Ādi Parva, Adhyāya 103 — Dhṛtarāṣṭra–Gāndhārī Vivāha: Proposal, Consent, and the Vow
जित्वा विसर्जयामास जीवन्तं नृपसत्तमम् | ततः शाल्व: स्वनगरं प्रययौं भरतर्षभ,तत्पश्चात् ऐन्द्रास्त्रद्वारा उसके उत्तम अश्वोंको यमलोक पहुँचा दिया। नरश्रेष्ठ] उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने कनन््याओंके लिये युद्ध करके शाल्वको जीत लिया और नुृपश्रेष्ठ शाल्वका भी केवल प्राणमात्र छोड़ दिया। जनमेजय! उस समय शाल्व अपनी राजधानीको लौट गया और धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगा। इसी प्रकार शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जो-जो राजा वहाँ स्वयंवर देखनेकी इच्छासे आये थे, वे भी अपने-अपने देशको चले गये। प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म उन कन्याओंको जीतकर हस्तिनापुरको चल दिये; जहाँ रहकर धर्मात्मा कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य इस पृथ्वीका शासन करते थे
jitvā visarjayāmāsa jīvantaṁ nṛpasattamam | tataḥ śālvaḥ svanagaraṁ prayayau bharatarṣabha ||
జయించిన తరువాత భీష్ముడు ఆ శ్రేష్ఠ నరపతిని ప్రాణాలతోనే విడిచిపెట్టాడు. ఆపై, ఓ భరతశ్రేష్ఠా, శాల్వుడు తన నగరానికి తిరిగి వెళ్లాడు।
वैशम्पायन उवाच