Adhyaya 33
Udyoga ParvaAdhyaya 3386 Verses

Adhyaya 33

उद्योगपर्व — अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर संवादः (विदुरनीतिः)

Upa-parva: Vidura-Nīti (Counsel to Dhṛtarāṣṭra) — Udyoga Parva Context

Vaiśaṃpāyana narrates Dhṛtarāṣṭra’s summons of Vidura through the palace doorkeeper, establishing court procedure and Dhṛtarāṣṭra’s readiness to receive counsel. Dhṛtarāṣṭra reports that Saṃjaya has returned after reproaching him and will speak in the assembly the next day; uncertainty about that speech produces insomnia and somatic agitation. Vidura begins with diagnostic counsel, asking whether the king is afflicted by major moral faults (e.g., coveting others’ wealth), then proceeds into an extended niti catalogue. The chapter defines the paṇḍita through behavioral markers: discernment, restraint from anger and pride, confidentiality, steadiness under heat/cold, fear/pleasure, prosperity/adversity, and prioritization of dharma and artha over kāma. In contrast, it profiles the mūḍha through impulsive speech, misplaced alliances, procrastination, and envy. Vidura enumerates governance hazards (vices, leaks of counsel, mismanagement of resources), prescribes durable virtues (truth, generosity, non-sloth, non-envy, forbearance, firmness), and frames leadership as measured discipline combined with compassion. The discourse culminates in a direct political-ethical recommendation: Dhṛtarāṣṭra should provide the Pāṇḍavas their due share of sovereignty, aligning state stability with justice and kinship responsibility.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र अनिष्ट की आशंका से व्याकुल होकर विदुर को बुलाते हैं और कहते हैं—‘कवे-तने! अजातशत्रु युधिष्ठिर के हित में जो पथ्य और श्रेयस्कर हो, वही मुझे यथावत् समझाओ।’ → विदुर ‘अपृष्ट’ होकर भी हितवचन कहने के धर्म का उद्घोष करते हैं—प्रिय-अप्रिय, शुभ-अशुभ से परे जाकर वही बोलना चाहिए जिससे श्रोता का पराभव न हो। फिर वे राजधर्म, इन्द्रिय-निग्रह, दण्ड-नीति, और वाणी की मर्यादा का क्रमशः प्रतिपादन करते हैं, यह दिखाते हुए कि काम-क्रोध जैसे दो ‘महामत्स्य’ बुद्धि को जाल में फँसी मछलियों की तरह लूट लेते हैं। → विदुर का निर्णायक उपदेश: युधिष्ठिर ही राजलक्षणों से सम्पन्न, त्रैलोक्य-राज्य के योग्य, और धृतराष्ट्र का आज्ञाकारी शिष्य-सदृश है; वह करुणा और अनृशंस्य से प्रेरित होकर धृतराष्ट्र के कारण अनेक क्लेश सह रहा है—अतः उसी के साथ न्याय करना ही राज्य और कुल का श्रेय है। → अध्याय का अंत विदुर के नीति-वचन को एक स्पष्ट दिशा देता है—राजा को धैर्यवान, परीक्ष्य-कारी, इन्द्रियजयी, और सुभाषित-वाणी वाला बनकर निर्णय करना चाहिए; अन्यथा दुर्भाषित और विकार राज्य को अनर्थ में ले जाते हैं। → विदुरनीति का प्रवाह यहीं से आरम्भ होकर आगे के अध्यायों में और तीक्ष्ण होकर धृतराष्ट्र के मोह, दुर्योधन की हठ, तथा राज्य-धर्म के निर्णायक प्रश्नों की ओर बढ़ता है।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल १२९ “लोक हैं।] हि. 770 8 2 बक। न मा * इस ३३ वें अध्यायसे प्रारम्भ होकर ४० वें अध्यायतक “विदुरनीति' है। > यहाँ 'उपास्ते” के स्थानपर “उपासते” यह प्रयोग आर्ष समझना चाहिये। - मुहूर्त शब्दका अर्थ दो घड़ी होता है। एक घड़ी २४ मिनटकी मानी जाती है। चतुस्त्रिं5 ध्याय: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन धृतराष्ट उवाच जाग्रतो दहयमानस्य यत्‌ कार्यमनुपश्यसि । तद्‌ ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो हासि,धृतराष्ट्र बोले--तात! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जाग रहा हूँ; तुम मेरे करनेयोग्य जो कार्य समझो, उसे बताओ; क्योंकि हमलोगोंमें तुम्हीं धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण हो

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ତାତ! ଚିନ୍ତାରେ ଦହିଯାଇ ମୁଁ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଜାଗି ରହିଛି। କରିବାଯୋଗ୍ୟ କାର୍ଯ୍ୟ କ’ଣ ବୋଲି ତୁମେ ଭାବୁଛ, ସେଥି କହ; କାରଣ ଆମମଧ୍ୟରେ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ଜ୍ଞାନରେ ତୁମେ ହିଁ ନିପୁଣ।

Verse 2

त्वं मां यथावद्‌ विदुर प्रशाधि प्रज्ञापूर्व सर्वमजातशत्रो: | यन्मन्यसे पथ्यमदीनसत्त्व श्रेयस्करं ब्रूहि तद्‌ वै कुरूणाम्‌,उदारचित्त विदुर! तुम अपनी बुद्धिसे विचारकर मुझे ठीक-ठीक उपदेश करो। जो बात युधिष्ठिरके लिये हितकर और कौरवोंके लिये कल्याणकारी समझो, वह सब अवश्य बताओ

ଉଦାରଚିତ୍ତ ବିଦୁର! ତୁମ ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ବିଚାର କରି ମୋତେ ଯଥାଯଥ ଉପଦେଶ ଦିଅ। ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଇଁ ଯାହା ହିତକର ଏବଂ କୁରୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯାହା ଶ୍ରେୟସ୍କର ବୋଲି ତୁମେ ଭାବ, ସେ ସବୁ କହ।

Verse 3

पापाशड्की पापमेवानुपश्यन्‌ पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम्‌ । कवे तने ब्रूहि सर्व यथाव- न्मनीषितं सर्वमजातशत्रो:,विद्वन! मेरे मनमें अनिष्टकी आशंका बनी रहती है, इसलिये मैं सर्वत्र अनिष्ट ही देखता हूँ, अतः व्याकुल हृदयसे मैं तुमसे पूछ रहा हँ--अजातशत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं, सो सब ठीक-ठीक बताओ

ବିଦ୍ୱନ୍! ପାପର ଆଶଙ୍କା ମୋ ମନରେ ସଦା ରହେ, ତେଣୁ ମୁଁ ସବୁଠି ଅନିଷ୍ଟ ହିଁ ଦେଖୁଛି। ଏହି ବ୍ୟାକୁଳ ହୃଦୟରେ ମୁଁ ତୁମକୁ ପଚାରୁଛି—ହେ କବି, ତାତ! ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମନର ଅଭିପ୍ରାୟ ଯାହା, ସେ ସବୁ ଯଥାଯଥ କହ।

Verse 4

विदुर उवाच शुभं वा यदि वा पापं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम्‌ । अपृष्टस्तस्य तद्‌ ब्रूयाद्‌ यस्य नेच्छेत्‌ पराभवम्‌,विदुरजीने कहा--राजन्‌! मनुष्यको चाहिये कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसको बिना पूछे भी अच्छी अथवा बुरी, कल्याण करनेवाली या अनिष्ट करनेवाली--जो भी बात हो, बता दे

ବିଦୁର କହିଲେ—ରାଜନ୍! କଥା ଶୁଭ ହେଉ କି ଅଶୁଭ, ଶୁଣିବାକୁ ଅପ୍ରିୟ ହେଉ କି ପ୍ରିୟ—ଯାହାର ପରାଭବ ଆମେ ଚାହୁଁନାହିଁ, ତାକୁ ପଚାରା ନହେଲେ ମଧ୍ୟ ସେ କଥା କହିଦେବା ଉଚିତ।

Verse 5

तस्माद्‌ वक्ष्यामि ते राजन हित॑ं यत्‌ स्यात्‌ कुरून्‌ प्रति । वच: श्रेयस्करं धर्म्य ब्रुवतस्तन्निबोध मे

ଏହେତୁ, ହେ ରାଜନ୍, କୁରୁମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଯାହା ହିତକର, ସେହି କଥା ମୁଁ ତୁମକୁ କହିବି। ମୁଁ କହୁଥିବା ଶ୍ରେୟସ୍କର ଓ ଧର୍ମଯୁକ୍ତ ବଚନକୁ ମନୋଯୋଗରେ ଶୁଣ।

Verse 6

इसलिये राजन्‌! जिससे समस्त कौरवोंका हित हो, मैं वही बात आपसे कहूँगा। मैं जो कल्याणकारी एवं धर्मयुक्त वचन कह रहा हूँ, उन्हें आप ध्यान देकर सुनें ।। मिथ्योपेतानि कर्माणि सिध्येयुर्यानि भारत । अनुपायप्रयुक्तानि मा सम तेषु मन: कृथा:,भारत! असत्‌ उपायों (अन्यायपूर्वक युद्ध एवं द्यूत) आदिका प्रयोग करके जो कपटपूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं, उनमें आप मन मत लगाइये

ହେ ଭାରତ, ଯେ କର୍ମଗୁଡ଼ିକ ଛଳରେ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ଅନୁଚିତ ଉପାୟରେ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ, ସେଥିରେ ମନ ଲଗାଅ ନାହିଁ।

Verse 7

तथैव योगविहितं यत्‌ तु कर्म न सिध्यति । उपाययुक्त मेधावी न तत्र ग्लपयेन्मन:,इसी प्रकार अच्छे उपायोंका उपयोग करके सावधानीके साथ किया गया कोई कर्म यदि सफल न हो तो बुद्धिमान्‌ पुरुषको उसके लिये मनमें ग्लानि नहीं करनी चाहिये

ସେହିପରି, ଯଥୋଚିତ ଉପାୟ ନେଇ ସାବଧାନତାରେ କରାଯାଇଥିବା କାମ ସିଦ୍ଧ ନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ଲୋକ ତାହା ପାଇଁ ମନକୁ ଗ୍ଲାନିତ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।

Verse 8

अनुबन्धानपेक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु । सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत्‌,किसी प्रयोजनसे किये गये कर्मोमें पहले प्रयोजनको समझ लेना चाहिये। खूब सोच- विचारकर काम करना चाहिये, जल्दबाजीसे किसी कामका आरम्भ नहीं करना चाहिये

ଅନୁବନ୍ଧ ଥିବା କାର୍ଯ୍ୟରେ ପ୍ରଥମେ ସେହି ଅନୁବନ୍ଧ—ଅର୍ଥାତ୍ ସଂଲଗ୍ନ ପରିଣାମ—କୁ ଦେଖିବା ଉଚିତ। ଭଲଭାବେ ଭାବିଚିନ୍ତା କରି କାମ କରିବା ଉଚିତ; ତ୍ୱରାରେ କୌଣସି କାମ ଆରମ୍ଭ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।

Verse 9

अनुबन्ध॑ च सम्प्रेक्ष्य विपाकं॑ चैव कर्मणाम्‌ । उत्थानमात्मनश्वैव धीर: कुर्वीत वा न वा,धीर मनुष्यको उचित है कि पहले कर्मोंका प्रयोजन, परिणाम तथा अपनी उन्नतिका विचार करके फिर काम आरम्भ करे या न करे

ଧୀର ମନୁଷ୍ୟ ପ୍ରଥମେ କାର୍ଯ୍ୟର ଅନୁବନ୍ଧ, କର୍ମର ବିପାକ ଏବଂ ନିଜ ଉନ୍ନତିର ସାମର୍ଥ୍ୟକୁ ବିଚାର କରି, ତାପରେ କରିବେ କି ନ କରିବେ ନିଷ୍ପତ୍ତି ନେବା ଉଚିତ।

Verse 10

यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौँ तथा क्षये । कोशे जनपदे दण्डे न स राज्येडवतिषछते,जो राजा स्थिति, लाभ, हानि, खजाना, देश तथा दण्ड आदिकी मात्राको नहीं जानता, वह राज्यपर स्थिर नहीं रह सकता

ଯେ ରାଜା ସ୍ଥିତି, ବୃଦ୍ଧି ଓ କ୍ଷୟରେ; କୋଷ, ଜନପଦ ଓ ଦଣ୍ଡପ୍ରୟୋଗରେ ଯଥାଯଥ ପ୍ରମାଣ ଜାଣେ ନାହିଁ, ସେ ରାଜ୍ୟରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଅବସ୍ଥିତ ରହିପାରେ ନାହିଁ।

Verse 11

यस्त्वेतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति । युक्तो धर्मार्थयोज्ञनि स राज्यमधिगच्छति,जो इनके प्रमाणोंको उपर्युक्त प्रकारसे ठीक-ठीक जानता है तथा धर्म और अर्थके ज्ञानमें दत्तचित्त रहता है, वह राज्यको प्राप्त करता है

ଯେ ଏହି ପ୍ରମାଣଗୁଡ଼ିକୁ ଯଥୋକ୍ତ ଭାବେ ନିଖୁଟ ଭାବରେ ପରୀକ୍ଷା କରେ, ଏବଂ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ଜ୍ଞାନ-ପ୍ରୟୋଗରେ ସଦା ଯୁକ୍ତ ରହେ, ସେ ରାଜ୍ୟ ଲାଭ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ହୁଏ।

Verse 12

न राज्यं प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसाम्प्रतम्‌ । श्रियं हविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम्‌

‘ରାଜ୍ୟ ମିଳିଲା ନାହିଁ’—ଏହି ଭାବନାରେ ଅନୁଚିତ ଆଚରଣ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଅବିନୟ ଯେପରି ଶ୍ରୀକୁ ନଷ୍ଟ କରେ, ସେପରି ଜରା ଉତ୍ତମ ରୂପକୁ ନଷ୍ଟ କରେ।

Verse 13

“अब तो राज्य प्राप्त ही हो गया'--ऐसा समझ-कर अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये। उद्ण्डता सम्पत्तिको उसी प्रकार नष्ट कर देती है, जैसे सुन्दर रूपको बुढ़ापा ।। भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्न॑ मत्स्यो बडिशमायसम्‌ | लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते,जैसे मछली बढ़िया खाद्य वस्तुसे ढकी हुई लोहेकी काँटीको लोभमें पड़कर निगल जाती है, उससे होनेवाले परिणामपर विचार नहीं करती (अतएव मर जाती है)

‘ଏବେ ତ ରାଜ୍ୟ ମିଳିଗଲା’—ଏଭଳି ଭାବି ଅନୁଚିତ ଆଚରଣ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଉଦ୍ଦଣ୍ଡ ଅବିନୟ ସମ୍ପତ୍ତିକୁ ସେହିପରି ନଷ୍ଟ କରେ, ଯେପରି ଜରା ସୁନ୍ଦର ରୂପକୁ। ଯେପରି ମାଛ ଉତ୍ତମ ଆହାରରେ ଢାକା ଲୋହାର କାଁଟାକୁ ଲୋଭରେ ଗିଳି ଫଳାଫଳ ଭାବେ ନାହିଁ, ସେପରି ଲାଭଲୋଭରେ ଅନ୍ଧ ମଣିଷ ପରିଣାମ ନ ଭାବି ବିନାଶ ଦିଗକୁ ଧାଉଁଥାଏ।

Verse 14

यच्छव्यं ग्रसितु ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्‌ । हितं च परिणामे यत्‌ तदाद्यं भूतिमिच्छता,अत: अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको वही वस्तु खानी (या ग्रहण करनी) चाहिये, (जो परिणाममें अनिष्टकर न हो अर्थात) जो खानेयोग्य हो तथा खायी जा सके, खाने (या ग्रहण करने)-पर पच सके और पच जानेपर हितकारी हो

ଯେ ଭୂତି (ସମୃଦ୍ଧି) ଚାହେ, ସେ କେବଳ ସେହିଟି ଗ୍ରହଣ କରୁ—ଯାହା ପ୍ରକୃତରେ ଗ୍ରହଣଯୋଗ୍ୟ; ଯାହା ଗ୍ରସିତ ହୋଇପାରେ, ଗ୍ରହଣ ପରେ ପଚିପାରେ, ଏବଂ ପରିଣାମରେ ହିତକର ହୁଏ।

Verse 15

वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति यः । स नाप्रोति रसं तेभ्यो बीजं चास्य विनश्यति,जो पेड़से कच्चे फलोंको तोड़ता है, वह उन फलोंसे रस तो पाता नहीं, परंतु उस वृक्षके बीजका नाश हो जाता है

ଯେ ଗଛର କଚ୍ଚା ଫଳ ତୋଳେ, ସେ ସେଥିରୁ ସତ୍ୟ ରସ ପାଏ ନାହିଁ; ବରଂ ସେଇ ଗଛର ବୀଜ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ।

Verse 16

यस्तु पक्‍्वमुपादत्ते काले परिणतं फलम्‌ | फलाद्‌ रसं स लभते बीजाच्चैव फलं पुन:,परंतु जो समयपर पके हुए फलको ग्रहण करता है, वह फलसे रस पाता है और उस बीजसे पुनः फल प्राप्त करता है

କିନ୍ତୁ ଯେ ଯଥାସମୟରେ ପକ୍କ ହୋଇଥିବା ଫଳ ଗ୍ରହଣ କରେ, ସେ ଫଳରୁ ରସ ପାଏ; ଏବଂ ସେଇ ବୀଜରୁ ପୁଣି ଫଳ ମିଳେ।

Verse 17

यथा मधु समादत्ते रक्षन्‌ पुष्पाणि षट्पद:ः । तद्वदर्थान्‌ मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया,जैसे भौंरा फूलोंकी रक्षा करता हुआ ही उनके मधुका ग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजाजनोंको कष्ट दिये बिना ही उनसे धन ले

ଯେପରି ଭ୍ରମର ପୁଷ୍ପମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରି ମଧୁ ଗ୍ରହଣ କରେ, ସେପରି ରାଜା ମଧ୍ୟ ପ୍ରଜାଙ୍କୁ କଷ୍ଟ ନଦେଇ ତାଙ୍କଠାରୁ ଧନ ଗ୍ରହଣ କରିବା ଉଚିତ।

Verse 18

पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं॑ न कारयेत्‌ । मालाकार इवारामे न यथाड्रारकारक:,जैसे माली बगीचेमें एक-एक फूल तोड़ता है, उसकी जड़ नहीं काटता, उसी प्रकार राजा प्रजाकी रक्षापूर्वक उनसे कर ले। कोयला बनानेवालेकी तरह जड़से नहीं काटे

ଉଦ୍ୟାନରେ ମାଳୀ ଯେପରି ପୁଷ୍ପ ପୁଷ୍ପ କରି ତୋଳେ, ମୂଳ ଛେଦ କରେ ନାହିଁ; ସେପରି ରାଜା ପ୍ରଜାକୁ ରକ୍ଷା କରି ସଂଯମରେ କର ନେବ—କୋଇଲାକାର ପରି ମୂଳରୁ କାଟିଦେବ ନାହିଁ।

Verse 19

किन्नु मे स्यादिदं कृत्वा किन्नु मे स्यादकुर्वतः । इति कर्माणि संचिन्त्य कुर्याद्‌ वा पुरुषो न वा,इसे करनेसे मेरा क्या लाभ होगा और न करनेसे क्या हानि होगी--इस प्रकार कर्मोंके विषयमें भलीभाँति विचार करके फिर मनुष्य (कर्म) करे या न करे

ଏହା କଲେ ମୋର କ’ଣ ଲାଭ ହେବ, ନ କଲେ କ’ଣ କ୍ଷତି ହେବ—ଏପରି କର୍ମ ବିଷୟରେ ଭଲଭାବେ ଚିନ୍ତା କରି, ମଣିଷ କରିବ କି ନ କରିବ ନିଷ୍ପତ୍ତି ନେବା ଉଚିତ।

Verse 20

अनारशभ्या भवन्त्यर्था: केचिन्नित्यं तथागता: । कृत: पुरुषकारो हि भवेद्‌ येषु निरर्थक:,कुछ ऐसे व्यर्थ कार्य हैं, जो नित्य अप्राप्त होनेके कारण आरम्भ करनेयोग्य नहीं होते; क्योंकि उनके लिये किया हुआ पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाता है

କିଛି ଲକ୍ଷ୍ୟ ସ୍ୱଭାବତଃ ସଦା ଅପ୍ରାପ୍ୟ; ତେଣୁ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଆରମ୍ଭ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। କାରଣ ସେଠାରେ କରାଯାଇଥିବା ପୁରୁଷାର୍ଥ ମଧ୍ୟ ଶେଷେ ନିଷ୍ଫଳ ହୁଏ।

Verse 21

प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थक: । न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रिय:,जिसकी प्रसन्नताका कोई फल नहीं और क्रोध भी व्यर्थ है, उसको प्रजा स्वामी बनाना नहीं चाहती--जैसे स्त्री नपुंसकको पति नहीं बनाना चाहती

ଯାହାର ପ୍ରସାଦ ନିଷ୍ଫଳ ଓ କ୍ରୋଧ ମଧ୍ୟ ନିରର୍ଥକ, ତାକୁ ପ୍ରଜା ଭର୍ତ୍ତା ଭାବେ ଚାହେ ନାହିଁ—ଯେପରି ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ଷଣ୍ଢକୁ ପତି ଭାବେ ଚାହନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 22

कांश्रचिदर्थान्‌ नर: प्राज्ञो लघुमूलान्‌ महाफलान्‌ । क्षिप्रमारभते कर्तु न विध्नयति तादृशान्‌,जिनका मूल (साधन) छोटा और फल महान हो, बुद्धिमान्‌ पुरुष उनको शीघ्र ही आरम्भ कर देता है; वैसे कामोंमें वह विघ्न नहीं आने देता

ଯାହାର ମୂଳସାଧନ ଛୋଟ ଓ ଫଳ ମହାନ, ସେପରି ଲକ୍ଷ୍ୟକୁ ପ୍ରାଜ୍ଞ ପୁରୁଷ ଶୀଘ୍ର ଆରମ୍ଭ କରେ; ଏମିତି କାମରେ ସେ ବିଘ୍ନ ଆସିବାକୁ ଦିଏ ନାହିଁ।

Verse 23

ऋणजु पश्यति य: सर्व चक्षुषानुपिबन्निव | आसीनमपि तूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजा:

ଯେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସରଳ ସ୍ନେହମୟ ଦୃଷ୍ଟିରେ—ମନେ ହେଉ ଚକ୍ଷୁଦ୍ୱାରା ପାନ କରୁଛି—ଦେଖେ, ପ୍ରଜା ତାହାକୁ ଅନୁରାଗ କରେ; ସେ ନୀରବ ହୋଇ ବସିଥିଲେ ମଧ୍ୟ।

Verse 24

जो राजा इस प्रकार प्रेमके साथ कोमल दृष्टिसे देखता है, मानो आँखोंसे पीना चाहता है, वह चुपचाप बैठा भी रहे, तो भी प्रजा उससे अनुराग रखती है ।। सुपुष्पित: स्यादफल: फलित: स्याद्‌ दुरारुह: । अपक्व: पक्‍वसंकाशो न तु शीर्येत कहिचित्‌,राजा वृक्षकी भाँति अच्छी तरह फूलने (प्रसन्न रहने) पर भी फलसे खाली रहे (अधिक देनेवाला न हो)। यदि फलसे युक्त (देनेवाला) हो तो भी जिसपर चढ़ा न जा सके, ऐसा (पहुँचके बाहर) होकर रहे। कच्चा (कम शक्तिवाला) होनेपर भी पके (शक्तिसम्पन्न)-की भाँति अपनेको प्रकट करे। ऐसा करनेसे वह नष्ट नहीं होता

ରାଜା ବୃକ୍ଷ ପରି ହେଉ: ସୁପୁଷ୍ପିତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଫଳଶୂନ୍ୟ ରହୁ (ଅତିଦାନଶୀଳ ନ ହେଉ); ଯଦି ଫଳବାନ ହୁଏ, ତଥାପି ଦୁରାରୋହ ରହୁ (ସହଜେ ଧରା ପଡ଼ି ଶୋଷିତ ନ ହେଉ); ଏବଂ ଅପକ୍ୱ (ଦୁର୍ବଳ) ହୋଇ ମଧ୍ୟ ପକ୍ୱ ସଦୃଶ ଦେଖାଉ। ଏପରି ଆଚରଣ କଲେ ସେ କେବେ ନଶ୍ଟ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 25

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्‌ | प्रसादयति यो लोक॑ तं लोको<नुप्रसीदति,जो राजा नेत्र, मन, वाणी और कर्म--इन चारोंसे प्रजाको प्रसन्न करता है, उसीसे प्रजा प्रसन्न रहती है

ଯେ ରାଜା ଦୃଷ୍ଟି, ମନ, ବାଣୀ ଓ କର୍ମ—ଏହି ଚାରି ପ୍ରକାରେ ପ୍ରଜାକୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରେ, ପ୍ରଜା ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ପ୍ରସନ୍ନ ରହେ।

Verse 26

यस्मात्‌ त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगा इव । सागरान्तामपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते,जैसे व्याधसे हरिन भयभीत होते हैं, उसी प्रकार जिससे समस्त प्राणी डरते हैं, वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य पाकर भी प्रजाजनोंके द्वारा त्याग दिया जाता है

ଯାହାକୁ ଦେଖି ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ଶିକାରୀକୁ ଦେଖି ହରିଣ ଯେପରି ଭୟଭୀତ ହୁଅନ୍ତି ସେପରି ଭୟ କରନ୍ତି, ସେ ସମୁଦ୍ରାନ୍ତ ପୃଥିବୀର ରାଜ୍ୟ ପାଇଲେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଜାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିତ୍ୟକ୍ତ ହୁଏ।

Verse 27

पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान्‌ स्वेन कर्मणा । वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थित:,अन्यायमें स्थित हुआ राजा बाप-दादोंका राज्य पाकर भी अपने कर्मोंसे उसे इस तरह भ्रष्ट कर देता है, जैसे हवा बादलको छिज्न-भिन्न कर देती है

ଅନ୍ୟାୟରେ ଅବସ୍ଥିତ ରାଜା, ନିଜ କର୍ମଦ୍ୱାରା ପିତୃ-ପୈତାମହିକ ରାଜ୍ୟ ପାଇଲେ ମଧ୍ୟ, ବାୟୁ ମେଘକୁ ଆଘାତ କରି ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ କରେ ଯେପରି, ସେପରି ନିଜ କର୍ମରେ ତାହାକୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ କରିଦିଏ।

Verse 28

धर्ममाचरतो राज्ञ: सद्धिश्नरितमादित: । वसुधा वसुसम्पूर्णा वर्धते भूतिवर्धिनी,परम्परासे सज्जन पुरुषोंद्वारा किये हुए धर्मका आचरण करनेवाले राजाके राज्यकी पृथ्वी धन-धान्यसे पूर्ण होकर उन्नतिको प्राप्त होती है और उसके ऐश्वर्यको बढ़ाती है

ଆଦିକାଳରୁ ସଜ୍ଜନମାନେ ଯେ ଶିଷ୍ଟାଚାର ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରିଛନ୍ତି, ସେହି ନୀତିଅନୁସାରେ ଯେ ରାଜା ଧର୍ମ ଆଚରଣ କରେ, ତାଙ୍କ ରାଜ୍ୟର ଭୂମି ଧନ-ଧାନ୍ୟରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ଉନ୍ନତି ପାଏ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଐଶ୍ୱର୍ୟକୁ ବଢ଼ାଏ।

Verse 29

अथ संत्यजतो धर्ममधर्म चानुतिष्ठत: । प्रतिसंवेष्टते भूमिरग्नौ चर्माहितं यथा,जो राजा धर्मको छोड़ता और अधर्मका अनुष्ठान करता है, उसकी राज्यभूमि आगपर रखे हुए चमड़ेकी भाँति संकुचित हो जाती है

ଯେ ରାଜା ଧର୍ମକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ଅଧର୍ମ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରେ, ତାଙ୍କ ରାଜ୍ୟଭୂମି ଅଗ୍ନି ଉପରେ ରଖା ଚର୍ମ ପରି ସଙ୍କୁଚିତ ହୋଇଯାଏ।

Verse 30

य एव यत्न: क्रियते परराष्ट्रविमर्दने । स एव यत्न: कर्तव्य: स्वराष्ट्रपरिपालने,दूसरे राष्ट्रोंका नाश करनेके लिये जिस प्रकारका प्रयत्न किया जाता है, उसी प्रकारकी तत्परता अपने राज्यकी रक्षाके लिये करनी चाहिये

ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟକୁ ଦମନ କରିବା ପାଇଁ ଯେପରି ଦୃଢ଼ ପ୍ରୟାସ କରାଯାଏ, ସେହି ପ୍ରୟାସ—କିଛିମାତ୍ର ଶିଥିଳତା ବିନା—ନିଜ ରାଜ୍ୟର ରକ୍ଷା ଓ ସୁଶାସନରେ କରିବା ଉଚିତ।

Verse 31

धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेण परिपालयेत्‌ । धर्ममूलां श्रियं प्राप्प न जहाति न हीयते,धर्मसे ही राज्य प्राप्त करे और धर्मसे ही उसकी रक्षा करे; क्‍योंकि धर्ममूलक राज्यलक्ष्मीको पाकर न तो राजा उसे छोड़ता है और न वही राजाको छोड़ती है

ଧର୍ମରେ ରାଜ୍ୟ ଲାଭ କରିବା ଉଚିତ ଏବଂ ଧର୍ମରେ ହିଁ ତାହାକୁ ପାଳନ କରିବା ଉଚିତ; କାରଣ ଧର୍ମମୂଳକ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ ନ ରାଜା ତାହାକୁ ଛାଡ଼େ, ନ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ରାଜାକୁ ଛାଡ଼େ।

Verse 32

अप्युन्मत्तात्‌ प्रलपतो बालाच्च परिजल्पत: । सर्वत: सारमादद्यादश्मभ्य इव काउ्चनम्‌,निरर्थक बोलनेवाले, पागल तथा बकवाद करनेवाले बच्चेसे भी सब ओरसे उसी भाँति सार बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे पत्थरोंमेंसे सोना लिया जाता है

ନିରର୍ଥକ ପ୍ରଲାପ କରୁଥିବା ଉନ୍ମତ୍ତ ଲୋକଠାରୁ ଓ ଅର୍ଥହୀନ ବକବକ କରୁଥିବା ଶିଶୁଠାରୁ ମଧ୍ୟ ସବୁ ଦିଗରୁ ସାର ଗ୍ରହଣ କରିବା ଉଚିତ—ଯେପରି ପଥର ମଧ୍ୟରୁ ସୁନା ନିଆଯାଏ।

Verse 33

सुव्याहृतानि सूक्तानि सुकृतानि ततस्तत: । संचिन्वन्‌ धीर आसीत शिलाहारी शिलं यथा,जैसे शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाला अनाज-का एक-एक दाना चुगता रहता है, उसी प्रकार धीर पुरुषको जहाँ-तहाँसे भावपूर्ण वचनों, सूक्तियों और सत्कर्मोका संग्रह करते रहना चाहिये

ଯେପରି ଶିଳାହାରୀ ପଥରିଆ ଭୂମିରୁ ଏକେକ ଧାନ୍ୟକଣା ଚୟନ କରି ଜୀବିକା ଚାଲାଏ, ସେପରି ଧୀର ପୁରୁଷ ଯେଉଁଠାରୁ ମିଳେ ସେଉଁଠାରୁ ସୁବଚନ, ସୂକ୍ତି ଓ ସତ୍କର୍ମ ସଂଚୟ କରି ଯାଉ।

Verse 34

गन्धेन गाव: पश्यन्ति वेद: पश्यन्ति ब्राह्मणा: । चारै: पश्यन्ति राजानश्नक्षुभ्यामितरे जना:,इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये चतुस्त्रिंशो 5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ााभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजागरपर्वमें विदुर-नीतिवाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଗନ୍ଧରେ ଗାଈମାନେ ଦେଖନ୍ତି, ବେଦରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଦେଖନ୍ତି; ଚାର (ଗୁପ୍ତଚର) ଦ୍ୱାରା ରାଜାମାନେ ଦେଖନ୍ତି, ଅନ୍ୟ ଲୋକେ ଚକ୍ଷୁଦ୍ୱାରା ଦେଖନ୍ତି।

Verse 35

गौएँ गन्धसे, ब्राह्मणलोग वेदोंसे, राजा गुप्तचरोंसे और अन्य साधारण लोग आँखोंसे देखा करते हैं ।। भूयांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा । अथ या सुदुहा राजन नैव तां वितुदन्त्यपि,राजन्‌! जो गाय बड़ी कठिनाईसे दुहने देती है, वह बहुत क्लेश उठाती है; किंतु जो आसानीसे दूध देती है, उसे लोग कष्ट नहीं देते

ଗାଈ ଗନ୍ଧରେ ପରିଚିତ, ବ୍ରାହ୍ମଣ ବେଦରେ, ରାଜା ଗୁପ୍ତଚରରେ, ଏବଂ ସାଧାରଣ ଲୋକ ଚକ୍ଷୁରେ ଦେଖାଯାଉଥିବାରେ। ଯେ ଗାଈ କଷ୍ଟରେ ଦୁହାଯାଏ ସେ ବହୁ କ୍ଲେଶ ପାଏ; କିନ୍ତୁ ଯେ ସହଜରେ ଦୁହାଯାଏ ତାକୁ କେହି ପୀଡ଼ା ଦିଏ ନାହିଁ।

Verse 36

यदतप्तं प्रणमति न तत्‌ संतापयन्त्यपि । यच्च स्वयं नतं दारु न तत्‌ संनमयन्त्यपि,जो धातु बिना गरम किये मुड़ जाते हैं, उन्हें आगमें नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे कोई झुकानेका प्रयत्न नहीं करता

ଯେ ଧାତୁ ତାପ ନଦେଇ ମୁଡ଼ିଯାଏ, ତାକୁ ପୁଣି ଅଗ୍ନିରେ ତାପାନ୍ତି ନାହିଁ; ଯେ କାଠ ସ୍ୱୟଂ ନତ, ତାକୁ ପୁଣି ନମାଇବାକୁ କେହି ଚେଷ୍ଟା କରେ ନାହିଁ।

Verse 37

एतयोपमया धीर: संनमेत बलीयसे । इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे,इस दृष्टान्तके अनुसार बुद्धिमान्‌ पुरुषको अधिक बलवानके सामने झुक जाना चाहिये; जो अधिक बलवानके सामने झुकता है, वह मानो इन्द्रको प्रणाम करता है

ଏହି ଉପମା ଅନୁସାରେ ଧୀର ପୁରୁଷ ଅଧିକ ବଳବାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ନମିବା ଉଚିତ; ଯେ ଅଧିକ ବଳବାନଙ୍କ ଆଗରେ ନମେ, ସେ ମନୋ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରେ।

Verse 38

पर्जन्यनाथा: पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवा: | पतयो बान्धवा: स्त्रीणां ब्राह्मणा वेदबान्धवा:,पशुओंके रक्षक या स्वामी हैं बादल, राजाओंके सहायक हैं मन्त्री, स्त्रियोंके बन्धु (रक्षक) हैं पति और ब्राह्मणोंके बान्धव हैं वेद

ପଶୁମାନଙ୍କର ନାଥ ପର୍ଜନ୍ୟ (ବର୍ଷା); ରାଜାମାନଙ୍କର ବାନ୍ଧବ ମନ୍ତ୍ରୀ; ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କର ବାନ୍ଧବ ପତି; ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର ବାନ୍ଧବ ବେଦ।

Verse 39

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते । मृजया रक्ष्यते रूप॑ कुल वृत्तेन रक्ष्यते,सत्यसे धर्मकी रक्षा होती है, योगसे विद्या सुरक्षित होती है, सफाईसे (सुन्दर) रूपकी रक्षा होती है और सदाचारसे कुलकी रक्षा होती है

ସତ୍ୟରେ ଧର୍ମ ରକ୍ଷିତ ହୁଏ, ଯୋଗ (ଶାସନ)ରେ ବିଦ୍ୟା ରକ୍ଷିତ ହୁଏ; ପରିଷ୍କାରତାରେ ରୂପ ରକ୍ଷିତ ହୁଏ, ଏବଂ ସଦାଚାରରେ କୁଳ ରକ୍ଷିତ ହୁଏ।

Verse 40

मानेन रक्ष्यते धान्यमश्चान्‌ रक्षत्यनुक्रम: । अभीक्ष्णदर्शनं गाश्च स्त्रियो रक्ष्या: कुचैलत:,भलीभाँति सँभालकर रखनेसे नाजकी रक्षा होती है, फेरनेसे घोड़े सुरक्षित रहते हैं, बारंबार देख-भाल करनेसे गौओंकी तथा मैले वस्त्रोंसे स्त्रियोंकी रक्षा होती है

ବିଦୁର କହନ୍ତି—ଯଥାଯଥ ମାପଜୋଖ ଓ ସମ୍ମାନସହ ରକ୍ଷା କଲେ ଧାନ୍ୟ ସୁରକ୍ଷିତ ରହେ; ଶୃଙ୍ଖଳା ଓ କ୍ରମରେ ଘୋଡ଼ା ସୁରକ୍ଷିତ ରହେ; ବାରମ୍ବାର ନିରୀକ୍ଷଣରେ ଗାଈ ରକ୍ଷା ପାଏ; ଏବଂ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ମଲିନ ବସ୍ତ୍ର ଓ ଅଶୁଚି ପରିବେଶଜନିତ ଅନର୍ଥରୁ ରକ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ।

Verse 41

न कुल वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति मे मति: । अन्तेष्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते,मेरा ऐसा विचार है कि सदाचारसे हीन मनुष्यका केवल ऊँचा कुल मान्य नहीं हो सकता; क्योंकि नीच कुलमें उत्पन्न मनुष्यका भी सदाचार श्रेष्ठ माना जाता है

ମୋ ମତରେ, ସଦାଚାରହୀନ ଲୋକ ପାଇଁ କେବଳ ଉଚ୍ଚ କୁଳଜନ୍ମ ପ୍ରମାଣ ନୁହେଁ; କାରଣ ନୀଚ କୁଳରେ ଜନ୍ମିଥିବା ଲୋକଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ସଦାଚାର ହିଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଠାରେ।

Verse 42

य ईर्षु: परवित्तेषु रूपे वीर्ये कुलान्वये । सुखसौ भाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तक:ः,जो दूसरोंके धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य और सम्मानपर डाह करता है, उसका यह रोग असाध्य है

ଯେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଧନ, ରୂପ, ପରାକ୍ରମ, କୁଳାନ୍ବୟ, ସୁଖ, ସୌଭାଗ୍ୟ ଓ ସତ୍କାର ଉପରେ ଈର୍ଷ୍ୟା କରେ—ତାହାର ସେଇ ଈର୍ଷ୍ୟା ଅସାଧ୍ୟ ବ୍ୟାଧି।

Verse 43

अकार्यकरणाद्‌ भीत: कार्याणां च विवर्जनात्‌ | अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येन्न तत्‌ पिबेत्‌,न करनेयोग्य काम करनेसे, करनेयोग्य काममें प्रमाद करनेसे तथा कार्यसिद्धि होनेके पहले ही मन्त्र प्रकट हो जानेसे डरना चाहिये और जिससे नशा चढ़े, ऐसी मादक वस्तु नहीं पीनी चाहिये

ଅକାର୍ଯ୍ୟ କରିବା, କାର୍ଯ୍ୟରେ ଅବହେଳା କରିବା, ଏବଂ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧି ପୂର୍ବରୁ ମନ୍ତ୍ର-ରହସ୍ୟ ଫାଶ ହୋଇଯିବା—ଏସବୁକୁ ଭୟ କରିବା ଉଚିତ; ଏବଂ ଯାହାରେ ମଦ ଚଢ଼େ, ସେପରି ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ ପାନ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।

Verse 44

विद्यामदो धनमदस्तृतीयोडभिजनो मद: । मदा एते5वलिप्तानामेत एव सतां दमा:,विद्याका मद, धनका मद और तीसरा ऊँचे कुलका मद है। ये घमंडी पुरुषोंके लिये तो मद हैं, परंतु ये (विद्या, धन और कुलीनता) ही सज्जन पुरुषोंके लिये दमके साधन हैं

ବିଦ୍ୟାର ମଦ, ଧନର ମଦ, ଏବଂ ତୃତୀୟ ଉଚ୍ଚ କୁଳର ମଦ—ଏଗୁଡ଼ିକ ଅହଂକାରୀଙ୍କ ପାଇଁ ମଦମତା; କିନ୍ତୁ ସଜ୍ଜନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହି ବିଦ୍ୟା, ଧନ ଓ କୁଳୀନତା ହିଁ ସଂଯମ (ଦମ)ର ସାଧନ।

Verse 45

असन्तो< भ्यर्थिता: सद्धिः क्वचित्कार्ये कदाचन । मन्यन्ते सन्‍्तमात्मानमसन्तमपि विश्रुतम्‌,कभी किसी कार्यमें सज्जनोंद्वारा प्रार्थित होनेपर दुष्टलोग अपनेको प्रसिद्ध दुष्ट जानते हुए भी सज्जन मानने लगते हैं

କେବେ କେବେ କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ସଜ୍ଜନମାନେ ଅନୁରୋଧ କଲେ, ଦୁଷ୍ଟମାନେ—ନିଜେ ଦୁଷ୍ଟ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଥିବାକୁ ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ—ନିଜକୁ ସଜ୍ଜନ ଭାବିବାକୁ ଲାଗନ୍ତି।

Verse 46

गतिरात्मवतां सन्त: सन्‍्त एव सतां गति: । असतां च गति: सन्‍्तो न त्वसन्त: सतां गति:,मनस्वी पुरुषोंको सहारा देनेवाले संत हैं; संतोंके भी सहारे संत ही हैं, दुष्टोंकी भी सहारा देनेवाले संत हैं, पर दुष्टलोग संतोंको सहारा नहीं देते

ଆତ୍ମସଂଯମୀମାନଙ୍କର ଆଶ୍ରୟ ସଜ୍ଜନ; ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କର ଆଶ୍ରୟ ମଧ୍ୟ ସଜ୍ଜନମାନେ ହିଁ। ଦୁଷ୍ଟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ସଜ୍ଜନମାନେ ଆଶ୍ରୟ ହୁଅନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ଦୁଷ୍ଟମାନେ ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କର ଆଶ୍ରୟ ନୁହେଁ।

Verse 47

जिता सभा वस्त्रवता मिष्टाशा गोमता जिता । अध्वा जितो यानवता सर्व शीलवता जितम्‌,अच्छे वस्त्रवाला सभाको जीतता (अपना प्रभाव जमा लेता) है; जिसके पास गौ है, वह (दूध, घी, मक्खन, खोवा आदि पदार्थोके आस्वादनसे) मीठे स्वादकी आकांक्षाको जीत लेता है, सवारीसे चलनेवाला मार्गको जीत लेता (तय कर लेता) है और शीलस्वभाववाला पुरुष सबपर विजय पा लेता है

ଭଲ ବସ୍ତ୍ରଧାରୀ ସଭାରେ ପ୍ରଭାବ ପକାଏ; ଗୋଧନ ଥିବା ଲୋକ ମିଠା ଓ ସମୃଦ୍ଧ ରୁଚିର ଲୋଭକୁ ଜିତେ; ଯାନ ଥିବା ଲୋକ ପଥକୁ ଜିତେ; ଏବଂ ଶୀଳବାନ ପୁରୁଷ ସବୁକୁ ଜିତେ।

Verse 48

शीलं प्रधान पुरुषे तद्‌ यस्येह प्रणश्यति । न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभि:,पुरुषमें शील ही प्रधान है; जिसका वही नष्ट हो जाता है, इस संसारमें उसका जीवन, धन और बन्धुओंसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता

ମଣିଷରେ ଶୀଳ ହିଁ ପ୍ରଧାନ; ଯାହାର ଶୀଳ ଏହି ଲୋକରେ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ, ତାହା ପାଇଁ ନ ଜୀବନର କିଛି ଅର୍ଥ ରହେ, ନ ଧନର, ନ ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କର।

Verse 49

आढ्यानां मांसपरमं मध्यानां गोरसोत्तरम्‌ तैलोत्तरं दरिद्राणां भोजनं भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ। धनोन्मत्त (तामस स्वभाववाले) पुरुषोंके भोजनमें मांसकी, मध्यम श्रेणीवालोंके भोजनमें गोरसकी तथा दरिद्रोंक भोजनमें तेलकी प्रधानता होती है

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଧନୀମାନଙ୍କ ଭୋଜନରେ ମାଂସ ପ୍ରଧାନ; ମଧ୍ୟମମାନଙ୍କ ଭୋଜନରେ ଗୋରସ (ଦୁଧ ଆଦି) ଅଧିକ; ଏବଂ ଦରିଦ୍ରମାନଙ୍କ ଭୋଜନରେ ତେଲ ପ୍ରଧାନ ହୁଏ।

Verse 50

सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुज्जते सदा । क्षुत्‌ स्वादुतां जनयति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा,दरिद्र पुरुष सदा स्वादिष्ट भोजन ही करते हैं; क्योंकि भूख उनके भोजनमें (विशेष) स्वाद उत्पन्न कर देती है और वह भूख धनियोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है

ଦରିଦ୍ରମାନେ ସଦା ନିଜ ଅନ୍ନକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ବୋଲି ଭାବି ଭୋଜନ କରନ୍ତି; କାରଣ ଭୁଖ ହିଁ ତାହାରେ ରୁଚି ଓ ମାଧୁର୍ଯ୍ୟ ଜନ୍ମାଏ, ଏମିତି ଭୁଖ ଧନୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଲଭ।

Verse 51

प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते जीर्यन्त्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते,राजन! संसारमें धनियोंको प्रायः भोजनको पचानेकी शक्ति नहीं होती, किंतु दरिद्रोंके पेटमें काठ भी पच जाते हैं

ମହୀପତେ! ଏହି ଲୋକରେ ଧନୀମାନଙ୍କ ପାଖରେ ପ୍ରାୟଃ ଭୋଗ କରିବା ଓ ପଚାଇବାର ଶକ୍ତି ନଥାଏ; କିନ୍ତୁ ଦରିଦ୍ରମାନଙ୍କ ଉଦରରେ କାଠ ମଧ୍ୟ ପଚିଯାଏ।

Verse 52

अवृत्तिर्भयमन्त्यानां मध्यानां मरणाद्‌ भयम्‌ । उत्तमानां तु मर्त्यानामवमानात्‌ परं भयम्‌,अधम पुरुषोंको जीविका न होनेसे भय लगता है, मध्यम श्रेणीके मनुष्योंको मृत्युसे भय होता है; परंतु उत्तम पुरुषोंको अपमानसे ही महान्‌ भय होता है

ଅଧମମାନଙ୍କୁ ଜୀବିକା ନଥିବାର ଭୟ, ମଧ୍ୟମମାନଙ୍କୁ ମୃତ୍ୟୁର ଭୟ; କିନ୍ତୁ ଉତ୍ତମ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଅପମାନଠାରୁ ବଡ଼ ଭୟ ନାହିଁ।

Verse 53

ऐश्वर्यमदपापिष्ठा मदा: पानमदादय: । ऐश्वर्यमदमत्तो हि नापतित्वा विबुध्यते,यों तो (मादक वस्तुओंके) पीनेका नशा आदि भी नशा ही है, किंतु ऐश्वर्यका नशा तो बहुत ही बुरा है; क्योंकि ऐश्वर्यके मदसे मतवाला पुरुष भ्रष्ट हुए बिना होशमें नहीं आता

ପାନମଦ ଆଦି ମଦମାନେ ମଦ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ଐଶ୍ୱର୍ଯ୍ୟର ମଦ ସବୁଠାରୁ ପାପିଷ୍ଠ। କାରଣ ଐଶ୍ୱର୍ଯ୍ୟମଦରେ ମତ୍ତ ମନୁଷ୍ୟ ପତିତ ନହେଲେ ସଚେତନ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 54

इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु वर्तमानैरनिग्रहै: । तैरयं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव,वशमें न होनेके कारण विषयोंमें रमनेवाली इन्द्रियोंसे यह संसार उसी भाँति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहोंसे नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं

ଅନିଗ୍ରହୀତ ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନେ ବିଷୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବିଚରଣ କଲେ, ସେମାନେ ଏହି ଲୋକକୁ ଦହନ କରନ୍ତି—ଯେପରି ଗ୍ରହମାନଙ୍କ ତେଜରେ ନକ୍ଷତ୍ରମାନେ ମ୍ଲାନ ହୋଇଯାନ୍ତି।

Verse 55

यो जित: पञठ्चवर्गेण सहजेनात्मकर्षिणा । आपदस्तस्य वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवोडुराट्‌,जो मनुष्य जीवोंको वशमें करनेवाली सहज पाँच इन्द्रियोंसे जीत लिया गया, उसकी आपत्तियाँ शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ती हैं

ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ଆତ୍ମାକୁ ବାହାରକୁ ଟାଣିନେବା ସହଜ ପାଞ୍ଚ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ବର୍ଗ ଦ୍ୱାରା ଜିତାଯାଏ, ତାହାର ଆପଦ ଶୁକ୍ଳପକ୍ଷର ଚନ୍ଦ୍ର ପରି ଦିନକୁ ଦିନ ବଢ଼ିଯାଏ।

Verse 56

अविजित्य य आत्मानममात्यान्‌ विजिगीषते । अमित्रान्‌ वाजितामात्य: सोडवश: परिहीयते,इन्द्रियोंसहित मनको जीते बिना ही जो मन्त्रियोंको जीतनेकी इच्छा करता है या मन्त्रियोंको अपने अधीन किये बिना शत्रुको जीतना चाहता है, उस अजितेन्द्रिय पुरुषको सब लोग त्याग देते हैं

ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ପ୍ରଥମେ ନିଜକୁ ଜିତିନଥାଇ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ବଶ କରିବାକୁ ଚାହେ, କିମ୍ବା ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଅଧୀନ କରିନଥାଇ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଜିତିବାକୁ ଚାହେ—ସେ ଅଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ପୁରୁଷ ଅସହାୟ ହୋଇ ପତନ ପାଏ, ଏବଂ ସମସ୍ତେ ତାକୁ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି।

Verse 57

आत्मानमेव प्रथम द्वेष्यरूपेण यो जयेत्‌ । ततोअमात्यानमित्रांश्व न मोघं विजिगीषते,जो पहले इन्द्रियोंसहित मनको ही शत्रु समझकर जीत लेता है, उसके बाद यदि वह मन्त्रियों तथा शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करे तो उसे सफलता मिलती है

ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ପ୍ରଥମେ ମନ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ସହିତ ନିଜକୁ ଶତ୍ରୁରୂପେ ଭାବି ଜିତେ, ତାପରେ ଯଦି ସେ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଓ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଜିତିବାକୁ ଚାହେ, ତେବେ ତାହାର ଚେଷ୍ଟା ନିଷ୍ଫଳ ହୁଏନାହିଁ—ସେ ସଫଳତା ପାଏ।

Verse 58

वश्येन्द्रियं जितात्मानं धृतदण्डं विकारिषु | परीक्ष्य कारिणं धीरमत्यन्तं श्रीनिषेवते,इन्द्रियों तथा मनको जीतनेवाले, अपराधियोंको दण्ड देनेवाले और जाँच-परखकर काम करनेवाले धीर पुरुषकी लक्ष्मी अत्यन्त सेवा करती है

ଯାହାର ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ବଶରେ, ଯିଏ ନିଜକୁ ଜିତିଛି, ଯିଏ ଅପରାଧୀଙ୍କୁ ଆବଶ୍ୟକ ହେଲେ ଦଣ୍ଡ ଦିଏ, ଏବଂ ପରୀକ୍ଷା କରି କାର୍ଯ୍ୟ କରେ—ସେହି ଧୀର ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଶ୍ରୀ (ଲକ୍ଷ୍ମୀ) ଅତ୍ୟନ୍ତ ନିଷ୍ଠାରେ ସେବା କରନ୍ତି।

Verse 59

रथ: शरीरं पुरुषस्य राज- न्नात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्वा: | तैरप्रमत्त: कुशली सदश्नै- दन्ति: सुखं याति रथीव धीर:,राजन! मनुष्यका शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है और इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं। इनको वशमें करके सावधान रहनेवाला चतुर एवं धीर पुरुष काबूमें किये हुए घोड़ोंसे रथीकी भाँति सुखपूर्वक संसारपथका अतिक्रमण करता है

ରାଜନ୍! ମନୁଷ୍ୟର ଶରୀର ରଥ, ଆତ୍ମା ତାହାର ନିୟନ୍ତା, ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନେ ତାହାର ଅଶ୍ୱ। ଯେ ଏହି ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କୁ ବଶରେ ରଖି ଅପ୍ରମତ୍ତ, କୁଶଳ ଓ ଧୀର ରହେ, ସେ ଦାନ୍ତ ଅଶ୍ୱଯୁକ୍ତ ରଥୀ ପରି ସୁଖରେ ସଂସାରପଥ ଅତିକ୍ରମ କରେ।

Verse 60

एतान्यनिगृहीतानि व्यापादयितुमप्यलम्‌ । अविधेया इवादान्ता हया: पथि कुसारथिम्‌,शिक्षा न पाये हुए तथा काबूमें न आनेवाले घोड़े जैसे मूर्ख सारथिको मार्गमें मार गिराते हैं, वैसे ही ये इन्द्रियाँ वशमें न रहनेपर पुरुषको मार डालनेमें भी समर्थ होती हैं

ଏହି ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକ ଯଦି ଅନିଗ୍ରହୀତ ରହିଯାଏ, ତେବେ ମଣିଷକୁ ନାଶ କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ସମର୍ଥ। ଯେପରି ପଥରେ ଶିକ୍ଷା ନପାଇଥିବା, ଅବଶ୍ୟ ନ ହେବା ଘୋଡ଼ା ଅଯୋଗ୍ୟ ସାରଥିକୁ ଫେଳି ମାରିଦିଏ, ସେପରି ଅବଶ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ମଣିଷକୁ ପତନରେ ନେଇଯାଏ।

Verse 61

अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्थ चैवाप्यनर्थत: । इन्द्रियेरजितैर्बाल: सुदुःखं मनन्‍्यते सुखम्‌,इन्द्रियोंको वशमें न रखनेके कारण अर्थको अनर्थ और अनर्थको अर्थ समझकर अज्ञानी पुरुष बहुत बड़े दुःखको भी सुख मान बैठता है

ଇନ୍ଦ୍ରିୟକୁ ଜିତିନଥିବା ମୂଢ଼ ଲୋକ ଅନର୍ଥକୁ ଅର୍ଥ ଏବଂ ଅର୍ଥକୁ ଅନର୍ଥ ଭାବେ ଦେଖେ; ଇନ୍ଦ୍ରିୟମୋହରେ ସେ ଭୟଙ୍କର ଦୁଃଖକୁ ମଧ୍ୟ ସୁଖ ମାନେ।

Verse 62

धर्मार्थो यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानुग: । श्रीप्राणधनदारेभ्य: क्षिप्रं स परिहीयते,जो धर्म और अर्थका परित्याग करके इन्द्रियोंके वशमें हो जाता है, वह शीघ्र ही ऐश्वर्य, प्राण, धन तथा स्त्रीसे भी हाथ धो बैठता है

ଯେ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରି ଇନ୍ଦ୍ରିୟର ବଶାନୁଗ ହୁଏ, ସେ ଶୀଘ୍ର ଶ୍ରୀ, ପ୍ରାଣ, ଧନ ଓ ଦାରା—ଏ ସବୁଠାରୁ ହ୍ରାସ ପାଏ।

Verse 63

अर्थनामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणामनी श्वर: । इन्द्रियाणामनैश्वयदिदश्वर्याद्‌ भ्रश्यते हि सः,जो अधिक धनका स्वामी होकर भी इन्द्रियोॉंपर अधिकार नहीं रखता, वह इन्द्रियोंको वशमें न रखनेके कारण ही एऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है

ଯେ ଧନର ଅଧିପତି ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଇନ୍ଦ୍ରିୟର ଅଧିପତି ନୁହେଁ, ସେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ଅନୈଶ୍ୱର୍ୟର କାରଣରୁ ନିଶ୍ଚୟ ନିଜ ଐଶ୍ୱର୍ୟରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ ହୁଏ।

Verse 64

आत्मना55त्मानमन्विच्छेन्मनोबुद्धीन्द्रियैर्यतै: । आत्मा होवात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:,मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको अपने अधीनकर अपनेसे ही अपने आत्माको जाननेकी इच्छा करे; क्योंकि आत्मा ही अपना बन्धु और आत्मा ही अपना शत्रु है

ମନ, ବୁଦ୍ଧି ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟକୁ ସଂଯମ କରି ମଣିଷ ନିଜେ ନିଜ ଆତ୍ମାକୁ ଅନ୍ୱେଷଣ କରୁ; କାରଣ ଆତ୍ମା ହିଁ ଆତ୍ମାର ବନ୍ଧୁ, ଆତ୍ମା ହିଁ ଆତ୍ମାର ରିପୁ।

Verse 65

बन्धुरात्मा55त्मनस्तस्य येनैवात्मा55त्मना जित: । स एव नियतो बन्धु: स एवानियतो रिपु:,जिसने स्वयं अपने आत्माको ही जीत लिया है, उसका आत्मा ही उसका बन्धु है। वही आत्मा जीता गया होनेपर सच्चा बन्धु और वही न जीता हुआ होनेपर शत्रु है

ଯିଏ ଆତ୍ମସଂଯମରେ ନିଜ ଆତ୍ମାକୁ ଜୟ କରିଛି, ତାହାର ଆତ୍ମା ହିଁ ତାହାର ସତ୍ୟ ବନ୍ଧୁ; ଏହି ଆତ୍ମା ଯଦି ଅନିୟନ୍ତ୍ରିତ ରହେ, ତେବେ ଶତ୍ରୁ ହୋଇ ବିନାଶ ପଥେ ଟାଣିନେଇଯାଏ।

Verse 66

क्षुद्राक्षेगेव जालेन झषावपिहितावुरू । कामश्न राजन्‌ क्रोधश्व तौ प्रज्ञानं विलुम्पत:,राजन! जिस प्रकार सूक्ष्म छेदवाले जालमें फँसी हुई दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ मिलकर जालको काट डालती हैं, उसी प्रकार ये काम और क्रोध--दोनों विवेकको लुप्त कर देते हैं

ରାଜନ୍! ସୂକ୍ଷ୍ମ ଛିଦ୍ରଯୁକ୍ତ ଜାଲରେ ଧରା ପଡ଼ିଥିବା ଦୁଇଟି ବଡ଼ ମାଛ ଛଟପଟ କରି ଜାଲକୁ ଫାଡ଼ିଦେଉଥିବା ପରି, କାମ ଓ କ୍ରୋଧ—ଏ ଦୁଇ—ପ୍ରଜ୍ଞାକୁ ଲୁଟିନେଇଯାନ୍ତି।

Verse 67

समवेक्ष्येह धर्मार्थी सम्भारान्‌ योडधिगच्छति । स वै सम्भूतसम्भार: सततं सुखमेधते,जो इस जगतमें धर्म तथा अर्थका विचार करके विजयसाधन-सामग्रीका संग्रह करता है, वही उस सामग्रीसे युक्त होनेके कारण सदा सुखपूर्वक समृद्धिशाली होता रहता है

ଏହି ଲୋକରେ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ସମ୍ୟକ୍‌ ଭାବେ ବିଚାର କରି ସଫଳତାର ଉପକରଣ-ସମ୍ଭାର ସଂଗ୍ରହ କରୁଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି, ସୁସଜ୍ଜିତ ହୋଇ ସଦା ସୁଖ ଓ ସମୃଦ୍ଧିରେ ବୃଦ୍ଧି ପାଏ।

Verse 68

यः पज्चाभ्यन्तराउ्छत्रूनविजित्य मनोमयान्‌ । जिगीषति रिपूनन्यान्‌ रिपवो5भिभवन्ति तम्‌,जो चित्तके विकारभूत पाँच इन्द्रियरूपी भीतरी शत्रुओंको जीते बिना ही दूसरे शत्रुओंको जीतना चाहता है, उसे शत्रु पराजित कर देते हैं

ମନରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ପାଞ୍ଚ ଆଭ୍ୟନ୍ତର ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ଜୟ କରିନଥାଇ ଯିଏ ବାହ୍ୟ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ଜୟ କରିବାକୁ ଚାହେ, ତାକୁ ସେଇ ଶତ୍ରୁମାନେ ହିଁ ପରାଜିତ କରନ୍ତି।

Verse 69

दृश्यन्ते हि महात्मानो बध्यमाना: स्वकर्मभि: । इन्द्रियाणामनीशत्वाद्‌ राजानो राज्यवि श्रमै:,इन्द्रियोंपर अधिकार न होनेके कारण बड़े-बड़े साधु भी अपने कर्मोंसे तथा राजालोग राज्यके भोग-विलासोंसे बँधे रहते हैं

ଦେଖାଯାଏ ଯେ ମହାତ୍ମାମାନେ ମଧ୍ୟ ନିଜ କର୍ମର ବନ୍ଧନରେ ବନ୍ଧିତ ହୁଅନ୍ତି; ଏବଂ ରାଜାମାନେ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଉପରେ ଅଧିକାର ନଥିବାରୁ, ରାଜ୍ୟର ଭୋଗ-ବିଲାସରେ ଜକଡ଼ି ରହନ୍ତି।

Verse 70

असंत्यागात्‌ पापकृतामपापां- स्तुल्यो दण्ड: स्पृशते मिश्रभावात्‌ | शुष्केणाद दहाते मिश्रभावात्‌ तस्मात्‌ पापै: सह सन्धिं न कुर्यात्‌,पापाचारी दुष्टोंका त्याग न करके उनके साथ मिले रहनेसे निरपराध सज्जनोंको भी उन (पापियों)-के समान ही दण्ड प्राप्त होता है, जैसे सूखी लकड़ीमें मिल जानेसे गीली भी जल जाती है; इसलिये दुष्ट पुरुषोंक साथ कभी मेल न करे

ପାପ କରୁଥିବା ଲୋକଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ ନ କଲେ, ସେମାନଙ୍କ ସଙ୍ଗ ଓ ମିଶ୍ରଭାବରୁ ନିର୍ଦୋଷ ସଜ୍ଜନମାନେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ପରି ଦଣ୍ଡର ସ୍ପର୍ଶ ପାଆନ୍ତି। ଯେପରି ଶୁଖିଲା କାଠ ସହ ମିଶିଲେ ଭିଜା କାଠ ମଧ୍ୟ ଜଳିଯାଏ, ସେପରି ଦୁଷ୍ଟଙ୍କ ସହ କେବେ ମେଳ କିମ୍ବା ସନ୍ଧି କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।

Verse 71

निजानुत्पतत: शत्रून्‌ू पजच पउठ्चप्रयोजनान्‌ । यो मोहान्न निगृह्नाति तमापद्‌ ग्रसते नरम्‌,जो पाँच विषयोंकी ओर दौड़नेवाले अपने पाँच इन्द्रियरूपी शत्रुओंको मोहके कारण वशमें नहीं करता, उस मनुष्यको विपत्ति ग्रस लेती है

ପାଞ୍ଚ ବିଷୟର ଦିଗକୁ ଧାଉଥିବା ନିଜର ପାଞ୍ଚ ଇନ୍ଦ୍ରିୟରୂପ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଯେ ମୋହବଶତଃ ନିଗ୍ରହ କରେ ନାହିଁ, ସେ ମନୁଷ୍ୟକୁ ବିପତ୍ତି ଗ୍ରସି ନେଇଥାଏ।

Verse 72

अनसूया<<्जवं शौचं संतोष: प्रियवादिता | दम: सत्यमनायासो न भवन्‍न्ति दुरात्मनाम्‌,गुणोंमें दोष न देखना, सरलता, पवित्रता, संतोष, प्रिय वचन बोलना, इन्द्रियदमन, सत्यभाषण तथा सरलता--ये गुण दुरात्मा पुरुषोंमें नहीं होते

ଦୋଷ ନ ଦେଖିବା, ସରଳତା, ପବିତ୍ରତା, ସନ୍ତୋଷ, ପ୍ରିୟବାଦିତା, ଇନ୍ଦ୍ରିୟଦମନ, ସତ୍ୟଭାଷଣ ଓ ନିଷ୍କପଟ ଆଚରଣ—ଏହି ଗୁଣଗୁଡ଼ିକ ଦୁରାତ୍ମାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ନଥାଏ।

Verse 73

आत्मज्ञानमसंरम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता | वाक्‌ चैव गुप्ता दानं॑ च नैतान्यन्त्येषु भारत,भारत! आत्मज्ञान, अक्रोध, सहनशीलता, धर्म-परायणता, वचनकी रक्षा तथा दान--ये गुण अधम पुरुषोंमें नहीं होते

ହେ ଭାରତ! ଆତ୍ମଜ୍ଞାନ, ଅକ୍ରୋଧ, ତିତିକ୍ଷା, ଧର୍ମରେ ନିତ୍ୟସ୍ଥିରତା, ସଂଯତ ବାକ୍ ଓ ଦାନ—ଏହି ଗୁଣଗୁଡ଼ିକ ଅଧମ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ନଥାଏ।

Verse 74

आक्रोशपरिवादाभ्यां विहिंसन्त्यबुधा बुधान्‌ । वक्ता पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्यते,मूर्ख मनुष्य विद्वानोंको गाली और निन्दासे कष्ट पहुँचाते हैं। गाली देनेवाला पापका भागी होता है और क्षमा करनेवाला पापसे मुक्त हो जाता है

ମୂର୍ଖମାନେ ଗାଳି ଓ ନିନ୍ଦା ଦ୍ୱାରା ବୁଦ୍ଧିମାନଙ୍କୁ ଆଘାତ କରନ୍ତି। ଗାଳି ଦେଇଥିବା ଲୋକ ପାପ ଗ୍ରହଣ କରେ, ଏବଂ କ୍ଷମା କରୁଥିବା ଲୋକ ସେହି ପାପରୁ ମୁକ୍ତ ହୁଏ।

Verse 75

हिंसा बलमसाधूनां राज्ञां दण्डविधिबलम्‌ | शुश्रूषा तु बल॑ स्त्रीणां क्षमा गुणवतां बलम्‌,दुष्ट पुरुषोंका बल है हिंसा, राजाओंका बल है दण्ड देना, स्त्रियोंका बल है सेवा और गुणवानोंका बल है क्षमा

ଦୁଷ୍ଟମାନଙ୍କର ବଳ ହେଉଛି ହିଂସା; ରାଜାମାନଙ୍କର ବଳ ହେଉଛି ଧର୍ମସମ୍ମତ ଦଣ୍ଡବିଧାନ; ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କର ବଳ ହେଉଛି ସେବା; ଏବଂ ଗୁଣବାନମାନଙ୍କର ବଳ ହେଉଛି କ୍ଷମା।

Verse 76

वाक्संयमो हि नृपते सुदुष्करतमो मत: । अर्थवच्च विचित्र च न शक्‍्यं बहु भाषितुम्‌,राजन! वाणीका पूर्ण संयम तो बहुत कठिन माना ही गया है; परंतु विशेष अर्थयुक्त और चमत्कारपूर्ण वाणी भी अधिक नहीं बोली जा सकती (इसलिये अत्यन्त दुष्कर होनेपर भी वाणीका संयम करना ही उचित है)

ହେ ନୃପତେ! ବାକ୍‌ସଂଯମ ସର୍ବାଧିକ ଦୁଷ୍କର ବୋଲି ମନାଯାଏ; ଅର୍ଥବତୀ ଓ ବିଚିତ୍ର ବାଣୀ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ କହିହେବ ନାହିଁ—ଏହିପରି କଠିନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ବାକ୍‌ସଂଯମ ହିଁ ଉଚିତ।

Verse 77

अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक्‌ सुभाषिता | सैव दुर्भाषिता राजन्ननर्थायोपपद्यते,राजन! मधुर शब्दोंमें कही हुई बात अनेक प्रकारसे कल्याण करती है; किंतु वही यदि कट शब्दोंमें कही जाय तो महान्‌ अनर्थका कारण बन जाती है

ହେ ରାଜନ! ସୁଭାଷିତ ବାଣୀ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାରର କଲ୍ୟାଣ ଆଣେ; କିନ୍ତୁ ସେଇ ଏକେ ବାଣୀ ଯଦି ଦୁର୍ଭାଷିତ ଭାବେ କହାଯାଏ, ତେବେ ମହା ଅନର୍ଥର କାରଣ ହୁଏ।

Verse 78

रोहते सायकैर्िंद्ध वनं परशुना हतम्‌ । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम्‌,बाणोंसे बिंधा हुआ तथा फरसेसे काटा हुआ वन भी अंकुरित हो जाता है; किंतु कट वचन कहकर वाणीसे किया हुआ भयानक घाव नहीं भरता

ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ ଓ ପରଶୁରେ କାଟା ଜଙ୍ଗଲ ମଧ୍ୟ ପୁଣି ଅଙ୍କୁରିତ ହୁଏ; କିନ୍ତୁ କଟୁ ବଚନରେ ବାଣୀ ଦ୍ୱାରା ହୋଇଥିବା ଭୟଙ୍କର ଘାଉ ଭରେ ନାହିଁ।

Verse 79

कर्णिनालीकनाराचान्‌ निर्हरन्ति शरीरत: । वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तु शक्यो हृदिशयो हि सः

କାଣ୍ଟାଯୁକ୍ତ ଓ ଲୋହା-ମୁଣ୍ଡିଆ ବାଣ ଶରୀରରୁ ବାହାର କରାଯାଇପାରେ; କିନ୍ତୁ କ୍ରୁର ବାଣୀର ଶଲ୍ୟ ବାହାର କରିହେବ ନାହିଁ, କାରଣ ସେ ହୃଦୟରେ ରହିଯାଏ।

Verse 80

कर्णि, नालीक और नाराच नामक बाणोंको शरीरसे निकाल सकते हैं, परंतु कटु वचनरूपी बाण नहीं निकाला जा सकता; क्योंकि वह हृदयके भीतर धँस जाता है ।। वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहत: शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान्‌ पण्डितो नावसूजेत्‌ परेभ्य:,कट वचनरूपी बाण मुखसे निकलकर दूसरोंके मर्मस्थानपर ही चोट करते हैं; उनसे आहत मनुष्य रात-दिन घुलता रहता है। अतः विद्वान पुरुष दूसरोंपर उनका प्रयोग न करे

ବିଦୁର କହିଲେ— କର୍ଣୀ, ନାଳୀକ ଓ ନାରାଚ ନାମକ ବାଣ ଶରୀରରୁ ବାହାର କରାଯାଇପାରେ; କିନ୍ତୁ କଟୁବଚନରୂପୀ ବାଣ ବାହାର କରାଯାଇପାରେ ନାହିଁ, କାରଣ ସେ ହୃଦୟର ଭିତରେ ଗଭୀରେ ଧସିଯାଏ। ବାକ୍‌ବାଣ ମୁଖରୁ ନିଷ୍ପତ୍ତି ହୁଏ; ତାହାରେ ଆହତ ମନୁଷ୍ୟ ରାତିଦିନ ଶୋକ କରେ। ସେଗୁଡ଼ିକ ପରର ମର୍ମସ୍ଥାନରେ ପଡ଼େ; ତେଣୁ ପଣ୍ଡିତ ଲୋକ ଅନ୍ୟଙ୍କ ଉପରେ ଏପରି କଥା ଛାଡ଼ିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।

Verse 81

यस्मै देवा: प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम्‌ | बुद्धि तस्पापकर्षन्ति सोडवाचीनानि पश्यति,देवतालोग जिसे पराजय देते हैं, उसकी बुद्धिको पहले ही हर लेते हैं; इससे वह नीच कर्मोंपर ही अधिक दृष्टि रखता है

ବିଦୁର କହିଲେ— ଯାହାକୁ ଦେବତାମାନେ ପରାଜୟ ଦେବାକୁ ଠାରୁଛନ୍ତି, ତାଙ୍କର ବୁଦ୍ଧିକୁ ସେମାନେ ପ୍ରଥମେ ହରଣ କରନ୍ତି; ତାପରେ ସେ ବିବେକହୀନ ହୋଇ ନୀଚ ଓ ଅନୁଚିତ କର୍ମରେ ମାତ୍ର ଦୃଷ୍ଟି ରଖେ ଏବଂ ସେଇପଥେ ବିନାଶକୁ ଯାଏ।

Verse 82

बुद्धी कलुषभूतायां विनाशे प्रत्युपस्थिते । अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति,विनाशकाल उपस्थित होनेपर बुद्धि मलिन हो जाती है; फिर तो न्यायके समान प्रतीत होनेवाला अन्याय हृदयसे बाहर नहीं निकलता

ବିଦୁର କହିଲେ— ବିନାଶ ସମୀପ ଆସିଲେ ବୁଦ୍ଧି ମଲିନ ହୋଇଯାଏ; ତାପରେ ନ୍ୟାୟ ପରି ଦେଖାଯାଉଥିବା ଅନ୍ୟାୟ ହୃଦୟରୁ ସରେ ନାହିଁ—ସେଠି ନୀତି ଭଳି ଲାଗି ଅଟକି ରହେ।

Verse 83

सेय॑ बुद्धि: परीता ते पुत्राणां भरतर्षभ । पाण्डवानां विरोधेन न चैनानवबुध्यसे,भरतश्रेष्ठ) आपके पुत्रोंकी वह बुद्धि पाण्डवोंके प्रति विरोधसे व्याप्त हो गयी है; आप इन्हें पहचान नहीं रहे हैं

ବିଦୁର କହିଲେ— ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମ ପୁଅମାନଙ୍କର ବୁଦ୍ଧି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ବିରୋଧରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଆବୃତ ହୋଇଯାଇଛି; ସେହିକାରଣେ ତୁମେ ସେମାନେ କ’ଣ ହେଉଛନ୍ତି ତାହା ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ବୁଝୁନାହାଁ।

Verse 84

राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्यापि यो भवेत्‌ | शिष्यस्ते शासिता सोडस्तु धृतराष्ट्र युधिष्ठिर:

ବିଦୁର କହିଲେ— ହେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ଯେ ରାଜା ସମସ୍ତ ରାଜଲକ୍ଷଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇ ତ୍ରିଲୋକର ମଧ୍ୟ ଅଧିପତି ହେଉ, ସେ ମଧ୍ୟ ଶାସନ-ଶିଷ୍ଟାଚାର ଗ୍ରହଣ କରିବା ଉଚିତ୍। ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତୁମ ଶିଷ୍ୟ—ଉପଦେଶରେ ଚାଲେ, ନିୟନ୍ତ୍ରଣ ମାନେ; ତେଣୁ ମୋହ ତ୍ୟାଗ କରି ପରାମର୍ଶ ଅନୁସାରେ ରାଜ୍ୟ ଚଳାଅ।

Verse 85

महाराज धुतराष्ट्र!्‌ जो राजलक्षणोंसे सम्पन्न होनेके कारण त्रिभुवनका भी राजा हो सकता है, वह आपका आज्ञाकारी युधिष्ठिर ही इस पृथ्वीका शासक होनेयोग्य है ।। अतीत्य सर्वान्‌ पुत्रांस्ते भागधेयपुरस्कृत: । तेजसा प्रज्ञया चैव युक्तो धर्मार्थतत्त्ववित्‌,वह धर्म तथा अर्थके तत्त्वको जाननेवाला, तेज और बुद्धिसे युक्त, पूर्ण सौभाग्यशाली तथा आपके सभी पुत्रोंसे बढ़-चढ़कर है

ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ଯିଏ ରାଜଲକ୍ଷଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇ ତ୍ରିଭୁବନକୁ ମଧ୍ୟ ଶାସନ କରିପାରେ, ସେଇ ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞାକାରୀ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ହିଁ ଏହି ପୃଥିବୀ ଶାସନ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ। ସେ ଆପଣଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ଭାଗ୍ୟଶାଳୀ, ତେଜ ଓ ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ଯୁକ୍ତ, ଧର୍ମ-ଅର୍ଥର ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞ।

Verse 86

अनुक्रोशादानृशंस्याद्‌ यो$सौ धर्मभृतां वर: । गौरवात्‌ तव राजेन्द्र बहून्‌ क्लेशांस्तितिक्षति,राजेन्द्र! धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर दया, सौम्यभाव तथा आपके प्रति गौरव-बुद्धिके कारण बहुत कष्ट सह रहा है

ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଧର୍ମଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କରୁଣା ଓ ଅନୃଶଂସ୍ୟ (ଅକ୍ରୂର ସୌମ୍ୟଭାବ) ଦ୍ୱାରା, ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରତି ଗୌରବ-ବୁଦ୍ଧିର କାରଣରୁ, ଅନେକ କ୍ଲେଶ ସହୁଛନ୍ତି।

Frequently Asked Questions

Dhṛtarāṣṭra’s conflict between attachment-driven political choices and the obligation to enact justice and stability—intensified by fear of Saṃjaya’s forthcoming public message.

Wise leadership is defined by self-mastery, truthful and measured speech, confidentiality in counsel, and prioritizing dharma and artha over impulsive desire; these traits prevent personal anxiety from becoming state disorder.

No formal phalaśruti is stated; the chapter instead embeds pragmatic ‘results’ language—linking virtues like truth, restraint, and secrecy of counsel to social trust, political stability, and avoidance of ruin.