
Dhṛtarāṣṭra–Duryodhana Dialogue on Peace and the Refusal of Compromise
Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Samvada (War-Counsel Episode)
Chapter 57 records a tense exchange in the Kuru court. Dhṛtarāṣṭra urges Duryodhana to desist from war, arguing that conflict is not praised in any condition and that even half the earth is sufficient for dignified life; he recommends granting the Pāṇḍavas their due and notes that leading Kuru elders and allies do not desire hostilities. He further implies that Duryodhana is being driven by advisers such as Karṇa, Duḥśāsana, and Śakuni. Duryodhana replies with categorical defiance: he will not shift the burden of the campaign onto Droṇa, Aśvatthāman, Sañjaya, or other allies; instead he and Karṇa will conduct a ‘raṇa-yajña’ (battle-sacrifice), casting Yudhiṣṭhira as the symbolic victim, and he details a ritualized metaphor where chariot, weapons, and arrows become implements of sacrifice. He vows that he, Karṇa, and Duḥśāsana will destroy the Pāṇḍavas, framing the outcome as binary sovereignty—either he rules after killing them, or they rule after killing him—and asserts he will not live alongside them. Dhṛtarāṣṭra then laments the impending destruction, foresees the Pāṇḍavas’ battlefield efficacy (with specific attention to Yuyudhāna and Bhīmasena), and warns of the Kuru army’s collapse; Vaiśaṃpāyana concludes the unit by noting Dhṛtarāṣṭra’s renewed questioning of Sañjaya after addressing assembled kings.
Chapter Arc: हस्तिनापुर की सभा में धृतराष्ट्र दुर्योधन को युद्ध-त्याग और संधि का उपदेश देते हैं—राज्य-भाग देकर पाण्डवों को संतुष्ट करने की अंतिम कोशिश। → धृतराष्ट्र युद्ध की निन्दा करते हुए दुर्योधन से कहते हैं कि पृथ्वी का उचित भाग पाण्डवों को दे दे; पर दुर्योधन अहंकार में अडिग रहता है—वह सुई की नोक जितनी भूमि भी छोड़ने को तैयार नहीं। → संजय (वर्णन/भविष्यवाणी-स्वर) दुर्योधन को भीमसेन के प्रचण्ड पराक्रम का भयावह चित्र दिखाते हैं—हाथियों के दाँत टूटे, कुम्भ फटे, रक्तरंजित गजराज गिरते हैं; कौरव-सेना अग्नि-वेग से ‘निर्दग्ध’ होती प्रतीत होती है। → धृतराष्ट्र उपस्थित राजाओं को समझा-बुझाकर फिर संजय से प्रश्न करते हैं—सभा का संवाद आगे बढ़ने के लिए तैयार होता है। → धृतराष्ट्र का संजय से अगला प्रश्न क्या होगा, और संजय कौन-सा निर्णायक समाचार/नीति-वचन सुनाएगा—यही अगले अध्याय की देहरी है।
Verse 1
ऑपन-माजल बछ। जि अष्टपञ्चाशत्तमो< ध्याय: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना धृतराष्ट उवाच क्षत्रतेजा ब्रह्मबचारी कौमारादपि पाण्डव: । तेन संयुगमेष्यन्ति मन्दा विलपतो मम,धृतराष्ट्र बोले--संजय! पाण्थुपुत्र युधिष्ठिर क्षात्र-तेजसे सम्पन्न हैं। उन्होंने कुमारावस्थासे ही विधि-पूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन किया है, परंतु मेरे ये मूर्ख पुत्र मेरे विलापकी ओर ध्यान न देकर उन्हीं युधिष्ठिरके साथ युद्ध छेड़नेवाले हैं
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“ସଞ୍ଜୟ! ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କ୍ଷତ୍ରତେଜରେ ସମ୍ପନ୍ନ; କୁମାରାବସ୍ଥାରୁ ହିଁ ବିଧିପୂର୍ବକ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ ପାଳନ କରିଆସିଛନ୍ତି। ତଥାପି ମୋର ଏହି ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ପୁଅମାନେ ମୋର ବିଲାପକୁ ଅଗ୍ରାହ୍ୟ କରି ତାଙ୍କ ସହିତ ଯୁଦ୍ଧକୁ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେବାକୁ ଠାରୁଛନ୍ତି।”
Verse 2
दुर्योधन निवर्तस्व युद्धाद् भरतसत्तम | न हि युद्ध प्रशंसन्ति सर्वावस्थमरिंदम,भरतकुलभूषण शत्रुदमन दुर्योधन! तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ। श्रेष्ठ पुरुष किसी भी दशामें युद्धकी प्रशंसा नहीं करते हैं
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଯୁଦ୍ଧରୁ ଫେରିଆ। ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ, କୌଣସି ଅବସ୍ଥାରେ ମଧ୍ୟ ଜ୍ଞାନୀମାନେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 3
अलमर्ध पृथिव्यास्ते सहामात्यस्य जीवितुम् | प्रयच्छ पाण्डुपुत्राणां यथोचितमरिंदम,शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! तुम पाण्डवोंको उनका यथोचित राज्यभाग दे दो। बेटा! मन्त्रियों-सहित तुम्हारे जीवननिर्वाहके लिये तो आधा राज्य ही पर्याप्त है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ, ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ତୁମ ଜୀବନନିର୍ବାହ ପାଇଁ ପୃଥିବୀର ଅର୍ଧ ଭାଗ ଯଥେଷ୍ଟ। ତେଣୁ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ଯଥୋଚିତ ରାଜ୍ୟଭାଗ ଦିଅ।
Verse 4
एतद्धि कुरव: सर्वे मन्यन्ते धर्मसंहितम् । यत् त्वं प्रशान्तिं मनन््येथा: पाण्डुपुत्रमहात्मभि:,समस्त कौरव यही धर्मानुकूल समझते हैं कि तुम महात्मा पाण्डवोंके साथ (संधि करके आपसमें) शान्ति बनाये रखनेकी बात स्वीकार कर लो
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ସମସ୍ତ କୁରୁମାନେ ଏହାକୁ ଧର୍ମସମ୍ମତ ବୋଲି ମନେ କରନ୍ତି: ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କରି ଶାନ୍ତିର ପଥକୁ ତୁମେ ଗ୍ରହଣ କର।
Verse 5
अड़्जेमां समवेक्षस्व पुत्र स्वामेव वाहिनीम् । जात एष तवाभावस्त्वं तु मोहान्न बुध्यसे,वत्स! तुम इस अपनी ही सेनाकी ओर दृष्टिपात करो। यह तुम्हारा विनाशकाल ही उपस्थित हुआ है, परंतु तुम मोहवश इस बातको समझ नहीं रहे हो
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ପୁତ୍ର, ନିଜର ଏହି ସେନାକୁ ଭଲଭାବେ ଦେଖ। ତୋର ବିନାଶକାଳ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି; କିନ୍ତୁ ମୋହରେ ତୁ ଏହା ବୁଝୁନାହଁ।
Verse 6
न त्वहं युद्धमिच्छामि नैतदिच्छति बाह्विकः । न च भीष्मो न च द्रोणो नाश्वृत्थामा न संजय:,देखो, न तो मैं युद्ध करना चाहता हूँ, न बाह्नीक इसकी इच्छा रखते हैं और न भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, संजय, सोमदत्त, शल तथा कृपाचार्य ही युद्ध करना चाहते हैं। सत्यव्रत, पुरुमित्र, जय और भूरिश्रवा भी युद्धके पक्षमें नहीं हैं
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ଦେଖ, ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧ ଚାହୁଁନି; ବାହ୍ଲିକ ମଧ୍ୟ ଏହା ଚାହୁଁନି। ଭୀଷ୍ମ ନୁହେଁ, ଦ୍ରୋଣ ନୁହେଁ, ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ନୁହେଁ, ସଞ୍ଜୟ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ— କେହି ଯୁଦ୍ଧ ଇଚ୍ଛା କରୁନାହାନ୍ତି।
Verse 7
न सोमदत्तो न शलो न कृपो युद्धमिच्छति । सत्यव्रत: पुरुमित्रो जयो भूरिश्रवास्तथा,देखो, न तो मैं युद्ध करना चाहता हूँ, न बाह्नीक इसकी इच्छा रखते हैं और न भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, संजय, सोमदत्त, शल तथा कृपाचार्य ही युद्ध करना चाहते हैं। सत्यव्रत, पुरुमित्र, जय और भूरिश्रवा भी युद्धके पक्षमें नहीं हैं
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ନ ସୋମଦତ୍ତ, ନ ଶଲ, ନ କୃପ ଯୁଦ୍ଧ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି। ସତ୍ୟବ୍ରତ, ପୁରୁମିତ୍ର, ଜୟ ଓ ଭୂରିଶ୍ରବ ମଧ୍ୟ ରଣପକ୍ଷରେ ନୁହନ୍ତି।
Verse 8
येषु सम्प्रतितिष्ठेयु: कुरव: पीडिता: परै: । ते युद्ध नाभिनन्दन्ति तत् तुभ्यं तात रोचताम्,शत्रुओंसे पीड़ित होनेपर कौरवसैनिक जिनके आश्रयमें खड़े हो सकते हैं, वे ही लोग युद्धका अनुमोदन नहीं कर रहे हैं। तात! उनके इस विचारको तुम्हें भी पसंद करना चाहिये
ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୀଡିତ ହେଲେ କୌରବମାନେ ଯାହାଙ୍କ ଆଶ୍ରୟରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ଦାଁଡ଼ିପାରନ୍ତି, ସେମାନେ ହିଁ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଅନୁମୋଦନ କରୁନାହାନ୍ତି। ତେଣୁ, ତାତ, ସେମାନଙ୍କ ମତ ତୁମକୁ ମଧ୍ୟ ରୋଚୁ।
Verse 9
न त्वं करोषि कामेन कर्ण: कारयिता तव । दुःशासनश्न पापात्मा शकुनिश्चापि सौबल:,(मैं जानता हूँ.) तुम अपनी इच्छासे युद्ध नहीं कर रहे हो, अपितु पापात्मा दुःशासन, कर्ण तथा सुबल-पुत्र शकुनि ही तुमसे यह कार्य करा रहे हैं
ତୁମେ ନିଜ ଇଚ୍ଛାରେ ଏହି ଯୁଦ୍ଧ କରୁନାହ; କର୍ଣ୍ଣ ତୁମକୁ ଏହା କରାଉଛି। ପାପାତ୍ମା ଦୁଃଶାସନ ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି ମଧ୍ୟ ତୁମକୁ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟରେ ବାଧ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 10
दुर्योधन उवाच नाहं भवति न द्रोणे नाश्वृत्थाम्नि न संजये । न भीष्मे न च काम्बोजे न कृपे न च बाह्लिके,दुर्योधन बोला-पिताजी! मैंने आप, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, संजय, भीष्म, काम्बोजनरेश, कृपाचार्य, बाह्नीक, सत्यव्रत, पुरुमित्र, भूरिश्रवा अथवा आपके अन्यान्य योद्धाओंपर सारा बोझ रखकर पाण्डवोंको युद्धके लिये आमन्त्रित नहीं किया है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପିତା! ଆପଣଙ୍କ ଉପରେ, ଦ୍ରୋଣ, ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, ସଞ୍ଜୟ, ଭୀଷ୍ମ, କାମ୍ବୋଜରାଜ, କୃପ କିମ୍ବା ବାହ୍ଲୀକଙ୍କ ଉପରେ ସମସ୍ତ ଭାର ରଖି ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆହ୍ୱାନ କରିନାହିଁ।
Verse 11
सत्यव्रते पुरुमित्रे भूरिश्रवसि वा पुन: । अन्येषु वा तावकेषु भारं कृत्वा समाह्दयम्,दुर्योधन बोला-पिताजी! मैंने आप, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, संजय, भीष्म, काम्बोजनरेश, कृपाचार्य, बाह्नीक, सत्यव्रत, पुरुमित्र, भूरिश्रवा अथवा आपके अन्यान्य योद्धाओंपर सारा बोझ रखकर पाण्डवोंको युद्धके लिये आमन्त्रित नहीं किया है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସତ୍ୟବ୍ରତ, ପୁରୁମିତ୍ର, ଭୂରିଶ୍ରବ କିମ୍ବା ଆପଣଙ୍କ ପକ୍ଷର ଅନ୍ୟ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ଉପରେ ସମସ୍ତ ଭାର ରଖି, ମନକୁ କଠୋର କରି, ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆହ୍ୱାନ କରିନାହିଁ।
Verse 12
अहं च तात कर्णश्न रणयज्ञं वितत्य वै | युधिष्ठिरं पशुं कृत्वा दीक्षितौ भरतर्षभ,तात! भरतश्रेष्ठ! मैंने तथा कर्णने रणयज्ञका विस्तार करके युधिष्ठिरको बलिपशु बनाकर उस यज्ञकी दीक्षा ले ली है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତାତ, ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ଓ କର୍ଣ୍ଣ ସତ୍ୟେ ରଣଯଜ୍ଞକୁ ବିସ୍ତାର କରିଛୁ; ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ବଳିପଶୁ କରି ଆମେ ସେ ଯଜ୍ଞର ଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରିଛୁ।
Verse 13
रथो वेदी ख्रुवः खड्गो गदा स्लरुक् कवचोडजिनम् | चातुर्ोत्रं च धुर्या मे शरा दर्भा हविर्यश:,इसमें रथ ही वेदी है, खड़ग खुवा है, गदा खुक् है, कवच मृगचर्म है, रथका भार वहन करनेवाले मेरे चारों घोड़े ही चार होता हैं, बाण कुश हैं और यश ही हविष्य है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମୋ ରଥ ହିଁ ବେଦୀ, ମୋ ଖଡ୍ଗ ହିଁ ଖ୍ରୁବ (ସ୍ଥିର ସ୍ତମ୍ଭ); ମୋ ଗଦା ହିଁ ସ୍ରୁବ (ଆହୁତି-ଚମଚ), ମୋ କବଚ ହିଁ ମୃଗଚର୍ମ। ରଥ ବହନ କରୁଥିବା ମୋ ଚାରି ଘୋଡ଼ା ହିଁ ଚାରି ହୋତୃ; ମୋ ଶର ଦର୍ଭ, ଆଉ ମୋ ଯଶ ହିଁ ହବିଷ୍ୟ।
Verse 14
आत्मयज्ञेन नृपते इष्ट्वा वैवस्व॒तं रणे । विजित्य च समेष्यावो हतामित्रौ श्रिया वृती,नरेश्वरर हम दोनों समरांगणमें अपने इस यज्ञके द्वारा यमराजका यजन करके शत्रुओंको मारकर विजयी हो विजयलक्ष्मीसे शोभा पाते हुए पुनः राजधानीमें लौटेंगे
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ନୃପତି! ରଣଭୂମିରେ ଆତ୍ମଯଜ୍ଞ ଦ୍ୱାରା ଆମେ ବୈବସ୍ୱତ (ଯମ)ଙ୍କୁ ଯଜନ କରିବୁ; ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ହତ କରି ବିଜୟ ଲାଭ କରି, ଶ୍ରୀର ଶୋଭାରେ ଭୂଷିତ ହୋଇ ଆମେ ଦୁଇଜଣ ଏକାସାଥି ଫେରିଆସିବୁ।
Verse 15
अहं च तात कर्णश्न भ्राता दुःशासनश्व मे । एते वयं हनिष्याम: पाण्डवान् समरे त्रयः,तात! मैं, कर्ण तथा भाई दुःशासन--हम तीन ही समरभूमिमें पाण्डवोंका संहार कर डालेंगे
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତାତ! ମୁଁ, କର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ମୋ ଭାଇ ଦୁଃଶାସନ—ଆମେ ତିନିଜଣେ ଯୁଦ୍ଧରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ ସଂହାର କରିଦେବୁ।
Verse 16
अहं हि पाण्डवान् हत्वा प्रशास्ता पृथिवीमिमाम् | मां वा हत्वा पाण्डुपुत्रा भोक्तार: पृथिवीमिमाम्,या तो मैं ही पाण्डवोंको मारकर इस पृथ्वीका शासन करूँगा या पाण्डव ही मुझे मारकर भूमण्डलका राज्य भोगेंगे
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ହତ କରି ଏହି ପୃଥିବୀକୁ ଶାସନ କରିବି; ନଚେତ୍ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନେ ମୋତେ ହତ କରି ଏହି ପୃଥିବୀର ରାଜ୍ୟ ଭୋଗ କରିବେ।
Verse 17
त्यक्त मे जीवितं राज्यं धनं सर्व च पार्थिव । न जातु पाण्डवै: सार्थ वसेयमहमच्युत,राज्यच्युत न होनेवाले महाराज! मैं जीवन, राज्य, धन--सब कुछ छोड़ सकता हूँ, परंतु पाण्डवोंके साथ मिलकर कदापि नहीं रह सकता
ହେ ମହାରାଜ! ମୁଁ ମୋର ପ୍ରାଣ, ରାଜ୍ୟ ଓ ସମସ୍ତ ଧନ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରିପାରେ; କିନ୍ତୁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଏକତାରେ କଦାପି ରହିବି ନାହିଁ।
Verse 18
यावद्धि सूच्यास्तीक्ष्णाया विध्येदग्रेण मारिष । तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्न: पाण्डवान् प्रति,पूज्य पिताजी! तीखी सूईके अग्रभागसे जितनी भूमि बिंध सकती है, उतनी भी मैं पाण्डवोंको नहीं दे सकता
ପୂଜ୍ୟ ପିତାମହ! ତୀକ୍ଷ୍ଣ ସୁଇର ଅଗ୍ରଭାଗ ଯେତେ ଭୂମିକୁ ବିଦ୍ଧ କରିପାରେ, ସେତେ ମାତ୍ର ଭୂମି ମଧ୍ୟ ଆମ ଦେଶରୁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ିବା ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ—ମୁଁ ଦେବି ନାହିଁ।
Verse 19
धृतराष्ट्र रवाच सर्वान् वस्तात शोचामि त्यक्तो दुर्योधनो मया । ये मन्दमनुयास्यध्वं यान्तं वैवस्वतक्षयम्,धृतराष्ट्र बोले--तात कौरवगण! दुर्योधनको तो मैंने त्याग दिया। यमलोकको जाते हुए उस मूर्खका तुम लोगोंमेंसे जो अनुसरण करेंगे मैं उन सभी लोगोंके लिये शोकमें पड़ा हूँ
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବତ୍ସମାନେ! ମୁଁ ତୁମ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଶୋକ କରୁଛି। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ମୁଁ ତ୍ୟାଗ କରିଛି। ଯେ ଯେ ଲୋକ ଯମ (ବୈବସ୍ୱତ) ଙ୍କ ଧାମକୁ ଯାଉଥିବା ସେଇ ମୂର୍ଖକୁ ଅନୁସରଣ କରିବେ, ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ମୁଁ ଦୁଃଖରେ ଡୁବିଛି।
Verse 20
रुरूणामिव यूथेषु व्याप्रा: प्रहरतां वरा: । वरान् वरान् हनिष्यन्ति समेता युधि पाण्डवा:,प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ व्याप्र जैसे रुक नामक मृगोंके झुंडोंमें घुसकर बड़ों-बड़ोंको मार डालते हैं, उसी प्रकार योद्धाओंमें अग्रगण्य पाण्डव युद्धमें एकत्र होकर कौरवोंके प्रधान- प्रधान वीरोंका वध कर डालेंगे
ଯେପରି ପ୍ରହାରରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ୟାଘ୍ରମାନେ ରୁରୁ-ମୃଗମାନଙ୍କ ଝୁଣ୍ଡରେ ପ୍ରବେଶ କରି ବଡ଼ ବଡ଼କୁ ମାରି ପକାନ୍ତି, ସେପରି ପାଣ୍ଡବମାନେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଆମ ପ୍ରଧାନ ପ୍ରଧାନ ବୀରମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିଦେବେ।
Verse 21
प्रतीपमिव मे भाति युयुधानेन भारती । व्यस्ता सीमन्तिनी ग्रस्ता प्रमृष्टा दीर्घबाहुना,मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पुरुषसे तिरस्कृत हुई नारीकी भाँति इस भरतवंशियोंकी सेनाको विशाल बाँहोंवाले वीर सात्यकिने अपने अधिकारमें करके रौंद डाला है और वह अब विपरीत दिशाकी ओर अस्त-व्यस्त दशामें भागी जा रही है
ମୋତେ ଏପରି ଲାଗୁଛି ଯେ ଯୁୟୁଧାନ (ସାତ୍ୟକି) ଏହି ଭାରତୀୟ ସେନାକୁ ଉଲ୍ଟା ଦିଗକୁ ଘୁଞ୍ଚାଇ ଦେଇଛି—ଯେପରି ପୁରୁଷଦ୍ୱାରା ତିରସ୍କୃତ ନାରୀ, ଯାହାର ସୀମନ୍ତ ଅସ୍ତବ୍ୟସ୍ତ, ଦୀର୍ଘବାହୁ ବୀରଙ୍କ ହାତରେ ଧରାପଡ଼ି ରୌଦ୍ର ଭାବେ ରଗଡ଼ାଯାଇଥାଏ; ସେପରି ଏହି ସେନା ମଧ୍ୟ ଗୋଲମାଳ ହୋଇ ବିପରୀତ ଦିଗକୁ ପଳାଉଥିବା ପରି ଦିଶୁଛି।
Verse 22
सम्पूर्ण पूरयन् भूयो धन पार्थस्य माधव: । शैनेय: समरे स्थाता बीजवत् प्रवपठ्शरान्,मधुवंशी सात्यकि युधिष्ठिरके भरे-पूरे बल-वैभवको और भी बढ़ाते हुए, जैसे किसान खेतोंमें बीज बोता है, उसी प्रकार समरभूमिमें बाण बिखेरते हुए खड़े होंगे
ମାଧବ (କୃଷ୍ଣ) ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମୃଦ୍ଧି ଓ ସାଧନକୁ ଆହୁରି ବଢ଼ାଇବେ; ଏବଂ ଶୈନେୟ (ସାତ୍ୟକି) ଯୁଦ୍ଧରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ, କୃଷକ ଯେପରି ବୀଜ ବୁଣେ ସେପରି ବାଣ ଛିଟାଇବେ।
Verse 23
सेनामुखे प्रयुद्धानां भीमसेनो भविष्यति । त॑ं सर्वे संश्रयिष्यन्ति प्राकारमकुतो भयम्,सेनामें समस्त पाण्डव योद्धाओंके आगे भीमसेन खड़े होंगे और समस्त योद्धा उन्हें भयरहित प्राकार (चहारदीवारी)-के समान मानकर उन्हींका आश्रय लेंगे
ସେନାର ଅଗ୍ରଭାଗରେ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭୀମସେନ ଅଗ୍ରଣୀ ହେବେ। ସମସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧା ତାଙ୍କୁ ଭୟହୀନ ପ୍ରାକାର—ଅଭେଦ୍ୟ ରକ୍ଷାପ୍ରାଚୀର—ଭାବି ତାଙ୍କର ଆଶ୍ରୟ ନେବେ।
Verse 24
यदा द्रक्ष्यसि भीमेन कुञ्जरान् विनिपातितान् । विशीर्णदन्तान् गिर्याभान् भिन्नकुम्भान् सशोणितान्,जब तुम देखोगे कि भीमसेनने पर्वताकार गजराजोंके दाँत तोड़ एवं कुम्भस्थल विदीर्ण करके उन्हें रक्तरंजित दशामें धराशायी कर दिया है और वे रणभूमिमें टूट-फ़ूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे हैं, तब उन सबपर दृष्टिपात करके भीमसेनके स्पर्शसे भी भयभीत होकर मेरी कही हुई बातोंको याद करोगे
ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ଦେଖିବ ଭୀମ ପର୍ବତସଦୃଶ ମହାକୁଞ୍ଜରମାନଙ୍କୁ ଭୂମିରେ ପତିତ କରିଛନ୍ତି—ତାଙ୍କର ଦନ୍ତ ଭାଙ୍ଗିଯାଇଛି, କୁମ୍ଭସ୍ଥଳ ଫାଟିଯାଇଛି, ଏବଂ ସେମାନେ ରକ୍ତରେ ରଞ୍ଜିତ—ସେତେବେଳେ ସେଇ ଦୃଶ୍ୟ ତୁମ ହୃଦୟରେ ଭୟ ଭରିଦେବ।
Verse 25
तानभिप्रेक्ष्य संग्रामे विशीर्णानिव पर्वतान् | भीतो भीमस्य संस्पर्शात् स्मर्तासि वचनस्य मे,जब तुम देखोगे कि भीमसेनने पर्वताकार गजराजोंके दाँत तोड़ एवं कुम्भस्थल विदीर्ण करके उन्हें रक्तरंजित दशामें धराशायी कर दिया है और वे रणभूमिमें टूट-फ़ूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे हैं, तब उन सबपर दृष्टिपात करके भीमसेनके स्पर्शसे भी भयभीत होकर मेरी कही हुई बातोंको याद करोगे
ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଭାଙ୍ଗିପଡ଼ିଥିବା ପର୍ବତମାନଙ୍କ ପରି ଦେଖି, ଭୀମଙ୍କ ସ୍ପର୍ଶମାତ୍ରରେ ମଧ୍ୟ ଭୟଭୀତ ହୋଇ, ତୁମେ ମୋ କଥା ସ୍ମରଣ କରିବ।
Verse 26
निर्दग्ध॑ं भीमसेनेन सैन्यं रथहयद्विपम् । गतिमग्नेरिव प्रेक्ष्य स्मतासि वचनस्य मे,भीमसेन जब घोड़े, रथ और हाथियोंसे भरी हुई सारी कौरव-सेनाको अपनी क्रोधाग्निसे दग्ध करने लगेंगे, उस समय अग्निके समान उनका प्रबल वेग देखकर तुम्हें मेरी बातें याद आयेंगी
ରଥ, ଅଶ୍ୱ ଓ ଗଜରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଆମ ସେନାକୁ ଭୀମସେନ ଯେତେବେଳେ ଦଗ୍ଧ କରିଦେବେ, ସେତେବେଳେ ଅଗ୍ନିର ଗତି ପରି ତାଙ୍କର ପ୍ରବଳ ବେଗ ଦେଖି ତୁମେ ମୋ କଥା ସ୍ମରଣ କରିବ।
Verse 27
महद् वो भयमागामि न चेच्छाम्यथ पाण्डवै: । गदया भीमसेनेन हता: शममुपैष्यथ,तुमलोगोंपर बहुत बड़ा भय आनेवाला है। मैं नहीं चाहता कि पाण्डवोंके साथ तुम्हारा युद्ध हो। यदि हो गया तो तुमलोग भीमसेनकी गदासे मारे जाकर सदाके लिये शान्त हो जाओगे
ତୁମମାନଙ୍କ ଉପରେ ମହାଭୟ ଆସିପଡ଼ିବାକୁ ଯାଉଛି। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ତୁମେ ଯୁଦ୍ଧ କର, ମୁଁ ଏହା ଚାହେଁ ନାହିଁ। ଯଦି ଯୁଦ୍ଧ ହେଲା, ତେବେ ଭୀମସେନଙ୍କ ଗଦାଘାତରେ ତୁମେ ହତ ହୋଇ ସଦାକାଳ ପାଇଁ ମୃତ୍ୟୁର ନିରବ ଶାନ୍ତିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବ।
Verse 28
महावनमिवच्छिन्नं यदा द्रक्ष्यसि पातितम् । बल॑ कुरूणां भीमेन तदा स्मर्तासि मे वच:,काटकर गिराये हुए विशाल वनकी भाँति जब तुम कौरवसेनाको भीमसेनके द्वारा मार गिरायी हुई देखोगे, तब तुम्हें मेरे वचनोंका स्मरण हो आयेगा
ଭୀମ ଯେତେବେଳେ କୁରୁସେନାକୁ କାଟି ପକାଇଥିବା ବିଶାଳ ବନ ପରି ଭୂମିରେ ପତିତ ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ତୁମେ ମୋ କଥା ସ୍ମରଣ କରିବ।
Verse 29
वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा राजा तु सर्वास्तान् पृथिवीपतीन् । अनुभाष्य महाराज पुन: पप्रच्छ संजयम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏତିକି କହି ରାଜା ସେଠାରେ ଉପବିଷ୍ଟ ସମସ୍ତ ପୃଥିବୀପତିଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ। ସେମାନଙ୍କ ସହ ଆଉ କିଛି କଥା କହି, ହେ ମହାରାଜ, ସେ ପୁନର୍ବାର ସଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।
Verse 57
इस प्रकार श्रीमह्माभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ସଞ୍ଜୟବାକ୍ୟବିଷୟକ ସତ୍ତାବନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 58
वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने वहाँ बैठे हुए समस्त भूपालोंसे उपर्युक्त बातें कहकर उन्हें समझा-बुझाकर पुन: संजयसे पूछा ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्येडष्टपञ्चाशत्तमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक अद्डावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ ଜନମେଜୟ! ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ସେଠାରେ ବସିଥିବା ସମସ୍ତ ଭୂପାଳଙ୍କୁ ପୂର୍ବୋକ୍ତ କଥା କହି ସେମାନଙ୍କୁ ବୁଝାଇ ଧୈର୍ୟ ଦେଇ, ପୁନର୍ବାର ସଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ। ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରବାକ୍ୟବିଷୟକ ଅଠାବନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma is whether sovereignty and honor can justify rejecting equitable compromise when war is foreseeable and preventable—testing the ruler’s duty to protect life and stability against an aggressive claim to undivided power.
The chapter illustrates that ethical governance depends not only on receiving counsel but on the capacity to internalize it; rhetorical sacralization of conflict can function as a mechanism to bypass moral scrutiny and normalize extreme risk.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-frame is conveyed through Vaiśaṃpāyana’s transition, positioning the exchange as evidentiary material within the larger inquiry into causality, responsibility, and the escalation toward Kurukṣetra.