Sanatsujāta on the Imperceptible Eternal Light (यत्तच्छुक्रं महज्ज्योतिः)
उभौ लोकौ विद्यया व्याप्य याति तदा हुतं चाहुतमग्निहोत्रम् । मा ते ब्राह्मी लघुतामादधीत प्रज्ञानं स्यान्नाम धीरा लभन्ते | योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्,ज्ञानी पुरुष ब्रह्मविद्याके द्वारा इस लोक और परलोक दोनोंके तत्त्वको जानकर ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। उस समय उसके द्वारा यदि अग्निहोत्र आदि कर्म न भी हुए हों तो भी वे पूर्ण हुए समझे जाते हैं। राजन! यह ब्रह्मविद्या तुममें लघुता न आने दे तथा इसके द्वारा तुम्हें वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो, जिसे धीर पुरुष ही प्राप्त करते हैं। उसी ब्रह्मविद्याके द्वारा योगीलोग उस सनातन परमात्माका साक्षात्कार करते हैं
ubhāv lokau vidyayā vyāpya yāti tadā hutaṃ cāhutam agnihotram | mā te brāhmī laghutām ādadhīta prajñānaṃ syān nāma dhīrā labhante || yoginas taṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam |
ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ଜ୍ଞାନୀ ପୁରୁଷ ଇହଲୋକ ଓ ପରଲୋକ—ଦୁହିଁକୁ ବ୍ୟାପି (ତାହାର ତତ୍ତ୍ୱ ଜାଣି) ପରମଭାବକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ। ତେବେ ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର ଆଦି କର୍ମ ହୋଇଥାଉ କି ନ ହୋଇଥାଉ—ସବୁ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲା ବୋଲି ଧରାଯାଏ। ରାଜନ୍! ଏହି ବ୍ରାହ୍ମୀ ବିଦ୍ୟାକୁ ତୁଚ୍ଛ ଭାବିବେନି; ଏହା ଦ୍ୱାରା ଧୀର ପୁରୁଷମାନେ ଯେ ପ୍ରଜ୍ଞା ପାଆନ୍ତି, ସେହି ପ୍ରଜ୍ଞା ଆପଣଙ୍କୁ ଲଭ୍ୟ ହେଉ। ଏହି ବ୍ରହ୍ମଜ୍ଞାନ ଦ୍ୱାରା ଯୋଗୀଜନ ସେହି ସନାତନ ଭଗବାନଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତି।
सनत्सुजात उवाच