Sātyaki-praveśaḥ and Duryodhana-saṃnipātaḥ
Sātyaki’s passage and Duryodhana’s mass engagement
शीघ्र प्रजवितैरश्वैः प्रत्युद्याहि प्रहृष्टवत् आचार्य राजपुत्राणां सततं शूरमानिनम्,'सूत! ये शौर्यसम्पन्न ब्राह्मणदेवता अपने ब्राह्मणोचित कर्ममें स्थिर नहीं हैं। ये धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनके आश्रय होकर उसके दुःख और भयका निवारण करनेवाले हैं। समस्त राजकुमारोंके ये ही आचार्य हैं और सदा अपनेको शूरवीर मानते हैं। तुम प्रसन्नचित्त होकर अपने वेगशाली अश्रोंद्वारा शीघ्र इनका सामना करनेके लिये चलो”
sañjaya uvāca | śīghra-prajavitair aśvaiḥ pratyudyāhi prahṛṣṭavat | ācārya rājaputrāṇāṃ satataṃ śūra-māninam ||
शीघ्रप्रजवितैरश्वैः प्रत्युद्याहि प्रहृष्टवत्। आचार्यं राजपुत्राणां सततं शूरमानिनम्॥
संजय उवाच