पूर्वरात्रे परार्धे च धारयेन् मन आत्मनः जन्तोः पञ्चेन्द्रियस्यास्य यद्य् एकं क्लिन्नम् इन्द्रियम् //
Этот стих (№ 49) сохраняется в традиции как ключ к пониманию и богопочитанию.