Aṃśāvataraṇa-kathana (Catalog of Divine/Asuric Portions in Human Births) — Chapter 61
सुभद्रा युयुजे प्रीत्या पाण्डवेनार्जुनेन ह । उसी समय उन्होंने निर्मल तीर्थोकी यात्रा की और नागकन्या उलूपीको पाकर पाण्ड्यदेशीय नरेश चित्रवाहनकी पुत्री चित्रांगदाको भी प्राप्त किया और उन-उन स्थानोंमें उन दोनोंके साथ कुछ कालतक निवास किया। तत्पश्चात् वे किसी समय द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णके पास गये। वहाँ अर्जुनने मंगलमय वचन बोलनेवाली कमललोचना सुभद्राको, जो वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी छोटी बहिन थी, पत्नीरूपमें प्राप्त किया। जैसे इन्द्रसे शच्ची और भगवान् विष्णुसे लक्ष्मी संयुक्त हुई हैं, उसी प्रकार सुभद्रा बड़े प्रेमसे पाण्डुनन्दन अर्जुनसे मिली || ४३-४४ $ || अतर्पयच्च कौन्तेय: खाण्डवे हव्यवाहनम्,व्यवसायसहायस्य विष्णो: शत्रुवधेष्विव । तत्पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें भगवान् वासुदेवके साथ रहकर अग्निदेवको तृप्त किया। नृपश्रेष्ठ जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका साथ होनेसे अर्जुनको इस कार्यमें ठीक उसी तरह अधिक परिश्रम या भारका अनुभव नहीं हुआ, जैसे दृढ़ निश्चयको सहायक बनाकर देवशत्रुओंका वध करते समय भगवान् विष्णुको भार या परिश्रमकी प्रतीति नहीं होती है
subhadrā yuyuje prītyā pāṇḍavenārjunena ha |
వైశంపాయనుడు పలికెను—సుభద్ర పాండవుడైన అర్జునునితో ప్రేమానందముతో వివాహసంబంధమున కలిసెను. ఈ సంయోగము ధర్మసమ్మతమై, పరస్పర స్నేహమున నిలిచి, కృష్ణకుటుంబముతో న్యాయబద్ధమైన బంధుత్వమును స్థాపించెను; అర్జునుని సంచారజీవితము గృహస్థధర్మమునకు, అనుమతింపబడిన కులబంధమునకు మార్గమైంది.
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights a dharmic ideal of marriage as a harmonious union marked by prīti (affection) and legitimate social bonding, emphasizing that personal love can align with righteous alliance and duty.
The narrator states that Subhadrā becomes united with Arjuna in marriage, signaling the formal establishment of their relationship and Arjuna’s integration into Kṛṣṇa’s familial network.