यह सोपान ‘धर्म-संकट’ से ‘शरणागति’ की ओर चढ़ने का द्वार है: राज्य-व्यवस्था (राजधर्म) टूटती दिखती है, पर भक्त-हृदय में राम-नाम का राज्य (रामराज्य-तत्त्व) स्थापित होता है। यहाँ वियोग, लोक-लज्जा, और अपजस के बीच ‘राम-पद-संमुखता’ ही मुक्ति-सीढ़ी का अगला पायदान बनती है।
ਅਯੋਧਿਆ ਕਾਂਡ ਦਾ ਰਸ-ਵਿਨ੍ਯਾਸ ਕਰੁਣ ਅਤੇ ਸ਼ਾਂਤ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਝੂਲਦਾ ਹੈ: ਇਕ ਪਾਸੇ ਕੈਕਈ-ਕ੍ਰਿਤ ਵਿਘਟਨ ਨਾਲ ਲੋਕ-ਵਿਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਵਿਸਾਦ, ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਭਰਤ ਦਾ ਰਾਮ-ਪ੍ਰੇਮ ਉਸ ਨੂੰ ਸ਼ੁੱਧ ਕਰ ਕੇ ‘ਸ਼ਰਣਾਗਤੀ-ਰਸ’ ਵਿੱਚ ਰੂਪਾਂਤਰਿਤ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਅੰਸ਼ ਵਿੱਚ ਭਰਤ ਕੈਕਈ ਦੇ ਦਾਰੁਣ ਆਰੋਪਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਵੀ ਮਨ ਨੂੰ ਰਾਮ-ਪਦ ਵੱਲ ਮੋੜਦੇ ਹਨ—ਇਹ ‘ਦਾਸ੍ਯ-ਭਕਤੀ’ ਦਾ ਉਤਕਰਸ਼ ਹੈ। ਤੁਲਸੀ ਇੱਥੇ ਰਾਜਸੱਤਾ ਨੂੰ ‘ਪਰਿਣਾਮ-ਧਰਮ’ (ਫਲ-ਧਰਮ) ਦੇ ਅਧੀਨ ਦਿਖਾਉਂਦੇ ਹਨ: ਸੰਪੱਤੀ, ਨਗਰ, ਸੈਨਾ—ਸਭ ਰਘੁਪਤੀ ਦੀਆਂ ਹਨ; ਸੇਵਕ ਦਾ ਧਰਮ ਸ੍ਵਾਮੀ-ਹਿਤ ਹੈ। ਨਾਲ ਹੀ, ਨਿਸ਼ਾਦ-ਰਾਜ ਗੁਹ ਦਾ ਸੰਦੇਹ ਲੋਕ-ਯਥਾਰਥ ਹੈ—ਭਕਤੀ-ਮਾਰਗ ਵਿੱਚ ਵੀ ਵਿਵੇਕ ਅਤੇ ਸਾਵਧਾਨੀ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਇਸ ਕਾਂਡ ਦਾ ਸਥਾਨ ‘ਸੋਪਾਨ’ ਵਿੱਚ ਨਿਰਣਾਇਕ ਹੈ: ਬਾਹਰੀ ਹਾਨੀ ਦੇ ਅੰਦਰ ਅੰਤਰਕਰਣ ਦੀ ਜਿੱਤ—ਰਾਮ ਵੱਲ ਚੱਲਣਾ ਹੀ ਮੋਖਸ਼-ਸੀੜ੍ਹੀ ਦਾ ਠੋਸ ਪੈਦਾਨ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
Verse 368 (चौपाई)
कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।। जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।। लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।। लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।। मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।। एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।। कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।। मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई।।
Verse 369 (दोहा/सोरठा)
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।180।।
Verse 370 (चौपाई)
कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।। दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।। तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका।। उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।। मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।। मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।। परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू।। संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।
Verse 371 (दोहा/सोरठा)
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।
Verse 372 (चौपाई)
गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।। मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।। परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।। सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।। डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।। एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।। जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा।। मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी।।
Verse 373 (दोहा/सोरठा)
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।
Verse 374 (चौपाई)
आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।। एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।। जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी।। तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।। सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।। अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।। तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।। जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।
Verse 375 (दोहा/सोरठा)
जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।
Verse 376 (चौपाई)
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।। लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।। मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी।। भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।। तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।। जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।। सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।। अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।
Verse 377 (दोहा/सोरठा)
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।
Verse 378 (चौपाई)
भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।। चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के।। मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई।। धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं।। कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू।। जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।। कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।
Verse 379 (दोहा/सोरठा)
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ। सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।
Verse 380 (चौपाई)
घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।। भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू।। संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही।। तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई।। करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।। अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।। कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।
Verse 381 (दोहा/सोरठा)
आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान। कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।
Verse 382 (चौपाई)
चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।। जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना।। कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।। बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।। अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।। बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।। नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।। सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी।।
Verse 383 (दोहा/सोरठा)
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।
Verse 384 (चौपाई)
राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।। बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।। देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे।। जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली।। तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।। तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।। सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।। तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू।।
Verse 385 (दोहा/सोरठा)
पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग। करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।188।।
Verse 386 (चौपाई)
सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।। समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।। कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।। जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई।। जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी।। भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।। सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा।। का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।
Verse 387 (दोहा/सोरठा)
अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु। हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।189।।
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