धृतराष्ट्र–दुर्योधन संवादः
Vāraṇāvata-vivāsana-nīti: Dhṛtarāṣṭra and Duryodhana’s Policy Dialogue
तस्याथ मिथुन जज्ञे गौतमस्य शरद्वत: । मृगयां चरतो राज्ञ: शन्तनोस्तु यदृच्छया,तदनन्तर गौतमनन्दन शरद्वानके उसी वीर्यसे एक पुत्र और एक कन्याकी उत्पत्ति हुई। उस दिन दैवेच्छासे राजा शन्तनु वनमें शिकार खेलने आये थे। उनके किसी सैनिकने वनमें उन युगल संतानोंको देखा। वहाँ बाणसहित धनुष और काला मृगचर्म देखकर उसने यह जान लिया कि “ये दोनों किसी धरनुर्वेदके पारंगत विद्वान ब्राह्मणकी संतानें हैं” ऐसा निश्चय होनेपर उसने राजाको वे दोनों बालक और बाणसहित धनुष दिखाया। राजा उन्हें देखते ही कृपाके वशीभूत हो गये और उन दोनोंको साथ ले अपने घर आ गये। वे किसीके पूछनेपर यही परिचय देते थे कि “ये दोनों मेरी ही संतानें हैं"
tasya atha mithunaṁ jajñe gautamasya śaradvatāḥ | mṛgayāṁ carato rājñaḥ śantanostu yadṛcchayā ||
பின்னர் கௌதமன் புதல்வன் சரத்வதனின் அந்த வீரியத்திலிருந்து ஒரு மகனும் ஒரு மகளும்—இரட்டையராக—பிறந்தனர். அதே வேளையில் விதிவசமாக வேட்டையாடிக் கொண்டிருந்த அரசன் சாந்தனு அங்கு வந்தடைந்தான்.
वैशम्पायन उवाच