श्र॒त्वैवं तु महाराज वधोपायं महात्मन: । गाहमानस्य ते सेनां मालवस्येन्द्रवर्मण:,वे दोनों इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि भीमसेन बोल उठे--“महाराज! महामना द्रोणके वधका ऐसा उपाय सुनकर मैंने आपकी सेनामें विचरनेवाले मालवनरेश इन्द्रवर्माके अश्वत्थामानामसे विख्यात गजराजको, जो ऐरावतके समान शक्तिशाली था, युद्धमें पराक्रम करके मार डाला। फिर द्रोणाचार्यके पास जाकर कहा--'ब्रह्मन्! अश्व॒त्थामा मारा गया, अब युद्धसे निवृत्त हो जाइये।” परंतु इन पुरुषप्रवर द्रोणने निश्चय ही मेरी बातपर विश्वास नहीं किया है
śrutvaivaṃ tu mahārāja vadhopāyaṃ mahātmanaḥ | gāhamānasya te senāṃ mālavasya indrvarmaṇaḥ ||
సంజయుడు అన్నాడు—“మహారాజా! ఆ మహాత్ముని వధోపాయాన్ని విని, మాలవ రాజు ఇంద్రవర్ముడు మీ సేనలో సంచరిస్తూ యుద్ధంలోకి దూకాడు।”
संजय उवाच