ||

puṇyāhaṁ vācyatāṁ tāta gosahasraṁ tu dīyatām |

grāmamukhyāś ca viprebhyo dīyantāṁ sahadakṣiṇāḥ ||

ānaya me mukuṭaṁ kṣattaḥ hastābharaṇam ānaya |

muktāvalīś ca hāraṁ ca niṣkādīn kuṇḍalāni ca ||

kaṭibandhaś ca sūtraṁ ca tathodarānibandhanam |

aṣṭottarasahasraṁ tu brāhmaṇādhiṣṭhitā gajāḥ |

jāhnavīsalilaṁ śīghram ānayantu purohitaiḥ ||

abhiṣekodakaklinnaṁ sarvābharaṇabhūṣitam |

aupavāhyoparigataṁ divyacāmaravījitam ||

suvarṇamaṇicitreṇa śvetacchatreṇa śobhitam |

jayeti dvijavākyena stūyamānaṁ nṛpais tathā ||

dṛṣṭvā kuntīsutaṁ jyeṣṭham ājamīḍhaṁ yudhiṣṭhiram |

prītāḥ prītena manasā praśaṁsantu pure janāḥ ||

pāṇḍoḥ kṛtopakārasya rājyaṁ dattvā mamaiva ca |

pratikriyākṛtam idaṁ bhaviṣyati na saṁśayaḥ ||

(iti dhṛtarāṣṭravacanam)

vaiśampāyana uvāca |

bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ kṣattā sādhu sādhv ity abhāṣata ||

ธฤตราษฏระตรัสว่า “โอ้กษัตฤ (วิทุระ) จงนำเครื่องเตรียมพิธีราชาภิเษกมาโดยพลัน อย่าชักช้า วันนี้เราจักประกอบราชาภิเษกแก่ยุดิษฐิระ ผู้เป็นความชื่นใจแห่งวงศ์กุรุ จงเชิญพราหมณ์ผู้ทรงเวทผู้เลิศ บรรดาพ่อค้าใหญ่แห่งนคร หัวหน้าสมาคมการค้า ประชาราษฎร์ และโดยเฉพาะญาติวงศ์ทั้งหลายให้มาพร้อมหน้า ลูกเอ๋ย จงให้สวดพุณยาหะ และจงถวายโคหนึ่งพันพร้อมทักษิณา อีกทั้งมอบหมู่บ้านสำคัญแก่พราหมณ์ทั้งหลาย วิทุระ จงนำมงกุฎ กำไลต้นแขน เครื่องประดับมือ พวงมุกและสร้อยคอ เหรียญทอง ตุ้มหู เข็มขัด สายรัดเอว และผ้ารัดท้องมา และให้ช้างหนึ่งพันแปดเชือก—มีพราหมณ์ประจำช้าง—ไปพร้อมปุโรหิตโดยเร็ว เพื่อนำสายน้ำแห่งชาห์นวี (คงคา) มา”

धृतराष्ट्रःDhritarashtra
धृतराष्ट्रः:
Karta
TypeNoun
Rootधृतराष्ट्र
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect, Third, Singular
अभिषेकस्यof the consecration
अभिषेकस्य:
TypeNoun
Rootअभिषेक
FormMasculine, Genitive, Singular
सम्भारान्preparations/materials
सम्भारान्:
Karma
TypeNoun
Rootसम्भार
FormMasculine, Accusative, Plural
क्षत्तःO chamberlain (Vidura)
क्षत्तः:
Sampradana
TypeNoun
Rootक्षत्तृ
FormMasculine, Vocative, Singular
आनयbring
आनय:
TypeVerb
Rootनी
FormImperative, Second, Singular
माdo not
मा:
TypeIndeclinable
Rootमा
चिरम्long (time)
चिरम्:
TypeIndeclinable
Rootचिर
अभिषिक्तम्consecrated
अभिषिक्तम्:
Karma
TypeAdjective
Rootअभिषिक्त
FormMasculine, Accusative, Singular
करिष्यामिI will make/do
करिष्यामि:
TypeVerb
Rootकृ
FormSimple Future, First, Singular
अद्यtoday
अद्य:
TypeIndeclinable
Rootअद्य
वैindeed
वै:
TypeIndeclinable
Rootवै
कुरुनन्दनम्the joy of the Kurus (Yudhishthira)
कुरुनन्दनम्:
Karma
TypeNoun
Rootकुरुनन्दन
FormMasculine, Accusative, Singular

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśampāyana
D
Dhṛtarāṣṭra
V
Vidura (Kṣattṛ)
Y
Yudhiṣṭhira
K
Kuntī
P
Pāṇḍu
B
Bhīṣma
D
Droṇa
K
Kṛpa
B
Brāhmaṇas
P
purohitas (priests)
K
kings (nṛpas)
C
citizens of the city (pura-jana)
J
Jāhnavī (Gaṅgā)
C
crown (mukuṭa)
W
white parasol (śvetacchatra)
C
cāmara (royal whisk-fans)
E
elephants (gaja)
C
cows (go)

Educational Q&A

The passage links royal authority to dharma through ritual propriety and public welfare: a king’s legitimacy is affirmed by sacred consecration, generosity to Brāhmaṇas and the community, and by framing power as a moral repayment (pratikriyā) rather than mere possession.

Dhṛtarāṣṭra instructs Vidura to arrange Yudhiṣṭhira’s coronation immediately—summoning priests, civic leaders, and kin; preparing ornaments and royal insignia; bringing Gaṅgā water on elephants; and staging public acclamation. Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, and Vidura approve the plan.