गरुडजन्म तथा विनतादास्यवृत्तान्तः
Garuḍa’s Birth and Vinatā’s Enslavement
विषोल्बणा महाभोगा मात्रा शप्ता: परंतप । तत्र मन्युस्त्वया तात न कर्तव्य: कथंचन,“ये महाबली दुःसह पराक्रम तथा प्रचण्ड विषसे युक्त हैं। अपने तीखे विषके कारण ये सदा दूसरोंको पीड़ा देनेके लिये दौड़ते-फिरते हैं। अतः समस्त प्राणियोंके हितकी दृष्टिसे इन्हें शाप देकर माता कद्भूने उचित ही किया है। जो सदा दूसरे प्राणियोंको हानि पहुँचाते रहते हैं, उनके ऊपर दैवके द्वारा ही प्राणनाशक दण्ड आ पड़ता है।” ऐसी बात कहकर ब्रह्माजीने कट्रूकी प्रशंसा की और कश्यपजीको बुलाकर यह बात कही--“अनघ! तुम्हारे द्वारा जो ये लोगोंको डँसनेवाले सर्प उत्पन्न हो गये हैं, इनके शरीर बहुत विशाल और विष बड़े भयंकर हैं। परंतप! इन्हें इनकी माताने शाप दे दिया है, इसके कारण तुम किसी तरह भी उसपर क्रोध न करना। तात! यज्ञमें सर्पोंका नाश होनेवाला है, यह पुराणवृत्तान्त तुम्हारी दृष्टिमें भी है ही!” ऐसा कहकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने प्रजापति कश्यपको प्रसन्न करके उन महात्माको सर्पोका विष उतारनेवाली विद्या प्रदान की
viṣolbaṇā mahābhogā mātrā śaptāḥ paraṃtapa | tatra manyus tvayā tāta na kartavyaḥ kathaṃcana ||
శౌనకుడు అన్నాడు—“ఈ సర్పాలు విషంతో ఉబ్బినవి, మహాభోగములు (ప్రబలమైనవి); వీటిని వీటి తల్లి శపించింది. కాబట్టి, హే పరంతప! ప్రియ తాత, ఆ కారణంగా నీవు ఏ విధంగానూ కోపపడకూడదు.”
शौनक उवाच
Do not react with personal anger to a divinely or morally corrective consequence (such as a curse meant to restrain harm). Restraint and acceptance of a welfare-oriented order are presented as dharmic.
In the context of the serpents—large and dangerously venomous—Śaunaka’s statement underscores that since they have been cursed by their mother, Kāśyapa (addressed with honorifics) should not become angry about it; the curse functions as a check on harmful beings.