(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १३४ श्लोक हैं।) #::73:.8 #::3.:7 (0) हि 7 - धर्मानुकूल प्राप्त भार्यासे धर्मका विरोध नहीं होता एवं वह पातित्रत्यधर्मका पालन करनेवाली हो, तो धर्मसे उसका विरोध नहीं होता। इस प्रकार धर्मानुसार प्राप्त पातिव्रत्यधर्मका पालन करनेवाली स्त्री और धर्म दोनों जिसके अनुकूल हो जाते हैं, वह धर्मात्मा गृहस्थ कभी दरिद्र नहीं होता। इसलिये उसके घरमें धर्म, अर्थ और काम तीनों बिना विरोधके एक साथ रह सकते हैं। चतुर्दशाधिकत्रिशततमो< ध्याय: यक्षका चारों भाइयोंको जिलाकर धर्मके रूपमें प्रकट हो युधिष्ठिरको वरदान देना वैशमग्पायन उवाच ततस्ते यक्षवचनादुदतिष्ठन्त पाण्डवा: । क्षुत्पिपासे च सर्वेषां क्षणेन व्यपगच्छताम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर यक्षके कहते ही सब पाण्डव उठकर खड़े हो गये तथा एक क्षणमें ही उन सबकी भूख-प्यास जाती रही
Vaiśaṃpāyana uvāca: tataḥ te yakṣavacanād udatīṣṭhanta pāṇḍavāḥ | kṣutpipāse ca sarveṣāṃ kṣaṇena vyapagacchatām ||
వైశంపాయనుడు పలికెను—రాజా! ఆపై యక్షుని వాక్యముతో పాండవులు లేచి నిలిచిరి; క్షణములోనే వారందరి ఆకలి దాహములు తొలగిపోయెను।
वैशमग्पायन उवाच
Dharma is not merely debated but demonstrated: when one responds rightly to a moral test (here, the Yakṣa’s examination), life-sustaining order is restored—symbolized by the brothers rising and their hunger and thirst disappearing.
After the Yakṣa speaks, the Pāṇḍavas—who had been struck down in the episode—rise up, and their physical distress (hunger and thirst) is immediately removed, marking the Yakṣa’s power and the turning point of the ordeal.