
ययातेर्वानप्रस्थतपःस्वर्गारोहणम् | Yayāti’s Vānaprastha Austerities and Ascent to Heaven
Upa-parva: Sambhava Parva (Genealogies and Origins)
Vaiśaṃpāyana reports that King Yayāti, son of Nāhuṣa, joyfully installs his desired heir (Pūru) and withdraws to the forest as a vānaprastha, living with Brahmins on fruits and roots with self-control. Through disciplined ritual conduct—tending sacred fires, offerings according to rule, honoring guests with forest oblations, and subsisting in a gleaner-like manner—he undertakes prolonged austerities: extended regulation of speech and mind, periods of water-only subsistence, then air-only subsistence, penance amid five fires, and one-legged standing. He reaches heaven by merit, resides happily, then is said to be cast down by Śakra (Indra), remaining suspended in midair before earth-contact. A tradition is noted that he again attained heaven after meeting other kings (including Vasumat, Aṣṭaka, Pratardana, and Śibi) in an assembly. Janamejaya then asks what specific karma enabled Yayāti’s renewed ascent, prompting Vaiśaṃpāyana to continue with the “later account” that is described as meritorious and sin-destroying to hear.
Chapter Arc: वन-प्रदेश में सखियों और दासियों के साथ देवयानी तथा शर्मिष्ठा का विहार—उसी एकांत में राजा ययाति का आगमन, मानो भाग्य स्वयं दो कुलों को आमने-सामने ले आया हो। → देवयानी ‘विधान’ (दैव-नियत) की बात कहकर प्रसंग को ऊँचा उठाती है, फिर ययाति से पूछती है कि वह इस वन में किस प्रयोजन से आया है। संवाद के भीतर ही संकेत उभरता है कि यह भेंट साधारण नहीं—यह विवाह, राजनीति और भविष्य की संतति-रेखा को मोड़ने वाली है। → देवयानी ययाति से स्पष्ट निवेदन करती है कि वह उसकी रक्षा-आश्रय बने—‘सखा, भर्ता’ बने—और साथ ही वह शर्मिष्ठा (वृषपर्वा की पुत्री) को भी ययाति के संरक्षण में सौंपते हुए मर्यादा-सीमा रखती है: उसका सत्कार हो, पर उसे शय्या पर न बुलाया जाए। → शुक्राचार्य की स्वीकृति और सम्मान के साथ ययाति को देवयानी, शर्मिष्ठा तथा दासियों/कन्याओं के साथ विदा किया जाता है; ययाति प्रसन्न होकर अपने नगर लौटता है—विवाह-संबंध स्थापित, पर भीतर एक निषिद्ध-रेखा भी खींच दी गई। → देवयानी की शर्त—‘शर्मिष्ठा को शय्या पर न बुलाना’—भविष्य के संघर्ष का बीज बनकर रह जाती है: क्या राजा वचन निभा पाएगा, या काम-धर्म और राज-धर्म की टकराहट अनिवार्य है?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५६ श्लोक मिलाकर कुल ३२३ “लोक हैं) नफमशा (0) अमन न एकाशीतितमो< ध्याय: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह वैशम्पायन उवाच अथ दीर्घस्य कालस्य देवयानी नृपोत्तम । वन॑ तदेव निर्याता क्रीडार्थ वरवर्णिनी,वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उत्तम वर्णवाली देवयानी फिर उसी वनमें विहारके लिये गयी
வைசம்பாயனர் கூறினார்—அரசர்களில் சிறந்தவனே! நீண்ட காலம் கழிந்த பின், ஒளிவண்ணமுடைய தேவயானி விளையாட்டிற்காக மீண்டும் அதே வனத்திற்குச் சென்றாள்.
Verse 2
तेन दासीसहस््रेण सार्थ शर्मिछ्ठया तदा । तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
அப்போது சர்மிஷ்டாவும் ஆயிரம் பணிப்பெண்களுடன் அவளோடு சேர்ந்திருந்தாள். அவள் அதே இடத்தை அடைந்து தோழியருடன் விருப்பம்போல் உலாவினாள்.
Verse 3
ताभि: सखीभि: सहिता सर्वाभिमुदिता भृशम् । क्रीडन्त्योडभिरता: सर्वा: पिबन्त्यो मधुमाधवीम्,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
தோழியருடன் கூடி அவர்கள் அனைவரும் மிகுந்த மகிழ்ச்சியடைந்து, நீரருகே விளையாட்டில் ஈடுபட்டு, தேனினும் இனிய மাধவியின் ரசத்தை அருந்தினர்.
Verse 4
खादन्त्यो विविधान् भक्ष्यान् विदशन्त्य: फलानि च । पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
வைசம்பாயனர் கூறினார்—அந்த இளம்பெண்கள் பலவகை உணவுகளை உண்டு, பழங்களை கடித்துக் கொண்டு விளையாட்டில் மகிழ்ந்திருந்தனர். அச்சமயம் தெய்வயோகத்தால், வேட்டையாசையுடன் நஹுஷ வம்சத்தரசன் யயாதி மீண்டும் அதே இடத்துக்கு வந்தான்.
Verse 5
तमेव देशं सम्प्राप्तो जलार्थी श्रमकर्शित: । ददृशे देवयानीं स शर्मिष्ठां ताश्न॒ योषित:,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
வைசம்பாயனர் கூறினார்—உழைப்பால் களைத்தவனாய், நீரை நாடி அவன் அதே இடத்துக்கு வந்தான். அங்கே தேவயானி, சர்மிஷ்டை மற்றும் பிற இளம்பெண்களையும் கண்டான்.
Verse 6
पिबन्तीर्ललमानाश्व दिव्याभरणभूषिता: । (आसने प्रवरे दिव्ये सर्वाभरण भूषिते ।) उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम्,वे सभी दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो पीनेयोग्य रसका पान और भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ कर रही थीं। राजाने पवित्र मुसकानवाली देवयानीको वहाँ समस्त आभूषणोंसे विभूषित परम सुन्दर दिव्य आसनपर बैठी हुई देखा
வைசம்பாயனர் கூறினார்—தெய்வீக ஆபரணங்களால் அலங்கரிக்கப்பட்ட அந்தப் பெண்கள் பானங்களை அருந்தி பலவகை விளையாட்டுகளில் ஈடுபட்டிருந்தனர். அங்கே அரசன் தூய புன்னகையுடைய தேவயானியை கண்டான்—அவள் எல்லா ஆபரணங்களாலும் ஒளிரும் மிக அழகிய தெய்வீக ஆசனத்தில் அமர்ந்திருந்தாள்.
Verse 7
रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराड़नाम् । शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभि:,उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठाद्वारा उसकी चरणसेवा की जा रही थी
வைசம்பாயனர் கூறினார்—அந்தப் பெண்களிடையே அவள் அழகில் ஒப்பற்ற பேரழகியாக இருந்தாள். அவள் நடுவில் அமர்ந்திருந்தாள்; சர்மிஷ்டை அவளுக்குப் பாதமசாஜ் முதலிய சேவைகளை செய்து கொண்டிருந்தாள்.
Verse 8
ययातिरुवाच द्वाभ्यां कन्न्यासहस्राभ्यां द्वे कन््ये परिवारिते । गोत्रे च नामनी चैव द्वयो: पृच्छाम्यहं शुभे,ययातिने पूछा--दो हजार- कुमारी सखियोंसे घिरी हुई कन््याओ! मैं आप दोनोंके गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ। शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें
யயாதி கூறினான்—ஓ நற்கன்னியரே! நீங்கள் இருவரும் இரண்டாயிரம் கன்னித் தோழிகளால் சூழப்பட்டுள்ளீர்கள். உங்கள் இருவரின் கோத்திரமும் பெயரும் என்னவென்று நான் கேட்கிறேன்; உங்கள் அடையாளத்தைச் சொல்லுங்கள்.
Verse 9
देवयान्युवाच आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचन मे नराधिप । शुक्रो नामासुरगुरु: सुतां जानीहि तस्य माम्,देवयानी बोली--महाराज! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें। असुरोंके जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये
தேவயானி கூறினாள்—ஓ அரசே, நான் யார் என்பதைச் சொல்கிறேன்; என் சொல்லை ஏற்றுக்கொள். அசுரர்களின் புகழ்பெற்ற குரு சுக்ராசாரியர்; நான் அவருடைய மகள் என்று அறிந்துகொள்.
Verse 10
इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी । दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वण:,यह दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है। मैं विवाह होनेपर जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी जायगी
இவள் என் தோழியும் பணிவிடைக்காரியும்; நான் எங்கு சென்றாலும் அவளும் அங்கேயே வருவாள். இவள் தானவர்களின் தலைவன் வ்ருஷபர்வனின் மகள் சர்மிஷ்டை.
Verse 11
ययातिरुवाच कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी । असुरेन्द्रसुता सुभ्रू: परं कौतूहलं हि मे,ययाति बोले--सुन्दरी! यह असुरराजकी रूपवती कन्या सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है
யயாதி கூறினார்—ஓ அழகியே, அசுரராஜனின் இந்த அழகிய, நெற்றிப் புருவம் அழகுடைய மகள் சர்மிஷ்டை எவ்வாறு உன் தோழியும் பணிவிடைக்காரியுமாக ஆனாள்? இதை அறிய எனக்கு மிகுந்த ஆவல்.
Verse 12
देवयान्युवाच सर्व एव नरश्रेष्ठ विधानमनुवर्तते । विधानविदितं मत्वा मा विचित्रा: कथा: कृथा:,देवयानी बोली--नरश्रेष्ठी सब लोग दैवके विधानका ही अनुसरण करते हैं। इसे भी भाग्यका विधान मानकर संतोष कीजिये। इस विषयकी विचित्र घटनाओंको न पूछिये
தேவயானி கூறினாள்—ஓ மனிதர்களில் சிறந்தவரே, அனைவரும் விதியின் ஒழுங்கையே பின்பற்றுகின்றனர். இதையும் விதியின் நிலைபெற்ற ஏற்பாடாகக் கருதி, வியத்தகு கதைகளைப் பின்னாதே; அதிகமாகக் கேள்வி எழுப்பாதே.
Verse 13
राजवद् रूपवेषौ ते ब्राह्मीं वाच॑ं बिभर्षि च | को नाम त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्न शंस मे,आपके रूप और वेष राजाके समान हैं और आप ब्राह्मी वाणी (विशुद्ध संस्कृत भाषा) बोल रहे हैं। मुझे बताइये; आपका क्या नाम है, कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं?
உன் தோற்றமும் ஆடையும் அரசனைப் போன்றவை; மேலும் நீ பிராஹ்மீ வாணியையும் பேசுகிறாய். எனக்குச் சொல்—உன் பெயர் என்ன, நீ எங்கிருந்து வந்தாய், யாருடைய மகன் நீ?
Verse 14
ययातिरुवाच ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्न: श्रुतिपर्थ गत: । राजाहूं राजपुत्रश्न ययातिरिति विश्रुत:,ययातिने कहा--ैंने ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है
யயாதி கூறினான்— பிரம்மச்சரிய ஒழுக்கத்தால் நான் முழு வேதத்தையும் கற்றறிந்து, அதைச் ச்ருதி மரபின் பாதையில் நிலைநாட்டினேன். நான் நஹுஷ அரசனின் மகன்; இப்போது நானே அரசன்; ‘யயாதி’ என்ற பெயரால் புகழ்பெற்றவன்.
Verse 15
देवयान्युवाच केनास्यर्थेन नृपते इमं देशमुपागत: । जिधघृक्षुर्वारिजं किंचिदथवा मृगलिप्सया,देवयानीने पूछा--महाराज! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं?
தேவயானி கேட்டாள்— ஓ அரசே, எந்த நோக்கத்தால் நீங்கள் காடின் இப்பகுதிக்கு வந்தீர்கள்? நீர் எடுக்கவா, ஏதாவது தாமரையைப் பறிக்கவா, அல்லது வேட்டையாசையால் வந்தீர்களா?
Verse 16
ययातिरुवाच मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमुपागत: । बहुधाप्यनुयुक्तो5स्मि तदनुज्ञातुमहसि,ययातिने कहा--भटद्रे! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ। अत: अब मुझे आज्ञा दीजिये
யயாதி கூறினான்— ஓ நற்குலப் பெண்ணே, நீர் அருந்துவதற்காக நான் இங்கு வந்தேன். ஒரு காட்டுயிரை கொல்லத் துரத்திச் சென்றதால் நான் களைத்துவிட்டேன். நீ பலவிதமாகக் கேட்டுவிட்டாய்— இப்போது எனக்கு அனுமதி அளி (நீர் அருந்தி செல்ல).
Verse 17
देवयान्युवाच द्वाभ्यां कन्न्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिछ्ठया सह । त्वदधीनास्मि भद्रें ते सखा भर्ता च मे भव,देवयानीने कहा--राजन! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन््याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे सखा और पति हो जायेँ
தேவயானி கூறினாள்— அரசே, உமக்கு நலம் உண்டாகுக. இரண்டாயிரம் கன்னியருடனும் என் பணிப்பெண் சர்மிஷ்டையுடனும் நான் உமது பாதுகாப்பில் என்னை ஒப்படைக்கிறேன். நீர் எனக்கு தோழனாகவும் கணவராகவும் ஆகுக.
Verse 18
ययातिरु्वाच विद्धयौशनसि भद्र॑ ते न त्वामहोंडस्मि भाविनि । अविवाह्दा हि राजानो देवयानि पितुस्तव,ययाति बोले--शुक्रनन्दिनी देवयानी! आपका भला हो। भाविनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं
யயாதி கூறினான்— ஓ உசனஸ் (சுக்ரர்) மகளே தேவயானி, உனக்கு நலம் உண்டாகுக. ஓ நற்குணவதியே, நான் உனக்குத் தகுதியானவன் அல்லன். தேவயானி, உன் தந்தை அரசர்களுடன் (இவ்விதமாக) திருமண உறவு செய்வது முறையெனக் கருதப்படாது.
Verse 19
देवयान्युवाच संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म संहितम् । ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुषाड़ वहस्व माम्,देवयानीने कहा--नहुषनन्दन! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं। अतः मुझसे विवाह कीजिये
தேவயானி கூறினாள்—நஹுஷ வம்சத்தவனே! பிராமணரும் க்ஷத்திரியரும் ஒன்றோடொன்று கலந்துள்ளனர். நீ ராஜரிஷியின் மகன்; நீயும் ராஜரிஷியே. ஆகவே என்னை மணமாக ஏற்றுக்கொள்.
Verse 20
ययातिरुवाच एकदवेहोद्धवा वर्णश्षृत्वारोडपि वराड़ने । पृथग्धर्मा: पृथक्छौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वर:,ययाति बोले--वरांगने! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है; परंतु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सब वर्णोमें श्रेष्ठ हैं
யயாதி கூறினான்—அழகியவளே! ஒரே பரமேஸ்வரனின் உடலிலிருந்து நான்கு வர்ணங்கள் தோன்றின; ஆனால் அவரவர் தர்மமும் தூய்மை ஒழுக்கமும் வேறுபட்டவை. அவற்றில் பிராமணன் உயர்ந்தவன்.
Verse 21
देवयान्युवाच पाणिधर्मो नाहुषायं न पुम्भि: सेवित: पुरा । त॑ मे त्वमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं तत:,देवयानीने कहा--नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आपहीने मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आपटहीका मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ
தேவயானி கூறினாள்—நஹுஷகுமாரனே! பெண்ணுக்கு பாணிகிரஹணம் ஒரு தர்மம். இதுவரை எந்த ஆணும் என் கையைப் பற்றவில்லை; முதலில் நீயே என் கையைப் பற்றினாய். ஆகவே இப்பொழுது உன்னை கணவராகத் தேர்ந்தெடுக்கிறேன்.
Verse 22
कथं नु मे मनस्विन्या: पाणिमन्य: पुमान् स्पृशेत् गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्यूषिणा त्वया,मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ। आप-जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा पुरुष कैसे कर सकता है
நான் மனக்கட்டுப்பாடு கொண்ட பெண். உன்னைப் போன்ற ராஜரிஷியின் மகனும், நீயே ராஜரிஷியுமானவன், என் கையைத் தானே பற்றிக் கொண்டபின், வேறு ஆண் அதை எவ்வாறு தொட முடியும்?
Verse 23
ययातिरुवाच क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् । दुराधर्षतरो विप्रो ज्ञेयः पुंसा विजानता,ययाति बोले--देवि! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प तथा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे
யயாதி கூறினான்—தேவி! அறிவுடையவன், பிராமணனை கோபம் கொண்ட விஷப்பாம்பையும், எல்லாத் திசைகளிலும் எரியும் தீயையும் விட மிகுந்த அஞ்சத்தக்கவனாகவும் அணுக இயலாதவனாகவும் அறிய வேண்டும்.
Verse 24
देवयान्युवाच कथमाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् | दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ,देवयानीने कहा--पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही?
தேவயானி கூறினாள்—மனிதர்களில் சிறந்தவரே! விஷமுள்ள பாம்பையும், எல்லாத் திசைகளிலும் எரியும் தீயையும் விடப் பிராமணன் மிகுந்த துராதர்ஷன் என்று நீங்கள் எவ்வாறு சொன்னீர்?
Verse 25
ययातिरुवाच एकमाशीविषो हन्ति शस्त्रेणैकश्ष वध्यते । हन्ति विप्र: सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपित:,ययाति बोले--भटद्रे! सर्प एकको ही मारता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर देता है। भीरु! इसलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा
யயாதி கூறினான்—அருமைமகளே! விஷப்பாம்பு ஒருவரையே கொல்லும்; ஆயுதமும் ஒரே நேரத்தில் ஒருவரையே வீழ்த்தும். ஆனால் கோபத்தில் எரியும் பிராமணன் முழு நாடுகளையும் நகரங்களையும் கூட அழிக்க வல்லவன். ஆகவே பிராமணனையே நான் மிகத் துராதர்ஷன் எனக் கருதுகிறேன். எனவே உன் தந்தை முறையாக உன்னை எனக்குக் கொடுக்கும் வரை, நான் உன்னை மணமாட்டேன்.
Verse 26
दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम । अतोउतदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम्,ययाति बोले--भटद्रे! सर्प एकको ही मारता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर देता है। भीरु! इसलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा
யயாதி கூறினான்—அச்சமுடையவளே! ஆகவே என் கருத்தில் பிராமணன் மிகத் துராதர்ஷன். எனவே அருமைமகளே, உன் தந்தை முறையாக உன்னை எனக்குக் கொடுக்கும் வரை நான் உன்னை மணமாட்டேன்.
Verse 27
देवयान्युवाच दत्तां वहस्व तन्मा त्वं पित्रा राजन् वृतो मया । अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्नतः,(तिष्ठ राजन मुहूर्त तु प्रेषयिष्याम्यहं पितु: । देवयानीने कहा--राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं; उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे। अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है। राजन! दो घड़ी ठहर जाइये। मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ
தேவயானி கூறினாள்—அரசே! நான் உம்மையே தேர்ந்தெடுத்தேன்; ஆனால் என் தந்தை முறையாக உமக்கு அளித்தபின் மட்டுமே என்னை ஏற்றுக்கொள்ளுங்கள். நீங்கள் நேரடியாகக் கேட்டு வேண்டவில்லை; தானமாகக் கிடைத்தபின் மட்டுமே ஏற்றுக் கொள்வீர்கள்; ஆகவே அவருடைய கோபத்திற்குப் பயமில்லை. அரசே, சிறிது நேரம் இங்கே நில்லுங்கள்; நான் உடனே தந்தையிடம் செய்தி அனுப்புகிறேன்.
Verse 28
गच्छ त्वं धात्रिके शीघ्र ब्रह्म कल्पमिहानय ।। स्वयंवरे वृतं शीघ्रं निवेदय च नाहुषम् ।।) धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ। उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुषनन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है। वैशम्पायन उवाच त्वरितं देवयान्याथ संदिष्टं पितुरात्मन: । सर्व निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार देवयानीने तुरंत धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया। धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक-ठीक बता दीं
தேவயானி கூறினாள்—தாத்ரியே! விரைந்து சென்று, பிரம்மனுக்கு ஒப்பான என் தந்தையை இங்கே அழைத்து வா. மேலும் நஹுஷனின் மகனுக்கும் உடனே அறிவி: சுயம்வர முறையில் தேவயானி அரசன் யயாதியை கணவராகத் தேர்ந்தெடுத்தாள் என்று. வைசம்பாயனன் கூறினான்—அப்போது தேவயானி உடனே தாத்ரியைத் தந்தையிடம் செய்தியுடன் அனுப்பினாள். தாத்ரி சென்று சுக்ராசாரியரிடம் எல்லாவற்றையும் அப்படியே தெரிவித்தாள்.
Verse 29
श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गव: | दृष्टवैव चागतं शुक्रे ययाति: पृथिवीपति: । वन्न््दे ब्राह्मणं काव्यं प्राउजलि: प्रणत: स्थित:,सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर राजाको दर्शन दिया। विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रभावसे खड़े हो गये
செய்தியைக் கேட்டவுடனே பார்கவனான சுக்ராசாரியர் அங்கே வந்து அரசனுக்கு தரிசனம் அளித்தார். சுக்ரர் வந்ததைப் பார்த்த பூமிபதி யயாதி, பிராமணன் காவ்யருக்கு வணங்கி, கைகூப்பி பணிவுடன் நின்றான்.
Verse 30
देवयान्युवाच राजायं नाहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत् । नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे,देवयानी बोली--तात! ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकटके समय मेरा हाथ पकड़ा था। आपको नमस्कार है। आप मुझे इन्हींकी सेवामें समर्पित कर दें। मैं इस जगतमें इनके सिवा दूसरे किसी पतिका वरण नहीं करूँगी
தேவயானி கூறினாள்—அப்பா! இவர் நஹுஷனின் மகன் அரசன் யயாதி; ஆபத்தில் இவர் என் கையைப் பிடித்து என்னை மீட்டார். உமக்கு வணக்கம்; என்னை இவருக்கே மணமுடித்து அளியுங்கள். இந்த உலகில் இவரைத் தவிர வேறு ஒருவரையும் கணவராக நான் தேர்வதில்லை.
Verse 31
शुक्र उवाच वृतोडनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया । गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज,शुक्राचार्यने कहा--वीर नहुषनन्दन! मेरी इस लाड़ली पुत्रीने तुम्हें पतिरूपमें वरण किया है; अतः मेरी दी हुई इस कन्याको तुम अपनी पटरानीके रूपमें ग्रहण करो
சுக்ரர் கூறினார்—வீர நஹுஷபுத்ரா! என் அன்புக் குமாரி வ்ருதோதனா உன்னைத் தன் கணவராகத் தேர்ந்தெடுத்தாள். ஆகவே நான் அளிக்கும் இந்தக் கன்னியை ஏற்று, அவளை முதன்மை அரசியாகக் கொள்.
Verse 32
ययातिरुवाच अधर्मो न स्पृशेदेष महान् मामिह भार्गव | वर्णसंकरजो ब्रद्वान्निति त्वां प्रवृणोम्पहम्,ययाति बोले--भार्गव ब्रह्मन! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे
யயாதி கூறினான்—ஓ பார்கவ பிராமணரே! இந்தத் திருமணத்தில் வர்ணசங்கரத்தால் உண்டாகும் இந்தப் பெரும் அதர்மம் என்னைத் தொடாதிருக்க வேண்டும்; இதுவே உம்மிடம் நான் வேண்டும் வரம்.
Verse 33
शुक्र उवाच अधर्मात् त्वां विमुज्चामि वृणु त्वं वरमीप्सितम् | अस्मिन् विवाहे मा म्लासीरहं पापं नुदामि ते,शुक्राचार्यने कहा--राजन! मैं तुम्हें अधर्मसे मुक्त करता हूँ; तुम्हारी जो इच्छा हो वर माँग लो। इस विवाहको लेकर तुम्हारे मनमें ग्लानि नहीं होनी चाहिये। मैं तुम्हारे सारे पापको दूर करता हूँ
சுக்ரர் கூறினார்—அரசே! அதர்மத்தின் களங்கத்திலிருந்து உன்னை விடுவிக்கிறேன்; உனக்கு விருப்பமான வரத்தைத் தேர்ந்தெடு. இந்தத் திருமணத்தைப் பற்றி உன் மனத்தில் வருத்தம் வேண்டாம்; உன் பாவத்தை நான் நீக்குகிறேன்.
Verse 34
वहस्व भार्या धर्मेण देवयानीं सुमध्यमाम् | अनया सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्लुहि,तुम सुन्दरी देवयानीको धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो
சுக்ரர் கூறினார்—தர்மப்படி சுமத்தியான தேவயானியை மனைவியாக ஏற்றுக்கொள். அவளுடன் வாழ்ந்து ஒப்பற்ற மகிழ்ச்சியும் பரஸ்பர நிறைவும் அடைவாய்.
Verse 35
इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । सम्पूज्या सततं राजन् मा चैनां शयने ह्वये:,महाराज! वृषपर्वाकी पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है। इसका सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न बुलाना
சுக்ரர் கூறினார்—அரசே! வ்ருஷபர்வனின் மகளான இந்த கன்னி சர்மிஷ்டாவும் உனக்குப் பொறுப்பாக ஒப்படைக்கப்படுகிறாள். அவளை எப்போதும் மதித்து நட; ஆனால் அவளை உன் படுக்கைக்கு ஒருபோதும் அழைக்காதே.
Verse 36
(रहस्थेनां समाहूय न वर्दे्न च संस्पृशे: । वहस्व भार्या भद्रें ते यथाकाममवाप्स्यसि ।।) तुम्हारा कल्याण हो। इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही करना। अब तुम विवाह करके इसे अपनी पत्नी बनाओ। इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्र कृत्वा प्रदक्षिणम् । शास्त्रोक्तविधिना राजा विवाहमकरोच्छुभम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की और शास्त्रोक्त विधिसे मंगलमय विवाह-कार्य सम्पन्न किया
சுக்ரர் கூறினார்—தனிமையில் அவளை அழைத்தாலும் அவளுடன் பேசாதே; அவள் உடலைத் தொடாதே. உனக்கு நலம் உண்டாக; தர்மப்படி அவளை மனைவியாக ஏற்றுக்கொள்—அவளால் நீ விரும்பிய பயன்களை அடைவாய். வைசம்பாயனர் கூறினார்—இவ்வாறு அறிவுறுத்தப்பட்ட யயாதி, சுக்ரரை வலம் வந்து, சாஸ்திர விதிப்படி மங்களகரமான திருமணத்தை நிறைவேற்றினார்.
Verse 37
लब्ध्वा शुक्रान्महद् वित्तं देवयानीं तदोत्तमाम् | द्विसहस्रेण कन्यानां तथा शर्मिष्ठया सह,शुक्राचार्यसे देवयानी-जैसी उत्तम कन्या, शर्मिष्ठा और दो हजार अन्य कन्याओं तथा महान् वैभवको पाकर दैत्यों एवं शुक्राचार्यसे पूजित हो, उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको गये
வைசம்பாயனர் கூறினார்—சுக்ரரிடமிருந்து பெரும் செல்வம், சிறந்த தேவயானி, மேலும் சர்மிஷ்டாவுடன் இரண்டாயிரம் கன்னியரைப் பெற்ற யயாதி, தைத்யர்களாலும் சுக்ரராலும் போற்றப்பட்டு, அந்த மகாத்மாவின் அனுமதி பெற்று மகிழ்ச்சியுடன் தன் தலைநகரை நோக்கிப் புறப்பட்டான்.
Verse 38
सम्पूजितश्न शुक्रेण दैत्यैश्न नृपसत्तम: । जगाम स्वपुरं हृष्टोडनुज्ञातो5थ महात्मना,शुक्राचार्यसे देवयानी-जैसी उत्तम कन्या, शर्मिष्ठा और दो हजार अन्य कन्याओं तथा महान् वैभवको पाकर दैत्यों एवं शुक्राचार्यसे पूजित हो, उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको गये
சுக்ரராலும் தைத்யர்களாலும் போற்றப்பட்ட அரசர்களில் சிறந்த யயாதி, அந்த மகாத்மாவின் அனுமதி பெற்று மகிழ்ச்சியுடன் தன் நகரை அடைந்தான்.
Verse 81
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने एकाशीतितमो<ध्याय:
இவ்வாறு ஸ்ரீமகாபாரதத்தின் ஆதிபர்வத்தில் உள்ள சம்பவபர்வத்தில் யயாதி-உபாக்யானத்தின் எண்பத்தொன்றாம் அத்தியாயம் நிறைவுற்றது.
The chapter implicitly tests how a ruler should transition from sovereignty to renunciation: whether authority is an entitlement to continued enjoyment or a duty that culminates in disciplined withdrawal and accountability to karmic consequence.
Merit is depicted as structured practice rather than status: self-restraint, correct ritual conduct, and hospitality within ascetic life generate results, yet heavenly attainment remains conditional, emphasizing vigilance regarding pride and the stability of earned rewards.
Yes in functional form: Vaiśaṃpāyana characterizes the forthcoming continuation of Yayāti’s account as puṇyārthā (merit-producing) and sarva-pāpa-praṇāśinī (sin-destroying) to hear, marking an embedded listening-benefit claim.