Adhyaya 2
Udyoga ParvaAdhyaya 218 Verses

Adhyaya 2

Udyoga Parva, Adhyaya 2 — Baladeva’s Counsel on Peace, Restitution, and Court Protocol

Upa-parva: Udyoga Parva — Court Counsel on Restitution and Dice-Game Causality (Adhyaya 2 Context Unit)

Baladeva addresses an assembly after hearing counsel attributed to Gada’s elder. He argues that the well-being of both Ajātaśatru (Yudhiṣṭhira) and King Duryodhana can be secured if Dhṛtarāṣṭra’s son grants half the kingdom, enabling the Pāṇḍavas to become pacified and thereby benefiting the subjects through social stability. Baladeva proposes a diplomatic initiative: someone should go to the Kuru-Pāṇḍava forum to learn Duryodhana’s position and convey Yudhiṣṭhira’s words in a manner marked by respectful submission (praṇipāta) and practical effect. He enumerates the elders and key figures to be consulted—Bhīṣma, Dhṛtarāṣṭra (Vaicitravīrya), Droṇa with his son, Vidura, Kṛpa, the Gāndhāra king, and the sūta’s son—along with other senior, tradition-grounded men. The chapter then revisits the dice-game: Yudhiṣṭhira’s kingdom was taken when he was negligent in play, and although warned by well-wishers he still summoned Śakuni (Saubala) and was defeated; Baladeva frames this as context for why careful, conciliatory speech to Dhṛtarāṣṭra’s son is now strategically feasible. Vaiśaṃpāyana concludes by noting that, as Baladeva speaks, a Śini hero abruptly rises, censuring the counsel and responding in anger, indicating contested views on settlement policy.

Chapter Arc: सेनोट्रोग/सेनodyoga-प्रसंग में दूत-यात्रा की भूमिका के बाद सभा में यह प्रश्न उठता है—क्या आधा राज्य देकर भी युद्ध टल सकता है, और क्या दुर्योधन को समझाया जा सकता है? → कुन्तीपुत्रों के त्याग और लोक-शान्ति का तर्क रखा जाता है: ‘अर्ध राज्य’ देकर धृतराष्ट्रपुत्र सुखी रहे, प्रजा का हित हो, और दोनों पक्ष प्रशान्त हों। साथ ही यह भी कहा जाता है कि दूत दुर्योधन का मत जानकर युधिष्ठिर का संदेश भी स्पष्ट करे। → सभा-नीति का निर्णायक क्षण आता है—दूत को किस-किस के सामने बात रखनी है: भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण (सपुत्र), विदुर, कृप, गान्धारराज, और सूतपुत्र कर्ण सहित—अर्थात् कुरु-सभा के समस्त स्तम्भों को साक्षी बनाकर शान्ति-प्रस्ताव रखना। → द्यूत-प्रसंग का नैतिक आधार पुनः स्थापित किया जाता है: युधिष्ठिर जूए में आसक्त हुए, राज्य हरण हुआ, पासों की कपट-प्रवृत्ति (शकुनि) और प्रतिकूलता से क्रोध/संरम्भ बढ़ा—इन सबको स्मरण कर दूत को ‘साम-नीति’ और विनय के साथ धृतराष्ट्र को प्रणाम करके बात रखने की रूपरेखा बनती है। → दूत के प्रस्थान और कुरु-सभा में शान्ति-वाक्य के वास्तविक प्रभाव—विशेषतः दुर्योधन की प्रतिक्रिया—अभी अनिश्चित रह जाती है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ा भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें (दुपदके) पुरोहितका यात्राविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ,ऑपन--माजल बछ। अकाल द्वितीयो&्ध्याय: बलरामजीका भाषण बलदेव उवाच श्रुतं भवद्धिर्गदपूर्वजस्य वाक्‍्यं यथा धर्मवर्दर्थवच्च । अजातशशभत्रोश्ष हित॑ हितं च दुर्योधनस्यापि तथैव राज्ञ: बलदेवजी बोले--सज्जनो! गदाग्रज श्रीकृष्णने जो कुछ धर्मानुकूल तथा अर्थशास्त्रसम्मत सम्भाषण किया है, उसे आप सब लोगोंने सुना है। इसीमें अजातशत्रु युधिष्ठिरका भी हित है तथा ऐसा करनेसे ही राजा दुर्योधनकी भलाई है

ବଳଦେବ କହିଲେ—ସଜ୍ଜନମାନେ! ଗଦାଧାରୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଅଗ୍ରଜ ଯେ ଧର୍ମସମ୍ମତ ଓ ଅର୍ଥନୀତିସମ୍ମତ ବଚନ କହିଛନ୍ତି, ତାହା ଆପଣମାନେ ଶୁଣିଛନ୍ତି। ସେଥିରେ ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ହିତ ଅଛି; ଏବଂ ସେହିପରି ରାଜା ଦୁର୍ୟୋଧନଙ୍କର ମଧ୍ୟ କଲ୍ୟାଣ ଅଛି।

Verse 2

अर्ध हि राज्यस्य विसृज्य वीरा: कुन्तीसुतास्तस्य कृते यतन्ते । प्रदाय चार्थ धृतराष्ट्रपुत्र: सुखी सहास्माभिरतीव मोदेत्‌,वीर कुन्तीकुमार आधा राज्य छोड़कर केवल आधेके लिये ही प्रयत्नशील हैं। दुर्योधन भी पाण्डवोंको आधा राज्य देकर हमारे साथ स्वयं भी सुखी और प्रसन्न होगा इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि बलदेववाक्ये द्वितीयो5ध्याय: ।। २ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें बलदेववाक्यविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ

ବୀର କୁନ୍ତୀସୁତମାନେ ରାଜ୍ୟର ଅର୍ଧ ଛାଡ଼ି ଅବଶିଷ୍ଟ ଅର୍ଧ ପାଇଁ ମାତ୍ର ପ୍ରୟାସ କରୁଛନ୍ତି। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଯଦି ସେହି ଅର୍ଧଭାଗ ଦେଇଦିଏ, ତେବେ ସେ ମଧ୍ୟ ଆମ ସହ ସୁଖୀ ହୋଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆନନ୍ଦିତ ହେବ।

Verse 3

लब्ध्वा हि राज्यं पुरुषप्रवीरा: सम्यक्प्रवृत्तेषु परेषु चैव । ध्रुवं प्रशान्ता: सुखमाविशेयु- स्तेषां प्रशान्तिश्न हितं प्रजानाम्‌,पुरुषोंमें श्रेष्ठ वीर पाण्डव आधा राज्य पाकर दूसरे पक्षकी ओरसे अच्छा बर्ताव होनेपर अवश्य ही शान्त (लड़ाई-झगड़ेसे दूर) रहकर कहीं सुखपूर्वक निवास करेंगे। इससे कौरवोंको शान्ति मिलेगी और प्रजावर्गका भी हित होगा

ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେହି ବୀର ପାଣ୍ଡବମାନେ ଯଦି ରାଜ୍ୟର ଏକ ଭାଗ ପାଆନ୍ତି ଏବଂ ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷ ମଧ୍ୟ ଯଥୋଚିତ ଆଚରଣ କରେ, ତେବେ ସେମାନେ ନିଶ୍ଚୟ ଶାନ୍ତ ହୋଇ ସୁଖରେ ବସବାସ କରିବେ। ସେମାନଙ୍କ ଏହି ପ୍ରଶାନ୍ତି କୌରବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଶାନ୍ତି ଦେବ ଏବଂ ପ୍ରଜାମାନଙ୍କ ହିତ ସାଧନ କରିବ।

Verse 4

दुर्योधनस्यापि मत च वेत्तुं वक्तुं च वाक्‍्यानि युधिष्ठिरस्थ । प्रियं च मे स्थाद्‌ यदि तत्र कश्चिद्‌ व्रजेच्छमार्थ कुरुपाण्डवानाम्‌,यदि दुर्योधनका भी विचार जाननेके लिये, युधिष्ठिरके संदेशको उसके कानोंतक पहुँचानेके लिये तथा कौरव-पाण्डवोंमें शान्ति स्थापित करनेके लिये कोई दूत जाय, तो यह मेरे लिये बड़ी प्रसन्नताकी बात होगी

ବଳରାମ କହିଲେ— ଯଦି କେହି ଦୂତ ହୋଇ ସେଠାକୁ ଯାଇ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ମନୋଭାବ ମଧ୍ୟ ଜାଣି, ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ବାକ୍ୟ ତାଙ୍କ କାନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚାଇ, ଏବଂ କୁରୁ–ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସନ୍ଧି ସ୍ଥାପନ ପାଇଁ ଚେଷ୍ଟା କରେ, ତେବେ ସେଥିରେ ମୋର ଅତ୍ୟନ୍ତ ସନ୍ତୋଷ ହେବ।

Verse 5

स भीष्ममामन्त्रय कुरुप्रवीरं वैचित्रवीर्य च महानुभावम्‌ | द्रोणं सपुत्रं विदुरं कृपं च गान्धारराजं च ससूतपुत्रम्‌,वह दूत वहाँ जाकर कुरुवंशके श्रेष्ठ वीर भीष्म, महानुभाव धृतराष्ट्र, द्रोण, अश्वत्थामा, विदुर, कृपाचार्य, शकुनि, कर्ण तथा दूसरे सब धूृतराष्ट्रपुत्र, जो शक्तिशाली, वेदज्ञ, स्वधर्मनिष्ठ, लोकप्रसिद्ध वीर, विद्यावृद्ध और वयोवृद्ध हैं, उन सबको आमन्त्रित करे और इन सबके आ जाने एवं नागरिकों तथा बड़े बूढ़ोंके सम्मिलित होनेपर वह दूत विनयपूर्वक प्रणाम करके ऐसी बात कहे, जिससे युधिष्ठिरके प्रयोजनकी सिद्धि हो

ବଳରାମ କହିଲେ— ସେ ଦୂତ ସେଠାକୁ ଯାଇ କୁରୁମାନଙ୍କ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀର ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ, ବିଚିତ୍ରବୀର୍ୟ ବଂଶଜ ମହାନୁଭାବ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ, ପୁତ୍ରସହିତ ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ, ବିଦୁରଙ୍କୁ, କୃପଙ୍କୁ, ଗାନ୍ଧାରରାଜଙ୍କୁ ଏବଂ ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବିଧିବତ୍ ଆମନ୍ତ୍ରଣ କରୁ। ସମସ୍ତେ ନାଗରିକ ଓ ବୃଦ୍ଧଜନଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହେଲେ, ଦୂତ ବିନୟରେ ପ୍ରଣାମ କରି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେବ ଏମିତି ବାର୍ତ୍ତା କହୁ।

Verse 6

सर्वे च ये<न्ये धृतराष्ट्रपुत्रा बलप्रधाना निगमप्रधाना: । स्थिताश्च धर्मेषु तथा स्वकेषु लोक प्रवीरा: श्रुतकालवृद्धा:,वह दूत वहाँ जाकर कुरुवंशके श्रेष्ठ वीर भीष्म, महानुभाव धृतराष्ट्र, द्रोण, अश्वत्थामा, विदुर, कृपाचार्य, शकुनि, कर्ण तथा दूसरे सब धूृतराष्ट्रपुत्र, जो शक्तिशाली, वेदज्ञ, स्वधर्मनिष्ठ, लोकप्रसिद्ध वीर, विद्यावृद्ध और वयोवृद्ध हैं, उन सबको आमन्त्रित करे और इन सबके आ जाने एवं नागरिकों तथा बड़े बूढ़ोंके सम्मिलित होनेपर वह दूत विनयपूर्वक प्रणाम करके ऐसी बात कहे, जिससे युधिष्ठिरके प्रयोजनकी सिद्धि हो

ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ—ଯେମାନେ ବଳରେ ଅଗ୍ରଣୀ, ବେଦଜ୍ଞାନରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ନିଜ ନିଜ ଧର୍ମରେ ଦୃଢ଼, ଲୋକମଧ୍ୟରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ବୀର, ଏବଂ ଶ୍ରୁତି-ବିଦ୍ୟା ଓ ବୟସରେ ପକ୍କ—ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଆହ୍ୱାନ କରାଯାଉ।

Verse 7

एतेषु सर्वेषु समागतेषु पौरेषु वृद्धेषु च संगतेषु । ब्रवीतु वाक्‍्यं प्रणिपातयुक्तं कुन्तीसुतस्यार्थकरं यथा स्यात्‌,वह दूत वहाँ जाकर कुरुवंशके श्रेष्ठ वीर भीष्म, महानुभाव धृतराष्ट्र, द्रोण, अश्वत्थामा, विदुर, कृपाचार्य, शकुनि, कर्ण तथा दूसरे सब धूृतराष्ट्रपुत्र, जो शक्तिशाली, वेदज्ञ, स्वधर्मनिष्ठ, लोकप्रसिद्ध वीर, विद्यावृद्ध और वयोवृद्ध हैं, उन सबको आमन्त्रित करे और इन सबके आ जाने एवं नागरिकों तथा बड़े बूढ़ोंके सम्मिलित होनेपर वह दूत विनयपूर्वक प्रणाम करके ऐसी बात कहे, जिससे युधिष्ठिरके प्रयोजनकी सिद्धि हो

ଏ ସମସ୍ତେ—ନାଗରିକ ଓ ବୃଦ୍ଧଜନଙ୍କ ସହ—ଏକତ୍ର ହେଲେ, ଦୂତ ବିନୟରେ ପ୍ରଣାମ କରି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର (ଯୁଧିଷ୍ଠିର)ଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେବ ଏମିତି ବାର୍ତ୍ତା କହୁ।

Verse 8

सर्वास्ववस्थासु च ते न कोप्या ग्रस्‍्तो हि सो5र्थोबलमश्रितैस्तै: | प्रियाभ्युपेतस्य युधिष्ठटिरस्य द्यूते प्रसक्तस्य हृतं च राज्यम्‌,किसी भी दशामें कौरवोंको उत्तेजित या कुपित नहीं करना चाहिये, क्योंकि उन्होंने बलवान्‌ होकर ही पाण्डवोंके राज्यपर अधिकार जमाया है। (युधिष्ठिर भी सर्वथा निर्दोष नहीं हैं, क्योंकि) ये जूएको प्रिय मानकर उसमें आसक्त हो गये थे। तभी इनके राज्यका अपहरण हुआ है

ବଳରାମ କହିଲେ— କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ କୌରବମାନଙ୍କୁ ଉତ୍ତେଜିତ କିମ୍ବା କ୍ରୋଧିତ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; କାରଣ ସେମାନେ ନିଜ ବଳ ଓ ସାଧନର ଆଶ୍ରୟରେ ସତ୍ତା ଦଖଲ କରିଛନ୍ତି। ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମଧ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିର୍ଦ୍ଦୋଷ ନୁହେଁ—ଜୁଆକୁ ପ୍ରିୟ ମାନି ତାହାରେ ଆସକ୍ତ ହୋଇଥିବାରୁ ଦ୍ୟୂତରେ ତାଙ୍କର ରାଜ୍ୟ ହରଣ ହୋଇଥିଲା।

Verse 9

निवार्यमाणश्च कुरुप्रवीर: सर्वे: सुह्द्धिहायमप्यतज्ज्ञ: । स दीव्यमान: प्रतिदीव्य चैनं गान्धारराजस्य सुतं मताक्षम्‌,उत्सृज्य तान्‌ सौबलमेव चायं॑ समाह्दयत्‌ तेन जितो$क्षवत्याम्‌ । अजमीढवंशी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर जूएका खेल नहीं जानते थे। इसीलिये समस्त सुहृदोंने इन्हें मना किया था, (परंतु इन्होंने किसीकी बात नहीं मानी।) दूसरी ओर गान्धारराजका पुत्र शकुनि जूएके खेलमें निपुण था। यह जानते हुए भी ये उसीके साथ बारंबार खेलते रहे। इन्होंने कर्ण और दुर्योधनको छोड़कर शकुनिको ही अपने साथ जूआ खेलनेके लिये ललकारा था। उस सभामें दूसरे भी हजारों जुआरी मौजूद थे, जिन्हें युधिष्ठिर जीत सकते थे। परंतु उन सबको छोड़कर इन्होंने सुबलपुत्रको ही बुलाया। इसीलिये उस जूएमें इनकी हार हुई

ବଳରାମ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ସୁହୃଦମାନେ ରୋକୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ କୁରୁମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ବୀର, ଏ ବିଷୟରେ ଅଜ୍ଞ ଥିବାରୁ, ତାଙ୍କ କଥା ଶୁଣିଲେ ନାହିଁ। ଦ୍ୟୁତ ଆରମ୍ଭ ହେଲାପରେ ସେ ଗାନ୍ଧାରରାଜଙ୍କ ପୁତ୍ର, ପାଶାରେ ନିପୁଣ ଶକୁନି ସହିତ ହିଁ ପୁନଃପୁନଃ ଖେଳିଲେ। ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି କେବଳ ସୌବଳକୁ ହିଁ ସେ ଆହ୍ୱାନ କଲେ; ତେଣୁ ପାଶାପଟରେ ସେ ପରାଜିତ ହେଲେ। ଅଜମୀଢବଂଶୀ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦ୍ୟୁତକ୍ରୀଡ଼ା ଜାଣୁଥିଲେ ନାହିଁ; ତେଣୁ ସୁହୃଦମାନେ ତାଙ୍କୁ ବହୁତ ରୋକିଲେ, କିନ୍ତୁ ସେ ଶୁଣିଲେ ନାହିଁ। ଶକୁନିଙ୍କ ଦକ୍ଷତା ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ତାଙ୍କ ସହିତ ହିଁ ପୁନଃପୁନଃ ଖେଳିଲେ; ସଭାରେ ତାଙ୍କୁ ଜିତିପାରିବା ହଜାରେ ଜୁଆଡ଼ି ଥିଲେ, ତଥାପି ସେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ସୁବଳପୁତ୍ରକୁ ହିଁ ଡାକିଲେ—ଏହି କାରଣରୁ ସେ ଦ୍ୟୁତରେ ହାରିଲେ।

Verse 10

हित्वा हि कर्ण च सुयोधनं च समाह्दयद्‌ देवितुमाजमीढ: । दुरोदरास्तत्र सहस्रशो<न्ये युधिष्ठिरो यान्‌ विषहेत जेतुम्‌

କର୍ଣ୍ଣ ଓ ସୁୟୋଧନକୁ ଛାଡ଼ି ଅଜମୀଢବଂଶୀ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର) ଦ୍ୟୁତ ଖେଳିବାକୁ (ଶକୁନିକୁ) ଆହ୍ୱାନ କଲେ। ସେଠାରେ ଆଉ ହଜାରେ ଦୁରୋଦର ଜୁଆଡ଼ି ଥିଲେ—ଯାହାଙ୍କୁ ଜିତିବା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଦୁଷ୍କର ହେଉଥାନ୍ତା।

Verse 11

स दीव्यमान: प्रतिदेवनेन अक्षेषु नित्यं तु पराड्मुखेषु

ସେ ଦ୍ୟୁତରେ ଲୀନ ହୋଇ, ପୁନଃପୁନଃ ଖେଳୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ପାଶା ପ୍ରତି ସଦା ପରାଙ୍ମୁଖ ଥିବା ପରି ଦେଖାଯାଉଥିଲେ।

Verse 12

तस्मात्‌ प्रणम्यैव वचो ब्रवीतु वैचित्रवीर्य बहुसामयुक्तम्‌

ଏହେତୁ, ହେ ବୈଚିତ୍ରବୀର୍ୟ, ପ୍ରଥମେ ପ୍ରଣାମ କରି, ସୁସଂଗଠିତ ଓ ସାମଭାବରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏମିତି ବଚନ ସେ କହୁ।

Verse 13

अयुद्धमाकाड्क्षत कौरवाणां साम्नैव दुर्योधनमाह्दय ध्वम्‌,कौरव पाण्डवोंमें परस्पर युद्ध हो, ऐसी आकांक्षा न करो--ऐसा कोई कदम न उठाओ। सन्धि या समझौतेकी भावनासे ही दुर्योधनको आमन्त्रित करो। मेल-मिलापसे समझा- बुझाकर जो प्रयोजन सिद्ध किया जाता है, वही परिणाममें हितकारी होता है। युद्धमें तो दोनों पक्षकी ओरसे अन्याय अर्थात्‌ अनीतिका ही बर्ताव किया जाता है और अन्यायसे इस जगत्‌में किसी प्रयोजनकी सिद्धि नहीं हो सकती

ହେ କୌରବମାନେ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ପରସ୍ପର ଯୁଦ୍ଧ ହେଉ—ଏମିତି ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରନି; ସେପରି କୌଣସି ପଦକ୍ଷେପ ନିଅନି। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ କେବଳ ସାମମାର୍ଗରେ, ସନ୍ଧି-ସମାଧାନର ଭାବନାରେ ହିଁ ଆହ୍ୱାନ କର। ମେଳ-ମିଳାପରେ ଧୀରେ ଧୀରେ ବୁଝାଇ ଯେ ପ୍ରୟୋଜନ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ, ସେଇ ଶେଷରେ ହିତକର। ଯୁଦ୍ଧରେ ଦୁଇ ପକ୍ଷରୁ ପ୍ରାୟଃ ଅନୀତି ହିଁ ଚାଲିଥାଏ; ଏବଂ ଅନ୍ୟାୟରେ ଏହି ଜଗତରେ କୌଣସି ପ୍ରୟୋଜନ ସିଦ୍ଧ ହୋଇପାରେ ନାହିଁ।

Verse 14

साम्ना जितो<र्थो5र्थकरो भवेत युद्धेडनयो भविता नेह सो<र्थ:,कौरव पाण्डवोंमें परस्पर युद्ध हो, ऐसी आकांक्षा न करो--ऐसा कोई कदम न उठाओ। सन्धि या समझौतेकी भावनासे ही दुर्योधनको आमन्त्रित करो। मेल-मिलापसे समझा- बुझाकर जो प्रयोजन सिद्ध किया जाता है, वही परिणाममें हितकारी होता है। युद्धमें तो दोनों पक्षकी ओरसे अन्याय अर्थात्‌ अनीतिका ही बर्ताव किया जाता है और अन्यायसे इस जगत्‌में किसी प्रयोजनकी सिद्धि नहीं हो सकती

ବଳରାମ କହିଲେ— ସାମ୍ନା ଓ ସନ୍ଧି-ସମାଧାନରେ ଜିତା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ହିଁ ସତ୍ୟରେ ଫଳଦାୟକ। ଯୁଦ୍ଧରେ ତ ଅନ୍ୟାୟ ହିଁ ପ୍ରବଳ ହୁଏ; ତାହାରେ ଆକାଙ୍କ୍ଷିତ ସିଦ୍ଧି ମିଳେ ନାହିଁ। କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପରସ୍ପର ସଂହାର ହେଉ— ଏମିତି ଆଶା କରନି, ଏବଂ ସେପରି କୌଣସି ପଦକ୍ଷେପ ମଧ୍ୟ ନେଉନି। ସନ୍ଧି ଓ ସମ୍ମତିର ଭାବନାରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ଆମନ୍ତ୍ରଣ କର। ମେଳମିଳାପରେ ବୁଝାଇ ଯେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସାଧିତ ହୁଏ, ସେଇ ଶେଷରେ ହିତକର ହୁଏ। ରଣରେ ଉଭୟ ପକ୍ଷ ଅନିବାର୍ୟ ଭାବେ ଅଧର୍ମାଚରଣକୁ ଝୁକେ; ଅଧର୍ମରେ ଏହି ଜଗତରେ କୌଣସି ସ୍ଥାୟୀ ଲକ୍ଷ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 15

वैशम्पायन उवाच एवं ब्रुवत्येव मधुप्रवीरे शिनिप्रवीर: सहसोत्पपात । तच्चापि वाक्यं परिनिन्द्य तस्य समाददे वाक्यमिदं समन्यु:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मधुवंशके प्रमुख वीर बलदेवजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि शिनिवंशके श्रेष्ठ शूरमा सात्यकि सहसा उछलकर खड़े हो गये। उन्होंने कुपित होकर बलभद्रजीके भाषणकी कड़ी आलोचना करते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜନମେଜୟ! ମଧୁବଂଶର ପ୍ରଧାନ ବୀର ବଳରାମ ଏପରି କହୁଥିବା ସମୟରେ, ଶିନିବଂଶର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୋଦ୍ଧା ସାତ୍ୟକି ହଠାତ୍ ଉଛଳି ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲେ। କ୍ରୋଧରେ ସେ ବଳଭଦ୍ରଙ୍କ ସେହି ଭାଷଣକୁ କଠୋର ଭାବେ ନିନ୍ଦା କରି, ରୋଷପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଏହି କଥା କହିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।

Verse 106

उत्सृज्य तान्‌ सौबलमेव चायं॑ समाह्दयत्‌ तेन जितो$क्षवत्याम्‌ । अजमीढवंशी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर जूएका खेल नहीं जानते थे। इसीलिये समस्त सुहृदोंने इन्हें मना किया था, (परंतु इन्होंने किसीकी बात नहीं मानी।) दूसरी ओर गान्धारराजका पुत्र शकुनि जूएके खेलमें निपुण था। यह जानते हुए भी ये उसीके साथ बारंबार खेलते रहे। इन्होंने कर्ण और दुर्योधनको छोड़कर शकुनिको ही अपने साथ जूआ खेलनेके लिये ललकारा था। उस सभामें दूसरे भी हजारों जुआरी मौजूद थे, जिन्हें युधिष्ठिर जीत सकते थे। परंतु उन सबको छोड़कर इन्होंने सुबलपुत्रको ही बुलाया। इसीलिये उस जूएमें इनकी हार हुई

ବଳରାମ କହିଲେ— ଅଜମୀଢବଂଶଜ, କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି କେବଳ ସୌବଲ (ଶକୁନି) କୁ ହିଁ ପାଶାଖେଳ ପାଇଁ ଆହ୍ୱାନ କଲେ; ଏବଂ ପାଶାରେ ସେଇ ଲୋକଙ୍କ ହାତରେ ହାରିଲେ। ସୁହୃଦମାନେ ମନା କରିଥିଲେ, କିନ୍ତୁ ସେ ଶୁଣିଲେ ନାହିଁ; ଶକୁନି ଜୁଆରେ ପାରଙ୍ଗତ ବୋଲି ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ପୁନଃପୁନଃ ତାଙ୍କୁ ହିଁ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀ କଲେ। ସଭାରେ ଅନ୍ୟ ଅନେକ ଜୁଆରି ଥିଲେ, ଯାହାଙ୍କୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଜିତିପାରିଥାନ୍ତେ; କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କୁ ସବୁକୁ ଛାଡ଼ି ସୌବଲକୁ ହିଁ ଡାକିଲେ। ତେଣୁ ସେହି ହାର କେବଳ ଭାଗ୍ୟ ନୁହେଁ—ଇଚ୍ଛାକୃତ, ନୀତିଦୋଷପୂର୍ଣ୍ଣ ଚୟନର ପରିଣାମ।

Verse 116

संरम्भमाणो विजित: प्रसहा तत्रापराध: शकुनेर्न कश्चित्‌ । जब ये खेलने लगे और प्रतिपक्षीकी ओरसे फेंके हुए पासे जब बराबर इनके प्रतिकूल पड़ने लगे, तब ये और भी रोषावेशमें आकर खेलने लगे। इन्होंने हठपूर्वक खेल जारी रखा और अपनेको हराया, इसमें शकुनिका कोई अपराध नहीं है

ଆବେଶରେ ଉତ୍ତେଜିତ ହୋଇ ସେ ହଠପୂର୍ବକ ଖେଳ ଚାଲୁ ରଖିଲେ ଏବଂ ସେଇ ହଠରେ ହାରିଲେ; ଏଥିରେ ଶକୁନିଙ୍କ କୌଣସି ଅପରାଧ ନାହିଁ।

Verse 126

तथा हि शक्यो धृतराष्ट्रपुत्र: स्वार्थे नियोक्तुं पुरुषेण तेन । इसलिये जो दूत यहाँसे भेजा जाय, वह धृतराष्ट्रको प्रणाम करके अत्यन्त विनयके साथ सामनीतियुक्त वचन कहे। ऐसा करनेसे ही धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको वह पुरुष अपने प्रयोजनकी सिद्धिमें लगा सकता है

କାରଣ ସେହି ପୁରୁଷ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରକୁ ନିଜ ପ୍ରୟୋଜନସିଦ୍ଧିରେ ଲାଗାଇ ପାରେ। ତେଣୁ ଏଠାରୁ ଯେ ଦୂତ ପଠାଯିବ, ସେ ପ୍ରଥମେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରି, ପରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିନୟରେ ସାମନୀତି ଓ ନୀତିଯୁକ୍ତ ବଚନ କହୁ। ଏପରି ଆଚରଣରେ ହିଁ ସେ ଦୂତ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ଅଭିପ୍ରେତ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟସିଦ୍ଧି ଦିଗରେ ନିୟୋଜିତ କରିପାରିବ।

Frequently Asked Questions

Whether political legitimacy and social welfare are better served by restitution and negotiated division of sovereignty, or by insisting on maximal claims despite foreseeable destabilization for the realm and its subjects.

Peace is treated as a public good: the pacification of rulers reduces harm to subjects, and respectful, well-timed speech in institutions can be a dharmic instrument when it aims at restoration and stability.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary function is implicit in Vaiśaṃpāyana’s narrative framing, which marks the counsel as contested and thereby invites evaluation of policy, accountability, and rhetorical method.