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Shloka 19

Drupada’s Putrakāmeṣṭi: The Sacrificial Birth of Dhṛṣṭadyumna and Kṛṣṇā

(प्राक्‌ संध्यातो विमोक्तव्यो रक्षितव्यश्न नित्यश: । एवं रमस्व भीमेन यावद्‌ गर्भस्य वेदनम्‌ ।। एष ते समयो भगद्रे शुश्रूष्यश्चाप्रमत्तया । नित्यानुकूलया भूत्वा कर्तव्यं शोभनं त्वया ।। संध्याकाल आनेसे पहले ही इन्हें छोड़ देना होगा और नित्य-निरन्तर इनकी रक्षा करनी होगी। इस शर्तपर तुम भीमसेनके साथ सुखपूर्वक तबतक रहो, जबतक कि तुम्हें यह पता न चल जाय कि तुम्हारे गर्भमें बालक आ गया है। भद्रे! यही तुम्हारे लिये पालन करनेयोग्य नियम है। तुम्हें सावधान होकर भीमसेनकी सेवा करनी चाहिये और नित्य उनके अनुकूल होकर सदा उनकी भलाईमें संलग्न रहना चाहिये। ३७ ५। ४९, ५७८ युधिष्ठिरेणैवमुक्ता कुन्त्या चाड्केडधिरोपिता । भीमार्जुनान्तरगता यमाभ्यां च पुरस्कृता ।। तिर्यग युधिष्ठिरे याति हिडिम्बा भीमगामिनी । शालिहोत्रसरो रम्यमासेदुस्ते जलार्थिन: ।। तत्‌ तथेति प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा | वनस्पतितलं गत्वा परिमृज्य गृहं यथा ।। पाण्डवानां च वासं सा कृत्वा पर्णमयं तथा । आत्मनश्व तथा कुन्त्या एकोद्देशे चकार सा ।। पाण्डवास्तु ततः स्नात्वा शुद्धा: संध्यामुपास्य च । तृषिता: क्षुत्पिपासार्ता जलमात्रेण वर्तयन्‌ ।। शालिहोगत्रस्ततो ज्ञात्वा क्षुधार्तान्‌ पाण्डवांस्तदा | मनसा चिन्तयामास पानीयं भोजन महत्‌ | ततस्ते पाण्डवा: सर्वे विश्रान्ता: पृथया सह ।। यथा जतुगृहे वृत्तं राक्षसेन कृतं च यत्‌ । कृत्वा कथा बहुविधा: कथान्ते पाण्डुनन्दनम्‌ ।। कुन्तिराजसुता वाक्‍्यं भीमसेनमथात्रवीत्‌ ।। युधिष्ठिरके यों कहनेपर कुन्तीने हिडिम्बाको अपने हृदयसे लगा लिया। तदनन्तर वह युधिष्ठिससे कुछ दूरीपर रहकर भीमके साथ चल पड़ी। वह चलते समय भीम और अर्जुनके बीचमें रहती थी। नकुल और सहदेव सदा उसे आगे करके चलते थे। (इस प्रकार) वे (सब) लोग जल पीनेकी इच्छासे शालिहोत्र मुनिके रमणीय सरोवरके तटपर जा पहुँचे। वहाँ कुन्ती तथा युधिष्ठिरने पहले जो शर्त रखी थी, उसे स्वीकार करके हिडिम्बा राक्षसीने वैसा ही कार्य करनेकी प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात्‌ उसने वृक्षके नीचे जाकर घरकी तरह झाड़ू लगायी और पाण्डवोंके लिये निवास-स्थानका निर्माण किया। उन सबके लिये पर्णशाला तैयार करनेके बाद उसने अपने और कुन्तीके लिये एक दूसरी जगह कुटी बनायी। तदनन्तर पाण्डवोंने स्नान करके शुद्ध हो संध्योपासना किया और भूख-प्याससे पीड़ित होनेपर भी केवल जलका आहार किया। उस समय शालिठोगत्र मुनिने उन्हें भूखसे व्याकुल जान मन-ही-मन उनके लिये प्रचुर अन्न-पानकी सामग्रीका चिन्तन किया (और उससे पाण्डवोंको भोजन कराया)। तदनन्तर कुन्तीदेवीसहित सब पाण्डव विश्राम करने लगे। विश्रामके समय उनमें नाना प्रकारकी बातें होने लगीं--किस प्रकार लाक्षागृहमें उन्हें जलानेका प्रयत्न किया गया तथा फिर राक्षस हिडिम्बने उन लोगोंपर किस प्रकार आक्रमण किया इत्यादि प्रसंग उनकी चर्चाके विषय थे। बातचीत समाप्त होनेपर कुन्तिराजकुमारी कुन्तीने पाण्डुनन्दन भीमसेनसे इस प्रकार कहा। कुन्त्युवाच यथा पाण्डुस्तथा मान्यस्तव ज्येष्ठो युधिष्ठिर: । अहं धर्मविधानेन मान्या गुरुतरा तव ।। तस्मात्‌ पाण्डुहितार्थ मे युवराज हित॑ कुरु । निकृता धार्तराष्ट्रेण पापेनाकृतबुद्धिना । दुष्कृतस्य प्रतीकारं न पश्यामि वृकोदर ।। तस्मात्‌ कतिपयाहेन योगक्षेमं भविष्यति ।। क्षेमं दु्गमिमं वासं वसिष्यामो यथासुखम्‌ । इदमद्य महद्‌ दु:खं धर्मकृच्छं वृकोदर ।। दृष्टवैव त्वां महाप्राज्ञ अनड्रािप्रचोदिता । युधिष्ठिरं च मां चैव वरयामास धर्मतः ।। धर्मार्थ देहि पुत्र त्वं स न: श्रेय: करिष्यति । प्रतिवाक्यं तु नेच्छामि हयावाभ्यां वचनं कुरु ।।) कुन्ती बोली--युवराज! तुम्हारे लिये जैसे महाराज पाण्डु माननीय थे, वैसे ही बड़े भाई युधिष्ठिर भी हैं। धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे मैं उनकी अपेक्षा भी अधिक गौरवकी पात्र तथा सम्माननीय हूँ। अतः तुम महाराज पाण्डुके हितके लिये मेरी एक हितकर आज्ञाका पालन करो। वृकोदर! अपवित्र बुद्धिवाले पापात्मा दुर्योधनने हमारे साथ जो दुष्टता की है, उसके प्रतिशोधका उपाय मुझे कोई नहीं दिखायी देता। अतः कुछ दिनोंके बाद भले ही हमारा योगक्षेम सिद्ध हो। यह निवासस्थान अत्यन्त दुर्गम होनेके कारण हमारे लिये कल्याणकारी सिद्ध होगा। हम यहाँ सुखपूर्वक रहेंगे। महाप्राज्ञ भीमसेन! आज यह हमारे सामने अत्यन्त दुःखद धर्मसंकट उपस्थित हुआ है कि हिडिगम्बा तुम्हें देखते ही कामसे प्रेरित हो मेरे और युधिष्ठिरके पास आकर धर्मतः तुम्हें पतिके रूपमें वरण कर चुकी है। मेरी आज्ञा है कि तुम उसे धर्मके लिये एक पुत्र प्रदान करो। वह हमारे लिये कल्याणकारी होगा। मैं इस विषयमें तुम्हारा कोई प्रतिवाद नहीं सुनना चाहती। तुम हम दोनोंके सामने प्रतिज्ञा करो। वैशम्पायन उवाच तथेति तत्‌ प्रतिज्ञाय भीमसेनो<ब्रवीदिदम्‌ । शृणु राक्षसि सत्येन समयं ते वदाम्यहम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! “बहुत अच्छा” कहकर भीमसेनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की (और हिडिम्बाके साथ गान्धर्व-विवाह कर लिया)। तत्पश्चात्‌ भीमसेन हिडिम्बासे इस प्रकार बोले--'राक्षसी! सुनो, मैं सत्यकी शपथ खाकर तुम्हारे सामने एक शर्त रखता हूँ

vaiśampāyana uvāca |

prāk sandhyāto vimoktavyo rakṣitavyaś ca nityaśaḥ |

evaṃ ram asva bhīmena yāvad garbhasya vedanam ||

eṣa te samayo bhadre śuśrūṣyaś cāpramattayā |

nityānukūlayā bhūtvā kartavyaṃ śobhanaṃ tvayā ||

ไวศัมปายนะกล่าวว่า “ก่อนยามสนธยาเจ้าต้องปล่อยเขา และต้องคุ้มครองเขาอยู่เสมอไม่ขาด ด้วยเงื่อนไขนี้ จงอยู่กับภีมอย่างรื่นรมย์จนกว่าเจ้าจะรู้สัญญาณแห่งการปฏิสนธิในครรภ์ โอ้ผู้มีใจอ่อนโยน นี่คือกฎที่เจ้าต้องรักษาไว้: จงปรนนิบัติภีมเสนะด้วยความไม่ประมาท และจงเป็นผู้เอื้ออำนวยแก่เขาเสมอ กระทำเพื่อสวัสดิภาพของเขาไม่หยุดยั้ง”

प्राक्before
प्राक्:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootप्राक्
संध्यातःfrom (the time of) twilight
संध्यातः:
Apadana
TypeNoun
Rootसंध्या
FormFeminine, Ablative, Singular
विमोक्तव्यःmust be released/let go
विमोक्तव्यः:
Karma
TypeVerb
Rootविमोच्
Formतव्यत् (gerundive), Masculine, Nominative, Singular, Passive (obligative)
रक्षितव्यःmust be protected
रक्षितव्यः:
Karma
TypeVerb
Rootरक्ष्
Formतव्यत् (gerundive), Masculine, Nominative, Singular, Passive (obligative)
and
:
TypeIndeclinable
Root
नित्यशःalways, continually
नित्यशः:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootनित्यशः
एवम्thus, in this way
एवम्:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootएवम्
रमस्वenjoy/live pleasantly
रमस्व:
TypeVerb
Rootरम्
FormImperative, 2, Singular, Atmanepada
भीमेनwith Bhima
भीमेन:
Karana
TypeNoun
Rootभीम
FormMasculine, Instrumental, Singular
यावत्until
यावत्:
TypeIndeclinable
Rootयावत्
गर्भस्यof the womb/pregnancy
गर्भस्य:
TypeNoun
Rootगर्भ
FormMasculine, Genitive, Singular
वेदनम्knowledge/awareness (recognition)
वेदनम्:
Karma
TypeNoun
Rootवेदन
FormNeuter, Accusative, Singular
एषःthis
एषः:
Karta
TypePronoun
Rootएतद्
FormMasculine, Nominative, Singular
तेyour
ते:
TypePronoun
Rootयुष्मद्
FormGenitive, Singular
समयःagreement/condition
समयः:
Karta
TypeNoun
Rootसमय
FormMasculine, Nominative, Singular
भद्रेO good lady
भद्रे:
TypeNoun
Rootभद्र
FormFeminine, Vocative, Singular
शुश्रूष्यःto be served/attended to
शुश्रूष्यः:
Karma
TypeVerb
Rootशुश्रूष्
Formय (gerundive/obligative), Masculine, Nominative, Singular, Passive (obligative)
and
:
TypeIndeclinable
Root
अप्रमत्तयाwith vigilance, carefully
अप्रमत्तया:
Karana
TypeAdjective
Rootअप्रमत्त
FormFeminine, Instrumental, Singular
नित्यानुकूलयाbeing always favorable
नित्यानुकूलया:
Karana
TypeAdjective
Rootनित्यानुकूल
FormFeminine, Instrumental, Singular
भूत्वाhaving become
भूत्वा:
TypeVerb
Rootभू
Formक्त्वा (absolutive), Parasmaipada/Atmanepada-neutral
कर्तव्यम्must be done
कर्तव्यम्:
Karma
TypeVerb
Rootकृ
Formतव्यत् (gerundive), Neuter, Nominative/Accusative, Singular, Passive (obligative)
शोभनम्good, proper
शोभनम्:
Karma
TypeAdjective
Rootशोभन
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
त्वयाby you
त्वया:
Karana
TypePronoun
Rootयुष्मद्
FormInstrumental, Singular

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśampāyana
B
Bhīmasena (Bhīma)
H
Hiḍimbā
S
Sandhyā (twilight time/ritual time)

Educational Q&A

The verse frames intimacy and alliance within dharma through clear conditions: time-bounded association, constant protection, and vigilant service. It emphasizes apramāda (non-negligence) and acting for another’s welfare as ethical disciplines even in personal relationships.

A stipulation is laid down for Hiḍimbā’s union with Bhīma: she may stay with him until pregnancy is confirmed, but she must be released before twilight and must be continually protected. The passage sets the ethical and practical terms governing their relationship within the larger journey of the Pāṇḍavas.