
Udyoga Parva, Adhyāya 72 — Bhīmasena’s counsel on conciliation and Duryodhana’s disposition
Upa-parva: Udyoga Parva — Krishna’s diplomatic briefing and counsel (Bhīmasena’s assessment of Duryodhana)
Bhīmasena addresses Kṛṣṇa (Madhusūdana/Vāsudeva), urging him to speak in whatever manner secures peace for the Kurus and not to provoke fear of war. He advises that Duryodhana should be approached through sāman (conciliation) rather than harsh speech, while simultaneously presenting a detailed temperament profile: resentful, perpetually agitated, hostile to others’ welfare, morally lax, pride-intoxicated, vindictive toward the Pāṇḍavas, and resistant to changing his stance even at personal cost. Bhīma frames this as a governance risk—anger spreading like fire and consuming lineages—then invokes exemplars of destructive rulers (a catalog of notorious kings) as cautionary parallels. Despite pessimism about reconciliation with such a person, Bhīma recommends gradual, gentle dharma- and artha-consistent counsel, and proposes de-escalatory postures (even adopting humility) to prevent the ruin of the Bhāratas. He also emphasizes engaging elders and court members to restore fraternal concord, noting Arjuna’s reluctance for war and his compassionate disposition.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के सामने धर्म और क्षात्र-कर्तव्य का द्वंद्व खड़ा है—वे शान्ति-याचना की ओर झुकते हैं, पर संकेतों और वाणी में युद्ध की अनिवार्यता गूंजने लगती है। → कृष्ण युधिष्ठिर को समझाते हैं कि उनकी बुद्धि धर्माश्रित है, जबकि कौरवों की मति वैराश्रित; जो लाभ युद्ध के बिना मिल सकता हो, वही युधिष्ठिर को प्रिय है, पर क्षत्रिय-धर्म का नैष्ठिक कर्म केवल याचना नहीं। साथ ही वे बताते हैं कि शान्ति माँगने से अधर्म का भाग नहीं मिलता, पर कौरव-सभा और प्रजा के बीच धृतराष्ट्र-पुत्रों की निन्दा और धिक्कार अवश्य उठेगा। → कृष्ण निर्णायक स्वर में दुर्योधन की हठधर्मिता उद्घाटित करते हैं—वह जीवित रहते पाण्डवों का द्यूत में हृत राज्य लौटाने को तैयार नहीं; ऊपर से अपशकुन और घोर लक्षण (मृग-पक्षियों के भयावह शब्द, अग्नि के विकृत वर्ण) आने वाले विनाश की मुहर लगा देते हैं। → कृष्ण युधिष्ठिर को यह धैर्य देते हैं कि शान्ति-प्रयास धर्मसम्मत है, किंतु परिणाम की सच्चाई भी दिखाते हैं—यदि कुलीन की निन्दा और वध में चुनना पड़े तो क्षत्रिय के लिए वध (युद्ध) ही अधिक गुणकारक माना गया है, क्योंकि निन्दा जीवन को घृणित बनाती है। → कृष्ण के वचन के बाद दूत-यात्रा और सभा-समागम की छाया गहराती है—क्या शान्ति-याचना कौरवों की हठ को तोड़ पाएगी, या अपशकुनों की भविष्यवाणी युद्ध को अवश्यंभावी बना देगी?
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ इ श्लोक मिलाकर कुल ९८ ६ “लोक हैं।] #ीरशशा< (0) आस असस- - कुत्तोंके दुम हिलानेके समान राजाओंका ध्वज-कम्पन है, उनके गुर्रनेकी जगह उनका सिंहनाद है। कुत्ते जो एक- दूसरेको देखकर गर्जते हैं, उसी प्रकार दो विरोधी क्षत्रिय एक-दूसरेके प्रति उत्तर-प्रत्युत्तरके रूपमें आक्षेपजनक बातें कहते हैं। एक-दूसरेके निकट जाना दोनोंमें समानरूपसे होता है। राजालोग क्रोधमें आकर जो दाँतोंसे होठ चबाते हैं, यही कुत्तोंके समान उनका दाँत दिखाना है। विकट गर्जन-तर्जन भूकना है और युद्ध करना ही कुत्तोंके समान लड़ना है। राज्यकी प्राप्ति ही वह मांसका टुकड़ा है, जिसके लिये उनमें लड़ाई होती है। त्रिसप्ततितमो<ध्याय: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना श्रीभगवानुवाच संजयस्य श्रुतं वाक्यं भवतश्न श्रुतं मया । सर्व जानाम्यभिप्रायं तेषां च भवतक्ष यः,श्रीभगवान् बोले--राजन्! मैंने संजयकी और आपकी भी बातें सुनी हैं। कौरवोंका क्या अभिप्राय है, वह सब मैं जानता हूँ और आपका जो विचार है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ
ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ସଞ୍ଜୟ କହିଥିବା କଥା ମୁଁ ଶୁଣିଛି, ଆପଣଙ୍କ କଥା ମଧ୍ୟ ଶୁଣିଛି। କୌରବମାନଙ୍କ ଅଭିପ୍ରାୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ମୋତେ ଜଣା; ଆପଣଙ୍କ ମନର ସଙ୍କଳ୍ପ ମଧ୍ୟ ମୋ ପାଇଁ ଅଜଣା ନୁହେଁ।
Verse 2
तव धर्मश्रिता बुद्धिस्तेषां वैराश्रया मति: । यदयुद्धेन लभ्येत तत् ते बहुमतं भवेत्,आपकी बुद्धि धर्ममें स्थित है और उनकी बुद्धिने शत्रुताका आश्रय ले रखा है। आप तो बिना युद्ध किये जो कुछ मिल जाय, उसीको बहुत समझेंगे
ଆପଣଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ଧର୍ମରେ ନିଷ୍ଠିତ, ତାଙ୍କର ମତି ତ ଶତ୍ରୁତାକୁ ଆଶ୍ରୟ କରିଛି। ଯୁଦ୍ଧ ବିନା ଯାହା ଲଭ୍ୟ, ସେହିଟିକୁ ଆପଣ ସର୍ବାଧିକ ମୂଲ୍ୟବାନ ଭାବନ୍ତି।
Verse 3
न चैवं नैछिकं कर्म क्षत्रियस्य विशाम्पते । आहुराश्रमिण: सर्वे न भेक्षे क्षत्रिय श्षरेत्,परंतु महाराज! यह क्षत्रियका नैष्ठिक (स्वाभाविक) कर्म नहीं है। सभी आश्रमोंके श्रेष्ठ पुरुषोंका यह कथन है कि क्षत्रियको भीख नहीं माँगनी चाहिये
କିନ୍ତୁ ହେ ପ୍ରଜାପତେ, ଏହା କ୍ଷତ୍ରିୟର ନୈଷ୍ଠିକ କର୍ମ ନୁହେଁ। ସମସ୍ତ ଆଶ୍ରମର ଶିଷ୍ଟଜନ କହନ୍ତି—କ୍ଷତ୍ରିୟ ଭିକ୍ଷା ମାଗିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।
Verse 4
जयो वधो वा संग्रामे धात्रा5डदिष्ट: सनातन: । स्वधर्म: क्षत्रियस्यैष कार्पण्यं न प्रशस्यते,उसके लिये विधाताने यही सनातन कर्तव्य बताया है कि वह संग्राममें विजय प्राप्त करे अथवा वहीं प्राण दे दे। यही क्षत्रियका स्वधर्म है। दीनता अथवा कायरता उसके लिये प्रशंसाकी वस्तु नहीं है
ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ଜୟ କିମ୍ବା ମୃତ୍ୟୁ—ଧାତା ଏହି ସନାତନ ବିଧାନ ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ କରିଛନ୍ତି। ଏହାହିଁ କ୍ଷତ୍ରିୟର ସ୍ୱଧର୍ମ; ଦୀନତା/କାୟରତା ପ୍ରଶଂସନୀୟ ନୁହେଁ।
Verse 5
न हि कार्पण्यमास्थाय शक््या वृत्तिर्युधिष्ठिर । विक्रमस्व महाबाहो जहि शत्रून् परंतप,महाबाहु युधिष्ठिर! दीनताका आश्रय लेनेसे क्षत्रियकी जीविका नहीं चल सकती। शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! अब पराक्रम दिखाइये और शत्रुओंका संहार कीजिये
ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଦୀନତାକୁ ଆଶ୍ରୟ କଲେ କ୍ଷତ୍ରିୟର ଜୀବିକା ଓ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ରହିପାରେ ନାହିଁ। ହେ ମହାବାହୁ, ପରାକ୍ରମ ପ୍ରଦର୍ଶନ କର; ହେ ପରନ୍ତପ, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ସଂହାର କର।
Verse 6
अतिगृद्धा: कृतस्नेहा दीर्घकालं सहोषिता: । कृतमित्रा: कृतबला धार्तराष्ट्रा: परंतप,परंतप! धृतराष्ट्रके पुत्र बड़े लोभी हैं। इधर उन्होंने बहुत-से मित्र-राजाओंका संग्रह कर लिया है और उनके साथ दीर्घकालतक रहकर अपने प्रति उनका स्नेह भी बढ़ा लिया है। (शिक्षा और अभ्यास आदिके द्वारा भी) उन्होंने विशेष शक्तिका संचय कर लिया है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ପରନ୍ତପ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଲୋଭୀ। ଅନେକ ମିତ୍ର-ରାଜାଙ୍କ ସହ ଦୀର୍ଘକାଳ ସହବାସ କରି ସେମାନେ ପରସ୍ପର ସ୍ନେହକୁ ଦୃଢ଼ କରିଛନ୍ତି; ମିତ୍ରତା ସ୍ଥିର କରି ବଳ ମଧ୍ୟ ସଞ୍ଚୟ କରିଛନ୍ତି। ଏଭଳି ସଙ୍ଗ, ଶିକ୍ଷା-ପ୍ରଶିକ୍ଷଣ ଓ ନିରନ୍ତର ପ୍ରସ୍ତୁତିରେ ସେମାନେ ଆମ ବିରୋଧରେ ଭୟଙ୍କର ଶକ୍ତି ଗଢ଼ିଛନ୍ତି।
Verse 7
न पर्यायो$स्ति यत् साम्य॑ त्वयि कुर्युविशाम्पते । बलतवत्तां हि मन्यन्ते भीष्मद्रोणकृपादिभि:,अतः प्रजानाथ! ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे (वे आपको आधा राज्य देकर) आपके प्रति समता (सन्धि) स्थापित करें। भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदि उनके पक्षमें हैं, इसलिये वे अपनेको आपसे अधिक बलवान् समझते हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାନାଥ, ଏମିତି କୌଣସି ଉପାୟ ନାହିଁ ଯାହାଦ୍ୱାରା ସେମାନେ ତୁମକୁ ସମକକ୍ଷ ମାନି ସନ୍ଧି କରିବେ। ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପ ଆଦି ତାଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଥିବାରୁ ସେମାନେ ନିଜକୁ ତୁମଠାରୁ ଅଧିକ ବଳବାନ ଭାବନ୍ତି। ତେଣୁ ସେମାନେ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଭାଗ ମଧ୍ୟ ଦେବେ ନାହିଁ; ନ୍ୟାୟସମ୍ମତ ଶାନ୍ତି ଦୁର୍ଲଭ।
Verse 8
यावच्च मार्दवेनैतान् राजन्नुपचरिष्यसि । तावदेते हरिष्यन्ति तव राज्यमरिंदम,अतः शत्रुदमन राजन! जबतक आप इनके साथ नर्मीका बर्ताव करेंगे, तबतक ये आपके राज्यका अपहरण करनेकी ही चेष्टा करेंगे
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ଯେତେଦିନ ତୁମେ ଏମାନଙ୍କ ସହ ମାର୍ଦ୍ଦବରେ ବ୍ୟବହାର କରିବ, ସେତେଦିନ ସେମାନେ ତୁମ ରାଜ୍ୟ ହରଣ କରିବାକୁ ହିଁ ଚେଷ୍ଟା କରିବେ। ହେ ଅରିନ୍ଦମ, ଯେଉଁଠି ମୃଦୁତା ଦୁଷ୍ଟଙ୍କୁ ଅଧିକ ସାହସୀ କରେ, ସେଠି ରାଜାକୁ ସମୟ ଚିହ୍ନିବା ଉଚିତ।
Verse 9
नानुक्रोशान्न कार्पण्यान्न च धर्मार्थकारणात् । अलं कर्तु धार्तराष्ट्रस्तव काममरिंदम,शत्रुमर्दन नरेश! आप यह न समझें कि धृतराष्ट्रके पुत्र आपपर कृपा करके या अपनेको दीन-दुर्बल मानकर अथवा धर्म एवं अर्थकी ओर दृष्टि रखकर आपका मनोरथ पूर्ण कर देंगे
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଶତ୍ରୁମର୍ଦ୍ଦନ, ନ କରୁଣାରୁ, ନ ଦୈନ୍ୟରୁ, ନ ଧର୍ମ କିମ୍ବା ଅର୍ଥ-ନୀତିର କାରଣରୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ତୁମ ଇଚ୍ଛା ପୂରଣ କରିବେ। ତେଣୁ ସେମାନେ ଦୟାକରି, ନିଜକୁ ଦୁର୍ବଳ ଭାବି, କିମ୍ବା ଧର୍ମ-ନୀତି ଦେଖି ତୁମ ଅନୁରୋଧ ମାନିବେ ବୋଲି ଭାବନି।
Verse 10
एतदेव निमित्तं ते पाण्डवास्तु यथा त्वयि । नान्वतप्यन्त कौपीनं तावत् कृत्वापि दुष्करम्,पाण्डुनन्दन! कौरवोंके सन्धि न करनेका सबसे बड़ा कारण या प्रमाण तो यही है कि उन्होंने आपको कौपीन धारण कराकर तथा उतने दीर्घकालतकके लिये वनवासका दुष्कर कष्ट देकर भी कभी इसके लिये पश्चात्ताप नहीं किया
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ, ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ପ୍ରମାଣ ଏହିଏ: କୌରବମାନେ ତୁମେ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଯେପରି ବ୍ୟବହାର କରିଛନ୍ତି, ସେଥିପାଇଁ ସେମାନେ କେବେ ମଧ୍ୟ ପଶ୍ଚାତ୍ତାପ କରିନାହାନ୍ତି। ସେମାନେ ତୁମକୁ କୌପୀନ ଧାରଣ କରାଇ, ଦୀର୍ଘକାଳ ବନବାସର ଦୁଷ୍କର ଦୁଃଖ ଭୋଗାଇଲେ; ତଥାପି ତାଙ୍କ ହୃଦୟରେ ଖେଦ ଜାଗିଲା ନାହିଁ। ଏହି ଅନୁତାପର ଅଭାବ ହିଁ କୌରବମାନଙ୍କ ସହ ସତ୍ୟ ସନ୍ଧି ଟିକିନପାରିବାର କାରଣ।
Verse 11
पितामहस्य द्रोणस्य विदुरस्थ च धीमत:ः । ब्राह्मणानां च साधूनां राज्ञश्ष नगरस्य च,राजन! आप दानशील, कोमलस्वभाव, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, स्वभावत:ः धर्मपरायण तथा सबके हैं, तो भी क्रूर दुर्योधनने उस समय पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, बुद्धिमान् विदुर, साधु, ब्राह्मण, राजा धृतराष्ट्र, नगरनिवासी जनसमुदाय तथा कुरुकुलके सभी श्रेष्ठ पुरुषोंके देखते-देखते आपको जूएमें छलसे ठग लिया और अपने उस कुकृत्यके लिये वह अबतक लज्जाका अनुभव नहीं करता है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ବିଦୁର, ସାଧୁଜନ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ, ଏବଂ ରାଜା ଓ ନଗରବାସୀମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ—ଆପଣ ଦାନଶୀଳ, ମୃଦୁସ୍ୱଭାବ, ମନ-ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ସଂଯମୀ, ସ୍ୱଭାବତଃ ଧର୍ମପରାୟଣ ଓ ସର୍ବହିତେଷୀ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ—କ୍ରୂର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦ୍ୟୂତରେ ଛଳ କରି ଆପଣଙ୍କୁ ଠକି ଲୁଟିନେଲା। ତଥାପି ସେ ଦୁଷ୍କର୍ମ ପାଇଁ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଲଜ୍ଜା ଅନୁଭବ କରୁନାହିଁ।
Verse 12
पश्यतां कुरुमुख्यानां सर्वेषामेव तत्त्वतः । दानशील मृदुं दान्तं धर्मशीलमनुव्रतम्,राजन! आप दानशील, कोमलस्वभाव, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, स्वभावत:ः धर्मपरायण तथा सबके हैं, तो भी क्रूर दुर्योधनने उस समय पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, बुद्धिमान् विदुर, साधु, ब्राह्मण, राजा धृतराष्ट्र, नगरनिवासी जनसमुदाय तथा कुरुकुलके सभी श्रेष्ठ पुरुषोंके देखते-देखते आपको जूएमें छलसे ठग लिया और अपने उस कुकृत्यके लिये वह अबतक लज्जाका अनुभव नहीं करता है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! କୁରୁବଂଶର ସମସ୍ତ ଅଗ୍ରଣୀ ପୁରୁଷମାନେ ସତ୍ୟଟି ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ଜାଣି ଦେଖୁଥିବାବେଳେ—ଆପଣ ଦାନଶୀଳ, ମୃଦୁ, ସଂଯମୀ, ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ଓ ବ୍ରତପାଳକ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ—କ୍ରୂର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦ୍ୟୂତରେ ଛଳ କରି ଆପଣଙ୍କୁ ଠକିଲା। ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ବିଦୁର, ସାଧୁଜନ, ବ୍ରାହ୍ମଣ, ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ନଗରବାସୀ ଓ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ କରାଯାଇଥିବା ସେହି ପାପକର୍ମ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ସେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଲଜ୍ଜିତ ନୁହେଁ।
Verse 13
यत् त्वामुपधिना राजन दूते वज्चितवांस्तदा । न चापत्रपते तेन नृशंस: स्वेन कर्मणा,राजन! आप दानशील, कोमलस्वभाव, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, स्वभावत:ः धर्मपरायण तथा सबके हैं, तो भी क्रूर दुर्योधनने उस समय पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, बुद्धिमान् विदुर, साधु, ब्राह्मण, राजा धृतराष्ट्र, नगरनिवासी जनसमुदाय तथा कुरुकुलके सभी श्रेष्ठ पुरुषोंके देखते-देखते आपको जूएमें छलसे ठग लिया और अपने उस कुकृत्यके लिये वह अबतक लज्जाका अनुभव नहीं करता है
ହେ ରାଜନ! ସେ ଏକଦା ଦ୍ୟୂତର ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ଉପାୟ-ଛଳ ଦ୍ୱାରା ଆପଣଙ୍କୁ ଠକିଥିଲା; କିନ୍ତୁ ସେ ନୃଶଂସ ନିଜ କର୍ମ ପାଇଁ ଲଜ୍ଜା ପାଉନାହିଁ। ଆପଣ ଦାନଶୀଳ, ମୃଦୁସ୍ୱଭାବ, ସଂଯମୀ, ସ୍ୱଭାବତଃ ଧର୍ମପରାୟଣ ଓ ସର୍ବହିତେଷୀ; ତଥାପି ଭୀଷ୍ମ-ଦ୍ରୋଣ-ବିଦୁର, ସାଧୁଜନ, ବ୍ରାହ୍ମଣ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ନଗରବାସୀ ଓ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ସେ ଦ୍ୟୂତରେ ଛଳ କରି ଆପଣଙ୍କୁ ଲୁଟିନେଲା—ଏବଂ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମଧ୍ୟ ସେହି ପାପ ପାଇଁ ଲଜ୍ଜିତ ନୁହେଁ।
Verse 14
तथाशीलसमाचारे राजन् मा प्रणयं कृथा: । वध्यास्ते सर्वलोकस्य कि पुनस्तव भारत,राजन्! ऐसे कुटिलस्वभाव और खोटे आचरणवाले दुर्योधनके प्रति आप प्रेम न दिखावें। भारत! धृतराष्ट्रके वे पुत्र तो सभी लोगोंके वध्य हैं; फिर आप उनका वध करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है?
ହେ ରାଜନ! ଏପରି ସ୍ୱଭାବ ଓ ଏପରି ଦୁଷ୍ଟ ଆଚରଣ ଥିବା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ପ୍ରତି ଆପଣ ସ୍ନେହ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ। ହେ ଭାରତ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସେହି ପୁତ୍ରମାନେ ସର୍ବଲୋକର ବଧ୍ୟ; ତେବେ ଆପଣଙ୍କ ପାଇଁ ତ ଆଉ କ’ଣ କହିବା!
Verse 15
वाम्भिस्त्वप्रतिरूपाभिरतुदत् त्वां सहानुजम् । श्लाघमान: प्रहृष्ट: सन् भ्रातृभि: सह भाषते,(क्या आप वह दिन भूल गये, जब कि) दुर्योधनने भाइयोंसहित आपको अपने अनुचित वचनोंद्वारा मार्मिक पीड़ा पहुँचायी थी। वह अत्यन्त हर्षसे फ़ूलकर अपनी मिथ्या प्रशंसा करता हुआ अपने भाइयोंके साथ कहता था--“अब पाण्डवोंके पास इस संसारमें “अपनी” कहनेके लिये इतनी-सी भी कोई वस्तु नहीं रह गयी है। केवल नाम और गोत्र बचा है, परंतु वह भी शेष नहीं रहेगा"
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଅଶୋଭନ ଓ ଅନୁଚିତ ବାକ୍ୟରେ ସେ ଆପଣଙ୍କୁ ଓ ଆପଣଙ୍କ ଅନୁଜମାନଙ୍କୁ ମର୍ମାହତ କରିଥିଲା। ଅତ୍ୟଧିକ ହର୍ଷରେ ଉଲ୍ଲସିତ ହୋଇ, ଆତ୍ମଶ୍ଲାଘା କରି, ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ କହିଥିଲା—“ଏବେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖରେ ଏହି ଲୋକରେ ‘ଆମର’ ବୋଲି କହିବାକୁ କିଛି ମଧ୍ୟ ନାହିଁ। କେବଳ ନାମ ଓ ଗୋତ୍ର ଅଛି—ସେହିଟା ମଧ୍ୟ ରହିବ ନାହିଁ।”
Verse 16
एतावत् पाण्डवानां हि नास्ति किंचिदिह स्वकम् । नामधेयं च गोत्र च तदप्येषां न शिष्यते,(क्या आप वह दिन भूल गये, जब कि) दुर्योधनने भाइयोंसहित आपको अपने अनुचित वचनोंद्वारा मार्मिक पीड़ा पहुँचायी थी। वह अत्यन्त हर्षसे फ़ूलकर अपनी मिथ्या प्रशंसा करता हुआ अपने भाइयोंके साथ कहता था--“अब पाण्डवोंके पास इस संसारमें “अपनी” कहनेके लिये इतनी-सी भी कोई वस्तु नहीं रह गयी है। केवल नाम और गोत्र बचा है, परंतु वह भी शेष नहीं रहेगा"
ଏବେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖରେ ଏହି ଲୋକରେ ‘ନିଜର’ ବୋଲି କହିବାକୁ କିଛି ମଧ୍ୟ ନାହିଁ। କେବଳ ନାମ ଓ ଗୋତ୍ର ଅଛି—କିନ୍ତୁ ସେ ଉଲ୍ଲାସିତ ଅହଂକାରରେ କହିଥିଲା, ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସେଥିରେ ମଧ୍ୟ ଅବଶେଷ ରହିବ ନାହିଁ।
Verse 17
कालेन महता चैषां भविष्यति पराभव: । प्रकृतिं ते भजिष्यन्ति नष्टप्रकृतयो मयि,'दीर्घकालके पश्चात् इनकी भारी पराजय होगी। इनकी स्वाभाविक शूरता-वीरता आदि नष्ट हो जायगी और ये मेरे पास ही प्राणत्याग करेंगे”
ଦୀର୍ଘ କାଳ ପରେ ଏମାନଙ୍କ ଉପରେ ନିଶ୍ଚୟ ଭାରୀ ପରାଜୟ ଆସିବ। ଏମାନଙ୍କ ସ୍ୱାଭାବିକ ଶୌର୍ୟ-ତେଜ ଭଙ୍ଗିଯିବ; ନିଜ ପ୍ରକୃତି ହରାଇ ଶେଷରେ ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ହିଁ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କରିବେ।
Verse 18
दुःशासनेन पापेन तदा झूते प्रवर्तिते । अनाथवत् तदा देवी द्रौपदी सुदुरात्मना,उन दिनों जब जूएका खेल चल रहा था, अत्यन्त दुरात्मा पापी दुःशासन अनाथकी भाँति रोती-कलपती हुई महारानी द्रौपदीको उनके केश पकड़कर राजसभामें घसीट लाया और भीष्म तथा द्रोणाचार्य आदिके समक्ष उसने उनका उपहास करते हुए बारंबार उसे “गाय” कहकर पुकारा
ଯେତେବେଳେ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡ଼ା ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା, ସେତେବେଳେ ପାପୀ ଦୁଃଶାସନ—ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁରାତ୍ମା—ଦେବୀ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ଅନାଥା ପରି ଭାବି ସଭାରେ ଅପମାନ କରିଥିଲା।
Verse 19
आकृष्य केशे रुदती सभायां राजसंसदि । भीष्मद्रोणप्रमुखतो गौरिति व्याहृता मुहुः,उन दिनों जब जूएका खेल चल रहा था, अत्यन्त दुरात्मा पापी दुःशासन अनाथकी भाँति रोती-कलपती हुई महारानी द्रौपदीको उनके केश पकड़कर राजसभामें घसीट लाया और भीष्म तथा द्रोणाचार्य आदिके समक्ष उसने उनका उपहास करते हुए बारंबार उसे “गाय” कहकर पुकारा
ରାଜସଭାରେ ସେ କାନ୍ଦୁଥିବାବେଳେ କେଶ ଧରି ଟାଣି ଆଣାଗଲା; ଭୀଷ୍ମ-ଦ୍ରୋଣ ଆଦି ପ୍ରମୁଖଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ତାଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ‘ଗୌ’ ବୋଲି ଅପମାନଜନକ ଭାବେ ଡାକାଗଲା।
Verse 20
भवता वारिता: सर्वे भ्रातरो भीमविक्रमा: । धर्मपाशनिबद्धाश्न न किंचित् प्रतिपेदिरे,यद्यपि आपके भाई भयंकर पराक्रम प्रकट करनेमें समर्थ थे, तथापि आपने इन्हें रोक दिया, इसलिये धर्मबन्धनमें बँधे होनेके कारण ये उस समय उस अन्यायका कुछ भी प्रतीकार न कर सके
ଆପଣ ମୋର ସମସ୍ତ ଭାଇମାନଙ୍କୁ ରୋକିଦେଲେ, ଯଦ୍ୟପି ସେମାନେ ଭୀମବିକ୍ରମ। ଧର୍ମପାଶରେ ବନ୍ଧିତ ଥିବାରୁ, ସେ ସମୟରେ ସେମାନେ ସେହି ଅନ୍ୟାୟର କିଛି ମଧ୍ୟ ପ୍ରତିକାର କରିପାରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 21
एताश्षान्याश्न॒ परुषा वाच: स समुदीरयन् । श्लाघते ज्ञातिमध्ये सम त्वयि प्रव्रजिते वनम्,जब आप वनकी ओर जाने लगे, उस समय भी वह बन्धु-बान्धवोंके बीचमें ऊपर कही हुई तथा और भी बहुत-सी कठोर बातें कहकर अपनी प्रशंसा करता रहा
ଏହିପରି ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ କଠୋର ବାକ୍ୟ ଉଚ୍ଚାରଣ କରି, ତୁମେ ବନବାସକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଥିବା ସମୟରେ ମଧ୍ୟ ସେ ଜ୍ଞାତିମଧ୍ୟରେ ନିଜ ମହିମା ଘୋଷଣା କରୁଥିଲା।
Verse 22
ये तत्रासन् समानीतास्ते दृष्टवा त्वामनागसम् । अश्रुकण्ठा रुदन्तश्न॒ सभायामासते तदा
ଯେମାନେ ସେଠାକୁ ଆଣାଯାଇଥିଲେ, ସେମାନେ ତୁମକୁ ନିର୍ଦୋଷ ଦେଖି ଅଶ୍ରୁରେ କଣ୍ଠ ରୁଦ୍ଧ ହୋଇ କାନ୍ଦୁଥିବା ଅବସ୍ଥାରେ ସେତେବେଳେ ସଭାରେ ବସି ରହିଲେ।
Verse 23
जो लोग वहाँ बुलाये गये थे, वे सभी नरेश आपको निरपराध देखकर रोते और आँसू बहाते हुए रुँँधे हुए कण्ठसे उस समय चुपचाप सभामें बैठे रहे ।। न चैनमभ्यनन्दंस्ते राजानो ब्राह्मणै: सह । सर्वे दुर्योधन तत्र निन्दन्ति सम सभासद:,ब्राह्मगोंसहित उन राजाओंने वहाँ दुर्योधनकी प्रशंसा नहीं की। उस समय सभी सभासद् उसकी निन्दा ही कर रहे थे
ସେଠାକୁ ଡାକାଯାଇଥିବା ସମସ୍ତ ରାଜା ତୁମକୁ ନିର୍ଦୋଷ ଦେଖି ଅଶ୍ରୁପାତ କରି, କଣ୍ଠ ରୁଦ୍ଧ ହୋଇ, ସେତେବେଳେ ନିରବରେ ସଭାରେ ବସି ରହିଲେ। ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସେ ରାଜାମାନେ ସେଠାରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଅଭିନନ୍ଦନ କଲେ ନାହିଁ; ହେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ସେ ସଭାରେ ସମସ୍ତ ସଭାସଦ ତାଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା ହିଁ କରୁଥିଲେ।
Verse 24
कुलीनस्य च या निन्दा वधो वामित्रकर्शन । महागुणो वधो राजन् न तु निन्दा कुजीविका
ହେ ମିତ୍ରକର୍ଷଣ! କୁଳୀନ ପୁରୁଷ ପାଇଁ ନିନ୍ଦା ହେଉ କି ବଧ—ହେ ରାଜନ, ବଧ ମହାଗୁଣ; ନିନ୍ଦା ନୁହେଁ। ନିନ୍ଦାରେ ବଞ୍ଚିବା ହେଉଛି ନୀଚ ଜୀବିକା।
Verse 25
शत्रुसूदन! कुलीन पुरुषकी निन्दा हो या वध--इनमेंसे वध ही उसके लिये अत्यन्त गुणकारक है; निन्दा नहीं। निन्दा तो जीवनको घृणित बना देती है ।। तदैव निहतो राजन् यदैव निरपत्रप: | निन्दितश्न महाराज पृथिव्यां सर्वराजभि:,महाराज! जब इस भूमण्डलके सभी राजाओंने निन््दा की, उसी समय उस निर्लज्ज दुर्योधनकी एक प्रकारसे मृत्यु हो गयी
ହେ ମହାରାଜ! ଏହି ପୃଥିବୀର ସମସ୍ତ ରାଜା ଯେତେବେଳେ ସେ ନିର୍ଲଜ୍ଜ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କଲେ, ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ, ହେ ରାଜନ, ସେ ଏକ ପ୍ରକାରରେ ନିହତ ହୋଇଗଲେ। କୁଳୀନ ପାଇଁ ଲୋକନିନ୍ଦା ମୃତ୍ୟୁଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ବିନାଶକାରୀ।
Verse 26
ईषत् कार्यो वधस्तस्य यस्य चारित्रमीदृशम् | प्रस्कन्देन प्रतिस्तब्धश्छिन्नमूल इव द्रुम:,जिसका चरित्र इतना गिरा हुआ है, उसका वध करना तो बहुत साधारण कार्य है। जिसकी जड़ कट गयी हो और जो गोल वेदीके आधारपर खड़ा हो, उस वृक्षकी भाँति दुर्योधनके भी धराशायी होनेमें अब अधिक विलम्ब नहीं है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯାହାର ଚରିତ୍ର ଏପରି ନୀଚ, ତାହାକୁ ବଧ କରିବା ସତ୍ୟେ ସହଜ। ଯେପରି ମୂଳ କଟା ଏବଂ କେବଳ ଭରସାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଗଛ ଶୀଘ୍ର ପଡ଼ିଯାଏ, ସେପରି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ଦେରି ନକରି ପତିତ ହେବ।
Verse 27
वध्य: सर्प इवानार्य: सर्वलोकस्य दुर्मति: । जह्ोनं त्वममित्रघ्न मा राजन् विचिकित्सिथा:,खोटी बुद्धिवाला दुराचारी दुर्योधन दुष्ट सर्पकी भाँति सब लोगोंके लिये वध्य है। शत्रुओंका नाश करनेवाले महाराज! आप दुविधामें न पड़ें, इस दुष्टको अवश्य मार डालें
ଏହି ଅନାର୍ଯ୍ୟ, ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦୁଷ୍ଟ ସର୍ପ ପରି ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ବଧ୍ୟ। ହେ ଶତ୍ରୁଘ୍ନ ରାଜନ୍, ଦ୍ୱିଧା କରନି—ଏହି ଦୁଷ୍ଟକୁ ନିଶ୍ଚୟ ବଧ କର।
Verse 28
सर्वथा त्वत्क्षमं चैतद् रोचते च ममानघ । यत् त्वं पितरि भीष्मे च प्रणिपातं समाचरे:,निष्पाप नरेश! आप जो पितृतुल्य धृतराष्ट्र तथा पितामह भीष्मके प्रति प्रणाम एवं नम्रतापूर्ण बर्ताव करते हैं, वह सर्वथा आपके योग्य है। मैं भी इसे पसंद करता हूँ
ହେ ନିଷ୍ପାପ ନରେଶ! ପିତୃତୁଲ୍ୟ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ପ୍ରତି ତୁମେ ଯେ ପ୍ରଣିପାତ ଓ ବିନୟପୂର୍ଣ୍ଣ ଆଚରଣ କରୁଛ, ତାହା ସର୍ବଥା ତୁମର ଯୋଗ୍ୟ; ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଏହା ପ୍ରିୟ।
Verse 29
अहं तु सर्वलोकस्य गत्वा छेत्स्यामि संशयम् । येषामस्ति द्विधाभावो राजन् दुर्योधन प्रति,राजन! दुर्योधनके सम्बन्धमें जिन लोगोंका मन दुविधामें है--जो लोग उसके अच्छे या बुरे होनेका निर्णय नहीं कर सके हैं, उन सब लोगोंका संदेह मैं वहाँ जाकर दूर कर दूँगा
ହେ ରାଜନ୍! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସମ୍ବନ୍ଧରେ ଯେଉଁମାନଙ୍କ ମନରେ ଦ୍ୱିଧା ଅଛି, ମୁଁ ସେଠାକୁ ଯାଇ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ସନ୍ଦେହ ଛେଦ କରିଦେବି।
Verse 30
मध्ये राज्ञामहं तत्र प्रातिपौरुषिकान् गुणान् | तव संकीर्तयिष्यामि ये च तस्य व्यतिक्रमा:,मैं राजसभामें जुटे हुए भूपालोंकी मण्डलीमें आपके सर्वसाधारण गुणोंका वर्णन और दुर्योधनके दोषों तथा अपराधोंका उद्घाटन करूँगा
ସେଠାରେ ରାଜସଭାରେ ସମବେତ ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୁଁ ତୁମର ପ୍ରଶଂସନୀୟ ପୌରୁଷଗୁଣଗୁଡ଼ିକୁ କୀର୍ତ୍ତନ କରିବି, ଏବଂ ତାହାର (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନର) ଅତିକ୍ରମ ଓ ଅପରାଧମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରକାଶ କରିବି।
Verse 31
ब्रुवतस्तत्र मे वाक््यं धर्मार्थसहितं हितम् । निशम्य पार्थिवा: सर्वे नानाजनपदेश्वरा:,मेरे मुखसे धर्म और अर्थसे संयुक्त हितकर वचन सुनकर नाना जनपदोंके स्वामी समस्त भूपाल आपके विषयमें यह निश्चितरूपसे समझ लेंगे कि युधिष्ठिर धर्मात्मा तथा सत्यवादी हैं और दुर्योधनके सम्बन्धमें भी उन्हें यह निश्चय हो जायगा कि उसने लोभसे प्रेरित होकर ही सारा अनुचित बर्ताव किया है
ସେଠାରେ ମୁଁ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ ସହିତ ସଂଯୁକ୍ତ ହିତକର ବଚନ କହିବି। ତାହା ଶୁଣି ନାନା ଜନପଦର ଅଧିପତି ସମସ୍ତ ରାଜା ନିଶ୍ଚୟ କରିବେ ଯେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧର୍ମାତ୍ମା ଓ ସତ୍ୟବାଦୀ; ଏବଂ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ନିଶ୍ଚିତ ହେବେ ଯେ ଲୋଭର ପ୍ରେରଣାରୁ ହିଁ ସେ ସମସ୍ତ ଅନୁଚିତ ଆଚରଣ କରିଛି।
Verse 32
त्वयि सम्प्रतिपत्स्यन्ते धर्मात्मा सत्यवागिति । तस्मिंश्नाधिगमिष्यन्ति यथा लोभादवर्तत,मेरे मुखसे धर्म और अर्थसे संयुक्त हितकर वचन सुनकर नाना जनपदोंके स्वामी समस्त भूपाल आपके विषयमें यह निश्चितरूपसे समझ लेंगे कि युधिष्ठिर धर्मात्मा तथा सत्यवादी हैं और दुर्योधनके सम्बन्धमें भी उन्हें यह निश्चय हो जायगा कि उसने लोभसे प्रेरित होकर ही सारा अनुचित बर्ताव किया है
ସେମାନେ ଆପଣଙ୍କ ବିଷୟରେ ନିଶ୍ଚୟ କରିବେ—‘ଏହେ ଧର୍ମାତ୍ମା, ସତ୍ୟବାଦୀ।’ ଏବଂ ତାଙ୍କ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ଯଥାର୍ଥ ଜାଣିବେ—ଲୋଭରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ସେ କିପରି ଅଧର୍ମ ଆଚରଣ କଲା।
Verse 33
गर्हयिष्यामि चैवैनं पौरजानपदेष्वपि । वृद्धबालानुपादाय चातुर्वण्यें समागते,मैं वहाँ आये हुए चारों वर्णोके आबालवृद्ध जनसमुदायको अपनाकर उनके सामने तथा पुरवासियों और देशवासियोंके समक्ष भी इस दुर्योधनकी निन््दा करूँगा
ମୁଁ ପୌରମାନଙ୍କ ଓ ଜନପଦବାସୀମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ମଧ୍ୟ ତାକୁ ନିନ୍ଦା କରିବି। ବୃଦ୍ଧ ଓ ଶିଶୁମାନଙ୍କୁ ସହ ନେଇ, ସମବେତ ଚାତୁର୍ବର୍ଣ୍ୟ ସମାଜର ସାମ୍ନାରେ ମୁଁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ସାର୍ବଜନୀନ ଭାବେ ଧିକ୍କାର କରିବି।
Verse 34
शमं वै याचमानस्त्वं नाधर्म तत्र लप्स्यसे । कुरून् विगर्हयिष्यन्ति धृतराष्ट्र च पार्थिवा:,वहाँ शान्तिके लिये याचना करनेपर आप अधर्मके भी भागी न होंगे। सब राजा कौरवोंकी तथा धृतराष्ट्रकी ही निन््दा करेंगे
ଆପଣ ଯଦି ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ଯାଚନା କରି ସମ୍ମିଳନର ଅନୁରୋଧ କରନ୍ତି, ତେବେ ତାହାରେ ଆପଣ ଅଧର୍ମର ଭାଗୀ ହେବେ ନାହିଁ। ବରଂ ରାଜାମାନେ କୌରବମାନଙ୍କୁ ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ ନିନ୍ଦା କରିବେ।
Verse 35
तस्मिल्लोकपरित्यक्ते कि कार्यमवशिष्यते । हते दुर्योधने राजन् यदन्यत् क्रियतामिति,सब लोग दुर्योधनको अन्यायी समझकर त्याग देंगे और वह निन्दनीय होनेके कारण नष्टप्राय हो जायगा। उस दशामें आपका दूसरा कौन-सा कार्य शेष रह जाता है जिसे सम्पन्न किया जाय
ସେ ଯେତେବେଳେ ଲୋକମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିତ୍ୟକ୍ତ ହେବ, ତେବେ କେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ ଅବଶିଷ୍ଟ ରହିବ? ହେ ରାଜନ, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ହତ ହେଲେ, ତା’ପରେ ଯାହା ଅନ୍ୟ କରଣୀୟ ଅଛି, ତାହା କରାଯାଉ।
Verse 36
यात्वा चाहं कुरून् सर्वान् युष्मदर्थमहापयन् । यतिष्ये प्रशमं कर्तु लक्षयिष्ये च चेष्टितम्,वहाँ पहुँचकर आपके स्वार्थकी सिद्धिमें तनिक भी त्रुटि न आने देते हुए मैं समस्त कौरवोंसे सन्धिस्थापनके लिये प्रयत्न करूँगा और उनकी चेष्टाओंपर दृष्टि रखूँगा
ସେଠାକୁ ଯାଇ ଆପଣଙ୍କ ହିତସିଦ୍ଧିରେ ଅଳ୍ପମାତ୍ରେ ମଧ୍ୟ ତ୍ରୁଟି ନ ହେବା ପରି ମୁଁ ସମସ୍ତ କୌରବଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି ସ୍ଥାପନ ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ କରିବି ଏବଂ ତାଙ୍କର ଚେଷ୍ଟା ଉପରେ ଦୃଷ୍ଟି ରଖିବି।
Verse 37
कौरवाणां प्रवृत्ति च गत्वा युद्धाधिकारिकाम् । निशम्य विनिवर्तिष्ये जयाय तव भारत,भारत! मैं जाकर कौरवोंकी युद्धविषयक तैयारीकी बातें जान-सुनकर आपकी विजयके लिये पुनः यहाँ लौट आऊँगा
ହେ ଭାରତ! ମୁଁ ଯାଇ କୌରବମାନଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ପ୍ରସ୍ତୁତି ଓ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ଜାଣି-ଶୁଣି, ଆପଣଙ୍କ ବିଜୟ ପାଇଁ ପୁନଃ ଏଠାକୁ ଫେରିଆସିବି।
Verse 38
सर्वथा युद्धमेवाहमाशंसामि परै: सह । निमित्तानि हि सर्वाणि तथा प्रादुर्भवन्ति मे,मुझे तो शत्रुओंके साथ सर्वथा युद्ध होनेकी ही सम्भावना हो रही है; क्योंकि मेरे सामने ऐसे ही लक्षण (शकुन) प्रकट हो रहे हैं
ମୋତେ ତ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ସର୍ବଥା ଯୁଦ୍ଧ ହେବାର ସମ୍ଭାବନା ମାତ୍ର ଦେଖାଯାଉଛି; କାରଣ ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ଏହିପରି ନିମିତ୍ତ (ଶକୁନ) ମାନେ ପ୍ରକଟ ହେଉଛନ୍ତି।
Verse 39
मृगा: शकुन्ताश्न वदन्ति घोरं हस्त्यश्वमुख्येषु निशामुखेषु । घोराणि रूपाणि तथैव चाग्नि- वर्णान् बहून् पुष्यति घोररूपान्,मृग (पशु) और पक्षी भयंकर शब्द कर रहे हैं। प्रदोषकालमें प्रमुख हाथियों और घोड़ोंके समुदायमें बड़ी भयानक आकृतियाँ प्रकट होती हैं। इसी प्रकार अग्निदेव भी नाना प्रकारके भयजनक वर्णों (रंगों)-को धारण करते हैं
ମୃଗ (ପଶୁ) ଓ ପକ୍ଷୀମାନେ ଭୟଙ୍କର ଶବ୍ଦ କରୁଛନ୍ତି। ସନ୍ଧ୍ୟାବେଳେ ପ୍ରମୁଖ ହାତୀ ଓ ଘୋଡ଼ାମାନଙ୍କ ଦଳରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟାନକ ଆକୃତିମାନେ ଦେଖାଯାଉଛି। ସେହିପରି ଅଗ୍ନି ମଧ୍ୟ ନାନା ପ୍ରକାର ଅଶୁଭ ବର୍ଣ୍ଣ ଧାରଣ କରି ଭୟଙ୍କର ରୂପ ପ୍ରକଟ କରୁଛି।
Verse 40
मनुष्यलोकक्षयकृत् सुघोरो नो चेदनुप्राप्त इहान्तकः स्यात् | शस्त्राणि यन्त्र कवचान् रथांश्व नागान् हयांश्व प्रतिपादयित्वा,यदि मनुष्यलोकका संहार करनेवाली अत्यन्त भयंकर मृत्यु इनको नहीं प्राप्त हुई होती, तो ऐसी बातें देखनेमें नहीं आतीं। अतः नरेन्द्र! आपके समस्त योद्धा युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके भाँति-भाँतिके शस्त्र, यन्त्र, कवच, रथ, हाथी और घोड़ोंको सुसज्जित कर लें तथा उन हाथियों, घोड़ों एवं रथोंपर सवार हो युद्ध करनेके निमित्त सदा तैयार रहें। इसके सिवा आपको युद्धोपयोगी जिन समस्त वस्तुओंका संग्रह करना है उन सबका भी आप संग्रह कर लीजिये
ଯଦି ମନୁଷ୍ୟଲୋକର ସଂହାର କରୁଥିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ମୃତ୍ୟୁ ଏଠାକୁ ସମୀପସ୍ଥ ନ ହୋଇଥାନ୍ତା, ତେବେ ଏପରି ପ୍ରସ୍ତୁତି ଓ ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖାଯାଇନଥାନ୍ତା। ତେଣୁ, ହେ ନରେନ୍ଦ୍ର! ଆପଣଙ୍କ ସମସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧା ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପ କରି ନାନାପ୍ରକାର ଶସ୍ତ୍ର, ଯନ୍ତ୍ର, କବଚ, ରଥ, ହାତୀ ଓ ଘୋଡ଼ାକୁ ସୁସଜ୍ଜିତ କରନ୍ତୁ; ସେହି ହାତୀ, ଘୋଡ଼ା ଓ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ସଦା ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ରୁହନ୍ତୁ। ଏହା ସହ, ଯୁଦ୍ଧୋପଯୋଗୀ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ଆବଶ୍ୟକ ସାମଗ୍ରୀର ମଧ୍ୟ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଂଗ୍ରହ କରନ୍ତୁ।
Verse 41
योधाश्व सर्वे कृतनिश्चयास्ते भव्न्तु हस्त्यश्वरथेषु यत्ता: । सांग्रामिकं ते यदुपार्जनीयं सर्व समग्र कुरु तन्नरेन्द्र,यदि मनुष्यलोकका संहार करनेवाली अत्यन्त भयंकर मृत्यु इनको नहीं प्राप्त हुई होती, तो ऐसी बातें देखनेमें नहीं आतीं। अतः नरेन्द्र! आपके समस्त योद्धा युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके भाँति-भाँतिके शस्त्र, यन्त्र, कवच, रथ, हाथी और घोड़ोंको सुसज्जित कर लें तथा उन हाथियों, घोड़ों एवं रथोंपर सवार हो युद्ध करनेके निमित्त सदा तैयार रहें। इसके सिवा आपको युद्धोपयोगी जिन समस्त वस्तुओंका संग्रह करना है उन सबका भी आप संग्रह कर लीजिये
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ହେ ନରେନ୍ଦ୍ର! ତୁମ ସମସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧା ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପ କରି ହାତୀ, ଘୋଡ଼ା ଓ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରସ୍ତୁତ ରୁହନ୍ତୁ। ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଯାହା ଯାହା ସଂଗ୍ରହ କରିବା ଉଚିତ, ସେ ସବୁକୁ ସମଗ୍ର ଭାବେ ସଂଗ୍ରହ କର। ଯଦି ମନୁଷ୍ୟଲୋକ-ସଂହାରକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ମୃତ୍ୟୁ ସେମାନଙ୍କ ଉପରେ ଆସନ୍ନ ନ ଥାଆନ୍ତା, ତେବେ ଏପରି ଅବସ୍ଥା ଦେଖାଯାଉନଥାନ୍ତା। ତେଣୁ ଅସ୍ତ୍ର, ଯନ୍ତ୍ର, କବଚ, ରଥ, ହାତୀ ଓ ଘୋଡ଼ାରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ହୋଇ ତୁମ ସେନା ସଦା ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ରୁହୁ।”
Verse 42
दुर्योधनो न हालमद्य दातुं जीवंस्तवैतन्नूपते कथंचित् । यत् ते पुरस्तादभवत् समृद्ध द्यूते हृतं पाण्डवमुख्य राज्यम्,पाण्डवप्रवर! नरेश्वर! यह निश्चय मानिये, आपके पास पहले जो समृद्धिशाली राज्य- वैभव था और जिसे आपने जूएमें खो दिया था, वह सारा राज्य अब दुर्योधन अपने जीते- जी आपको कभी नहीं दे सकता
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ହେ ନରେଶ୍ୱର! ନିଶ୍ଚୟ ଜାଣ—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଜୀବିତ ଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ, ଆଜି କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ମଧ୍ୟ ସେ ତୁମକୁ ଏହା ଫେରାଇ ଦେବ ନାହିଁ। ପାଣ୍ଡବପ୍ରବର! ପୂର୍ବେ ଯେ ସମୃଦ୍ଧ ରାଜ୍ୟ-ବୈଭବ ତୁମର ଥିଲା ଏବଂ ଯାହା ପାଶାଖେଳରେ ହରଣ କରାଗଲା, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିଜ ଜୀବନକାଳରେ କେବେ ମଧ୍ୟ ତାହା ତୁମକୁ ପୁନଃ ଦେବ ନାହିଁ।”
Verse 72
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णको प्रेरणाविषयक बह्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା-ବିଷୟକ ବାହାତ୍ତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ଏହି ଅଧ୍ୟାୟରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧର୍ମାଧି_toggle ଆଶାରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପଦକ୍ଷେପ ନେବାକୁ ଅନୁରୋଧ କଲେ, ଯେପରି ସଦୁପଦେଶ ଓ କୂଟନୀତି ଦ୍ୱାରା ଭୟାବହ ଯୁଦ୍ଧ ଟଳିଯାଉ।
Verse 73
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कृष्णवाक्ये त्रिसप्ततितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ, ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ‘କୃଷ୍ଣବାକ୍ୟ’ ନାମକ ତ୍ରିସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Whether to speak forcefully against wrongdoing or to prioritize peace through gentle, gradual counsel—balancing truthful admonition with the ethical duty to prevent wider social destruction.
Effective ethical counsel must be disposition-aware: when anger and pride dominate, strategy should emphasize conciliation and careful speech while still anchoring arguments in dharma and artha.
No explicit phalaśruti is stated in this chapter; its meta-function is pragmatic—positioning this counsel as part of the epic’s documentation of failed de-escalation efforts preceding Kurukṣetra.