Bhakti–Akṣara-Upāsanā-Viveka
Devotion to the Personal vs. Contemplation of the Imperishable
सम्बन्ध-- पहले श्लोकमें भगवान्ने जिस विषयपर कहनेकी प्रतिज्ञा की है, उसका वर्णन आरम्भ करते हुए वे पहले पाँच शलोकोंमें योगशब्दवाच्य प्रभावका और अपनी विशभ्ूतिका संक्षिप्त वर्णन करते हैं-- न मे विदु: सुरगणा:ः प्रभवं न महर्षय:३ | अहमादिर्ि देवानां महर्षीणां च सर्वश:,मेरी उत्पत्तिको अर्थात् लीलासे प्रकट होनेको न देवतालोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओंका और महर्षियोंका भी आदिकारण हूँ?
na me viduḥ sura-gaṇāḥ prabhavaṁ na maharṣayaḥ | aham ādir hi devānāṁ maharṣīṇāṁ ca sarvaśaḥ ||
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥
अजुन उवाच