Mahabharata Adhyaya 32
Bhishma ParvaAdhyaya 3229 Versesरण-स्थल पृष्ठभूमि में स्थिर; अध्याय का केंद्र युद्ध-रणनीति नहीं, अन्तःसाधना और परम-गति का निर्णय है।

Adhyaya 32

विभूति-योगः (Vibhūti-yoga) — Exemplary Manifestations as a Contemplative Index

Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-adhyāya cluster within Bhīṣma-parva)

Kṛṣṇa resumes instruction by asserting the limits of even divine and sage knowledge regarding his ultimate origin, positioning himself as the causal source of devas and seers (1–2). He states that correct recognition of him as unborn, beginningless, and lord of worlds functions as a liberative cognition that loosens moral-psychological burden (3). He then enumerates foundational qualities and polarities—intellect, knowledge, non-delusion, restraint, pleasure and pain, fear and fearlessness—as differentiated modalities proceeding from him (4–5), and situates primordial progenitors (seven seers, early Manus) as mind-born from his being (6). Knowing his vibhūti and yoga is presented as stabilizing one’s yogic integration; devotion is characterized by reflective understanding, mutual instruction, and constant discourse (7–9). He promises buddhi-yoga to devoted practitioners and depicts an inner illumination that dispels ignorance (10–11). Arjuna responds with a formal ascription of supreme titles and requests an expanded account of divine manifestations and the practical means of contemplation (12–18). Kṛṣṇa agrees to speak selectively, then offers a structured catalogue: he is the self within beings; among classes he is the foremost (Vişṇu among Ādityas, Sun among lights, etc.), extending across sacred texts, deities, mountains, rivers, virtues, time, governance, and the seed of all existence (19–39). He concludes that the list is only indicative: all excellence is a fraction of his radiance, and the cosmos is sustained by a single portion of his power (40–42).

Chapter Arc: अर्जुन का प्रश्न युद्धभूमि के बीचों-बीच भीतर की अंतिम घड़ी पर टिक जाता है—‘अधियज्ञ कौन है, देह में कैसे स्थित है, और प्रयाण-काल में युक्तात्मा उसे कैसे जानें?’ → कृष्ण उत्तर देते हुए ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ की परिभाषाएँ खोलते हैं; फिर प्रश्न और तीखा होता है—मृत्यु के क्षण चंचल मन को कैसे साधें, किस स्मरण से गति सुनिश्चित हो? → निर्णायक वचन: ‘अन्तकाले मामेव स्मरन्…’—जो अंतिम क्षण में कृष्ण-स्मरण के साथ देह त्यागता है, वह उन्हीं को प्राप्त होता है; और यह स्मरण अभ्यास-योग, एकाग्र चित्त, भक्ति और प्राण-नियमन से सिद्ध होता है। → कृष्ण काल-चक्र और ब्रह्मा के दिन-रात्रि का विस्तार बताते हैं, फिर ‘शुक्ल/कृष्ण’—दो मार्गों का रहस्य रखते हैं; योगी इन मार्गों को जानकर मोहित नहीं होता और ‘सर्वेषु कालेषु योगयुक्त’ रहने का आदेश पाता है। → अर्जुन के सामने अब प्रश्न नहीं, साधना का आदेश है—क्या वह इसी क्षण, इसी रणभूमि में, निरंतर योग-युक्त होकर कर्म में उतरेगा?

Shlokas

Verse 1

भीष्मपर्वमें इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३९ ॥। 75 5 १. इस लोक और परलोकके किसी भी भोगके प्रति जिसके मनमें तनिक भी आसक्ति नहीं रह गयी है तथा जिसका मन सब ओरसे हटकर एकमात्र परम प्रेमास्पद

अर्जुन उवाच । किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥

Verse 2

अधियज्ञ: कथं कोअत्र देहेडस्मिन्‌ मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोडसि नियतात्मभि:

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥

Verse 3

श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावो<ध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्धवकरो विसर्ग: कर्मसंज्ञित:

श्रीभगवानुवाच—अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥

Verse 4

अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञो5हमेवात्र देहे देहभूतां वर

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥

Verse 5

अन्तकाले च मामेव स्मरन्‌ मुक्त्वा कलेवरम्‌ | यः प्रयाति स मद्धाव॑ याति नास्त्यत्र संशय:

अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥

Verse 6

सम्बन्ध-- यहाँ यह बात कही गयी कि भ्रगवान्‌का स्मरण करते हुए मरनेवाला भगवान्‌को ही प्राप्त होता है। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि केवल भगवान्‌के स्मरणके सम्बन्धनें ही यह विशेष नियम है या सभीके सम्बन्धमें है? इसपर कहते हैं-- यं यं वापि स्मरन्‌ भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌ | त॑ तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:

यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

Verse 7

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌्गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌्गीतोपनिषद्‌: श्रीकृष्णाजुनसंवादमें ज्ञान-विज्ञानयोग नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥

Verse 8

अभ्यासयोगयुक्तेनः चेतसा नान्यगामिना । परम॑ पुरुष दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥

Verse 9

कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्‌ य: । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम्‌ आदित्यवर्ण तमस: परस्तात्‌

कविं पुराणमनुशासितारं अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥

Verse 10

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्‍्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌ सतं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥

Verse 11

जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता,“ सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले, अचिन्त्यस्वरूप, सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाशरूप और अविद्यासे अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका स्मरण करता है, वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकालमें भी योगबलसे भृकुटीके मध्यमें प्राणको अच्छी प्रकार स्थापित करके फिर निश्चल मनसे स्मरण करता हुआ उस दिव्यस्वरूप परम पुरुष परमात्माको ही प्राप्त होता है ।। सम्बन्ध- पाँचवें श्लोकमें भगवानका चिन्तन करते-करते मरनेवाले साधारण मनुष्यकी गतिका संक्षेपर्ें वर्णन किया गया; फिर आठवेंसे दसवें श*लीकतक भगवान्‌के 'अधियज्ञ" नामक सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त स्वरूपका चिन्तन करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिके सम्बन्धगें बतलाया;, अब ग्यारहवें शलोकसे तेरहवेंतक परम अक्षर निर्गुण नियाकार प्॑रह्मकी उपासना करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिका वर्णन करनेके लिये पहले उस अक्षर ब्रह्मकी प्रशंसा करके उसे बतलाते हैं-- यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागा: । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद संग्रहेण प्रवक्ष्ये

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥

Verse 12

वेदके जाननेवाले विद्वान जिस सच्चिदानन्द्नरूप परमपदको अविनाशी कहते हैं,> आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचारीलोग ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, उस परमपदको मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगाः ।।

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥

Verse 13

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्‌ मामनुस्मरन्‌ः | यः प्रयाति त्यजन्‌ देहं स याति परमां गतिम्‌

ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् ॥

Verse 14

अनन्यचेता:* सतत यो मां स्मरति नित्यश: । तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्थ योगिन:

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥

Verse 15

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्रवतम्‌ । नाप्रुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता:

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥

Verse 16

परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजनर मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते: ।।

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥

Verse 17

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्‌ ब्रह्मणो विदु: । रात्रि युगसहस्रान्तां तेडहोरात्रविदो जना:

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥

Verse 18

ब्रह्माका जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाला और रात्रिको भी एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैं,* वे योगीजन कालके तत्त्वको जाननेवाले हैं १७ ।।

अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥

Verse 19

१८ ।। भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्यागमेडवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥

Verse 20

सम्बन्ध--ब्रह्माकी यात्रिके आरम्भमें जिस अव्यक्तमें समस्त थूत लीन होते हैं और दिनका आरम्भ होते ही जिससे उत्पन्न होते हैं; वही अव्यक्त सर्वश्रेष्ठ है या उससे बढ़कर कोई दूसरा और है? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- परस्तस्मात्तु भावो<न्योडव्यक्तोडव्यक्तातू सनातन: । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥

Verse 21

जो अव्यक्त 'अक्षर'* इस नामसे कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परम गतिः कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

Verse 22

पुरुष: स पर: पार्थ भक्‍्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥

Verse 23

सम्बन्ध-- आठवें और दसवें शलोकोंमें अधियज्ञकी उपासनाका फल परम दिव्य पुरुषकी प्राप्ति; तेरहवें *लोकमें परम अक्षर निर्गुण ब्रह्ममीे उपासनाका फल परमगतिकी प्राप्ति और चौदहवें शलोकमें सगुण-साकार भगवान्‌ श्रीकृष्णणी उपासनाका फल भगवान्‌की प्राप्ति बतलाया गया है। इससे तीनोंगें किसी प्रकारके भेदका भ्रम न हो जाय; इस उद्देश्यसे अब सबकी एकताका प्रतिपादन करते हुए उनकी प्राप्तिके बाद पुनर्जन्मका अभाव दिखलाते हैं-- अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम्‌ । य॑ं प्राप्प न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥

Verse 24

अग्निर्ज्योतिरह:३ ४ शुक्ल:+ षण्मासा उत्तरायणम्‌: | तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्म॒विदों जना:

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥

Verse 25

धूमो3 रात्रिस्तथारं कृष्ण:5 षण्मासा दक्षिणायनम्‌ईः | तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥

Verse 26

शुक्लकृष्णे गती होते जगत: शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्यया5<वर्तते पुन:

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्यया वर्तते पुनः ॥

Verse 27

नैते सृती पार्थ जानन्‌ योगी मुह्ति कश्चन । तस्मात्‌ सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन

नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥

Verse 28

वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव दानेषु यत्‌ पुण्यफलं प्रदिष्टम्‌ अत्येति तत्सरवमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्‌

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥

Verse 32

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाम्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्म॒योगो नामाष्टमो5ध्याय: ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ भीष्मपर्वणि तु द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥

Frequently Asked Questions

The chapter addresses how a practitioner can stabilize discernment and devotion amid uncertainty: by replacing diffuse abstraction with a structured contemplative map (vibhūti) that anchors attention and reduces confusion (asaṃmoha).

All differentiated excellences—ethical qualities, cognitive powers, natural grandeur, and social exemplars—can be read as partial expressions of a single sustaining principle; recognizing this supports steady-minded action guided by buddhi rather than fluctuation.

A direct phalaśruti formula is not stated; however, the closing meta-commentary functions similarly by asserting that the catalogue is only a sample, that all splendor derives from a fraction of the supreme radiance, and that the cosmos is upheld by a single portion—framing the teaching as a contemplative key to comprehensive integration.

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