
Viśvarūpa-darśana (The Vision of the Universal Form) — महायोगेश्वरस्य विश्वरूपदर्शनम्
Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-adhyāya cluster within Bhīṣma-parva)
This chapter records Arjuna’s request to see Kṛṣṇa’s aiśvarya (sovereign, divine potency) after hearing a confidential metaphysical teaching. Kṛṣṇa responds by inviting Arjuna to behold innumerable divine forms and the totality of the moving and unmoving world gathered in a single locus. Because ordinary vision is deemed insufficient, Kṛṣṇa grants a divya-cakṣus (enhanced perception) and reveals the Viśvarūpa, described with countless faces, eyes, ornaments, and weapons, radiating a brilliance likened to a thousand suns. Arjuna perceives deities, sages, and cosmic orders within that form, then experiences awe and destabilization, including fear at the vision of beings entering the formidable mouths of the cosmic form. Arjuna asks the identity of the terrifying manifestation; Kṛṣṇa identifies it as Kāla (time) engaged in world-consuming transformation, positioning Arjuna as a nimitta (instrument) within an already-determined trajectory of battlefield outcomes. Arjuna offers praise, apology for familiar speech, and requests the return to the gentler four-armed/human-accessible form. Kṛṣṇa restores the familiar appearance, explains the rarity of this vision, and concludes with a bhakti-centered criterion: exclusive devotion enables true knowing, seeing, and entering into the divine reality, coupled with conduct marked by non-hostility and detachment.
Chapter Arc: जीव की दीर्घ भटकन और दुर्लभ मनुष्य-देह का स्मरण कराते हुए कृष्ण अर्जुन को जगाते हैं—यह अवसर केवल भोग के लिए नहीं, परमगति के लिए है। → अर्जुन के भीतर प्रश्न उभरता है: यदि ज्ञान-विज्ञान और उपासना इतनी महिमामयी है, तो सब उसे क्यों नहीं धारण करते? कृष्ण श्रद्धा, विधि और लक्ष्य के भेद से समझाते हैं—देव-भक्ति भी अन्ततः उन्हीं तक जाती है, पर ‘अविधिपूर्वक’ और सीमित फल के साथ। → कृष्ण अपना विराट्-व्यापक स्वरूप उद्घाटित करते हैं—सूर्य-ताप, वर्षा का आकर्षण और वर्षण, अमृत और मृत्यु, सत् और असत्—सबमें ‘मैं’ (अहं) ही हूँ; और फिर निर्णायक आदेश देते हैं: जो कुछ करो, खाओ, यज्ञ करो, दान दो, तप करो—सब मुझे अर्पित करो। → भक्ति का द्वार सर्वसुलभ घोषित होता है—स्त्री, वैश्य, शूद्र जैसे ‘पाप-योनि’ कहे जाने वाले भी शरण लेकर परमगति पा सकते हैं; फिर तो पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तों की बात ही क्या। इसलिए इस अनित्य, असुख लोक में रहते हुए भी ‘मेरा भजन’ कर। → अर्जुन के लिए अगला चरण स्पष्ट है—समर्पण-योग को युद्ध-कर्तव्य में कैसे उतारना है, यह आगे की वाणी में और तीक्ष्ण रूप से खुलता है।
Verse 1
१६)। ४. चौरासी लाख योनियोंमें भटकते-भटकते कभी-न-कभी भगवान् दया करके जीवमात्रको मनुष्यशरीर देकर अपने तथा देवताओंके लोकोंमें जानेका सुअवसर देते हैं। उस समय यदि वह जीवनका सदुपयोग करे तो दोनोंमेंसे किसी एक मार्गके द्वारा गन्तव्य स्थानको अवश्य प्राप्त कर सकता है। अतएव प्रकारान्तरसे प्राणिमात्रके साथ इन दोनों मार्गोंका सम्बन्ध है। ये मार्ग सदासे ही समस्त प्राणियोंके लिये हैं और सदैव रहेंगे। इसीलिये इनको शाश्वत कहा है। यद्यपि महाप्रलयमें जब समस्त लोक भगवानमें लीन हो जाते हैं
श्रीभगवानुवाच । इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
Verse 2
१, २; बृहदारण्यक उप० ६,६), “अत्रैव समवलीयन्ते” (बृहदारण्यक उप० ३ ४ बृहदारण्यक उप० ६ ५, ६, ७; बृहदारण्यक उप० ६ राजविद्या: राजगुह्ांँ पवित्रमिदमुत्तममरें । प्रत्यक्षावगमं" धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम्5 यह विज्ञानसहित ज्ञान सब विद्याओंका राजा, सब गोपनीयोंका राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करनेमें बड़ा सुगम* और अविनाशी है
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥
Verse 3
सम्बन्ध-- जब विज्ञानसहित ज्ञानकी इतनी महिमा है और इसका साधन भी इतना युगम है तो फिर सभी मनुष्य इसे धारण क्यों नहीं करते? इस जिज्ञासापर अश्रद्धाकों ही इसमें प्रधान कारण दिखलानेके लिये भगवान् अब इसपर श्रद्धा न करनेवाले मनुष्योंकी निन््दा करते हैं-- अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि
अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
Verse 4
१५) संवत्सरके अभिमानी देवताके पास पहुँचा देना इसका काम है। वहाँसे आगे संवत्सरका अभिमानी देवता उसे सूर्यलोकमें पहुँचाता है। वहाँसे क्रमश: आदित्याभिमानी देवता चन्द्राभिमानी देवताके अधिकारमें और वह विद्युत्ु-अभिमानी देवताके अधिकारमें पहुँचा देता है। फिर वहाँपर भगवानके परमधामसे भगवान्के पार्षद आकर उसे परमधाममें ले जाते हैं और तब उसका भगवानसे मिलन हो जाता है। ध्यान रहे कि इस वर्णनमें आया हुआ “चन्द्र” शब्द हमें दीखनेवाले चन्द्रलोकका और उसके अभिमानी देवताका वाचक नहीं है। ३. इस श्लोकमें 'ब्रह्मविद:” पद निर्गुण ब्रह्मके तत्त्वको या सगुण परमेश्वरके गुण
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
Verse 5
४ ।। न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्* । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
Verse 6
यथा55काशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
Verse 7
सम्बन्ध-- विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करते हुए भगवान्ने यहॉतक प्रभावसाहित अपने निराकारस्वरूपका तत्त्व समझानेके लिये अपनेको सबमें व्यापक: सबका आधार सबका उत्पादक; असंग और निर्विकार बतलाया। अब अपने भ्रूतभावन स्वरूपका स्पष्टीकरण करते हुए यृष्टिरचनादि कर्मोका तत्त्व समझाते हैं-- सर्वभूतानिः कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षयेः पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
Verse 8
७ ।। प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
Verse 9
सम्बन्ध-- इस प्रकार जगत्-रचनादि समस्त कर्म
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
Verse 10
५ तथा ५,६) अर्थात् “क्योंकि उसके प्राण उत्क्रान्तिको नहीं प्राप्त होते--शरीरसे निकलकर अन्यत्र नहीं जाते, “यहींपर लीन हो जाते हैं', “वह ब्रह्म हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।' २. यहाँ “ब्रह्म” शब्द सगुण परमेश्वरका वाचक है। उनके कभी नाश न होनेवाले नित्य धाममें, जिसे सत्यलोक, परमधाम, साकेतलोक, गोलोक, वैकुण्ठलोक आदि नामोंसे कहा है, पहुँचकर भगवानूको प्रत्यक्ष कर लेना ही उनको प्राप्त होना है। ३. यहाँ 'धूम:” पद धूमाभिमानी देवताका अर्थात् अन्धकारके अभिमानी देवताका वाचक है। उसका स्वरूप अन्धकारमय होता है। अग्नि-अभिमानी देवताकी भाँति पृथ्वीके ऊपर समुद्रसहित समस्त देशमें इसका भी अधिकार है तथा दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाले साथकोंको रात्रि-अभिमानी देवताके पास पहुँचा देना इसका काम है। दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाला जो साधक दिनमें मर जाता है उसे यह दिनभर अपने अधिकारमें रखकर रात्रिका आरम्भ होते ही रात्रि- अभिमानी देवताको सौंप देता है और जो रात्रिमें मरता है, उसे तुरंत ही रात्रि-अभिमानी देवताके अधीन कर देता है। ४. यहाँ 'रात्रि: पदको भी रात्रिके अभिमानी देवताका ही वाचक समझना चाहिये। इसका स्वरूप अन्धकारमय होता है। दिनके अभिमानी देवताकी भाँति इसका अधिकार भी जहाँतक पृथ्वीलोककी सीमा है, वहाँतक है। भेद इतना ही है कि पृथ्वीलोकमें जिस समय जहाँ दिन रहता है, वहाँ दिनके अभिमानी देवताका अधिकार रहता है और जिस समय जहाँ रात्रि रहती है, वहाँ रात्रि-अभिमानी देवताका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाले साधकको पृथ्वीलोककी सीमासे पार करके अन्तरिक्षमें कृष्णपक्षके अभिमानी देवताके अधीन कर देना इसका काम है। यदि वह साधक शुक्लपक्षमें मरता है, तब तो उसे कृष्णपक्षके आनेतक अपने अधिकारमें रखकर और यदि कृष्णपक्षमें मरता है तो तुरंत ही अपने अधिकारसे पार करके कृष्णपक्षाभिमानी देवताके अधीन कर देता है। ५. कृष्णपक्षाभिमानी देवताका वाचक यहाँ “कृष्ण:” पद है। इसका स्वरूप भी अन्धकारमय होता है। पृथ्वी-मण्डलकी सीमाके बाहर अन्तरिक्षलोकमें, जिन पितृलोकोंमें पंद्रह दिनका दिन और उतने ही समयकी रात्रि होती है, वहाँतक इसका भी अधिकार है। भेद इतना ही है कि जिस समय जहाँ उस लोकमें शुक्लपक्ष रहता है, वहाँ शुक्लपक्षाभिमानी देवताका अधिकार रहता है और जहाँ कृष्णपक्ष रहता है, वहाँ कृष्णपक्षाभिमानी देवताका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे स्वर्गमें जानेवाले साधकोंको दक्षिणायनाभिमानी देवताके अधीन कर देना इसका काम है। जो दक्षिणायन-मार्गका अधिकारी साधक उत्तरायणके समय इसके अधिकारमें आता है, उसे दक्षिणायनका समय आनेतक अपने अधिकारमें रखकर और जो दक्षिणायनके समय आता है, उसे तुरंत ही यह अपने अधिकारसे पार करके दक्षिणायनाभिमानी देवताके पास पहुँचा देता है। ६. जिन छ: महीनोंमें सूर्य दक्षिण दिशाकी ओर चलते रहते हैं, उस छमाहीको दक्षिणायन कहते हैं। उसके अभिमानी देवताका वाचक यहाँ “दक्षिणायनम्” पद है। इसका स्वरूप भी अन्धकारमय होता है। अन्तरिक्षतोकके ऊपर जिन देवताओंके लोकोंमें छ: महीनोंका दिन और छ: महीनोंकी रात्रि होती है, वहाँतक इसका भी अधिकार है। भेद इतना ही है कि उत्तरायणके छ: महीनोंमें उसके अभिमानी देवताका वहाँ अधिकार रहता है और दक्षिणायनके छ: महीनोंमें इसका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे स्वर्गमें जानेवाले साधकोंको अपने अधिकारसे पार करके उपनिषयदोंमें वर्णित पितृलोकाभिमानी देवताके अधिकारमें पहुँचा देना इसका काम है। वहाँसे पितृलोकाभिमानी देवता साधकको आकाशाभिमानी देवताके पास और वह आकाशाभिमानी देवता चन्द्रमाके लोकमें पहुँचा देता है (छान्दोग्य उप० ५ १६)। यहाँ चन्द्रमाका लोक उपलक्षणमात्र है; अत: ब्रह्मेके लोकतक जितने भी पुनरागमनशील लोक हैं, चन्द्रलोकसे उन सभीको समझ लेना चाहिये। ध्यान रहे कि उपनिषदोंमें वर्णित यह पितृलोक वह पितृलोक नहीं है, जो अन्तरिक्षके अन्तर्गत है और जहाँ पंद्रह दिनका दिन और उतने ही समयकी रात्रि होती है। ३. स्वर्गादिके लिये पुण्यकर्म करनेवाला पुरुष भी अपनी ऐहिक भोगोंकी प्रवृत्तिका निरोध करता है, इस दृष्टिसे उसे भी “योगी” कहना उचित है। इसके सिवा योगगश्रष्ट पुरुष भी इस मार्गसे स्वर्गमें जाकर वहाँ कुछ कालतक निवास करके वापस लौटते हैं। वे भी इसी मार्गसे जानेवालोंमें हैं। अत: उनको “योगी” कहना उचित ही है। यहाँ “योगी” शब्दका प्रयोग करके यह बात भी दिखलायी गयी है कि यह मार्ग पापकर्म करनेवाले तामस मनुष्योंके लिये नहीं है, उच्च लोकोंकी प्राप्तिके अधिकारी शास्त्रीय कर्म करनेवाले पुरुषोंके लिये ही है (गीता २४२, ४३, ४४ तथा ९।२०, २१ आदि)। २. चन्द्रमाके लोकमें उसके अभिमानी देवताका स्वरूप शीतल प्रकाशमय है। उसीके-जैसे प्रकाशमय स्वरूपका नाम “ज्योति” है और वैसे ही स्वरूपको प्राप्त हो जाना--चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होना है। वहाँ जानेवाला साधक उस लोकमें शीतल प्रकाशमय दिव्य देवशरीर पाकर अपने पुण्यकर्मोके फलस्वरूप दिव्य भोगोंको भोगता है। 3. चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर वहाँ रहनेका नियत समय समाप्त हो जानेपर इस मृत्युलोकमें वापस आ जाना ही वहाँसे लौटना है। जिन कर्मोंके फलस्वरूप स्वर्ग और वहाँके भोग प्राप्त होते हैं, उनका भोग समाप्त हो जानेसे जब वे क्षीण हो जाते हैं, तब प्राणीको बाध्य होकर वहाँसे वापस लौटना पड़ता है। वह चन्द्रलोकसे आकाशमें आता है, वहाँसे वायुरूप हो जाता है, फिर धूमके आकारमें परिणत हो जाता है, धूमसे बादलमें आता है, बादलसे मेघ बनता है, इसके अनन्तर जलके रूपमें पृथ्वीपर बरसता है, वहाँ गेहूँ, जौ, तिल, उड़द आदि बीजोंमें या वनस्पतियों में प्रविष्ट होता है। उनके द्वारा पुरुषके वीर्यमें प्रविष्ट होकर स्त्रीकी योनिमें सींचा जाता है और अपने कर्मानुसार योनिको पाकर जन्म ग्रहण करता है। (छान्दोग्य उप० ५ मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगत् विपरिवर्तते हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाताके सकाशसे प्रकृति चराचरसहित सर्वजगत्को रचती हैः और इस हेतुसे ही यह संसार-चक्र घूम रहा है
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
Verse 11
सम्बन्ध-- अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करते हुए भगवान्ने चौथेसे छठे शलोकतक प्रभावसहित सगुण-निराकार स्वरूपका तत्त्व समझाया। फिर सातवेंसे दसवें श*लोकतक युष्टि-रचनादि समस्त कर्मो्नें अपनी असंगता और निर्विकारता दिखलाकर उन कर्मोकी दिव्यताका तत्त्व बतलाया। अब अपने सगुण-साकार रूपका महत्त्व उसकी भक्तिका प्रकार और उसके गुण और प्रभावका तत्त्व समझानेके लिये पहले दो श्लोकोंगें उसके प्रभावकों न जाननेवाले
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
Verse 12
मोघाशा: मोघकर्माणोः मोघज्ञानाईं विचेतस: । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता:
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञानाः विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
Verse 13
१२ ।। सम्बन्ध-- भगवान्का प्रभाव न जाननेवाले आयुरी प्रकृतिके मनुष्योंकी निन्दा करके अब सगुणरूपकी भक्तिका तत्त्व समझानेके लिये भगवान्के प्रभावकों जाननेवाले
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥
Verse 14
सततंः कीर्तयन्तो मां यतन्तश्नः दृढव्रता:+ । नमस्यन्तश्न मां भक््त्या नित्ययुक्ताईं उपासते
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥
Verse 15
ऑपि-जफाप बछ। सं: ३. उनतीसवें श्लोकमें वर्णित “ब्रह्म'
अर्जुन उवाच— किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥
Verse 16
सम्बन्ध-- यमस्त विश्वकी उपासना भ्रगवान्की ही उपासना कैसे है--यह स्पष्ट समझानेके लिये अब चार शलोकोंद्वाय भगवान् इस बातका प्रतिपादन करते हैं कि समस्त जगत् मेरा ही स्वरूप है-- अहं क्रतुरहं! यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्ः | मन्त्रो5हमहमेवाज्यमहमग्निरहंरं हुतम्
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥
Verse 17
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह: । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च॥
Verse 18
गतिर्भ्ताः5 प्रभु: साक्षी निवास: शरणं5३ सुह्ृत्*३ | प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्5४
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
Verse 19
तपाम्यहमहं वर्ष निगृल्नाम्युत्सूजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्न सदसच्चाहमर्जुन
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
Verse 20
सम्बन्ध--तेरहवेंसे पंद्रहवें *लीकतक अपने सगुण-निर्गुण और विराट्ू रूपकी उपासनाओंका वर्णन करके भगवान्ने उन्नीसवें "्त्रीकतक समस्त विश्वको अपना स्वरूप बतलाया। 'समस्त विश्व मेरा ही स्वरूप होनेके कारण इन्द्रादि अन्य देवोंकी उपासना भी प्रकारान्तरसे मेरी ही उपासना है
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान् ॥
Verse 21
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोक॑ विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
Verse 22
अनन्याश्रिन्तयन्तोः मां ये जना: पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्पहम्
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
Verse 23
ये5प्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:* । तेडपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
Verse 24
हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धासे युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओंको पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात्र अज्ञानपूर्वक है? ।।
हे अर्जुन! येऽपि श्रद्धया युक्ताः सकामभक्ताः अन्यदेवताः पूजयन्ति, तेऽपि मामेव पूजयन्ति; किन्तु तद् अविधिपूर्वकम् अज्ञानपूर्वकं च। अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च; परं तु मां तत्त्वेन नाभिजानन्ति, अत एव ते च्यवन्ति—पुनर्जन्मचक्रं प्राप्नुवन्ति।
Verse 25
सम्बन्ध-- भगवान्के भ्क्त आवागमनको प्राप्त नहीं होते और अन्य देवताओंके उपासक जआवागमनको प्राप्त होते हैं; इसका क्या कारण है? इस जिज्ञासापर उपास्यके स्वरूप और उपासकके भावसे उपासनाके फलमें भेद होनेका नियम बतलाते हैं-- यान्ति देवब्रता देवान् पितृन् यान्ति पितृव्रता: । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोडपि माम्
देवव्रता देवान् यान्ति, पितृव्रताः पितṝन् यान्ति। भूतानि यान्ति भूतेज्याः, मद्याजिनोऽपि मामेव यान्ति। यथोपास्यं तथा फलम्; यद्भावेन यजनं, तद्गतिं नियच्छति।
Verse 26
सम्बन्ध-- भगवान्की भ्क्तिका भयवत्प्राप्तिरूप महान् फल होनेपर भी उसके साधनमें कोई कठिनता नहीं है; बल्कि उसका साधन बहुत ही युगम है--यही बात दिखलानेके लिये भ्रगवान् कहते हैं-- पत्र॑ पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक््त्युह्वतमश्नामि5 ३ प्रयतात्मन:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति, तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः। अल्पमपि समर्पितं शुद्धभावेन, मम प्रीत्यै भवति।
Verse 27
सम्बन्ध-- यदि ऐसी ही बात है तो मुझे क्या करना चाहिये
यत् करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥
Verse 28
सम्बन्ध--इस प्रकार समस्त कमोंको आपके अर्पण करनेसे कया होगा; इस जिज्ञासापर कहते हैं-- शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै: । संन्यासयोगयुक्तात्माः विमुक्तो मामुपैष्यसि
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥
Verse 29
सम्बन्ध--उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्की भक्ति करनेवालेको भगवान्की प्राप्ति होती है
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
Verse 30
अपिः चेत् सुदुराचारो3 भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि सः
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
Verse 31
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर मुझको भजता हैः तो वह साधु ही माननेयोग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है। अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं हैः ।।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
Verse 32
इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद््गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास््ररूप श्रीमद्भगवद््गीतोपनिषद्
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
Verse 33
कि पुनर्ब्राह्मणा:* पुण्या भक्ता: राजर्षयस्तथा | अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्पय भजस्व माम्
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
Verse 34
फिर इसमें कहना ही क्या है
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
The dilemma is how to act responsibly when outcomes appear overwhelming and prefigured by larger forces; Arjuna’s fear and disorientation test whether duty can be sustained without collapsing into paralysis or despair.
The chapter teaches that perception and agency can be reoriented: one acts as an instrument aligned with dharma, recognizing time-bound transformation (kāla) while cultivating devotion and detachment that reduce egocentric fixation.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides a meta-criterion for access to the vision’s meaning: such reality is not reached by ritual, austerity, or study alone, but by ananyā-bhakti enabling true knowledge, vision, and participatory understanding.
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