
Keśava-tattva-kathana (On the Principle of Keśava: Cosmogony and Divine Epithets)
Upa-parva: Mokṣa-dharma / Nārāyaṇīya-oriented Discourse (Cosmogony and Viṣṇu-Nārāyaṇa Mahātmyam)
Yudhiṣṭhira addresses Bhīṣma with a request to hear, in principled terms (tattvena), about Puṇḍarīkākṣa Acyuta—Viṣṇu/Nārāyaṇa as the uncreated agent and the source and dissolution of beings. Bhīṣma replies that this account is heard from established transmitters (Rāma Jāmadagnya, Nārada, Kṛṣṇa Dvaipāyana, Asita Devala, Vālmīki, and Mārkaṇḍeya), situating the discourse within a chain of authoritative reception. The chapter narrates a cosmogony: the formation of the mahābhūtas (wind, fire/light, waters, space, earth), the Lord’s repose upon the waters, and the contemplation of Saṃkarṣaṇa as support. From the navel-lotus arises Brahmā, followed by the appearance of the asura Madhu and his defeat, yielding the epithet Madhusūdana. A genealogical sequence proceeds through Brahmā’s mind-born sons, Dakṣa, his daughters, Kaśyapa’s marriages, and the emergence of devas, danavas, and other categories of beings, including the Vāmana form of Viṣṇu and its consequences for divine prosperity and adversarial defeat. The chapter also outlines the ordering of time (day-night, seasons, divisions of the day), creation of clouds and mobile/immobile life, and an account of varṇa origination. It describes yuga-based shifts in reproductive norms and concludes by emphasizing Keśava’s inconceivable, supra-human status.
Chapter Arc: युधिष्ठिर भीष्म से जिज्ञासा करता है—विरूपक के उपदेश के बाद ब्राह्मण-जापक और राजा इक्ष्वाकु ने क्या उत्तर दिया, उनका संवाद क्या रहा, और ‘क्रममुक्ति’ व ‘लोकान्तर-प्राप्ति’ का रहस्य कैसे घटित हुआ। → भीष्म उस प्रसंग को आगे बढ़ाते हैं: ब्राह्मण धर्म का सत्कार कर यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग की वंदना करता है; फिर ‘फल’ (जप का पुण्य) को लेकर एक सूक्ष्म नैतिक-सांस्कृतिक तनाव उभरता है—क्या साधना का फल दान/समर्पण से सिद्धि बदलती है, और क्या जापक स्वयं फल-त्याग कर भी उसी गति को पा सकता है। → राजा का निर्णायक वचन—यदि फल-समर्पण से तुम्हारी श्रद्धा और सिद्धि ‘अफला’ हो जाती है, तो मेरे साथ चलो और जप का फल मुझे प्राप्त कराओ—और उसी के साथ दिव्य संकेत प्रकट होते हैं: पुष्प-वर्षा, अप्सराओं का नर्तन, दिशाओं में हाहाकार, और स्तुत्य ज्योति का ब्रह्मा में प्रवेश। → महात्मा धर्म को अग्रणी मानकर प्रसन्नचित्त आगे बढ़ते हैं; भीष्म निष्कर्ष रूप में ‘जापकानां फलम्’—जप करने वालों की गति—को यथाश्रुत वर्णित कर देते हैं और युधिष्ठिर से पूछते हैं कि अब और क्या सुनना है। → भीष्म का प्रश्न—“कि भूयः श्रोतुमिच्छसि?”—अगले अध्याय के लिए जिज्ञासा छोड़ देता है कि युधिष्ठिर मोक्ष-मार्ग के किस अगले सोपान/उपाख्यान को चुनेंगे।
Verse 1
युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! उस समय विरूपके पूर्वोक्त वचन कहनेपर ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकु उन दोनोंने उसे कया उत्तर दिया, यह मुझे बताइये
ਯੁਧਿਸ਼ਠਿਰ ਨੇ ਕਿਹਾ— ਪਿਤਾਮਹ! ਉਸ ਵੇਲੇ ਵਿਰੂਪਕ ਨੇ ਪਹਿਲਾਂ ਕਹੇ ਬਚਨ ਉਚਾਰੇ ਤਾਂ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਅਤੇ ਰਾਜਾ ਇਖ਼ਸ਼ਵਾਕੁ—ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਕੀ ਜਵਾਬ ਦਿੱਤਾ? ਮੈਨੂੰ ਦੱਸੋ।
Verse 2
अथवा तौ गतौ तत्र यदेतत् कीर्तितं त्वया । संवादो वा तयो: को5भूत् कि वा तौ तत्र चक्रतुः,तथा आपने जो यह स््योमुक्ति, क्रममुक्ति और लोकान्तरकी प्राप्तिरूप तीन प्रकारकी गति बतायी है, उनमेंसे वे दोनों किस गतिको प्राप्त हुए? उस समय उन दोनोंमें क्या बातचीत हुई और उन्होंने क्या किया?
ਯੁਧਿਸ਼ਠਿਰ ਨੇ ਕਿਹਾ— ਜਾਂ, ਜਿਵੇਂ ਤੁਸੀਂ ਵਰਣਨ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਜੇ ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਉੱਥੇ ਗਏ ਸਨ, ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਕਿਹੋ ਜਿਹਾ ਸੰਵਾਦ ਹੋਇਆ ਅਤੇ ਉੱਥੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕੀ ਕੀਤਾ? ਅਤੇ ਤੁਸੀਂ ਜੋ ਤਿੰਨ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੀ ਗਤੀ ਦੱਸੀ ਹੈ—ਸਦ੍ਯੋਮੁਕਤੀ, ਕ੍ਰਮਮੁਕਤੀ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂਤਰ-ਪ੍ਰਾਪਤੀ—ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਕਿਹੜੀ ਗਤੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਏ? ਉਸ ਵੇਲੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕੀ ਕਿਹਾ ਅਤੇ ਕੀ ਕਰਮ ਕੀਤਾ?
Verse 3
भीष्म उवाच तथेत्येवं प्रतिश्रुत्य धर्म सम्पूज्य च प्रभो । यम॑ काल च मृत्युं च स्वर्ग सम्पूज्य चाहत:,भीष्मजीने कहा--प्रभो! तब “बहुत अच्छा” कहकर ब्राह्मणने धर्म, यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग--इन सभी पूजनीय देवताओंका पूजन किया। वहाँ पहलेसे जो ब्राह्मण मौजूद थे और दूसरे भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबके चरणोंमें सिर झुकाकर सबकी यथोचित पूजा करके ब्राह्मणने राजासे कहा--
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਕਿਹਾ— ਪ੍ਰਭੋ! ਤਦ ‘ਤਥਾਸਤੁ’ ਕਹਿ ਕੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੇ ਧਰਮ ਦਾ ਯਥਾਵਿਧਿ ਪੂਜਨ ਕੀਤਾ; ਅਤੇ ਫਿਰ ਯਮ, ਕਾਲ, ਮ੍ਰਿਤ੍ਯੁ ਅਤੇ ਸਵਰਗ—ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਭ ਪੂਜਨੀਯ ਦਿਵ੍ਯ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨੂੰ ਵੀ ਆਦਰ ਨਾਲ ਪੂਜਿਆ।
Verse 4
पूर्व ये चापरे तत्र समेता ब्राह्मणर्षभा: । सर्वान् सम्पूज्य शिरसा राजानं सोडब्रवीद् द्विज:,भीष्मजीने कहा--प्रभो! तब “बहुत अच्छा” कहकर ब्राह्मणने धर्म, यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग--इन सभी पूजनीय देवताओंका पूजन किया। वहाँ पहलेसे जो ब्राह्मण मौजूद थे और दूसरे भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबके चरणोंमें सिर झुकाकर सबकी यथोचित पूजा करके ब्राह्मणने राजासे कहा--
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਕਿਹਾ— ਉੱਥੇ ਪਹਿਲਾਂ ਆਏ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਪਧਾਰੇ—ਦੋਹਾਂ ਹੀ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਇਕੱਠੇ ਸਨ। ਉਹਨਾਂ ਸਭ ਨੂੰ ਸਿਰ ਨਿਵਾ ਕੇ ਯਥੋਚਿਤ ਸਤਿਕਾਰ-ਪੂਜਨ ਕਰਕੇ ਉਹ ਦ੍ਵਿਜ ਰਾਜੇ ਨੂੰ ਬੋਲਿਆ।
Verse 5
फलेनानेन संयुक्तो राजर्षे गच्छ मुख्यताम् । भवता चाभ्यनुज्ञातो जपेयं भूय एव ह,*राजर्षे! इस फलसे संयुक्त होकर आप श्रेष्ठ गतिको प्राप्त कीजिये और आपकी आज्ञा लेकर मैं फिर जपमें लग जाऊँगा
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ— ਹੇ ਰਾਜਰਿਸ਼ੀ! ਇਸ ਪੁੰਨ-ਫਲ ਨਾਲ ਯੁਕਤ ਹੋ ਕੇ ਤੂੰ ਪਰਮ ਪਦ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ। ਅਤੇ ਤੇਰੀ ਆਗਿਆ ਲੈ ਕੇ ਮੈਂ ਫਿਰ ਜਪ ਵਿੱਚ ਲੱਗਾਂਗਾ।
Verse 6
वरश्न मम पूर्व हि दत्तो देव्या महाबल । श्रद्धा ते जपतो नित्यं भवत्विति विशाम्पते,“महाबली प्रजानाथ! मुझे देवी सावित्रीने वर दिया है कि जपमें तुम्हारी नित्य श्रद्धा बनी रहेगी”
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ— ਹੇ ਮਹਾਬਲੀ! ਪਹਿਲਾਂ ਦੇਵੀ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਇਹ ਵਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ—‘ਹੇ ਪ੍ਰਜਾਨਾਥ! ਤੂੰ ਨਿੱਤ ਜਪ ਕਰਦਾ ਰਹੇਂ; ਤੇਰੀ ਸ਼ਰਧਾ ਸਦਾ ਅਡੋਲ ਰਹੇ।’
Verse 7
राजोवाच यद्येवमफला सिद्धि: श्रद्धा च जपितुं तव । गच्छ विप्र मया सार्थ जापकं फलमाप्रुहि,राजाने कहा--विप्रवर! यदि इस प्रकार मुझे फल समर्पण करनेके कारण आपको फलकी प्राप्ति नहीं हो रही है और पुनः: जप करनेमें ही आपकी श्रद्धा होती है तो आप मेरे साथ ही चलें और जप-दानजनित फलको प्राप्त करें
ਰਾਜੇ ਨੇ ਆਖਿਆ— ਹੇ ਵਿਪ੍ਰਵਰ! ਜੇ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮੈਨੂੰ ਫਲ ਅਰਪਣ ਕਰਨ ਕਰਕੇ ਤੇਰੀ ਸਿੱਧੀ ਨਿਸ਼ਫਲ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਫਿਰ ਵੀ ਤੇਰੀ ਸ਼ਰਧਾ ਜਪ ਵਿੱਚ ਹੀ ਟਿਕੀ ਹੈ, ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਚੱਲ ਅਤੇ ਜਪ ਤੇ ਦਾਨ ਤੋਂ ਉਤਪੰਨ ਫਲ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ।
Verse 8
ब्राह्मण उवाच कृतः प्रयत्न: सुमहान् सर्वेषां संनिधाविह । सह तुल्यफलावावं गच्छावो यत्र नौ गति:,ब्राह्मणने कहा--राजन्! मैंने यहाँ सबके समीप आपको अपने जपका फल देनेके लिये महान् प्रयत्न किया है; फिर भी आपका आग्रह साथ-साथ फलका उपभोग करनेका रहा है; अतः: हम दोनों समान फलके ही भागी हों। चलिये, जहाँतक हम दोनोंकी गति हो सके, साथ-साथ चलें
ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੇ ਆਖਿਆ— ਹੇ ਰਾਜਨ! ਇੱਥੇ ਸਭ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਤਪ ਅਤੇ ਜਪ ਦਾ ਫਲ ਤੁਹਾਨੂੰ ਅਰਪਣ ਕਰਨ ਲਈ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ ਯਤਨ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਪਰ ਤੁਹਾਡਾ ਅੜੀਅਲ ਪੱਖ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਮਿਲ ਕੇ ਹੀ ਫਲ ਭੋਗੀਏ। ਇਸ ਲਈ ਅਸੀਂ ਦੋਵੇਂ ਸਮਾਨ ਫਲ ਦੇ ਭਾਗੀ ਹੋਈਏ। ਆਓ, ਜਿੱਥੋਂ ਤੱਕ ਸਾਡੀ ਗਤੀ ਹੈ, ਇਕੱਠੇ ਚੱਲੀਏ।
Verse 9
भीष्य उवाच व्यवसायं तयोस्तत्र विदित्वा त्रिदशेश्वर: | सह देवैरुपययौ लोकपालैस्तथैव च,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवषण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ— ਹੇ ਰਾਜਨ! ਉੱਥੇ ਉਹਨਾਂ ਦੋਹਾਂ ਦੇ ਦ੍ਰਿੜ ਨਿਸ਼ਚੇ ਨੂੰ ਜਾਣ ਕੇ ਤ੍ਰਿਦਸ਼ਾਂ ਦੇ ਸਵਾਮੀ ਇੰਦਰ, ਦੇਵਤਿਆਂ ਅਤੇ ਲੋਕਪਾਲਾਂ ਸਮੇਤ ਉਸ ਸਥਾਨ ਤੇ ਆ ਪਹੁੰਚਿਆ।
Verse 10
साध्याश्न विश्वे मरुतो वाद्यानि सुमहान्ति च । नद्य: शैला: समुद्राश्व॒ तीर्थानि विविधानि च,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवषण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਰਾਜਨ! ਉੱਥੇ ਸਾਧ੍ਯ, ਵਿਸ਼੍ਵੇਦੇਵ ਅਤੇ ਮਰੁਤ-ਗਣ ਹਾਜ਼ਰ ਸਨ, ਅਤੇ ਮਹਾਨ ਵਾਜੇ ਗੂੰਜ ਰਹੇ ਸਨ। ਦਰਿਆ, ਪਹਾੜ, ਸਮੁੰਦਰ ਅਤੇ ਅਨੇਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਤੀਰਥ ਵੀ ਉੱਥੇ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋ ਗਏ।
Verse 11
तपांसि संयोगविधिवेंदा: सतो भा: सरस्वती । नारद: पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहू:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवषण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਰਾਜਨ! ਤਪੱਸਿਆਵਾਂ, ਸੰਯੋਗ-ਵਿਧੀਆਂ (ਸ਼ੁਭ ਸੰਯੋਗ ਅਤੇ ਕਰਮ-ਨਿਯਮ), ਵੇਦ, ਸਾਮਗਾਨ ਦੇ ਸਤੋਭ-ਅੱਖਰ, ਸਰਸਵਤੀ, ਨਾਰਦ, ਪਰਵਤ ਅਤੇ ਗੰਧਰਵ—ਵਿਸ਼ਵਾਵਸੁ, ਹਹਾ, ਹੂਹੂ—ਸਭ ਉੱਥੇ ਮੌਜੂਦ ਸਨ।
Verse 12
गन्धर्वश्षित्रसेनश्व॒ परिवारगणैर्युत: । नागा: सिद्धाश्न मुनयो देवदेव: प्रजापति:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवषण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਰਾਜਨ! ਪਰਿਵਾਰ ਸਮੇਤ ਗੰਧਰਵ ਚਿਤ੍ਰਸੇਨ, ਨਾਗ, ਸਿੱਧ ਅਤੇ ਮੁਨੀ-ਗਣ ਵੀ ਉੱਥੇ ਆਏ; ਅਤੇ ਦੇਵਾਂ ਵਿੱਚ ਦੇਵ ਪ੍ਰਜਾਪਤੀ ਵੀ ਉੱਥੇ ਪਧਾਰੇ।
Verse 13
विष्णु: सहस्रशीर्षश्ष देवो 5चिन्त्य: समागमत् | अवाद्यन्तान्तरिक्षे च भेर्यस्तूर्याणि वा विभो,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवषण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਰਾਜਨ! ਅਚਿੰਤ੍ਯ ਦੇਵ ਭਗਵਾਨ ਵਿਸ਼ਨੂ ਅਤੇ ਹਜ਼ਾਰ ਸਿਰਾਂ ਵਾਲਾ ਸ਼ੇਸ਼ਨਾਗ ਵੀ ਉੱਥੇ ਆ ਪਹੁੰਚੇ। ਅਤੇ ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਉਸ ਵੇਲੇ ਆਕਾਸ਼ ਵਿੱਚ ਭੇਰੀਆਂ ਅਤੇ ਤੂਰੀਆਂ ਆਦਿ ਵਾਜੇ ਗੂੰਜ ਰਹੇ ਸਨ।
Verse 14
पुष्पवर्षाणि दिव्यानि तत्र तेषां महात्मनाम् | ननृतुश्चाप्सर: संघास्तत्र तत्र समनन््ततः,वहाँ उन महात्माओंपर दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगी। झुंडकी झुंड अप्सराएँ सब ओर नृत्य करने लगीं
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਉੱਥੇ ਉਹਨਾਂ ਮਹਾਤਮਾਵਾਂ ਉੱਤੇ ਦਿਵ੍ਯ ਫੁੱਲਾਂ ਦੀ ਵਰਖਾ ਹੋਣ ਲੱਗੀ; ਅਤੇ ਅਪਸਰਾਵਾਂ ਦੇ ਟੋਲਿਆਂ ਨੇ ਹਰ ਪਾਸੇ, ਚੌਫੇਰਿਆਂ, ਨਾਚਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ।
Verse 15
अथ स्वर्गस्तथा रूपी ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् । संसिद्धस्त्वं महाभाग त्वं च सिद्धस्तथा नूप,तदनन्तर मूर्तिमान् स्वर्गने ब्राह्यणसे कहा--“महाभाग! तुम सिद्ध हो गये।' फिर राजासे कहा--“नरेश्वर! तुम भी सिद्ध हो गये"
ਤਦੋਂ ਸਵਰਗ ਨੇ ਦ੍ਰਿਸ਼੍ਯ ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੂੰ ਆਖਿਆ— “ਮਹਾਭਾਗ! ਤੂੰ ਪੂਰਨ ਸਿੱਧੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈਂ।” ਫਿਰ ਉਸ ਨੇ ਰਾਜੇ ਨੂੰ ਵੀ ਕਿਹਾ— “ਨਰੇਸ਼ਵਰ! ਤੂੰ ਵੀ ਸਿੱਧੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈਂ।”
Verse 16
अथ तौ सहितौ राजलन्नन्योन्यविधिना तत:ः । विषयप्रतिसंहारमुभावेव प्रचक्रतु:,राजन! तदनन्तर वे दोनों एक-दूसरेका उपकार करते हुए एक साथ हो गये। उन्होंने एक ही साथ अपने मनको विषयोंकी ओरसे हटा लिया
ਫਿਰ, ਹੇ ਰਾਜਨ, ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਇਕ-ਦੂਜੇ ਦਾ ਧਿਆਨ ਰੱਖਦੇ ਹੋਏ ਸਹਿਮਤੀ ਨਾਲ ਇਕੱਠੇ ਹੋ ਗਏ। ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਦੋਹਾਂ ਨੇ ਇਕੋ ਵੇਲੇ ਮਨ ਅਤੇ ਇੰਦ੍ਰਿਆਂ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ਿਆਂ ਵੱਲੋਂ ਸਮੇਟਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ।
Verse 17
प्राणापानौ तथोदानं समान व्यानमेव च । एवं तौ मनसि स्थाप्य दधतु: प्राणयोर्मन:,तदनन्तर प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान--इन पाँचों प्राण-वायुओंको हृदयमें स्थापित किया; इस प्रकार स्थित हुए उन दोनोंने मनको प्राण और अपानके साथ मिला दिया। भौहोंके नीचे नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए मनसहित प्राण-अपानको उन्होंने दोनों भौहोंके बीच स्थिर किया
ਫਿਰ ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਪ੍ਰਾਣ, ਅਪਾਨ, ਉਦਾਨ, ਸਮਾਨ ਅਤੇ ਵਿਆਨ—ਇਹ ਪੰਜ ਪ੍ਰਾਣ-ਵਾਯੂ ਮਨ ਵਿੱਚ ਸਥਾਪਿਤ ਕੀਤੇ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅੰਦਰੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਵਿਵਸਥਿਤ ਕਰਕੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਮਨ ਨੂੰ ਮੁੱਖ ਦੋ ਸ਼ਵਾਸਾਂ—ਪ੍ਰਾਣ ਅਤੇ ਅਪਾਨ—ਨਾਲ ਜੋੜ ਦਿੱਤਾ।
Verse 18
उपस्थितकृतौ तौ च नासिकाग्रमधो भ्रुवो: । भ्रुकुट्या चैव मनसा शनैर्धारयतस्तदा,तदनन्तर प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान--इन पाँचों प्राण-वायुओंको हृदयमें स्थापित किया; इस प्रकार स्थित हुए उन दोनोंने मनको प्राण और अपानके साथ मिला दिया। भौहोंके नीचे नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए मनसहित प्राण-अपानको उन्होंने दोनों भौहोंके बीच स्थिर किया
ਤਦ ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਸੰਯਮਿਤ ਹੋ ਕੇ, ਭੌਂਹਾਂ ਹੇਠਾਂ ਨੱਕ ਦੀ ਨੋਕ ਉੱਤੇ ਨਜ਼ਰ ਟਿਕਾ ਕੇ, ਭ੍ਰੂਕੁਟੀ ਵਿੱਚ ਮਨ ਜੋੜ ਕੇ, ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਉਸ ਨੂੰ ਅਡੋਲ ਰੱਖਣ ਲੱਗੇ।
Verse 19
निश्चैष्टा भ्यां शरीरा भ्यां स्थिरदृष्टी समाहितौ । जितात्मानौ तथा5<धाय मूर्धन्यात्मानमेव च,इस प्रकार मनको जीतकर दृष्टिको एकाग्र करके उन दोनोंने प्राणसहित मनको सुषुम्णा मार्गद्वारा मूर्धामें स्थापित कर दिया। फिर वे दोनों समाधिमें स्थित हो गये। उस समय उन दोनोंके शरीर जड़की भाँति चेष्टाहीन हो गये
ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਆਤਮ-ਸੰਯਮ ਹਾਸਲ ਕਰਕੇ, ਨਜ਼ਰ ਅਡੋਲ ਅਤੇ ਮਨ ਸਮਾਹਿਤ ਕਰਕੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੋਹਾਂ ਨੇ ਪ੍ਰਾਣ ਸਮੇਤ ਮਨ ਨੂੰ ਸੁਸ਼ੁਮਣਾ-ਮਾਰਗ ਰਾਹੀਂ ਸਿਰ ਦੇ ਸ਼ਿਖਰ ਵਿੱਚ ਸਥਾਪਿਤ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਫਿਰ ਉਹ ਸਮਾਧੀ ਵਿੱਚ ਲੀਨ ਹੋ ਗਏ; ਉਸ ਵੇਲੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸਰੀਰ ਜੜ ਵਾਂਗ ਨਿਸ਼ਚੇਸ਼ਟ ਹੋ ਗਏ।
Verse 20
तालुदेशमथोद्दाल्य ब्राह्मणस्य महात्मन: । ज्योतिर्ज्वाला सुमहती जगाम त्रिदिवं तदा,इसी समय महात्मा ब्राह्मणके तालुदेश (ब्रह्म-रन्ध्र) का भेदन करके एक ज्योतिर्मयी विशाल ज्वाला निकली और स्वर्गकी ओर चल दी
ਤਦ ਉਸ ਮਹਾਤਮਾ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦੇ ਤਾਲੂ-ਦੇਸ਼ (ਬ੍ਰਹਮਰੰਧ੍ਰ) ਨੂੰ ਭੇਦ ਕੇ ਇਕ ਅਤਿ ਵਿਸ਼ਾਲ, ਜੋਤਿਮਈ ਜਵਾਲਾ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋਈ ਅਤੇ ਉਸੇ ਵੇਲੇ ਤ੍ਰਿਦਿਵ ਵੱਲ ਚੱਲ ਪਈ।
Verse 21
हाहाकारस्तथा दिक्षु सर्वेषां सुमहानभूत् । तज्ज्योति:ः स्तूयमान सम ब्रह्माणं प्राविशत् तदा,फिर तो सम्पूर्ण दिशाओंमें महान् कोलाहल मच गया। उस ज्योतिकी सभी लोग स्तुति करने लगे। प्रजानाथ! प्रादेशके बराबर लंबे पुरुषका आकार धारण किये वह तेज:पुंज ब्रह्माजीके पास पहुँचा, तब ब्रह्माजीने आगे बढ़कर उसका स्वागत किया
ਤਦ ਸਭ ਦਿਸ਼ਾਵਾਂ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ ਹਾਹਾਕਾਰ ਮਚ ਗਿਆ। ਸਭ ਨੇ ਉਸ ਜੋਤ ਦੀ ਸਤੁਤੀ ਕੀਤੀ; ਅਤੇ ਸਤੁਤ ਹੋਇਆ ਉਹ ਤੇਜ-ਪੁੰਜ ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਦੇ ਕੋਲ ਪਹੁੰਚਿਆ। ਉਸ ਵੇਲੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਆਦਰ ਨਾਲ ਉਸ ਨੂੰ ਸਵਾਗਤ ਕਰਨ ਲਈ ਅੱਗੇ ਵਧੇ।
Verse 22
ततः स्वागतमित्याह तत् तेज: प्रपितामह: । प्रादेशमात्र पुरुष॑ प्रत्युदूगम्य विशाम्पते,फिर तो सम्पूर्ण दिशाओंमें महान् कोलाहल मच गया। उस ज्योतिकी सभी लोग स्तुति करने लगे। प्रजानाथ! प्रादेशके बराबर लंबे पुरुषका आकार धारण किये वह तेज:पुंज ब्रह्माजीके पास पहुँचा, तब ब्रह्माजीने आगे बढ़कर उसका स्वागत किया
ਤਦ ਪ੍ਰਪਿਤਾਮਹ ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਅੱਗੇ ਵਧ ਕੇ ਉਸ ਤੇਜ ਨੂੰ ਬੋਲੇ—“ਸੁਆਗਤ ਹੈ।” ਹੇ ਪ੍ਰਜਾਨਾਥ! ਉਹ ਤੇਜ-ਪੁੰਜ ਪ੍ਰਾਦੇਸ਼-ਮਾਤ੍ਰ ਮਨੁੱਖ ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਦੇ ਨੇੜੇ ਆਇਆ।
Verse 23
भूयश्चैवापरं प्राह वचन मधुरं तदा । जापकैस्तुल्यफलता योगानां नात्र संशय:,ब्रह्माजीने उस तेजोमय पुरुषका स्वागत करनेके पश्चात् पुनः उससे मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा--'विप्रवर! योगियोंको जो फल मिलता है, निस्संदेह वही फल जप करनेवालोंको भी प्राप्त होता है
ਫਿਰ ਉਸ ਨੇ ਮਿੱਠੇ ਬਚਨਾਂ ਨਾਲ ਅੱਗੇ ਕਿਹਾ—“ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸੰਦੇਹ ਨਹੀਂ; ਯੋਗੀਆਂ ਨੂੰ ਜੋ ਫਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ, ਉਹੀ ਫਲ ਜਪ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਵੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।”
Verse 24
जापक ब्राह्मण एवं महाराज इक्ष्वाकुकी ऊर्ध्वगति योगस्य तावदेते भ्य: प्रत्यक्ष फलदर्शनम् । जापकानां विशिष्ट तु प्रत्युत्थानं समाहितम्,“योगियोंको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह इन सभासदोंने प्रत्यक्ष देखा है; किंतु जापकोंको उनसे भी श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है, यह सूचित करनेके लिये ही मैंने उठकर तुम्हारा स्वागत किया है
ਹੇ ਰਾਜਨ! ਜਪ ਵਿੱਚ ਰਤ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜ ਇਖ਼ਸ਼ਵਾਕੂ—ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਦੇ ਵਿਸ਼ੇ ਵਿੱਚ ਉੱਪਰਲੀ ਗਤੀ ਵੱਲ ਲੈ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਯੋਗ ਦਾ ਪ੍ਰਤੱਖ ਫਲ ਇਸ ਸਭਾ ਨੇ ਵੇਖਿਆ ਹੈ। ਪਰ ਜਪ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਉਸ ਤੋਂ ਵੀ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਫਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ—ਇਹੀ ਦਰਸਾਉਣ ਲਈ ਮੈਂ ਉੱਠ ਕੇ ਸਮਾਹਿਤ ਮਨ ਨਾਲ ਤੇਰਾ ਆਦਰ-ਸਵਾਗਤ ਕੀਤਾ ਹੈ।
Verse 25
उष्यतां मयि चेत्युक्त्वा चेतयत् सततं पुनः । अथाय्यं प्रविवेशास्य ब्राह्मणो विगतज्वर:,“अब तुम मेरे भीतर सुखपूर्वक निवास करो।' इतना कहकर ब्रह्माजीने उसे पुनः तत्त्वज्ञान प्रदान किया। आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण-तेज रोग-शोकसे मुक्त हो ब्रह्माजीके मुखारविन्दमें प्रविष्ट हो गया
“ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਸੁਖ ਨਾਲ ਵੱਸੋ”—ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਮੁੜ ਮੁੜ ਤੱਤਵ-ਗਿਆਨ ਨਾਲ ਜਾਗਰੂਕ ਕੀਤਾ। ਫਿਰ ਹੁਕਮ ਪਾ ਕੇ ਉਹ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਜ਼ੁਕਾਮ/ਤਾਪ ਅਤੇ ਦੁੱਖ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਕੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਦੇ ਕਮਲ-ਸਮਾਨ ਮੁਖ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਕਰ ਗਿਆ।
Verse 26
राजाप्येतेन विधिना भगवन्तं पितामहम् । यथैव द्विजशार्दूलस्तथैव प्राविशत् तदा,राजा इक्ष्वाकु भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी ही भाँति विधिपूर्वक भगवान् ब्रह्माजीके मुखारविन्दमें प्रविष्ट हो गये
ਇਸੇ ਨਿਯਤ ਵਿਧੀ ਨਾਲ ਰਾਜਾ ਵੀ ਭਗਵਾਨ ਪਿਤਾਮਹ ਬ੍ਰਹਮਾ ਦੇ ਸਨਮੁੱਖ ਪਹੁੰਚਿਆ। ਜਿਵੇਂ ਉਹ ਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਕਰਿਆ ਸੀ, ਓਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਸ ਵੇਲੇ ਰਾਜੇ ਨੇ ਵੀ ਨਿਯਮ-ਬੱਧ ਢੰਗ ਨਾਲ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਕੀਤਾ।
Verse 27
स्वयम्भुवमथो देवा अभिवाद्य ततो<ब्रुवन् । जापकानां विशिष्ट तु प्रत्युत्थानं समाहितम्,तदनन्तर देवताओंने ब्रह्माजीको प्रणाम करके कहा--“भगवन्! आपने जो आगे बढ़कर इस ब्राह्मणका स्वागत किया है, इससे सिद्ध हो गया कि जापकोंको योगियोंसे भी श्रेष्ठ फलकी प्राप्ति होती है
ਫਿਰ ਦੇਵਤਿਆਂ ਨੇ ਸਵਯੰਭੂ ਬ੍ਰਹਮਾ ਨੂੰ ਨਮਸਕਾਰ ਕਰਕੇ ਕਿਹਾ—“ਭਗਵਨ! ਤੁਸੀਂ ਸੰਯਤ ਅਤੇ ਇਕਾਗ੍ਰ ਚਿੱਤ ਨਾਲ ਅੱਗੇ ਵਧ ਕੇ ਇਸ ਜਪ-ਨਿਸ਼ਠ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦਾ ਸਵਾਗਤ ਕੀਤਾ; ਇਸ ਨਾਲ ਸਿੱਧ ਹੋ ਗਿਆ ਕਿ ਜਪ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਯੋਗੀਆਂ ਤੋਂ ਵੀ ਉੱਚਾ ਫਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ।”
Verse 28
जापकार्थमयं यत्नो यदर्थ वयमागता: । कृतपूजाविमौ तुल्यौ त्वया तुल्यफलाविमौ,“इस जापक ब्राह्मणको सदगति देनेके लिये ही आपने ऐसा उद्योग किया था। इसीको देखनेके लिये हमलोग भी आये थे। आपने इन दोनोंका समानरूपसे आदर किया और ये दोनों ही एक-सी स्थितिमें पहुँचकर आपके समान फलके भागी हुए हैं
“ਇਸ ਜਪਕ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੂੰ ਸਦਗਤੀ ਦੇਣ ਲਈ ਹੀ ਤੁਸੀਂ ਇਹ ਯਤਨ ਕੀਤਾ ਸੀ; ਅਤੇ ਉਹੀ ਵੇਖਣ ਲਈ ਅਸੀਂ ਵੀ ਆਏ ਸੀ। ਤੁਸੀਂ ਦੋਹਾਂ ਦੀ ਸਮਾਨ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਪੂਜਾ ਕੀਤੀ; ਇਸ ਲਈ ਦੋਵੇਂ ਇੱਕੋ ਅਵਸਥਾ ਨੂੰ ਪਹੁੰਚ ਕੇ ਤੁਹਾਡੇ ਸਮਾਨ ਫਲ ਦੇ ਹੱਕਦਾਰ ਹੋ ਗਏ ਹਨ।”
Verse 29
योगजापकर्योर्द[ष्टं फलं सुमहदद्य वै । सर्वाल्लॉकानतिक्रम्य गच्छेतां यत्र वाज्छितम्,“आज हमलोगोंने योगी और जापकके महान् फलको प्रत्यक्ष देख लिया। वे सम्पूर्ण लोकोंको लाँधकर जहाँ उनकी इच्छा हो, जा सकते हैं'
“ਅੱਜ ਅਸੀਂ ਯੋਗੀ ਅਤੇ ਜਪਕ—ਦੋਹਾਂ ਦਾ ਅਤਿ ਮਹਾਨ ਫਲ ਅੱਖੀਂ ਵੇਖ ਲਿਆ। ਉਹ ਸਾਰੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਲੰਘ ਕੇ ਜਿੱਥੇ ਮਨ ਕਰੇ, ਉੱਥੇ ਜਾ ਸਕਦੇ ਹਨ।”
Verse 30
ब्रह्मोवाच महास्मृतिं पठेद् यस्तु तथैवानुस्मृतिं शुभाम् । तावप्येतेन विधिना गच्छेतां मत्सलोकताम्,ब्रह्माजीनी कहा--देवताओ! जो महास्मृति तथा कल्याणमयी अनुस्मृतिका पाठ करता है, वह भी इसी विधिसे मेरा सालोक्य प्राप्त कर लेता है। जो योगका भक्त है, वह भी देहत्यागके पश्चात् इसी विधिसे मेरे लोकोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। अब तुम सब लोग अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये अपने-अपने स्थानको जाओ। मैं तुम लोगोंका अभीष्ट साधन करता रहूँगा
ਬ੍ਰਹਮਾ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਦੇਵੋ! ਜੋ ਮਹਾਸਮ੍ਰਿਤੀ ਅਤੇ ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸ਼ੁਭ ਅਨੁਸਮ੍ਰਿਤੀ ਦਾ ਪਾਠ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਇਸੇ ਹੀ ਵਿਧੀ ਨਾਲ ਮੇਰੇ ਲੋਕ ਵਿੱਚ ਨਿਵਾਸ (ਸਾਲੋਕ੍ਯ) ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ; ਇਸ ਅਨੁਸ਼ਾਸਨ ਨਾਲ ਉਹ ਦਿਵ੍ਯ ਲੋਕ ਦੀ ਨਿਕਟਤਾ ਦਾ ਫਲ ਪਾਂਦਾ ਹੈ।
Verse 31
यश्च योगे भवेद् भक्त: सो5पि नास्त्यत्र संशय: । विधिनानेन देहान्ते मम लोकानवाप्लुयात् । साधये गम्यतां चैव यथास्थानानि सिद्धये,ब्रह्माजीनी कहा--देवताओ! जो महास्मृति तथा कल्याणमयी अनुस्मृतिका पाठ करता है, वह भी इसी विधिसे मेरा सालोक्य प्राप्त कर लेता है। जो योगका भक्त है, वह भी देहत्यागके पश्चात् इसी विधिसे मेरे लोकोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। अब तुम सब लोग अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये अपने-अपने स्थानको जाओ। मैं तुम लोगोंका अभीष्ट साधन करता रहूँगा
ਅਤੇ ਜੋ ਯੋਗ ਰਾਹੀਂ ਭਗਤੀਵਾਨ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ—ਉਸ ਬਾਰੇ ਵੀ ਇੱਥੇ ਕੋਈ ਸੰਦੇਹ ਨਹੀਂ: ਇਸੇ ਵਿਧੀ ਨਾਲ ਦੇਹਾਂਤ ਉਪਰੰਤ ਉਹ ਮੇਰੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਹੁਣ ਤੁਸੀਂ ਸਭ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਮਨੋਰਥ ਦੀ ਸਿੱਧੀ ਲਈ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਥਾਵਾਂ ਨੂੰ ਜਾਓ; ਮੈਂ ਤੁਹਾਡੀ ਇੱਛਾ ਪੂਰੀ ਕਰਦਾ ਰਹਾਂਗਾ।
Verse 32
भीष्म उवाच इत्युक्त्वा स तदा देवस्तत्रैवान्तरधीयत । आमन्त्रय च ततो देवा ययु: स्वं स्व॑ं निवेशनम्,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। देवता भी उनकी आज्ञा पाकर अपने-अपने स्थानको चले गये
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਰਾਜਨ! ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਉਹ ਦੇਵ (ਬ੍ਰਹਮਾ) ਓਥੇ ਹੀ ਅੰਤਧਾਨ ਹੋ ਗਿਆ। ਫਿਰ ਉਸ ਵੱਲੋਂ ਵਿਧੀਵਤ ਵਿਦਾ ਕੀਤੇ ਹੋਏ ਦੇਵਗਣ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਨਿਵਾਸਾਂ ਨੂੰ ਚਲੇ ਗਏ।
Verse 33
ते च सर्वे महात्मानो धर्म सत्कृत्य तत्र वै । पृष्ठतो5नुययू राजन् सर्वे सुप्रीतचेतस:,राजन! फिर वे सभी महात्मा धर्मको सत्कार-पूर्वक आगे करके प्रसन्नचित्त हो पीछे- पीछे चल दिये
ਅਤੇ ਉਹ ਸਾਰੇ ਮਹਾਤਮਾ ਉੱਥੇ ਧਰਮ ਦਾ ਸਤਿਕਾਰ ਕਰਕੇ, ਉਸ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਰੱਖ ਕੇ—ਹੇ ਰਾਜਨ—ਸਭ ਪ੍ਰਸੰਨ ਚਿੱਤ ਨਾਲ ਪਿੱਛੇ ਪਿੱਛੇ ਤੁਰ ਪਏ।
Verse 34
एतत् फलं जापकानां गतिकश्नैषा प्रकीर्तिता । यथाश्रुतं महाराज कि भूय: श्रोतुमिच्छसि,महाराज! मैंने जैसा सुना था, उसके अनुसार जापकोंको मिलनेवाले इस उत्तम फल और गतिका वर्णन किया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਮਹਾਰਾਜ! ਮੈਂ ਜਿਵੇਂ ਸੁਣਿਆ ਸੀ, ਓਸੇ ਅਨੁਸਾਰ ਜਪ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਵਾਲੇ ਇਸ ਫਲ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਗਤੀ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਹੁਣ ਤੁਸੀਂ ਹੋਰ ਕੀ ਸੁਣਨਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ?
Verse 200
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने द्विशततमो<ध्याय:
ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸ਼੍ਰੀ ਮਹਾਭਾਰਤ ਦੇ ਸ਼ਾਂਤਿ ਪਰਵ ਦੇ ਮੋਖਸ਼ਧਰਮ ਪਰਵ ਵਿੱਚ ‘ਜਾਪਕ-ਉਪਾਖਿਆਨ’ ਨਾਮਕ ਪ੍ਰਸੰਗ ਦਾ ਦੋ ਸੌਵਾਂ ਅਧਿਆਇ ਸਮਾਪਤ ਹੋਇਆ।
The chapter’s dilemma is epistemic-ethical: whether one should approach divine authority through mere naming and praise or through tattva—an accountable, principle-based understanding that grounds dharma, governance, and self-conduct in a coherent view of causality.
Ordered life (social, political, and personal) is portrayed as derivative of an underlying cosmic order: time, elements, and functions arise from a single organizing principle; recognizing this supports steadiness, humility, and responsibility rather than self-justifying power.
No explicit phalaśruti formula is stated in these verses; the meta-commentary appears as Bhīṣma’s appeal to authoritative transmission and the closing assertion that Keśava is inconceivable and not merely human, framing the chapter as doctrinal grounding within mokṣa-oriented instruction.