Adhyaya 45
Udyoga ParvaAdhyaya 4532 Verses

Adhyaya 45

Sanatsujāta on the Imperceptible Eternal Light (यत्तच्छुक्रं महज्ज्योतिः)

Upa-parva: Sanatsujātīya (Sanatsujāta-Upadeśa) — within Udyoga Parva

Sanatsujāta continues a compact theological-metaphysical exposition using layered cosmological and contemplative images. The chapter repeatedly asserts that yogins perceive the “Bhagavān, Sanātana” beyond sensory form, described as a great, radiant principle associated with the sun’s brilliance yet not reducible to visible phenomena. It presents origin-and-support motifs (brahman arising from the ‘śukra’ principle; directions, rivers, and oceans proceeding from it), and paradoxical fullness language (“from fullness, fullness is taken; fullness remains”), indicating non-diminishing plenitude. Several verses deny visual grasp (“no one sees it with the eye”), relocating knowledge to purified mind and heart, and link such insight to freedom from mortality. The discourse also employs symbolic sequences (prāṇa/apāna, moon/sun) to depict hierarchical absorption, and culminates in identity statements where the ultimate principle is declared as mother, father, son, and the self of all—an archival marker of non-dual framing within a courtly instruction context.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र के भीतर भय और मोह की धुंध है; उसी अंधकार में सनत्सुजात परमात्म-स्वरूप का दीप जलाते हैं—वह ज्योति जो ‘शुक्र’ के मध्य तपती हुई भी अतप्त रहती है। → ऋषि-भाषा में ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का उद्घाटन होता है: ब्रह्म का ‘शुक्र’ से प्रादुर्भाव, वायु-अग्नि-सोम-प्राण की उत्पत्ति और उसी में उनकी चेष्टा; सूर्य-चन्द्र-प्राण-अपान के परस्पर ‘गिरने’ (लय) का रहस्य—सब कुछ एक ही सनातन सत्ता में आवर्तित। → सनत्सुजात का निर्णायक प्रतिपादन: योगीजन उसी दिव्य, अजर, इन्द्रिय-मन-बुद्धि से परे भगवान को प्रत्यक्ष देखते हैं—वह ध्रुव-चक्र पर स्थित रथ-चक्र-सा अचल, केतुमान, सर्व-लोक-धारक है। → परमात्मा की सर्वव्यापकता और आत्म-ऐक्य का निष्कर्ष उभरता है: वही पितामह, पिता और पुत्र भी है; सब उसी में आत्मस्थ हैं—‘न मैं तुमसे भिन्न, न तुम मुझसे’—और वही सूक्ष्म से भी सूक्ष्म होकर समस्त भूतों में जाग्रत है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। डे षट्चत्वारिशो5 ध्याय: परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन सनत्सुजात उवाच यत्‌ तच्छुक्रे महज्ज्योतिर्दीप्यमानं महद्‌ यशः । तद्‌ वै देवा उपासते तस्मात्‌ सूर्यो विराजते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,सनत्सुजातजी कहते हैं--राजन्‌! जो शुद्ध ब्रह्म है, वह महान्‌ ज्योतिर्मय, देदीप्यमान एवं विशाल यशरूप है। सब देवता उसीकी उपासना करते हैं। उसीके प्रकाशसे सूर्य प्रकाशित होते हैं, उस सनातन भगवान्‌का योगीजन साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଯେ ଶୁଦ୍ଧ ବ୍ରହ୍ମ, ସେଇ ମହାଜ୍ୟୋତି—ସ୍ୱୟଂ ଦୀପ୍ତିମାନ ଓ ମହିମାମୟ। ଦେବଗଣ ସେହି ପରମତତ୍ତ୍ୱକୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି; ସେହି ତେଜରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ପ୍ରକାଶିତ ହୁଏ। ଯୋଗୀମାନେ ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 2

शुक्राद्‌ ब्रह्म प्रभवति ब्रह्म शुक्रेण वर्धते । तच्छुक्रे ज्योतिषां मध्येडतप्तं तपति तापनम्‌ | योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,शुद्ध सच्चिदानन्द परब्रह्मसे हिरण्यगर्भकी उत्पत्ति होती है तथा उसीसे वह वृद्धिको प्राप्त होता है। वह शुद्ध ज्योतिर्मय ब्रह्म ही सूर्यादि सम्पूर्ण ज्योतियोंके भीतर स्थित होकर सबको प्रकाशित कर रहा है और तपा रहा है; वह स्वयं सब प्रकारसे अतप्त और स्वयंप्रकाश है, उसी सनातन भगवानका योगीजन साक्षात्कार करते हैं

ଶୁକ୍ରରୁ ବ୍ରହ୍ମ ପ୍ରଭବିତ ହୁଏ, ଏବଂ ସେହି ଶୁକ୍ରଦ୍ୱାରା ବ୍ରହ୍ମ ବୃଦ୍ଧି ପାଏ। ସେହି ଶୁକ୍ରର ଭିତରେ, ସମସ୍ତ ଜ୍ୟୋତିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ, ତାପ ଦେବା ତେଜ ଅବସ୍ଥିତ—ଯେ ନିଜେ ଅତପ୍ତ, ତଥାପି ସବୁକୁ ପ୍ରକାଶିତ ଓ ଉଷ୍ଣ କରେ। ଯୋଗୀମାନେ ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 3

अपो5थ अद्भय: सलिलस्य मध्ये उभौ देवी शिश्रियातेडन्तरिक्षे अतन्द्रित: सवितुर्विवस्वा- नुभौ बिभर्ति पृथिवीं दिवं च | योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,जलकी भाँति एकरस परब्रह्म परमात्मामें स्थित पाँच सूक्ष्म महाभूतोंसे अत्यन्त स्थूल पांचभौतिक शरीरके हृदयाकाशमें दो देव--ईश्वर और जीव उसको आश्रय बनाकर रहते हैं। सबको उत्पन्न करनेवाला सर्वव्यापी परमात्मा सदैव जाग्रत्‌ रहता है। वही इन दोनोंको तथा पृथ्वी और द्युलोकको भी धारण करता है। उस सनातन भगवान्‌का योगीजन साक्षात्कार करते हैं

ଜଳରୁ, ତାପରେ ତତ୍ତ୍ୱମାନଙ୍କରୁ, ସେହି ମହାପ୍ଲାବନର ମଧ୍ୟଭାଗରେ ଅନ୍ତରିକ୍ଷରେ ଦୁଇ ଦେବତତ୍ତ୍ୱ ଆଶ୍ରୟ ନେଇଥାଏ। ଅତନ୍ଦ୍ରିତ ସବିତା-ବିବସ୍ୱାନ୍ ସେମାନଙ୍କୁ ଉଭୟକୁ, ଏବଂ ପୃଥିବୀ ଓ ଦ୍ୟୁଲୋକକୁ ମଧ୍ୟ ଧାରଣ କରନ୍ତି। ଯୋଗୀମାନେ ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 4

उभौ च देवौ पृथिवीं दिवं च दिश: शुक्रो भुवनं बिभर्ति । तस्माद्‌ दिश: सरितश्न स्रवन्ति तस्मात्‌ समुद्रा विहिता महान्ता: । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,उक्त दोनों देवताओंको, पृथ्वी और आकाशको, सम्पूर्ण दिशाओंको तथा समस्त लोकसमुदायको वह शुद्ध ब्रह्म ही धारण करता है। उसी परब्रह्मसे दिशाएँ प्रकट हुई हैं, उसीसे सरिताएँ प्रवाहित होती हैं तथा उसीसे बड़े-बड़े समुद्र प्रकट हुए हैं। उस सनातन भगवान्‌का योगीजन साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଶୁଦ୍ଧ, ଦୀପ୍ତିମାନ ବ୍ରହ୍ମ ଏକାଇ ଦୁଇ ଦେବଶକ୍ତିକୁ, ପୃଥିବୀ ଓ ଦ୍ୟୁଲୋକକୁ, ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ଏବଂ ସମଗ୍ର ଲୋକ-ବ୍ୟବସ୍ଥାକୁ ଧାରଣ କରେ। ସେହି ପରବ୍ରହ୍ମରୁ ଦିଗମାନେ ପ୍ରକଟ ହେଲେ; ସେଠାରୁ ନଦୀମାନେ ପ୍ରବାହିତ; ସେଠାରୁ ମହାସମୁଦ୍ରମାନେ ସ୍ଥାପିତ। ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 5

चक्रे रथस्य तिष्ठन्तो<5ध्रुवस्याव्ययकर्मण: । केतुमन्तं वहन्त्यश्वास्तं दिव्यमजरं दिवि । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,जो इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदिका संघात--शरीर विनाशशील है, जिसके कर्म अपने-आप नष्ट होनेवाले नहीं हैं, ऐसे इस शरीररूप रथके चक्रकी भाँति इसे घुमानेवाले कर्मसंस्कारसे युक्त मनमें जुते हुए इन्द्रियरूप घोड़े उस हृदयाकाशमें स्थित ज्ञानस्वरूप दिव्य अविनाशी जीवात्माको जिस सनातन परमेश्वरके निकट ले जाते हैं, उस सनातन भगवान्‌का योगीजन साक्षात्कार करते हैं?

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଯେପରି ରଥର ଚକ୍ର ଘୁରେ, କିନ୍ତୁ ଧ୍ରୁବ ଅକ୍ଷ ଅଚଳ ରହେ, ସେପରି ମନରେ ଯୋଜିତ ଇନ୍ଦ୍ରିୟରୂପ ଅଶ୍ୱମାନେ କେତୁଧାରୀ ରଥକୁ ଆଗେ ବହନ କରନ୍ତି; ତଥାପି ଅବ୍ୟୟ କର୍ତ୍ତା ଅନ୍ତରେ ଅଚଳ। ସେ ଦିବ୍ୟ, ଅଜର, ଅବିନାଶୀ ସତ୍ତା ଦିବ୍ୟଲୋକେ ଅଧିଷ୍ଠିତ; ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 6

न सादृश्ये तिक्ठतति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्रिदेनम्‌ मनीषयाथो मनसा ह॒दा च य एन॑ विदुरमृतास्ते भवन्ति । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,उस परमात्माका स्वरूप किसी दूसरेकी तुलनामें नहीं आ सकता; उसे कोई चर्मचक्षुओंसे नहीं देख सकता। जो निश्चयात्मिका बुद्धिसे, मनसे और हृदयसे उसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात्‌ परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं। उस सनातन भगवानका योगीजन साक्षात्कार करते हैं:

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ତାଙ୍କର ସ୍ୱରୂପ କୌଣସି ଉପମାର ସୀମାରେ ରହେ ନାହିଁ; ଦେହଚକ୍ଷୁରେ କେହି ତାଙ୍କୁ ଦେଖିପାରେ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ଯେମାନେ ବିବେକବୁଦ୍ଧିରେ, ସ୍ଥିର ମନରେ ଓ ହୃଦୟର ଗଭୀର ଅନୁଭୂତିରେ ତାଙ୍କୁ ଜାଣନ୍ତି, ସେମାନେ ଅମୃତତ୍ୱ ପାଆନ୍ତି—ଅର୍ଥାତ୍ ପରମାତ୍ମାକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି। ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 7

द्वादशपूगां सरितं पिबन्तो देवरक्षिताम्‌ । मध्वीक्षन्तश्न ते तस्या: संचरन्तीह घोराम्‌ । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,जो दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि--इन बारहके समुदायसे युक्त है तथा जो परमात्मासे सुरक्षित है, उस संसाररूप भयंकर नदीके विषयरूप मधुर जलको देखने और पीनेवाले लोग उसीमें गोता लगाते रहते हैं। इससे मुक्त करनेवाले उस सनातन परमात्माका योगीजन साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଦଶ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ, ମନ ଓ ବୁଦ୍ଧି—ଏହି ଦ୍ୱାଦଶ ସମୂହରେ ବନ୍ଧିତ ଲୋକେ, ଦେବରକ୍ଷିତ ଏହି ସଂସାରରୂପ ଘୋର ନଦୀର ଜଳ ପାନ କରନ୍ତି; ବିଷୟମାନଙ୍କୁ ମଧୁସଦୃଶ ମିଠା ଭାବି ସେହି ପ୍ରବାହରେ ଡୁବି-ଭାସି ଘୁରନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ଯିଏ ଏହି ସ୍ରୋତରୁ ଉଦ୍ଧାର କରନ୍ତି, ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 8

तदर्धमासं पिबति संचित्य भ्रमरो मधु । ईशान: सर्वभूतेषु हविर्भूतमकल्पयत्‌ । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,जैसे शहदकी मक्खी आधे मासतक शहदका संग्रह करके फिर आधे मासतक उसे पीती रहती है, उसी प्रकार यह भ्रमणशील संसारी जीव इस जन्ममें किये हुए संचित कर्मको परलोकमें (विभिन्न योनियोंमें) भोगता है। परमात्माने समस्त प्राणियोंके लिये उनके कर्मानुसार कर्मफलभोगरूप हविकी अर्थात्‌ समस्त भोग-पदार्थोंकी व्यवस्था कर रखी है। उस सनातन भगवान्‌का योगीलोग साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଯେପରି ଭ୍ରମର ଅର୍ଧମାସ ମଧୁ ସଞ୍ଚୟ କରି, ପରେ ଅର୍ଧମାସ ସେହି ସଞ୍ଚିତ ମଧୁ ପାନ କରେ, ସେପରି ଏହି ସଂଚାରୀ ଜୀବ ଏ ଜନ୍ମରେ ସଞ୍ଚିତ କର୍ମଫଳକୁ ପରଲୋକରେ ଭୋଗ କରେ; ବିଭିନ୍ନ ଯୋନିରେ ତାହାର ଆସ୍ୱାଦ ନେଇଥାଏ। ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅନ୍ତର୍ୟାମୀ ଈଶ୍ୱର କର୍ମାନୁସାରେ ଭୋଗ୍ୟବସ୍ତୁମାନଙ୍କୁ ‘ହବି’ ସଦୃଶ ନିୟତ କରି ରଖିଛନ୍ତି। ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 9

हिरण्यपर्णम श्वत्थमभिपद्य हापक्षका: । ते तत्र पक्षिणो भूत्वा प्रपतन्ति यथा दिशम्‌ | योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,जिसके विषयरूपी पत्ते स्वर्णके समान मनोरम दिखायी पड़ते हैं, उस संसाररूपी अश्वत्थवृक्षपर आरूढ़ होकर पंखहीन जीव कर्मरूपी पंख धारणकर अपनी वासनाके अनुसार विभिन्न योनियोंमें पड़ते हैं अर्थात्‌ एक योनिसे दूसरी योनिमें गमन करते हैं; किंतु योगीजन उस सनातन परमात्माका साक्षात्कार करते हैं

ଇନ୍ଦ୍ରିୟବିଷୟରୂପ ସୁବର୍ଣ୍ଣସଦୃଶ ମୋହକ ପତ୍ରଯୁକ୍ତ ସଂସାରରୂପ ଅଶ୍ୱତ୍ଥବୃକ୍ଷରେ ଆରୂଢ଼ ହୋଇ, ସ୍ୱଭାବତଃ ପକ୍ଷହୀନ ଜୀବମାନେ କର୍ମରୂପ ପକ୍ଷ ଧାରଣ କରି ନିଜ ନିଜ ବାସନାରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ଯେଉଁ ଦିଗକୁ ଚାହେଁ ସେଉଁ ଦିଗକୁ ପତିତ ଓ ଉଡ଼ି—ଏକ ଜନ୍ମରୁ ଅନ୍ୟ ଜନ୍ମକୁ ଗମନ କରନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ଯୋଗୀମାନେ ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯଥାର୍ଥରେ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 10

पूर्णात्‌ पूर्णान्युद्धरन्ति पूर्णात्‌ पूर्णानि चक्रिरे । हरन्ति पूर्णात्‌ पूर्णानि पूर्णमेवावशिष्यते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,पूर्ण परमेश्वरसे पूर्ण--चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं, पूर्ण सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही वे पूर्ण प्राणी चेष्टा करते हैं, फिर पूर्णसे ही पूर्णब्रह्ममें उनका उपसंहार (विलय) होता है तथा अन्तमें एकमात्र पूर्णब्रह्म ही शेष रह जाता है। उस सनातन परमात्माका योगीलोग साक्षात्कार करते हैं

ପୂର୍ଣ୍ଣ ପରମେଶ୍ୱରରୁ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଚରାଚର ସୃଷ୍ଟି ଉଦ୍ଭବ ହୁଏ; ପୂର୍ଣ୍ଣ ସତ୍ତାର ସ୍ଫୁରଣ ପାଇଲେ ହିଁ ସେମାନେ କ୍ରିୟା କରନ୍ତି; ପୁଣି ପୂର୍ଣ୍ଣରେ ହିଁ ସେମାନେ ପୂର୍ଣ୍ଣବ୍ରହ୍ମରେ ଲୟ ପାଆନ୍ତି; ଶେଷରେ ଏକମାତ୍ର ପୂର୍ଣ୍ଣବ୍ରହ୍ମ ଅବଶିଷ୍ଟ ରହେ। ସେହି ସନାତନ, ଧନ୍ୟ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 12

उस पूर्णब्रह्मसे ही वायुका आविर्भाव हुआ है और उसीमें वह चेष्टा करता है। उसीसे अग्नि और सोमकी उत्पत्ति हुई है तथा उसीमें यह प्राण विस्तृत हुआ है ।। सर्वमेव ततो विद्यात्‌ तत्‌ तद्‌ वक्तुं न शक्‍नुम: । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,कहाँतक गिनावें, हम अलग-अलग वस्तुओंका नाम बतानेमें असमर्थ हैं। तुम इतना ही समझो कि सब कुछ उस परमात्मासे ही प्रकट हुआ है। उस सनातन भगवानका योगीलोग साक्षात्कार करते हैं

ସେହି ପୂର୍ଣ୍ଣବ୍ରହ୍ମରୁ ହିଁ ବାୟୁର ଆବିର୍ଭାବ ହୋଇଛି, ଏବଂ ସେହିଠାରେ ହିଁ ସେ ଚେଷ୍ଟା କରେ। ସେହି ମୂଳରୁ ଅଗ୍ନି ଓ ସୋମ ଉତ୍ପନ୍ନ, ଏବଂ ସେହିଠାରେ ହିଁ ପ୍ରାଣ ସମସ୍ତ ଜୀବରେ ବିସ୍ତୃତ। ତେଣୁ ଜାଣ—ସବୁ କିଛି ସେହିଠାରୁ; ପ୍ରତ୍ୟେକ ବସ୍ତୁର ନାମ ଧରି ଗଣନା କରି କହିବାକୁ ଆମେ ଅସମର୍ଥ। ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ସାକ୍ଷାତ୍ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 13

अपानं गिरति प्राण: प्राणं गिरति चन्द्रमा: । आदित्यो गिरते चन्द्रमादित्यं गिरते पर: । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,अपानको प्राण अपनेमें विलीन कर लेता है, प्राणको चन्द्रमा, चन्द्रमाको सूर्य और सूर्यको परमात्मा अपनेमें विलीन कर लेता है; उस सनातन परमेश्वरका योगीलोग साक्षात्कार करते हैं

ଅପାନ ପ୍ରାଣରେ ଲୟ ପାଏ; ପ୍ରାଣ ଚନ୍ଦ୍ରରେ ଲୟ ପାଏ; ଚନ୍ଦ୍ର ଆଦିତ୍ୟରେ ଲୟ ପାଏ; ଆଦିତ୍ୟ ପରମରେ ଲୟ ପାଏ। ସେହି ସନାତନ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ସାକ୍ଷାତ୍ କରନ୍ତି।

Verse 14

एकं पाद॑ं नोत्क्षिपति सलिलाद्धंस उच्चरन्‌ । त॑ं चेत्‌ संततमूर्थ्वाय न मृत्युर्नामृतं भवेत्‌ । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,इस संसार-सलिलसे ऊपर उठा हुआ हंसरूप परमात्मा अपने एक पाद (जगत्‌)-को ऊपर नहीं उठा रहा है; यदि उसे भी वह ऊपर उठा ले तो सबका बन्ध और मोक्ष सदाके लिये मिट जाय। उस सनातन परमेश्वरका योगीजन साक्षात्कार करते हैं

ସଂସାର-ସଲିଳ ଉପରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ହଂସରୂପ ପରମାତ୍ମା ନିଜର ଏକ ପାଦ (ଜଗତ୍) କୁ ଜଳରୁ ଉପରକୁ ଉଠାନ୍ତି ନାହିଁ। ଯଦି ସେ ସେହି ପାଦକୁ ମଧ୍ୟ ସଦାକାଳ ପାଇଁ ଉର୍ଦ୍ଧ୍ୱକୁ ଉଠାଇ ଦେଇଥାନ୍ତେ, ତେବେ ନ ମୃତ୍ୟୁ ରହିଥାନ୍ତା, ନ ଅମୃତତ୍ୱ। ସେହି ସନାତନ ପରମେଶ୍ୱରଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ସାକ୍ଷାତ୍ କରନ୍ତି।

Verse 15

अड्गुष्ठमात्र: पुरुषो$न्तरात्मा लिड्रस्य योगेन स याति नित्यम्‌ | तमीशमीड्यमनुकल्पमाद्यं पश्यन्ति मूढा न विराजमानम्‌ | योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,हृदयदेशमें स्थित वह अंगुष्ठमात्र जीवात्मा सूक्ष्म (वहीं अन्तर्यामीरूपसे स्थित) शरीरके सम्बन्धसे सदा जन्म-मरणको प्राप्त होता है। उस सबके शासक, स्तुतिके योग्य, सर्वसमर्थ, सबके आदिकारण एवं सर्वत्र विराज-मान परमात्माको मूढ़ जीव नहीं देख पाते; किंतु योगीजन उस सनातन परमेश्वरका साक्षात्कार करते हैं

ଦେହର ଭିତରେ ହୃଦୟଦେଶରେ ଅଙ୍ଗୁଷ୍ଠମାତ୍ର ଅନ୍ତରାତ୍ମା, ସୂକ୍ଷ୍ମଦେହ (ଲିଙ୍ଗଶରୀର) ସହ ସଂଯୋଗରେ ନିତ୍ୟ ଜନ୍ମ–ମୃତ୍ୟୁର ପରିଭ୍ରମଣ କରେ। କିନ୍ତୁ ସର୍ବଶାସକ, ସ୍ତୁତ୍ୟ, ସର୍ବସମର୍ଥ, ଆଦିକାରଣ ଏବଂ ସ୍ୱପ୍ରଭାରେ ସର୍ବତ୍ର ବିରାଜମାନ ପରମେଶ୍ୱରଙ୍କୁ ମୋହଗ୍ରସ୍ତ ଜୀବ ଦେଖିପାରେନାହିଁ; ଯୋଗୀଜନ ତେବେ ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 16

असाधना वापि ससाधना वा समानमेतद्‌ दृश्यते मानुषेषु । समानमेतदमृतस्येतरस्य मुक्तास्तत्र मध्व उत्सं समापु: । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,कोई साधनसम्पन्न हों या साधनहीन, वह ब्रह्म सब मनुष्योंमें समानरूपसे देखा जाता है। वह (अपनी ओरसे) बद्ध और मुक्त दोनोंके ही लिये समान है। अन्तर इतना ही है कि इन दोनोंमेंसे जो मुक्त पुरुष हैं, वे ही आनन्दके मूलस्रोत परमात्माको प्राप्त होते हैं (दूसरे नहीं) उसी सनातन भगवान्‌का योगीलोग साक्षात्कार करते हैं

କେହି ସାଧନାହୀନ ହେଉ କି ସାଧନାସମ୍ପନ୍ନ—ସେହି ପରମତତ୍ତ୍ୱ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସମାନଭାବେ ଏକରୂପ ଦେଖାଯାଏ। ନିଜ ପକ୍ଷରୁ ସେ ବଦ୍ଧ ଓ ମୁକ୍ତ—ଦୁହିଁଙ୍କ ପାଇଁ ସମାନ; ଭେଦ ଏତିକି ଯେ ମୁକ୍ତ ପୁରୁଷମାନେ ମାତ୍ର ଆନନ୍ଦର ମୂଳସ୍ରୋତ, ଅମୃତସ୍ୱରୂପ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି। ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀଜନ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 17

उभौ लोकौ विद्यया व्याप्य याति तदा हुतं चाहुतमग्निहोत्रम्‌ । मा ते ब्राह्मी लघुतामादधीत प्रज्ञानं स्यान्नाम धीरा लभन्ते | योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,ज्ञानी पुरुष ब्रह्मविद्याके द्वारा इस लोक और परलोक दोनोंके तत्त्वको जानकर ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। उस समय उसके द्वारा यदि अग्निहोत्र आदि कर्म न भी हुए हों तो भी वे पूर्ण हुए समझे जाते हैं। राजन! यह ब्रह्मविद्या तुममें लघुता न आने दे तथा इसके द्वारा तुम्हें वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो, जिसे धीर पुरुष ही प्राप्त करते हैं। उसी ब्रह्मविद्याके द्वारा योगीलोग उस सनातन परमात्माका साक्षात्कार करते हैं

ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ଜ୍ଞାନୀ ପୁରୁଷ ଇହଲୋକ ଓ ପରଲୋକ—ଦୁହିଁକୁ ବ୍ୟାପି (ତାହାର ତତ୍ତ୍ୱ ଜାଣି) ପରମଭାବକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ। ତେବେ ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର ଆଦି କର୍ମ ହୋଇଥାଉ କି ନ ହୋଇଥାଉ—ସବୁ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲା ବୋଲି ଧରାଯାଏ। ରାଜନ୍! ଏହି ବ୍ରାହ୍ମୀ ବିଦ୍ୟାକୁ ତୁଚ୍ଛ ଭାବିବେନି; ଏହା ଦ୍ୱାରା ଧୀର ପୁରୁଷମାନେ ଯେ ପ୍ରଜ୍ଞା ପାଆନ୍ତି, ସେହି ପ୍ରଜ୍ଞା ଆପଣଙ୍କୁ ଲଭ୍ୟ ହେଉ। ଏହି ବ୍ରହ୍ମଜ୍ଞାନ ଦ୍ୱାରା ଯୋଗୀଜନ ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 18

एवंरूपो महात्मा स पावकं पुरुषो गिरन्‌ । यो वैत॑ पुरुष वेद तस्येहार्थो न रिष्यते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,जो ऐसा महात्मा पुरुष है, वह भोक्ताभावको अपनेमें विलीन करके उस पूर्ण परमेश्वरको जान लेता है। इस लोकमें उसका प्रयोजन नष्ट नहीं होता [अर्थात्‌ वह कृतकृत्य हो जाता है|| उस सनातन परमात्माका योगीलोग साक्षात्कार करते हैं

ଏପରି ମହାତ୍ମା ପୁରୁଷ, ଭୋଗରୂପ ଅଗ୍ନିକୁ ନିଜ ମଧ୍ୟରେ ଗିଳିନେଲା ପରି କରି, ସେହି ପରମ ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଜାଣିନେଇଥାଏ। ଯେ ସେହି ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଯଥାର୍ଥ ଜାଣେ, ତାହାର ଏହି ଲୋକରେ ପ୍ରୟୋଜନ ନଷ୍ଟ ହୁଏନାହିଁ—ସେ କୃତକୃତ୍ୟ ହୁଏ। ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀଜନ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 19

यः सहस््र॑ं सहस्राणां पक्षान्‌ संतत्य सम्पतेत्‌ । मध्यमे मध्य आगच्छेदपि चेत्‌ स्यान्मनोजव: । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,कोई मनके समान वेगवाला ही क्‍यों न हो और दस लाख भी पंख लगाकर क्यों न उड़े, अन्तमें उसे हृदयस्थित परमात्मामें ही आना पड़ेगा। उस सनातन परमात्माका योगीजन साक्षात्कार करते हैं

କେହି ମନର ସମାନ ବେଗବାନ ହେଉ, ହଜାରେ-ହଜାରେ ପକ୍ଷ ଲଗାଇ ଉଡ଼ିଯାଉ—ତଥାପି ଶେଷରେ ସେ ‘ମଧ୍ୟର ମଧ୍ୟ’କୁ, ହୃଦୟରେ ବସିଥିବା ପ୍ରଭୁଙ୍କ ପାଖକୁ ଫେରିଆସିବାକୁ ପଡ଼େ। ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀଜନ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 20

न दर्शने तिष्ठति रूपमस्य पश्यन्ति चैनं सुविशुद्धसत्त्वा: । हितो मनीषी मनसा न तप्यते ये प्रत्रजेयुरमृतास्ते भवन्ति । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,इस परमात्माका स्वरूप सबके प्रत्यक्ष नहीं होता; जिनका अन्त:ःकरण विशुद्ध है, वे ही इसे देख पाते हैं। जो सबके हितैषी और मनको वशगमें करनेवाले हैं तथा जिनके मनमें कभी दुःख नहीं होता एवं जो संसारके सब सम्बन्धोंका सर्वथा त्याग कर देते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं। उस सनातन परमात्माका योगीलोग साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହନ୍ତି—ପରମାତ୍ମାଙ୍କର ସତ୍ୟ ସ୍ୱରୂପ ସାଧାରଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ପ୍ରକାଶିତ ହୁଏ ନାହିଁ। ଯାହାଙ୍କର ଅନ୍ତଃକରଣ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶୁଦ୍ଧ, ସେମାନେ ମାତ୍ର ତାଙ୍କୁ ଦେଖିପାରନ୍ତି। ସର୍ବହିତେଷୀ, ମନୋନିୟନ୍ତ୍ରୀ ଜ୍ଞାନୀ ଅନ୍ତର୍ଦୁଃଖରେ ଦଗ୍ଧ ହୁଏ ନାହିଁ; ଏବଂ ଯେମାନେ ସଂସାର-ସମ୍ବନ୍ଧ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି, ସେମାନେ ଅମୃତତ୍ୱ ପାଆନ୍ତି। ସେଇ ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ସାକ୍ଷାତ୍କାର କରନ୍ତି।

Verse 21

गूहन्ति सर्पा इव गद्धराणि स्वशिक्षया स्वेन वृत्तेन मर्त्या: । तेषु प्रमुहान्ति जना विमूढा यथाध्वानं मोहयन्ते भयाय । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,जैसे साँप बिलोंका आश्रय ले अपनेको छिपाये रहते हैं, उसी प्रकार दम्भी मनुष्य अपनी शिक्षा और व्यवहारकी आड़में अपने दोषोंको छिपाये रखते हैं। जैसे ठग रास्ता चलनेवालोंको भयमें डालनेके लिये दूसरा रास्ता बतलाकर मोहित कर देते हैं, मूर्ख मनुष्य उनपर विश्वास करके अत्यन्त मोहमें पड़ जाते हैं; इसी प्रकार जो परमात्माके मार्ममें चलनेवाले हैं, उन्हें भी दम्भी पुरुष भयमें डालनेके लिये मोहित करनेकी चेष्टा करते हैं, किंतु योगीजन भगवत्कृपासे उनके फंदेमें न आकर उस सनातन परमात्माका ही साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଯେପରି ସର୍ପମାନେ ଗୁହା/ବିଲରେ ଲୁଚି ରହନ୍ତି, ସେପରି ଦମ୍ଭୀ ମର୍ତ୍ୟମାନେ ନିଜ ଶିକ୍ଷା ଓ ବାହ୍ୟ ଆଚରଣର ଆଡ଼ରେ ଦୋଷ ଲୁଚାନ୍ତି। ମୂଢ ଲୋକେ ସେମାନଙ୍କ ଉପରେ ଭରସା କରି ମୋହିତ ହୁଅନ୍ତି; ଯେପରି ପଥଲୁଟେରା ଭୟ ଦେବା ପାଇଁ ଭୁଲ ରାସ୍ତା ଦେଖାଇ ଯାତ୍ରୀଙ୍କୁ ଭ୍ରମିତ କରେ। ଏହିପରି ଢୋଙ୍ଗୀମାନେ ପରମାତ୍ମପଥରେ ଚାଲୁଥିବାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଭୟଭୀତ କରି ମୋହିତ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ସତ୍ୟ ଯୋଗୀମାନେ ସେହି ଫାନ୍ଦରେ ନ ପଡ଼ି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ହିଁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।

Verse 22

नाहं सदासत्कृत:ः स्यां न मृत्यु- न चामृत्युरमृतं मे कुतः स्यात्‌ । सत्यानृते सत्यसमानबन्धे सतश्नष योनिरसतश्नैक एव । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,राजन! मैं कभी किसीके असत्कारका पात्र नहीं होता। न मेरी मृत्यु होती है न जन्म, फिर मोक्ष किसका और कैसे हो [क्योंकि मैं नित्यमुक्त ब्रह्म हूँ]। सत्य और असत्य सब कुछ मुझ सनातन समत्रह्ममें स्थित हैं। एकमात्र मैं ही सत्‌ और असतूकी उत्पत्तिका स्थान हूँ। मेरे स्वरूपभूत उस सनातन परमात्माका योगीजन साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହନ୍ତି—ରାଜନ୍! ମୁଁ କେବେ ସତ୍କାର କିମ୍ବା ଅସତ୍କାରର ଅଧୀନ ନୁହେଁ। ମୋ ପାଇଁ ନ ମୃତ୍ୟୁ ଅଛି, ନ ଜନ୍ମ; ତେଣୁ ‘ମୋକ୍ଷ’ ମୋର କିପରି, ଏବଂ କାହାଠାରୁ? ସତ୍ୟ ଓ ଅସତ୍ୟ—ମାନୋ ସମାନ ବନ୍ଧନରେ ବନ୍ଧା—ଏହି ସନାତନ ବ୍ରହ୍ମ ମୋ ମଧ୍ୟରେ ଅବସ୍ଥିତ। ସତ୍ ଓ ଅସତ୍—ଦୁହିଁର ଏକମାତ୍ର ଯୋନି ମୁଁ ହିଁ। ସେଇ ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ସାକ୍ଷାତ୍କାର କରନ୍ତି।

Verse 23

न साधुना नोत असाधुना वा- समानमेतद्‌ दृश्यते मानुषेषु । समानमेतदमृतस्य विद्या- देवंयुक्तो मधु तद्‌ वै परीप्सेत्‌ । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,परमात्माका न तो साधुकर्मसे सम्बन्ध है और न असाधुकर्मसे। यह विषमता तो देहाभिमानी मनुष्योंमें ही देखी जाती है। ब्रह्मका स्वरूप सर्वत्र समान ही समझना चाहिये। इस प्रकार ज्ञानयोगसे युक्त होकर आनन्दमय ब्रह्मको ही पानेकी इच्छा करनी चाहिये। उस सनातन परमात्माका योगीलोग साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ପରମାତ୍ମାଙ୍କର ନ ସାଧୁକର୍ମ ସହ ସମ୍ବନ୍ଧ ଅଛି, ନ ଅସାଧୁକର୍ମ ସହ। ଏହି ଭେଦ ଦେହାଭିମାନୀ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମାତ୍ର ଦେଖାଯାଏ। ଅମୃତ ବ୍ରହ୍ମର ସ୍ୱରୂପ ସର୍ବତ୍ର ସମାନ—ଏହା ଜାଣ। ତେଣୁ ଜ୍ଞାନ-ଯୋଗରେ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ସେଇ ଆନନ୍ଦମୟ ବ୍ରହ୍ମକୁ ହିଁ ପାଇବାକୁ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ। ସେଇ ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ସାକ୍ଷାତ୍କାର କରନ୍ତି।

Verse 24

नास्यातिवादा हृदयं तापयन्ति नानधीत॑ नाहुतमग्निहोत्रम्‌ । मनो ब्राह्मी लघुतामादधीत प्रज्ञां चास्मै नाम धीरा लभन्ते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्‌,इस ब्रह्मवेत्ता पुरुषके हृदयको निन्दाके वाक्य संतप्त नहीं करते। “मैंने स्वाध्याय नहीं किया, अग्निहोत्र नहीं किया” इत्यादि बातें भी उसके मनमें तुच्छ भाव नहीं उत्पन्न करतीं। ब्रह्मविद्या शीघ्र ही उसे वह स्थिरबुद्धि प्रदान करती है, जिसे धीर पुरुष ही प्राप्त करते हैं। उस सनातन परमात्माका योगीजन साक्षात्कार करते हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ବ୍ରହ୍ମବେତ୍ତାର ହୃଦୟକୁ କଟୁବାକ୍ୟ ଓ ଅତିନିନ୍ଦା ଦଗ୍ଧ କରେ ନାହିଁ। “ମୁଁ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ କରିନାହିଁ, ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର କରିନାହିଁ”—ଏପରି ଭାବନାମାନେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ମନରେ ହୀନତା ଜଗାଏ ନାହିଁ। ବ୍ରହ୍ମମୁଖୀ ମନ ତୁଚ୍ଛତାକୁ ତ୍ୟାଗ କରେ, ଏବଂ ସେ ସେଇ ସ୍ଥିର ପ୍ରଜ୍ଞାକୁ ପାଏ ଯାହା ଧୀର ପୁରୁଷମାନେ ମାତ୍ର ପାଆନ୍ତି। ସେଇ ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଯୋଗୀମାନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ସାକ୍ଷାତ୍କାର କରନ୍ତି।

Verse 25

एवं य: सर्वभूतेषु आत्मानमनुपश्यति । अन्यत्रान्यत्र युक्तेषु किं स शोचेत्‌ तत: परम्‌

ଏହିପରି ଯେ ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଆତ୍ମାକୁ ଦେଖେ—ଯଦିଓ ସେମାନେ ଭିନ୍ନଭିନ୍ନ ଅବସ୍ଥା ଓ ଆସକ୍ତିରେ ଯୁକ୍ତ ଦିଶନ୍ତି—ସେ ପରେ କାହିଁକି ଶୋକ କରିବ?

Verse 26

इस प्रकार जो समस्त भूतोंमें परमात्माको निरन्तर देखता है, वह ऐसी दृष्टि प्राप्त होनेके अनन्तर अन्यान्य विषयभोगोंमें आसक्त मनुष्योंके लिये क्या शोक करे? ।। यथोदपाने महति सर्वतः सम्प्लुतोदके । एवं सर्वेषु वेदेषु आत्मानमनुजानत:

ଏହିପରି ଯେ ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପରମାତ୍ମାକୁ ନିରନ୍ତର ଦେଖେ, ଏମିତି ଦୃଷ୍ଟି ପାଇଲା ପରେ ବିଷୟଭୋଗରେ ଆସକ୍ତ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସେ କାହିଁକି ଶୋକ କରିବ? ଯେପରି ସବୁଦିଗରେ ଜଳରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ମହାଜଳରାଶି ମିଳିଲେ ଛୋଟ କୂଆର ମୂଲ୍ୟ ରହେ ନାହିଁ, ସେପରି ଆତ୍ମାକୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣିଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି ପାଇଁ ସମସ୍ତ ବେଦର ଉପଦେଶ ଏକ ପ୍ରକାରେ ଅନ୍ତର୍ଭୁକ୍ତ ଓ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଯାଏ।

Verse 27

जैसे सब ओर जलसे परिपूर्ण बड़े जलाशयके प्राप्त होनेपर जलके लिये अन्यत्र जानेकी आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार आत्मज्ञानीके लिये सम्पूर्ण वेदोंमें कुछ भी प्राप्त करनेयोग्य शेष नहीं रह जाता ।। अड्गुष्ठमात्र: पुरुषो महात्मा न दृश्यते सौहृदि संनिविष्ट: । अजक्षरो दिवारात्रमतन्।द्रितश्न सतं मत्वा कविरास्ते प्रसन्न:,यह अंगुष्ठमात्र अन्तर्यामी परमात्मा सबके हृदयके भीतर स्थित है, किंतु सबको दिखायी नहीं देता। वह अजन्मा, चराचरस्वरूप और दिन-रात सावधान रहनेवाला है। जो उसे जान लेता है, वह ज्ञानी परमानन्दमें निमग्न हो जाता है

ଯେପରି ସବୁଦିଗରେ ଜଳରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ମହାଜଳାଶୟ ମିଳିଲେ ଜଳ ପାଇଁ ଅନ୍ୟତ୍ର ଯିବାର ଆବଶ୍ୟକତା ରହେ ନାହିଁ, ସେପରି ଆତ୍ମଜ୍ଞାନୀ ପାଇଁ ସମସ୍ତ ବେଦରେ କିଛି ମଧ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ୟ ଶେଷ ରହେ ନାହିଁ। ଅଙ୍ଗୁଷ୍ଠମାତ୍ର ଏହି ମହାତ୍ମ ପୁରୁଷ ସମସ୍ତଙ୍କ ହୃଦୟରେ ଅନ୍ତର୍ୟାମୀ ଭାବେ ଅବସ୍ଥିତ, କିନ୍ତୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଦିଶେ ନାହିଁ। ସେ ଅଜ, ଅକ୍ଷର, ଦିନ-ରାତି ଅତନ୍ଦ୍ର; ତାଙ୍କୁ ସତ୍ୟ ଭାବେ ଜାଣିଥିବା କବି-ଜ୍ଞାନୀ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ପରମାନନ୍ଦରେ ଅବସ୍ଥିତ ରହେ।

Verse 28

अहमेव स्मृतो माता पिता पुत्रो5स्म्यहं पुन: । आत्माहमपि सर्वस्य यच्च नास्ति यदस्ति च,धृतराष्ट्र! मैं ही सबकी माता और पिता माना गया हूँ, मैं ही पुत्र हूँ और सबका आत्मा भी मैं ही हूँ। जो है, वह भी और जो नहीं है, वह भी मैं ही हूँ

ମୁଁ ହିଁ ମାତା ଓ ପିତା ଭାବେ ସ୍ମରଣୀୟ; ପୁନଃ ମୁଁ ହିଁ ପୁତ୍ର। ମୁଁ ହିଁ ସମସ୍ତଙ୍କ ଆତ୍ମା; ହେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ଯାହା ଅଛି ଓ ଯାହା ନାହିଁ—ଉଭୟ ମଧ୍ୟ ମୋ ମଧ୍ୟରେ ଅନ୍ତର୍ଭୁକ୍ତ।

Verse 29

पितामहो5स्मि स्थविर: पिता पुत्रश्न भारत । ममैव यूयामात्मस्था न मे यूयं न वो वयम्‌,भारत! मैं ही तुम्हारा बूढ़ा पितामह, पिता और पुत्र भी हूँ। तुम सब लोग मेरी ही आत्मामें स्थित हो, फिर भी (वास्तवमें) न तुम हमारे हो और न हम तुम्हारे हैं

ହେ ଭାରତ! ମୁଁ ହିଁ ତୁମର ବୃଦ୍ଧ ପିତାମହ, ପିତା ଓ ପୁତ୍ର ମଧ୍ୟ। ତୁମେ ସମସ୍ତେ ମୋ ଆତ୍ମାରେ ହିଁ ଅବସ୍ଥିତ; ତଥାପି ପରମ ସତ୍ୟରେ ନ ତୁମେ ‘ମୋର’, ନ ମୁଁ ‘ତୁମର’।

Verse 30

आत्मैव स्थानं मम जन्म चात्मा ओतप्रोतो5हमजरप्रतिष्ठ: । अजकश्षरो दिवारात्रमतन्द्रितो 5हं मां विज्ञाय कविरास्ते प्रसन्न:,आत्मा ही मेरा स्थान है और आत्मा ही मेरा जन्म (उद्गम) है। मैं सबमें ओतप्रोत और अपनी अजर ([नित्य-नूतन) महिमामें स्थित हूँ। मैं अजन्मा, चराचर-स्वरूप तथा दिन-रात सावधान रहनेवाला हूँ। मुझे जानकर ज्ञानी पुरुष परम प्रसन्न हो जाता है

ଆତ୍ମା ହିଁ ମୋର ଆଶ୍ରୟ, ଆତ୍ମା ହିଁ ମୋର ଜନ୍ମର ମୂଳ। ମୁଁ ସମସ୍ତ ଭୂତରେ ଓତପ୍ରୋତ ଭାବେ ବ୍ୟାପ୍ତ, ତଥାପି ଅଜର, ନିତ୍ୟ-ନୂତନ ମହିମାରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ମୁଁ ଅଜ, ଚରାଚର-ସ୍ୱରୂପ, ଦିବା-ରାତ୍ରି ଅତନ୍ଦ୍ରିତ। ମୋତେ ଏଭଳି ଜାଣି ଜ୍ଞାନୀ ଦ୍ରଷ୍ଟା ପରମ ପ୍ରସନ୍ନତାରେ ଅବସ୍ଥିତ ହୁଏ।

Verse 31

अणोरणीयान्‌ सुमना: सर्वभूतेषु जाग्रति । पितरं सर्वभूतेषु पुष्करे निहितं विदु:,परमात्मा सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा विशुद्ध मनवाला है। वही सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रकाशित है। सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयकमलमें स्थित उस परमपिताको ज्ञानी पुरुष ही जानते हैं

ପରମାତ୍ମା ଅଣୁଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଣୁ—ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ, ଏବଂ ଶୁଦ୍ଧ ମନସ୍ବୀ। ସେ ସମସ୍ତ ଭୂତରେ ଅନ୍ତର୍ୟାମୀ ରୂପେ ଜାଗ୍ରତ। ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ହୃଦୟ-ପଦ୍ମରେ ନିହିତ ସେଇ ପରମପିତାଙ୍କୁ ଜ୍ଞାନୀମାନେ ହିଁ ଜାଣନ୍ତି।

Verse 46

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि षट्चत्वारिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्युजातपर्वमें छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ସନତ୍ସୁଜାତପର୍ବର ଛୟାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 131

तस्माद्‌ वै वायुरायातस्तस्मिंश्व॒ प्रयतः सदा । तस्मादन्निश्व सोमश्न तस्मिंक्ष॒ प्राण आतत:ः

ତାହାଠାରୁ ନିଶ୍ଚୟ ବାୟୁ ଉଦ୍ଭବିତ; ତାହାରେ ହିଁ ସେ ସଦା ସଂଯତ ହୋଇ ଅବସ୍ଥିତ। ତାହାଠାରୁ ଅଗ୍ନି ଓ ସୋମ ମଧ୍ୟ ଉତ୍ପନ୍ନ; ଏବଂ ତାହାରେ ହିଁ ପ୍ରାଣ ବିସ୍ତୃତ ଓ ଆଧାରିତ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether one relies on sensory certainty and fear-conditioned inference, or cultivates inner knowledge (mind-heart discernment) that dissolves fear and stabilizes ethical decision-making.

The refrain indicates that the ultimate principle is not an object of ordinary perception; it is realized through purified consciousness, and that realization is presented as the basis for fearlessness and continuity beyond death.

Yes in functional form: the chapter repeatedly links correct knowing to amṛtatva—those who know or take refuge in that principle are described as becoming ‘amṛta’ (not bound by mortality), framing comprehension as soteriologically consequential.