
Adhyāya 20 — Rājadharma Argument for Paternal Inheritance and Timely Conciliation
Upa-parva: Udyoga Parva — Court Counsel on Inheritance and Conciliation (Adhyāya 20 Context Unit)
Vaiśaṃpāyana reports that Drupada’s priest arrives at the Kuru court and is respectfully received by Dhṛtarāṣṭra, Bhīṣma, and Vidura. Speaking amid the military leadership, he frames his address as a reminder of the already-known, eternal rājadharma. He asserts that Dhṛtarāṣṭra and Pāṇḍu are sons of one father and therefore share equal paternal wealth; the Kauravas have obtained it while the Pāṇḍavas have been denied their rightful portion. He recalls the Pāṇḍavas’ prolonged hardships—humiliation, forest exile for thirteen years, and concealment—yet emphasizes their current preference for peaceful accommodation, seeking their own without societal destruction. He then introduces a strategic caution: the Pāṇḍavas possess substantial assembled forces, with Arjuna distinguished among armies and Vāsudeva Kṛṣṇa likewise exceptional in brilliance and intelligence. Given the coalition’s magnitude, Arjuna’s prowess, and Kṛṣṇa’s counsel, he questions the rationality of choosing confrontation. The chapter closes with an urgent policy injunction: grant what must be granted according to dharma and proper timing, lest the opportunity pass.
Chapter Arc: वैशम्पायन के वचन से सभा का दृश्य खुलता है: त्रुपद के पुरोहित (दूत-रूप में) कौरव-सभा में पहुँचकर पहले कुशल-क्षेम पूछते हैं और फिर राजधर्म की स्मृति दिलाने को वाणी उठाते हैं। → दूत स्पष्ट करता है कि सबको सनातन राजधर्म विदित है, फिर भी लोभ-वश उसे भुलाया जा रहा है। वह द्यूत, वनवास और तेरह वर्ष के निर्वासन—इन सबको धृतराष्ट्र की अनुमोदना सहित स्मरण कराकर कौरवों के नैतिक ऋण को सभा के बीच उजागर करता है। → वह पाण्डव-पक्ष की शक्ति का निर्णायक चित्र खींचता है—अर्जुन का अतुल पराक्रम और वासुदेव कृष्ण की महाद्युति-बुद्धि को सामने रखकर पूछता है: इतनी सेनाओं की बहुलता, किरीटी का विक्रम और कृष्ण की नीति जानकर कौन युद्ध का साहस करेगा? → दूत निष्कर्ष देता है कि पाण्डव युद्ध नहीं चाहते; वे लोक-विनाश के बिना अपना अधिकार चाहते हैं। अतः कौरव समय रहते, धर्म और पूर्व-प्रतिज्ञा के अनुसार, जो देना चाहिए वह दे दें—काल हाथ से न निकल जाए। → सभा पर यह वाणी एक चुनौती बनकर ठहरती है—क्या धृतराष्ट्र और दुर्योधन धर्म-मार्ग चुनेंगे, या युद्ध की ओर ही बढ़ेंगे?
Verse 1
#5०3८5>> ब । #/्>स - 'खड््ग' दुधारी तलवारको कहते हैं। (संजययानपर्व) विंशो< ध्याय: ट्रुपदके पुरोहितका कौरवसभामें भाषण वैशम्पायन उवाच स च कौरव्यमासाद्य द्रुपदस्य पुरोहित: । सत्कृतो धृतराष्ट्रेण भीष्मेण विदुरेण च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर ट्रुपदके पुरोहित कौरवनरेशके पास पहुँचकर राजा धुृतराष्ट्र, भीष्म तथा विदुरजीद्वारा सम्मानित हुए
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଦ୍ରୁପଦଙ୍କ ପୁରୋହିତ କୌରବରାଜଙ୍କ ସଭାକୁ ଆସିଲେ। ସେଠାରେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ଭୀଷ୍ମ ଓ ବିଦୁର ତାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଲେ।
Verse 2
सर्व कौशल्यमुक्त्वा55दौ पृष्टवा चैवमनामयम् । सर्वसेनाप्रणेतृणां मध्ये वाक्यमुवाच ह,उन्होंने पहले (अपने पक्षके लोगोंका) सारा कुशलसमाचार बताकर धूृतराष्ट्र आदिके स्वास्थ्यका समाचार पूछा, फिर सम्पूर्ण सेनानायकोंके समक्ष इस प्रकार कहा--
ସେ ପ୍ରଥମେ ସମସ୍ତଙ୍କ କୁଶଳ ସମ୍ବାଦ ଜଣାଇ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଆଦିଙ୍କ ଆରୋଗ୍ୟ ପଚାରି, ପରେ ସମସ୍ତ ସେନାନାୟକଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏହି କଥା କହିଲେ।
Verse 3
सर्वेर्भवद्धिर्विदितो राजधर्म: सनातन: । वाक्योपादानहेतोस्तु वक्ष्यामि विदिते सति,“आप सब लोग सनातन राजधर्मको अच्छी तरह जानते हैं। जाननेपर भी स्वयं इसलिये कुछ कह रहा हूँ कि अन्तमें कुछ आपलोगोंके मुखसे भी सुननेका अवसर मिले
ଆପଣମାନେ ସମସ୍ତେ ସନାତନ ରାଜଧର୍ମକୁ ଭଲଭାବେ ଜାଣନ୍ତି। ତଥାପି, କଥାର ଆଧାର ସ୍ଥିର କରିବା ପାଇଁ, ଜଣାଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ କହୁଛି—ଯେଣୁ ଶେଷରେ ତାହା ଆପଣମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ମଧ୍ୟ ଶୁଣିବାକୁ ମିଳୁ।
Verse 4
धृतराष्ट्रश्न पाण्डुश्व सुतावेकस्य विश्रुतौ । तयो: समान द्रविणं पैतृकं नात्र संशय:,'राजा धृतराष्ट्र तथा पाण्डु दोनों एक ही पिताके सुविख्यात पुत्र हैं। पैतृक सम्पत्तिमें दोनोंका समान अधिकार है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। धृतराष्ट्रके जो पुत्र हैं, उन्होंने तो पैतृक धन प्राप्त कर लिया, परंतु पाण्डवोंको वह पैतृक सम्पत्ति क्यों न प्राप्त हो?
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ପାଣ୍ଡୁ—ଏକେ ପିତାଙ୍କ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଦୁଇ ପୁତ୍ର। ତେଣୁ ପୈତୃକ ଧନରେ ଉଭୟଙ୍କ ସମାନ ଅଧିକାର; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 5
धृतराष्ट्रस्य ये पुत्रा: प्राप्तं तैः पैतृकं वसु । पाण्डुपुत्रा: कथं नाम न प्राप्ता: पैतृक वसु,'राजा धृतराष्ट्र तथा पाण्डु दोनों एक ही पिताके सुविख्यात पुत्र हैं। पैतृक सम्पत्तिमें दोनोंका समान अधिकार है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। धृतराष्ट्रके जो पुत्र हैं, उन्होंने तो पैतृक धन प्राप्त कर लिया, परंतु पाण्डवोंको वह पैतृक सम्पत्ति क्यों न प्राप्त हो?
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ପୈତୃକ ଧନ ପାଇଛନ୍ତି; ତେବେ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନେ ସେହି ପୈତୃକ ଧନ କାହିଁକି ପାଇବେ ନାହିଁ?
Verse 6
एवंगते पाण्डवेयैरविंदितं व: पुरा यथा । न प्राप्तं पैतृक द्रव्यं धृतराष्ट्रण संवृतम्,“धृतराष्ट्रने सारा धन अपने अधिकारमें कर लिया; इसलिये पाण्घुपुत्रोंको पैतृक धन नहीं मिला है, यह बात आपलोग पहलेसे ही जानते हैं
ତୁମେ ପୂର୍ବରୁ ଯେପରି ଜାଣିଥିଲ, ଘଟଣା ଏପରି ହୋଇ ଆସିଲା ଯେ ଏହି ବିଷୟରେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିର୍ଦୋଷ; ପୈତୃକ ଧନ ସେମାନଙ୍କୁ ମିଳିଲା ନାହିଁ, କାରଣ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ତାହାକୁ ନିଜ ଅଧିକାରରେ ଅଟକାଇ ରଖିଥିଲେ।
Verse 7
प्राणान्तिकैरप्युपायै: प्रयतद्धिरनेकश: । शेषवन्तो न शकिता नेतुं वै यमसादनम्,“उसके बाद दुर्योधन आदि धुृतराष्ट्र-पुत्रोंने प्राणान््तकारी उपायोंद्वारा अनेक बार पाण्डवोंको नष्ट करनेका प्रयत्न किया; परंतु इनकी आयु शेष थी, इसलिये वे इन्हें यमलोक न पहुँचा सके
ତାପରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଆଦି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନେ ପ୍ରାଣାନ୍ତକ ଉପାୟରେ ଅନେକଥର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ନଷ୍ଟ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ; କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କର ଆୟୁ ଅବଶିଷ୍ଟ ଥିବାରୁ ସେମାନଙ୍କୁ ଯମସଦନକୁ ପଠାଇ ପାରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 8
पुनश्च वर्धितं राज्यं स्वबलेन महात्मभि: । छद्दानापद्तं क्षुद्रेर्धार्तराष्ट: ससौबलै:,“फिर महात्मा पाण्डवोंने अपने बाहुबलसे नूतन राज्यकी प्रतिष्ठा करके उसे बढ़ा लिया; परंतु शकुनि-सहित क्षुद्र धृतराष्ट्र-पुत्रोंने जूएमें छल-कपटका आश्रय ले उसका हरण कर लिया
ପୁନର୍ବାର ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନେ ନିଜ ବାହୁବଳରେ ନୂତନ ରାଜ୍ୟ ସ୍ଥାପନ କରି ତାହାକୁ ବୃଦ୍ଧି କଲେ; କିନ୍ତୁ ଶକୁନି ସହିତ ନୀଚ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନେ ଦ୍ୟୁତରେ ଛଳ-କପଟର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ତାହାକୁ ହରଣ କରିନେଲେ।
Verse 9
तदप्यनुमतं कर्म यथायुक्तमनेन वै । वासिताश्ष महारण्ये वर्षाणीह त्रयोदश,“तत्पश्चात् धृतराष्ट्रने भी उस द्यूतकर्मका अनुमोदन किया और उन्होंने जैसा आदेश दिया, उसके अनुसार पाण्डव महान् वनमें तेरह वर्षोतक- निवास करनेके लिये विवश हुए
ସେହି କର୍ମକୁ ମଧ୍ୟ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଯଥାବିଧି ଅନୁମୋଦନ କଲେ; ଏବଂ ତାଙ୍କ ଆଦେଶାନୁସାରେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଏଠାରେ ମହାଅରଣ୍ୟରେ ତେର ବର୍ଷ ବାସ କରିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ହେଲେ।
Verse 10
सभायां क्लेशितैवीरै: सहभार्यैस्तथा भृशम् । अरण्ये विविधा: क्लेशा: सम्प्राप्तास्तै: सुदारुणा:,'पत्नीसहित वीर पाण्डवोंको कौरव-सभामें भारी क्लेश पहुँचाया गया तथा वनमें भी उन्हें नाना प्रकारके भयंकर कष्ट भोगने पड़े
ସଭାରେ ସେହି ବୀରମାନେ ପତ୍ନୀମାନଙ୍କ ସହିତ ଭୟଙ୍କର କ୍ଲେଶ ପାଇଲେ; ଏବଂ ଅରଣ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ଉପରେ ନାନା ପ୍ରକାର ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦାରୁଣ କଷ୍ଟ ଆସିପଡ଼ିଲା।
Verse 11
तथा विराटनगरे योन्यन्तरगतैरिव । प्राप्त: परमसंक्लेशो यथा पापैर्महात्मभि:,“इतना ही नहीं, दूसरी योनिमें पड़े हुए पापियोंकी तरह विराटनगरमें भी इन महात्माओंको महान् क्लेश सहन करना पड़ा है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେପରି ଅନ୍ୟ ଯୋନିରେ ପତିତ ପାପୀମାନେ ନିଜ କର୍ମଫଳରେ ଘୋର ଦୁଃଖ ଭୋଗନ୍ତି, ସେପରି ବିରାଟନଗରରେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ମହାତ୍ମାମାନେ ପରମ କ୍ଲେଶ ସହିଥିଲେ।
Verse 12
ते सर्व पृष्ठतः कृत्वा तत् सर्व पूर्वकिल्बिषम् | सामैव कुरुभि: सार्धमिच्छन्ति कुरुपुड्रवा:,'पहलेके किये हुए इन सब अत्याचारोंको भुलाकर वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डव अब भी इन कौरवोंके साथ मेल-जोल ही रखना चाहते हैं
ସେଇ କୁରୁପୁଙ୍ଗବ ପାଣ୍ଡବମାନେ ପୂର୍ବର ସମସ୍ତ ଅପରାଧ-ଅତ୍ୟାଚାରକୁ ପଛେ ରଖି, ଏବେ ମଧ୍ୟ କୌରବମାନଙ୍କ ସହ ସାମ—ମେଳମିଶା ଓ ସୌହାର୍ଦ୍ୟ ହିଁ ଚାହୁଁଛନ୍ତି।
Verse 13
तेषां च वृत्तमाज्ञाय वृत्तं दुर्योधनस्य च । अनुनेतुमिहारन्ति धार्तराष्ट्रं सुहज्जना:,'पाण्डवोंके आचार-व्यवहारको तथा दुर्योधनके बर्तावको जानकर (उभयपक्षका हित चाहनेवाले) सुहृदोंका यह कर्तव्य है कि वे दुर्योधनको समझावें
ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଆଚରଣ ଓ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ବ୍ୟବହାର ଜାଣି, ଉଭୟ ପକ୍ଷର ହିତ ଚାହୁଁଥିବା ସୁହୃଦ୍ଜନମାନେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଉପଦେଶ ଦେଇ ସାମମାର୍ଗକୁ ଆଣିବା ଉଚିତ।
Verse 14
नहिते विग्रहं वीरा: कुर्वन्ति कुरुभि: सह । अविनाशेन लोकस्य काड्क्षन्ते पाण्डवा: स्वकम्,“वीर पाण्डव कौरवोंके साथ युद्ध नहीं कर रहे हैं, वे जनसंहार किये बिना ही अपना राज्य पाना चाहते हैं
ସେଇ ବୀର ପାଣ୍ଡବମାନେ କୌରବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ ଚାହୁଁନାହାନ୍ତି। ଲୋକଙ୍କ ବିନାଶ ନ ହେଉ, ସେପରି ଭାବେ ନିଜ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ରାଜ୍ୟ ପାଇବାକୁ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି।
Verse 15
यश्चापि धार्तराष्ट्रस्य हेतु: स्याद् विग्रहं प्रति । स च हेतुर्न मन्तव्यो बलीयांसस्तथा हि ते,“दुर्योधन जिस हेतुको सामने रखकर युद्धके लिये उत्सुक है, उसे यथार्थ नहीं मानना चाहिये; क्योंकि पाण्डव इन कौरवोंसे अधिक बलिष्ठ हैं
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଯେ କୌଣସି ହେତୁ ଦେଖାଉ, ସେହି ହେତୁକୁ ଯଥାର୍ଥ ବୋଲି ମାନିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; କାରଣ ପ୍ରକୃତରେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଅଧିକ ବଳବାନ।
Verse 16
अक्षौहिण्यश्व सप्तैव धर्मपुत्रस्य संगता: | युयुत्समाना: कुरुभि: प्रतीक्षन्तेडस्य शासनम्,“धर्मपुत्र युधिष्ठिरके पास सात अक्षौहिणी सेनाएँ भी एकत्र हो गयी हैं, जो कौरवोंके साथ युद्धकी अभिलाषा रखकर उनके आदेशभरकी प्रतीक्षा कर रही हैं
ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖରେ ସାତ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଏକତ୍ର ହୋଇଛି। କୌରବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଉତ୍ସୁକ ହୋଇ, ସେମାନେ କେବଳ ତାଙ୍କ ଆଦେଶକୁ ଅପେକ୍ଷା କରି ସଜାଗ ରହିଛନ୍ତି।
Verse 17
अपरे पुरुषव्याप्रा: सहस्राक्षोहिणीसमा: । सात्यकिर्भीमसेनश्व॒ यमौ च सुमहाबलौ,“इसके सिवा सात्यकि, भीमसेन तथा महाबली नकुल-सहदेव आदि जो दूसरे पुरुषसिंह वीर हैं, वे अकेले हजार अक्षौहिणी सेनाओंके समान हैं
ଏହା ଛଡ଼ା ସାତ୍ୟକି, ଭୀମସେନ ଏବଂ ସୁମହାବଳୀ ଯମଜ—ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ—ଆଦି ଅନ୍ୟ ପୁରୁଷସିଂହ ବୀରମାନେ ଅଛନ୍ତି; ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଜଣେ ହଜାର ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସମାନ।
Verse 18
एकादशैता: पृतना एकतश्न समागता: । एकतश्च महाबाहुर्बहुरूपी धनंजय:,'ये कौरवोंकी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ एक ओरसे आवें और दूसरी ओर केवल अनेक रूपधारी- महाबाहु अर्जुन हों, तो वे अकेले ही इन सबके लिये पर्याप्त हैं
କୌରବମାନଙ୍କ ଏହି ଏକାଦଶ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଏକ ପକ୍ଷରେ ଏକତ୍ର ହେଉ, ଓ ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷରେ କେବଳ ବହୁରୂପଧାରୀ ମହାବାହୁ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନ ଥାଉ—ତଥାପି ସେ ଏକା ହିଁ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ।
Verse 19
यथा किरीटी सर्वभ्य: सेनाभ्यो व्यतिरिच्यते । एवमेव महाबाहुर्वासुदेवो महाद्युति:,'जैसे किरीटथारी अर्जुन अकेले ही इन सब सेनाओंसे बढ़कर हैं, उसी प्रकार महातेजस्वी महाबाहु श्रीकृष्ण भी हैं
ଯେପରି କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ ଏକା ହିଁ ସମସ୍ତ ସେନାଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ସେପରି ମହାଦ୍ୟୁତି ମହାବାହୁ ବାସୁଦେବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରନ୍ତି।
Verse 20
बहुलत्वं च सेनानां विक्रमं च किरीटिन: । बुद्धिमत्त्वं च कृष्णस्य बुद्ध्वा युध्येत को नर:,'युधिष्ठिरकी सेनाओंके बाहुल्य, किरीटधारी अर्जुनके पराक्रम तथा भगवान् श्रीकृष्णकी बुद्धिमत्ताको जान लेनेपर कौन मनुष्य पाण्डवोंके साथ युद्ध कर सकता है? इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि पुरोहितयाने विंशोडध्याय:
ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେନାର ବହୁଳତା, କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ବିକ୍ରମ ଏବଂ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ବୁଦ୍ଧିମତ୍ତା—ଏ ସବୁ ଜାଣିଲା ପରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ କିଏ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ?
Verse 21
ते भवन्तो यथाधर्म यथासमयमेव च । प्रयच्छन्तु प्रदातव्यं मा व: कालो5त्यगादयम्,“अतः: आपलोग अपने धर्म और पहले की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार पाण्डवोंको उनका आधा राज्य, जो उन्हें मिलना ही चाहिये, दे दीजिये। कहीं ऐसा न हो कि यह सुन्दर अवसर आपलोगोंके हाथसे निकल जाय”
ଅତଏବ ଆପଣମାନେ ଧର୍ମ ଓ ପୂର୍ବ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଅନୁସାରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ଅବଶ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ୟ ଅର୍ଧରାଜ୍ୟ ଦେଇଦିଅନ୍ତୁ। ଏହି ସୁନ୍ଦର ସୁଯୋଗ ଆପଣମାନଙ୍କ ହାତରୁ ଖସିନଯାଉ।
The dilemma is whether the Kuru leadership should uphold lawful inheritance and restitution—despite political inconvenience—or persist in withholding paternal property, thereby prioritizing control over justice and increasing systemic instability.
Ethical policy is time-sensitive: rulers should correct injustice through lawful, proportionate concessions early, since delayed redress hardens grievances and narrows peaceful options even when conciliation remains preferable.
No explicit phalaśruti is presented in the provided verses; the chapter’s meta-function is pragmatic and ethical—positioning rāja-dharma and strategic realism as the interpretive lens for evaluating imminent political decisions.