युधिष्ठिरस्य अर्जुनप्रेषण-युक्तिवर्णनम् | Yudhiṣṭhira’s Rationale for Sending Arjuna and Request to Dhaumya
स मोदेत् सर्वलोकेषु एवमाहुर्मनीषिण: । नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम,भरतश्रेष्ठ] अपने कुलकी सात पीढ़ियोंका भी वह उद्धार कर देता है। जो नैमिषमें उपवासपूर्वक प्राणत्याग करता है, वह सब लोकोंमें आनन्दका अनुभव करता है; ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। नृपश्रेष्ठ! नैमिषतीर्थ नित्य, पवित्र और पुण्यजनक है
sa modet sarvalokeṣu evam āhur manīṣiṇaḥ | nityaṁ medhyaṁ ca puṇyaṁ ca naimiṣaṁ nṛpasattama |
అతడు సమస్త లోకాలలో ఆనందాన్ని అనుభవిస్తాడు—ఇదే మునిజనుల వాక్యం. ఓ నృపశ్రేష్ఠా! నైమిషతీర్థం నిత్యము, పరమ పవిత్రము, పుణ్యప్రదము.
घुलस्त्य उवाच