Ādi-parva, Adhyāya 187: Drupada’s Inquiry and the Dharma Debate on Draupadī’s Marriage
दुर्बला अपि विप्रा हि बलीयांस: स्वतेजसा । ब्राह्मणो नावमन्तव्य: सदसद् वा समाचरन्,इसमें शक्ति और महान् उत्साह है। यदि यह असमर्थ होता तो स्वयं ही धनुषके पास जानेका साहस नहीं करता। सम्पूर्ण लोकोंमें देवता, असुर आदिके रूपमें विचरनेवाले पुरुषोंका ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो ब्राह्मणोंके लिये असाध्य हो। ब्राह्मगलोग जल पीकर, हवा खाकर अथवा फलाहार करके (भी) दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हैं। अतः वे शरीरसे दुबले होनेपर भी अपने तेजके कारण अत्यन्त बलवान होते हैं। ब्राह्मण भला-बुरा, सुखद-दुःखद और छोटा-बड़ा जो भी कर्म प्राप्त होता है, कर लेता है; अतः किसी भी कर्मको करते समय उस ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये। मैं भूमण्डलमें ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता जो धरनुर्वेद, वेद तथा नाना प्रकारके योगोंमें ब्राह्मणसे बढ़-चढ़कर हो। श्रेष्ठ ब्राह्मण मन्त्रबल, योगबल अथवा महान् आत्मबलसे इस सम्पूर्ण जगत्को स्तब्ध कर सकते हैं। (अतः उनके प्रति तुच्छ बुद्धि नहीं रखनी चाहिये।) देखो, जमदग्निनन्दन परशुरामजीने अकेले ही (सम्पूर्ण) क्षत्रियोंको युद्धमें जीत लिया था
vaishampāyana uvāca |
durbalā api viprā hi balīyāṁsaḥ svatejasā |
brāhmaṇo nāvamantavyaḥ sadasad vā samācaran ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า: “แม้พราหมณ์จะอ่อนแรงทางกาย แต่ย่อมเข้มแข็งด้วยเตชัสของตนเอง ดังนั้นไม่ควรดูหมิ่นพราหมณ์ไม่ว่าการประพฤติของเขาจะดูดีหรือดูไม่ดีก็ตาม”
वैशम्पायन उवाच
Physical weakness does not determine true power; brahmins may be outwardly frail yet inwardly mighty through tejas (spiritual-ascetic radiance). Hence one should not insult or belittle a brahmin, regardless of how his actions appear.
Vaiśampāyana delivers a general admonition about the formidable spiritual potency of brahmins and the impropriety of contempt toward them, framing respect for ascetic and learned authority as a moral imperative.