द्रोणपर्व — अध्याय २७: सुशर्माह्वानम्, अर्जुनस्य प्रतिनिवर्तनम्, भगदत्तेन गजप्रहारः
/ अपना बा | अप्--र- - हाथीके निचले भागमें कोई ऐसा स्थान होता है, जिसमें दोनों हाथोंके द्वारा थपथपानेसे हाथीको सुख मिलता है। इस अवस्थामें वह महावतके मारनेपर भी टस-से-मस नहीं होता। भीमसेन इस कलाको जानते थे। इसीका नाम 'अंजलिकावेध' है। सप्तविशो<्ध्याय: अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध संजय उवाच यन्मां पार्थस्य संग्रामे कर्माणि परिपृच्छसि । तच्छुणुष्व महाबाहो पार्थो यदकरोद् रणे,संजय कहते हैं--महाबाहो! आप जो मुझसे युद्धमें अर्जुनके पराक्रम पूछ रहे हैं, उन्हें बताता हूँ। अर्जुनने रणक्षेत्रमें जो कुछ किया था, वह सुनिये
sañjaya uvāca | yan māṁ pārthasya saṅgrāme karmāṇi paripṛcchasi | tac chṛṇuṣva mahābāho pārtho yad akarod raṇe ||
सञ्जय उवाच—महाबाहो, यन्मां संग्रामे पार्थस्य कर्माणि परिपृच्छसि, तच्छृणुष्व। यत् पार्थो रणक्षेत्रेऽकरोत् तदहं ते यथावत् कथयिष्यामि॥
संजय उवाच
The verse frames ethical narration: a responsible witness (Sanjaya) answers a ruler’s inquiry by truthfully recounting actions in war, emphasizing attentive listening and accurate testimony about dharma-driven conduct on the battlefield.
Dhritarashtra asks about Arjuna’s actions in the battle; Sanjaya begins his report, inviting the king to listen as he recounts what Arjuna (Partha) did in combat.