धृष्टद्युम्नस्य द्रोणाभिमुख्यं तथा सात्यकि-कर्ण-समागमः
Dhṛṣṭadyumna’s advance toward Droṇa and the Sātyaki–Karṇa confrontation
मम सर्वेडपि राजानो जानन्त्येव महाव्रतम् । न शक्यो मामको हन्तुं यो मे स्थादू बाणगोचरे,“सब राजा मेरे इस महान् व्रतको जानते ही हैं कि जो कोई मेरा आत्मीयजन मेरे बाणोंकी पहुँचके भीतर होगा, वह किसी शत्रुके द्वारा मारा नहीं जा सकता
mama sarve 'pi rājāno jānanti eva mahāvratam | na śakyo māmako hantuṃ yo me sthād bāṇagocare ||
“సర్వ రాజులకూ నా ఈ మహావ్రతం తెలిసినదే—నా బాణాల పరిధిలో నా స్వజనుడు ఉన్నంతవరకు, ఏ శత్రువూ అతనిని సంహరించలేడు.”
संजय उवाच