
Chapter Arc: वनवास की सीमा पर खड़े पाण्डव—अब ‘अज्ञातवास’ का कठिन व्रत सामने है। युधिष्ठिर तपस्वियों और आचार्य धौम्य से अनुमति माँगते हुए शोक से भर उठते हैं। → आश्रमवासी विद्वान तपस्वी, जो पाण्डवों के भक्त हैं, युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर उन्हें विदा देने को खड़े होते हैं। पाण्डव अपनी योजना रखते हैं—इस वर्ष छिपकर रहना है, क्योंकि सुयोधन, कर्ण और शकुनि जैसे दुष्टात्मा शत्रु अवसर खोज रहे हैं। युधिष्ठिर का मन कर्तव्य और भय के बीच डगमगाता है। → अज्ञातवास की अनुमति माँगते-माँगते युधिष्ठिर दुःख-शोक से विह्वल होकर मूर्छित हो जाते हैं—कण्ठ आँसुओं से भर जाता है और राजधर्म का धैर्य क्षणभर को टूटता दिखता है। → धौम्य युधिष्ठिर को समझाते हैं—आप विद्वान, दान्त, सत्यसंध, जितेन्द्रिय हैं; ऐसी आपदा में भी महापुरुष मोह नहीं करते। उदाहरण देकर वे बताते हैं कि इन्द्र ने भी शत्रुदमन हेतु निषध देश में गुप्तरूप से रहकर कार्य सिद्ध किया; अतः छिपकर रहना अधर्म नहीं, नीति है। फिर भीमसेन उत्साहवर्धन करते हैं, राजा के भीतर साहस जगाते हैं और अज्ञातवास के लिए मन स्थिर होता है। → पाण्डवों के अज्ञातवास-प्रवेश का निर्णय पक्का हो जाता है—अब प्रश्न केवल यह है कि वे कहाँ और किस रूप में छिपेंगे, और क्या शत्रु उनकी पहचान कर पाएँगे।
Verse 1
हि >> न (0) हि 7 आम पञ्चदशाधिकंत्रेशततमो< ध्याय: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना वैशम्पायन उवाच धर्मेण ते5भ्यनुज्ञाता: पाण्डवा: सत्यविक्रमा: । अज्ञातवासं वत्स्यन्त$छज्ना वर्ष त्रयोदशम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले--- / ५ 8 । (/) १ /€+। कर
वैशम्पायन उवाच—धर्मेण तेऽभ्यनुज्ञाताः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः। अज्ञातवासं वत्स्यन्ति छन्ना वर्षं त्रयोदशम्॥
Verse 2
उपोपविष्टा विद्वांस: सहिता: संशितव्रता: । ये तद्भक्ता वसन्ति सम वनवासे तपस्विन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले---
उपोपविष्टा विद्वांसः सहिताः संशितव्रताः। ये तद्भक्ता वसन्ति समं वनवासे तपस्विनः॥
Verse 3
तानब्रुवन् महात्मान: स्थिता: प्राजजलयस्तदा । अभ्यनुज्ञापयिष्यन्तस्तं निवासं धृतव्रता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले---
वैशम्पायन उवाच—ततः ते महात्मानः धृतव्रताः प्राञ्जलयः स्थित्वा, तं निवासं—यमज्ञातवासरूपं छन्ननिवासं कर्तुमिच्छन्ति—तदभ्यनुज्ञापयितुं वचनमब्रुवन्।
Verse 4
विदितं भवतां सर्व धार्तराष्ट्रैयथा वयम् । छद्मना हृृतराज्याश्लानयाश्व बहुशः कृता:,“मुनिवरो! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने जिस प्रकार छल करके हमारा राज्य हर लिया और हमपर बारंबार अत्याचार किया, वह सब आपलोगोंको विदित ही है
विदितं भवतां सर्वं धार्तराष्ट्रैः यथा वयम् । छद्मना हृतराज्याश्च बहुशोऽनयमाचरिताः ॥
Verse 5
, ५ (१ ' १4. 8... -- उषिताश्च वने कृच्छे वयं द्वादश वत्सरान् । अज्ञातवाससमयं शेषं वर्ष त्रयोदशम्,“हमलोग कष्टदायक वनमें बारह वर्षोतक रह लिये। अब अन्तिम तेरहवाँ वर्ष हमारे अज्ञातवासका समय है
उषिताश्च वने कृच्छ्रे वयं द्वादश वत्सरान् । अज्ञातवाससमयः शेषो वर्षस्त्रयोदशः ॥
Verse 6
तद् वसामो वयं छजन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ । सुयोधनश्व दुष्टात्मा कर्णश्न सहसौबल:,“अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं
तद्वसामो वयं छन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ । सुयोधनश्च दुष्टात्मा कर्णश्च सहसौबलः ॥
Verse 7
जानन्तो विषमं कुर्युरस्मास्वत्यन्तवैरिण: । युक्तचाराश्न युक्ताश्न पौरस्प स््वजनस्य च,“अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं
जानन्तो विषमं कुर्युरस्मास्वत्यन्तवैरिणः । युक्तचाराश्च युक्ताश्च पौरस्य स्वजनस्य च ॥
Verse 8
अपि नस्तद् भवेद् भूयो यद् वयं ब्राह्मणैः सह | समस्ता: स्वेषु राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेमहि,“क्या हमारे सामने फिर कभी ऐसा अवसर आयेगा, जब कि हम सब भाई ब्राह्मणोंके साथ अपने राष्ट्रमें रहेंगे--अपने राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे”
अपि नस्तद् भवेद् भूयो यद् वयं ब्राह्मणैः सह । समस्ताः स्वेषु राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेमहि ॥
Verse 9
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा दुःखशोकार्त: शुचिर्धर्मसुतस्तदा । सम्मूर्छितो5भवद् राजा साश्रुकण्ठो युधिछ्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर पवित्र अन्तःकरणवाले धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिर दु:ख और शोकसे आतुर होकर मूर्च्छित हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और कण्ठ अवरुद्ध हो गया था
वैशम्पायन उवाच । इत्युक्त्वा दुःखशोकार्तः शुचिर्धर्मसुतस्तदा । सम्मूर्छितोऽभवद् राजा साश्रुकण्ठो युधिष्ठिरः ॥
Verse 10
तमथाश्वासयन् सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभि: सह | अथ धौम्योडब्रवीद् वाक्यं महार्थ नृपतिं तदा,उस समय उनके भाइयोंसहित समस्त ब्राह्मणोंने उन्हें आश्वासन दिया। तत्पश्चात् महर्षि धौम्यने राजा युधिष्ठिरसे यह गम्भीर अर्थयुक्त वचन कहा--
तमथाश्वासयन् सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभिः सह । अथ धौम्योऽब्रवीद् वाक्यं महार्थं नृपतिं तदा ॥
Verse 11
“राजन्! आप विद्वान, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। आप- जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं
राजन्! भवान् विद्वान् मनोवशी सत्यप्रतिज्ञो जितेन्द्रियः । भवादृशा न मुह्यन्ति आपदि धैर्यविवेकयोः ॥
Verse 12
देवैरप्यापद: प्राप्ता#छन्नैश्व बहुशस्तथा । तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थ महात्मभि:,“महामना देवताओंको भी जहाँ-तहाँ शत्रुओंके निग्रहके लिये अनेक बार छिपकर रहना और विपत्तियोंको भोगना पड़ा है
देवैः अप्यापदः प्राप्ताः छन्नैश्च बहुशस्तथा । तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थं महात्मभिः ॥
Verse 13
राजन विद्वान् भवान् दान्तः सत्यसंधो जितेन्द्रिय: । नैवंविधा: प्रमुहान्ते नरा: कस्याज्चिदापदि,इन्द्रेण निषधान प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा । छन्नेनोष्य कृतं कर्म द्विषतां च विनिग्रहे
वैशम्पायन उवाच—राजन्, भवान् विद्वान् दान्तः सत्यसन्धो जितेन्द्रियश्च। नैवंविधा नराः कस्यचिदापदि प्रमुह्यन्ति। इन्द्रेण निषधं प्राप्य तदा गिरिप्रस्थाश्रमे छन्नेनोष्य, द्विषतां विनिग्रहार्थं कृतं कर्म।
Verse 14
विष्णुनाश्वशिर: प्राप्प तथादित्यां निवत्स्यता | गर्भे वधार्थ दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम्,“भगवान् विष्णु भी दैत्योंका वध करनेके लिये हयग्रीवस्वरूप धारण करके अज्ञातभावसे अदितिके गर्भमें दीर्घकालतक रहे हैं
वैशम्पायन उवाच—भगवान् विष्णुः हयग्रीवरूपं धृत्वा दैत्यानां वधार्थम् अदितिं प्रविश्य, गर्भेऽज्ञातेन दीर्घकालं छन्नोऽवसत्।
Verse 15
प्राप्प वामनरूपेण प्रच्छन्न॑ ब्रह्म॒रूपिणा । बलेयथा हूतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम्
वामनरूपेण प्रच्छन्नो ब्रह्मरूपिणा प्राप्य, बलेर्यथा हृतं राज्यं विक्रमैस्तत् च ते श्रुतम्।
Verse 16
“उन्होंने ही ब्राह्मणवेषमें वामनरूप धारण करके अपने तीन पगोंद्वारा जिस प्रकार छिपे तौरपर राजा बलिका राज्य हर लिया था, वह सब तो तुमने सुना ही होगा ।। हुताशनेन यच्चाप: प्रविश्यच्छन्नमासता । विबुधानां कृतं कर्म तच्च सर्व श्रुतं त्वया,'अग्निने जलमें प्रवेश करके वहीं छिपे रहकर देवताओंका कार्य जिस प्रकार सिद्ध किया, वह सब कुछ भी तुम सुन चुके हो
यच्चापः प्रविश्य हुताशनः छन्नमासत, विबुधानां कृतं कर्म तत् सर्वं श्रुतं त्वया।
Verse 17
प्रच्छन्न॑ चापि धर्मज्ञ हरिणारिविनिग्रहे । वज्ज प्रविश्य शक्रस्य यत् कृतं तच्च ते श्रुतम्,“धर्मज्ञ! भगवान् श्रीहरिने शत्रुओंके विनाशके लिये छिपे तौरपर इन्द्रके वज्॒में प्रवेश करके जो कार्य किया, वह भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा
धर्मज्ञ, प्रच्छन्नं हरिणा अरिविनिग्रहार्थं वज्रं प्रविश्य शक्रस्य यत् कृतं, तत् च ते श्रुतम्।
Verse 18
और्वेण वसता छन्नमूरौ ब्रह्मर्षिणा तदा । यत् कृतं तात देवेषु कर्म तत्तेडनघ श्रुतम्,“तात! निष्पाप नरेश! ब्रह्मर्षि और्वने (माताके) ऊरुमें गुप्तरूपसे निवास करते हुए जो देवकार्य सिद्ध किया था, वह भी तुम्हारे सुननेमें आया ही होगा
वैशम्पायन उवाच— तात, अनघ नरेन्द्र! और्वेण ब्रह्मर्षिणा तदा ऊरौ छन्नवसता देवेषु यत्कृतं कर्म, तत् ते श्रुतमेव।
Verse 19
एवं विवस्वता तात छतन्नेनोत्तमतेजसा । निर्दग्धा: शात्रवा: सर्वे वसता भुवि सर्वश:,“तात! इसी प्रकार महातेजस्वी भगवान् सूर्यने भी पृथ्वीपर गुप्तरूपसे निवास करके समस्त शत्रुओंको दग्ध किया है
वैशम्पायन उवाच— एवमेव तात, विवस्वता उत्तमतेजसा छन्नेन भुवि वसता सर्वशः सर्वे शात्रवाः निर्दग्धाः।
Verse 20
विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै । दशग्रीवो हतश्छन्न॑ संयुगे भीमकर्मणा,“भयंकर पराक्रमी भगवान् विष्णुने भी श्रीरामरूपसे दशरथके घरमें छिपे रहकर युद्धमें दशमुख रावणका वध किया था
वैशम्पायन उवाच— विष्णुना वसता चापि दशरथस्य गृहे छन्नं, भीमकर्मणा संयुगे दशग्रीवो हतः।
Verse 21
एवमेव महात्मान: प्रच्छन्नास्तत्र तत्र ह अजयज्छात्रवान् युद्धे तथा त्वमपि जेष्यसि,“इसी प्रकार कितने ही महामना वीर पुरुषोंने यत्र-तत्र छिपे रहकर युद्धमें शत्रुओंपर विजय पायी है। इसी प्रकार तुम भी विजयी होओगे”
वैशम्पायन उवाच— एवमेव महात्मानो यत्र तत्र प्रच्छन्ना युद्धे शात्रवान् अजयन्; तथा त्वमपि जेष्यसि।
Verse 22
तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यै: सम्परितोषित: । शास्त्रबुद्धया स्वबुद्धया च न चचाल युधिछिर:,महर्षि धौम्यने जब इस प्रकार युक्तियुक्त वचनोंद्वारा धर्मज्ञ युधिष्ठिरको संतोष प्रदान किया, तब वे शास्त्रज्ञान और अपने बुद्धिबलके कारण (धर्मसे) विचलित नहीं हुए
तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यैः सम्परितोषितः । शास्त्रबुद्ध्या स्वबुद्ध्या च न चचाल युधिष्ठिरः ॥
Verse 23
अथाब्रवीन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबल: । राजानं बलिनां श्रेष्ठो गिरा सम्परिहर्षयन्,तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली महाबाहु भीमसेनने अपनी वाणीसे राजा युधिष्ठिरका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए कहा--
अथाब्रवीन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः । राजानं बलिनां श्रेष्ठो गिरा सम्परिहर्षयन् ॥
Verse 24
अवेक्षया महाराज तव गाण्डीवधन्वचना । धर्मानुगतया बुद्धया न किज्चित् साहसं कृतम्,“महाराज! गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने आपके आदेशकी प्रतीक्षा तथा अपनी धर्मानुगामिनी बुद्धिके कारण ही अबतक कोई साहसका कार्य नहीं किया है
अवेक्षया महाराज तव गाण्डीवधन्वना । धर्मानुगतया बुद्ध्या न किञ्चित्साहसं कृतम् ॥
Verse 25
सहदेवो मया नित्यं नकुलश्न निवारितौ । शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रूणां भीमविक्रमौ,“भयंकर पराक्रमी नकुल और सहदेव उन सब शत्रुओंका विध्वंस करनेमें समर्थ हैं। इन दोनोंको मैं ही सदा रोकता आया हूँ
सहदेवो मया नित्यं नकुलश्च निवारितौ । शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रूणां भीमविक्रमौ ॥
Verse 26
न वयं तत् प्रहास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान् | भवान् विधत्तां तत् सर्व क्षिप्रं जेष्यामहे रिपून्,“आप हमें जिस कार्यमें लगा देंगे, उसे हमलोग पूरा किये बिना नहीं छोड़ेंगे। अतः आप युद्धकी सारी व्यवस्था कीजिये। हम शत्रुओंपर शीघ्र ही विजय पायेंगे”
न वयं तत्प्रहास्यामो यस्मिन्योक्ष्यति नो भवान् । भवान्विधत्तां तत्सर्वं क्षिप्रं जेष्यामहे रिपून् ॥
Verse 27
इत्युक्ते भीमसेनेन ब्राह्मणा: परमाशिषा । उक्त्वा चापच्छय भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुग्गृहान्,भीमसेनके ऐसा कहनेपर सब ब्राह्मण पाण्डवोंको उत्तम आशीर्वाद देकर और उन भरतवंशियोंसे अनुमति लेकर अपने-अपने घरोंको चले गये
इत्युक्ते भीमसेनेन ब्राह्मणाः परमाशिषा । उक्त्वा चापच्छय भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुर्गृहान् ॥
Verse 28
सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तथा । आसेदुस्ते यथान्यायं पुनर्दर्शनकाड्क्षया,वेदोंके ज्ञाता समस्त प्रधान-प्रधान संन्यासी तथा मुनिलोग पाण्डवोंसे फिर मिलनेकी इच्छा रखकर न्यायानुसार अपने योग्य स्थानोंमें रहने लगे
वैशम्पायन उवाच— सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तथा । आसेदुस्ते यथान्यायं स्वस्वस्थाने यथार्हतः ॥ पुनर्दर्शनकाङ्क्षया पाण्डवानां महात्मनाम् ।
Verse 29
सह धौम्येन विद्वांसस्तथा पञ्च च पाण्डवा: । उत्थाय प्रययुर्वीरा: कृष्णामादाय धन्विन:,धौम्यसहित विद्वान् एवं वीर पाँचों पाण्डव द्रौपदीको साथ लिये धनुष धारण किये वहाँसे उठकर चल दिये
वैशम्पायन उवाच— सह धौम्येन विद्वांसस्तथा पञ्च च पाण्डवाः । उत्थाय प्रययुर्वीरा कृष्णामादाय धन्विनः ॥
Verse 30
क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद् देशान्निमित्तत: । श्वोभूते मनुजव्याप्राश्छन्नवासार्थमुद्यता:,किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे
क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद्देशान्निमित्ततः । श्वोभूते मनुजव्याघ्राः छन्नवासार्थमुद्यताः ॥ समुपाविश्य संमन्त्रं चक्रुस्ते धर्मवित्तमाः ।
Verse 31
पृथक्छास्त्रविद: सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदा: । संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन्,किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे
पृथक्छास्त्रविदः सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदाः । संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन् ॥
Verse 53
“देवराज इन्द्र शत्रुओंका दमन करनेके लिये गुप्तरूपसे निषधदेशमें गये और गिरिप्रस्थाश्रममें छिपे रहकर उन्होंने अपना कार्य सिद्ध किया
वैशम्पायन उवाच— देवराज इन्द्रः शत्रूणां दमनाय गुप्तरूपेण निषधदेशं जगाम । गिरिप्रस्थाश्रमे च छन्नो निवसन् स्वकार्यं सिद्धवान् ॥
Verse 314
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकल आदिके जीवित होने आदि वरोंकी प्राप्तिविषयक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वान्तर्गते नकुलादीनां जीवितप्राप्त्यादिवरलब्धिविषये त्रिशतचतुर्दशोऽध्यायः समाप्तः।
Verse 315
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिक्यां वनपर्वणि आरणेयपर्वणि अज्ञातवासमन्त्रणे पज्चदशाधिकत्रिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत--व्यासनिर्मित शतयाहसी संहिताके वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें अज्ञातवासके लिये मन्त्रणाविषयक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां वनपर्वणि आरणेयपर्वणि अज्ञातवासमन्त्रणविषये त्रिशतपञ्चदशोऽध्यायः समाप्तः।