Adhyaya 175
Udyoga ParvaAdhyaya 17561 Verses

Adhyaya 175

Amba approaches the Paraśurāma context; Hotravāhana’s counsel and Akṛtavraṇa’s report (अम्बोपाख्यानम्—रामदर्शनप्रसङ्गः)

Upa-parva: Ambopākhyāna (Episode of Amba and Paraśurāma) — within Udyoga-parva

Chapter 175 presents a tightly organized advisory exchange framing Amba’s next recourse. King Sṛñjaya Hotravāhana instructs the princess (Amba) that she will meet Rāma Jāmadagnya in the great forest, engaged in severe austerity, steadfast in truth, and of exceptional strength. The chapter emphasizes Paraśurāma’s stature: sages learned in the Vedas, as well as gandharvas and apsarases, are said to attend upon him on Mahendra mountain. Hotravāhana directs Amba to approach with formal reverence (bowing the head), convey his message, and trust that Paraśurāma—upon hearing Hotravāhana’s name—will assist her purpose. A transition follows: Rāma’s attendant Akṛtavraṇa appears; the assembled forest-dwellers and the aged king rise, exchange courtesies, and sit together, engaging in elevated conversation. Hotravāhana then inquires where Paraśurāma is and whether he can be seen; Akṛtavraṇa replies that Paraśurāma regularly praises Sṛñjaya as a dear royal-sage friend and is expected to arrive by morning, seeking the king’s audience. Akṛtavraṇa asks about the girl’s identity and reason for coming; Hotravāhana identifies her as his granddaughter, the eldest daughter of the king of Kāśī—Amba—along with her younger sisters Ambikā and Ambālikā. He recounts the Kāśī svayaṃvara, Bhīṣma’s forceful seizure of the three princesses, their presentation for Vicitravīrya’s marriage, Amba’s disclosure of her prior mental choice of Śālva, Bhīṣma’s release of her, and Śālva’s subsequent rejection on suspicion of compromised status. Amba confirms the account, states her inability to return home due to shame and fear of dishonor, and resolves that whatever Paraśurāma instructs will be her decisive course of action. The chapter thus establishes the ethical dossier (facts, claims, reputational stakes) to be evaluated by ascetic authority in the next narrative step.

Chapter Arc: तापसों के आश्रम में राजर्षि होत्रवाहन अपनी दुःखित दौहित्री अम्बा को देख कर व्याकुल हो उठते हैं; आश्रम-सभा में यह प्रश्न उठता है कि इस अपमानित राजकन्या का अब क्या मार्ग हो। → तपस्वियों में मतभेद फैलता है—कोई कहते हैं उसे पिता के घर भेज दिया जाए, कोई शाल्वराज के पास जाकर उसे स्वीकार करने को बाध्य किया जाए, और कोई कहते हैं कि शाल्व ने उसे ठुकरा दिया है, अतः वहाँ जाना व्यर्थ है। अम्बा स्वयं लज्जा और अपमान के भय से नगर लौटने में असमर्थ बताती है और आगे के निर्णय के लिए महर्षि परशुराम के वचन/निर्णय की प्रतीक्षा का संकेत देती है। → होट्रवाहन शोक-संतप्त होकर भी ‘कर्तव्य’ का निश्चय करते हैं और अम्बा को आश्वासन देते हैं—‘बेटी, मैं तुम्हारा दुःख काटूँगा; मेरे पास रहो।’ फिर वे समस्त वृत्तान्त स्पष्ट करते हैं: काशी-स्वयंवर, भीष्म द्वारा हरण, अम्बा का शाल्व-प्रेम, शाल्व द्वारा प्रत्याख्यान, और भीष्म की अनुमति से अम्बा का शाल्व के पास जाना—जिसके बाद भी उसका अपमान मिटा नहीं। → अध्याय का निष्कर्ष अम्बा के आश्रम-वास और संरक्षण की व्यवस्था में होता है—तपस्वी यह भी जताते हैं कि राजकुमारी का आश्रम में रहना कठिनाइयाँ/अवांछित स्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है, फिर भी होत्रवाहन उसे अपने संरक्षण में रखने का संकल्प दृढ़ करते हैं। → अम्बा कहती है कि ‘भगवान् राम (परशुराम) जो कहेंगे वही मेरे लिए परम कार्य है’—अर्थात् अगला मोड़ परशुराम के हस्तक्षेप और भीष्म-संघर्ष की ओर बढ़ता है।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ “लोक मिलकर कुल ४६ ६ “लोक हैं।] #+>ोी 32 श््यु हि कक षट्सप्तर्त्याधेकशततमो< ध्याय: तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत भीष्म उवाच ततस्ते तापसा: सर्वे कार्यवन्तो5भवंस्तदा । तां कन्‍्यां चिन्तयन्तस्ते कि कार्यमिति धर्मिण:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर वे सब धर्मात्मा तपस्वी उस कन्याके विषयमें चिन्ता करते हुए यह सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिये? उस समय वे उसके लिये कुछ करनेको उद्यत थे

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ତାପରେ ସେ ସମସ୍ତ ଧର୍ମାତ୍ମା ତପସ୍ବୀମାନେ କିଛି କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ। ସେ କନ୍ୟାକୁ ଭାବି ସେମାନେ ଚିନ୍ତା କରିଲେ—ଏବେ କ’ଣ କରିବା ଉଚିତ?

Verse 2

केचिदाहु: पितुर्वेश्म नीयतामिति तापसा: । केचिदस्मदुपालम्भे मतिं चक्रुर्हि तापसा:,कुछ तपस्वी यह कहने लगे कि इस राजकन्याको इसके पिताके घर पहुँचा दिया जाय। कुछ तापसोंने मुझे उलाहना देनेका निश्चय किया

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କେତେକ ତପସ୍ବୀ କହିଲେ, “ଏହାକୁ ତା’ର ପିତାଙ୍କ ଘରକୁ ନେଇଯାଅ।” ଆଉ କେତେକ ତପସ୍ବୀ ମୋ ଆଚରଣକୁ ନିନ୍ଦା କରି ମୋତେ ଉପାଳମ୍ଭ ଦେବାକୁ ମନ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ।

Verse 3

केचिच्छाल्वपतिं गत्वा नियोज्यमिति मेनिरे । नेति केचिद्‌ व्यवस्यन्ति प्रत्याख्याता हि तेन सा,कुछ लोग यह सम्मति प्रकट करने लगे कि चलकर शाल्वराजको बाध्य करना चाहिये कि वह इसे स्वीकार कर ले और कुछ लोगोंने यह निश्चय प्रकट किया था कि ऐसा होना सम्भव नहीं है; क्योंकि उसने इस कन्याको कोरा उत्तर देकर ग्रहण करनेसे इन्कार कर दिया है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କେତେକଙ୍କ ମତ ଥିଲା, “ଶାଲ୍ୱପତିଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କୁ ବାଧ୍ୟ କରି ଏହାକୁ ଗ୍ରହଣ କରାଯାଉ।” କିନ୍ତୁ କେତେକ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ, “ନା—ଏହା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ”; କାରଣ ସେ ଏହି କନ୍ୟାକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ କରି ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ଅସ୍ୱୀକାର କରିଛି।

Verse 4

एवं गते तु कि शक्‍यं भद्ठे कर्तु मनीषिभि: । पुनरूचुश्न तां सर्वे तापसा: संशितव्रता:,“भट्रे! ऐसी स्थितिमें मनीषी तापस कया कर सकते हैं? ऐसा कहकर वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले सभी तापस उस राजकन्यासे फिर बोले--

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ଭଦ୍ରେ! କଥା ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆସିପହଞ୍ଚିଲେ, ମନୀଷୀ ତପସ୍ବୀମାନେ କ’ଣ କରିପାରିବେ?” ଏମିତି କହି, କଠୋର ବ୍ରତନିଷ୍ଠ ସେ ସମସ୍ତ ତପସ୍ବୀ ପୁଣିଥରେ ସେଇ ରାଜକନ୍ୟାକୁ କହିଲେ।

Verse 5

अलं प्रव्रजितेनेह भद्रे शूणु हितं वच: । इतो गच्छस्व भद्रं ते पितुरेव निवेशनम्‌,'भद्रे! घर त्यागकर संन्यासियोंके-से धर्माचरणमें संलग्न होनेकी आवश्यकता नहीं है। तुम हमारा हितकर वचन सुनो, तुम्हारा कल्याण हो। यहाँसे पिताके घरको ही चली जाओ। इसके बाद जो आवश्यक कार्य होगा, उसे तुम्हारे पिता काशिराज सोचे-समझेंगे। कल्याणि! तुम वहाँ सर्वगुणसम्पन्न होकर सुखसे रह सकोगी

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ଭଦ୍ରେ! ଏଠାରେ ପ୍ରବ୍ରଜ୍ୟାଧର୍ମ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ; ମୋର ହିତକର ବଚନ ଶୁଣ। ତୋର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ—ଏଠାରୁ ନିଜ ପିତାଙ୍କ ନିବାସକୁ ଯାଅ।”

Verse 6

प्रतिपत्स्यति राजा स पिता ते यदनन्तरम्‌ । तत्र वत्स्यसि कल्याणि सुखं सर्वगुणान्विता,'भद्रे! घर त्यागकर संन्यासियोंके-से धर्माचरणमें संलग्न होनेकी आवश्यकता नहीं है। तुम हमारा हितकर वचन सुनो, तुम्हारा कल्याण हो। यहाँसे पिताके घरको ही चली जाओ। इसके बाद जो आवश्यक कार्य होगा, उसे तुम्हारे पिता काशिराज सोचे-समझेंगे। कल्याणि! तुम वहाँ सर्वगुणसम्पन्न होकर सुखसे रह सकोगी

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ତା’ପରେ ତୋର ପିତା—ସେଇ ରାଜା—ଯାହା କରିବା ଉଚିତ, ତାହା ନିଶ୍ଚୟ କରିବେ। କଲ୍ୟାଣି! ତୁ ତାହାଁ ସର୍ବଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇ ସୁଖରେ ବସିବୁ।”

Verse 7

न च ते<न्या गतिन्याय्या भवेद्‌ भद्रे यथा पिता । पतिर्वापि गतिरनार्या: पिता वा वरवर्णिनि,भद्रे! तुम्हारे लिये पिताका आश्रय लेना जैसा न्यायसंगत है, वैसा दूसरा कोई सहारा नहीं है। वरवर्णिनि! नारीके लिये पति अथवा पिता ही गति (आश्रय) है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଭଦ୍ରେ! ପିତାଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେବା ପରି ଯଥୋଚିତ ଓ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଆଶ୍ରୟ ତୁମ ପାଇଁ ନାହିଁ। ବରବର୍ଣ୍ଣିନି! ନାରୀର ଗତି (ଆଶ୍ରୟ) ସ୍ୱାମୀ; ସେ ନଥିଲେ ପିତା।

Verse 8

गति: पति: समस्थाया विषमे च पिता गति: । प्रत्रज्या हि सुदु:खेयं सुकुमार्या विशेषत:,“सुखकी परिस्थितिमें नारीके लिये पति आश्रय होता है और संकटकालमें उसके लिये पिताका आश्रय लेना उत्तम है। विशेषतः तुम सुकुमारी हो, अतः तुम्हारे लिये यह प्रव्रज्या (गृहत्याग) अत्यन्त दुःखसाध्य है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସୁସ୍ଥିତିରେ ନାରୀର ଆଶ୍ରୟ ସ୍ୱାମୀ; ଏବଂ ବିପଦକାଳରେ ପିତା ତାହାର ଆଶ୍ରୟ। ବିଶେଷତଃ ତୁମେ ସୁକୁମାରୀ; ତେଣୁ ଏହି ପ୍ରବ୍ରଜ୍ୟା—ଗୃହତ୍ୟାଗ—ତୁମ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖସାଧ୍ୟ।

Verse 9

राजपुत्र्या: प्रकृत्या च कुमार्यास्तव भामिनि । भद्रे दोषा हि विद्यन्ते बहवो वरवर्णिनि

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଭାମିନି! ରାଜକନ୍ୟା ଓ କୁମାରୀ ହେବାର ସ୍ୱଭାବ ହେତୁ, ଭଦ୍ରେ, ବରବର୍ଣ୍ଣିନି, ତୁମରେ ନିଶ୍ଚୟ ଅନେକ ଦୋଷ ମଧ୍ୟ ରହିଛି।

Verse 10

ततस्त्वन्येडब्रुवन्‌ वाक्यं तापसास्तां तपस्विनीम्‌,तदनन्तर दूसरे तापसोंने उस तपस्विनीसे कहा--“इस निर्जन गहन वनमें तुम्हें अकेली देख कितने ही राजा तुमसे प्रणय-प्रार्थना करेंगे, अतः तुम इस प्रकार तपस्या करनेका विचार न करो”

ତାପରେ ଅନ୍ୟ ତାପସମାନେ ସେହି ତପସ୍ୱିନୀଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଏହି ନିର୍ଜନ ଗହନ ବନରେ ତୁମକୁ ଏକାକିନୀ ଦେଖି ଅନେକ ରାଜା ପ୍ରେମ-ପ୍ରାର୍ଥନା ନେଇ ଆସିବେ; ତେଣୁ ଏପରି ଭାବେ ତପସ୍ୟା କରିବାକୁ ମନ କରନି।”

Verse 11

त्वामिहैकाकिनीं दृष्टवा निर्जने गहने वने । प्रार्थयिष्यन्ति राजानस्तस्मान्मैवं मन: कृथा:,तदनन्तर दूसरे तापसोंने उस तपस्विनीसे कहा--“इस निर्जन गहन वनमें तुम्हें अकेली देख कितने ही राजा तुमसे प्रणय-प्रार्थना करेंगे, अतः तुम इस प्रकार तपस्या करनेका विचार न करो”

ତାପରେ ଅନ୍ୟ ତାପସମାନେ ସେହି ତପସ୍ୱିନୀଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଏହି ନିର୍ଜନ ଗହନ ବନରେ ତୁମକୁ ଏକାକିନୀ ଦେଖି ଅନେକ ରାଜା ପ୍ରେମ-ପ୍ରାର୍ଥନା ନେଇ ଆସିବେ; ତେଣୁ ଏପରି ମନ କରନି।”

Verse 12

अस्बोवाच न शक्‍यं काशिनगरं पुनर्गन्तुं पितुर्गहान्‌ । अवज्ञाता भविष्यामि बान्धवानां न संशय:,अम्बा बोली--तापसो! अब मेरे लिये पुनः काशिनगरमें पिताके घर लौट जाना असम्भव है; क्योंकि वहाँ मुझे बन्धु-बान्धवोंमें अपमानित होकर रहना पड़ेगा

ଅମ୍ବା କହିଲା—ହେ ତାପସ! ମୋ ପାଇଁ ପୁନର୍ବାର କାଶୀନଗରକୁ ପିତାଙ୍କ ଗୃହକୁ ଫେରିବା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ। ନିଶ୍ଚୟ, ନିଜ ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୋତେ ଅବଜ୍ଞା ଓ ଅପମାନ ସହି ବସିବାକୁ ପଡ଼ିବ।

Verse 13

उषितास्मि तथा बाल्ये पितुर्वेश्मनि तापसा: । नाहं गमिष्ये भद्रं वस्तत्र यत्र पिता मम । तपस्तप्तुमभीप्सामि तापसै: परिरक्षिता,तापसो! मैं बाल्यावस्थामें पिताके घर रह चुकी हूँ। आपका कल्याण हो। अब मैं वहाँ नहीं जाऊँगी, जहाँ मेरे पिता होंगे। मैं आप तपस्वी जनोंद्वारा सुरक्षित होकर यहाँ तपस्या करनेकी ही इच्छा रखती हूँ

ଅମ୍ବା କହିଲା—ହେ ତାପସମାନେ! ମୁଁ ବାଲ୍ୟକାଳରେ ପିତୃଗୃହରେ ରହିସାରିଛି। ଆପଣମାନଙ୍କର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଏବେ ଯେଉଁଠାରେ ମୋ ପିତା ଅଛନ୍ତି ସେଠାକୁ ମୁଁ ଯିବି ନାହିଁ। ଆପଣ ତାପସମାନଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ଏଠାରେ ତପସ୍ୟା କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।

Verse 14

यथा परे5पि मे लोके न स्यादेव॑ महात्यय: । दौर्भाग्यं तापसश्रेष्ठास्तस्मात्‌ तप्स्याम्यहं तप:,तापसश्रेष्ठ महर्षियो! मैं तपस्या इसलिये करना चाहती हूँ, जिससे परलोकमें भी मुझे इस प्रकार महान्‌ संकट एवं दुर्भाग्यका सामना न करना पड़े। अतः मैं तपस्या ही करूँगी

ହେ ତାପସଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ! ପରଲୋକରେ ମଧ୍ୟ ମୋତେ ପୁନର୍ବାର ଏପରି ମହାସଙ୍କଟ ଓ ଦୁର୍ଭାଗ୍ୟ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବାକୁ ନ ପଡ଼ୁ—ଏହି କାରଣରୁ ମୁଁ ତପସ୍ୟା କରିବି।

Verse 15

भीष्म उवाच इत्येवं तेषु विप्रेषु चिन्तयत्सु यथातथम्‌ । राजर्षिस्तद्‌ वन॑ प्राप्तस्तपस्वी होत्रवाहन:,भीष्मजी कहते हैं--इस प्रकार वे ब्राह्मण जब यथावत्‌ चिन्तामें मग्न हो रहे थे, उसी समय तपस्वी राजर्षि होत्रवाहन उस वनमें आ पहुँचे

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଏପରି ଭାବେ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଯଥାଯଥ ଚିନ୍ତାରେ ଲୀନ ଥିବାବେଳେ, ସେଇ ସମୟରେ ତପସ୍ବୀ ରାଜର୍ଷି ହୋତ୍ରବାହନ ସେହି ଅରଣ୍ୟକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 16

ततस्ते तापसा: सर्वे पूजयन्ति सम त॑ नूपम्‌ । पूजाभि: स्वागताद्याभिरासनेनोदकेन च,तब उन सब तापसोंने स्वागत, कुशल-प्रश्न, आसन-समर्पण और जल-दान आदि अतिथि-सत्कारके उपचारोंद्वारा राजा होत्रवाहनका समादर किया

ତାପରେ ସେହି ସମସ୍ତ ତାପସ ଆଗତ ନୃପତିଙ୍କୁ ଅତିଥି-ଧର୍ମ ଅନୁସାରେ ସମ୍ମାନ କଲେ—ସ୍ୱାଗତବାକ୍ୟ, କୁଶଳ-ପ୍ରଶ୍ନ, ଆସନ-ସମର୍ପଣ ଓ ଜଳ-ଦାନ ଆଦି ପୂଜୋପଚାରରେ।

Verse 17

तस्योपविष्टस्य सतो विश्रान्तस्योपशृण्वत: । पुनरेव कथां चक्कु: कन्यां प्रति वनौकस:,जब वे आसनपर बैठकर विश्राम कर चुके, उस समय उनके सुनते हुए ही वे वनवासी तपस्वी पुनः: उस कन्याके विषयमें बातचीत करने लगे

ସେ ଆସନରେ ବସି ବିଶ୍ରାମ କରୁଥିଲେ ଏବଂ ଶୁଣୁଥିଲେ; ସେତେବେଳେ ବନବାସୀ ତପସ୍ବୀମାନେ ସେଇ କନ୍ୟା ବିଷୟରେ ପୁନର୍ବାର ପରସ୍ପର ଆଲୋଚନା କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 18

अम्बायास्तां कथां श्रुत्वा काशिराज्ञश्न भारत | राजर्षि: स महातेजा बभूवोद्धिग्नमानस:,भारत! अम्बा और काशिराजकी यह चर्चा सुनकर महातेजस्वी राजर्षि होत्रवाहनका चित्त उद्विग्न हो उठा

ହେ ଭାରତ! ଅମ୍ବା ଓ କାଶୀରାଜ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ସେଇ କଥା ଶୁଣି, ମହାତେଜସ୍ବୀ ରାଜର୍ଷି ହୋତ୍ରବାହନଙ୍କ ମନ ଗଭୀର ଭାବେ ଉଦ୍ବିଗ୍ନ ହେଲା।

Verse 19

तां तथावादिनीं श्रुत्वा दृष्टया च स महातपा: । राजर्षि: कृपया5<विष्टो महात्मा होत्रवाहन:,पूर्वोक्त रूपसे दीनतापूर्वक अपना दुःख निवेदन करनेवाली राजकन्या अम्बाकी बातें सुनकर महातपस्वी, महात्मा राजर्षि होत्रवाहन दयासे द्रवित हो गये

ସେପରି ଦୀନଭାବେ ଦୁଃଖ ନିବେଦନ କରୁଥିବା ଅମ୍ବାର କଥା ଶୁଣି ଓ ତାହାର ଅବସ୍ଥା ଦେଖି, ମହାତପସ୍ବୀ ମହାତ୍ମା ରାଜର୍ଷି ହୋତ୍ରବାହନ କୃପାରେ ଆବିଷ୍ଟ ହେଲେ।

Verse 20

स वेपमान उत्थाय मातुस्तस्या: पिता तदा । तां कन्यामड्कमारोप्य पर्यश्चासयत प्रभो,वे अम्बाके नाना थे। राजन! वे काँपते हुए उठे और उस राजकन्याको गोदमें बिठाकर उसे सान्त्वना देने लगे

ତେବେ ତାଙ୍କ ପିତା (ଅମ୍ବାଙ୍କ ନାନା) କମ୍ପିତ ହୋଇ ଉଠି, ସେଇ କନ୍ୟାକୁ କୋଳରେ ବସାଇ, ପ୍ରଭୁସମ ଭାବେ ତାକୁ ସାନ୍ତ୍ବନା ଓ ଆଶ୍ୱାସନ ଦେଲେ।

Verse 21

स तामपृच्छत्‌ कार्त्स्न्येन व्यसनोत्पत्तिमादित: । सा च तस्मै यथावृत्तं विस्तरेण न्यवेदयत्‌,उन्होंने उसपर संकट आनेकी सारी बातें आरम्भसे ही पूछी और अम्बाने भी जो कुछ जैसे-जैसे हुआ था, वह सारा वृत्तान्त उनसे विस्तारपूर्वक बताया

ସେ ଆରମ୍ଭରୁ ତାଙ୍କ ବିପଦ କିପରି ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲା ତାହା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ପଚାରିଲେ; ଅମ୍ବା ମଧ୍ୟ ଯେପରି ଯାହା ଘଟିଥିଲା, ସେ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ତାଙ୍କୁ ବିସ୍ତାରରେ ଜଣାଇଲା।

Verse 22

ततः स राजर्षिरभूद्‌ दुः:खशोकसमन्वित: । कार्य च प्रतिपेदे तन्मनसा सुमहातपा:,तब उन महातपस्वी राजर्षिने दुख और शोकसे संतप्त हो मन-ही-मन आवश्यक कर्तव्यका निश्चय किया

ତେବେ ସେ ମହାତପସ୍ବୀ ରାଜର୍ଷି ଦୁଃଖ ଓ ଶୋକରେ ଆବୃତ ହୋଇ, ମନେମନେ କରଣୀୟ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ।

Verse 23

अब्रवीद्‌ वेपमानश्न कन्यामार्ता सुदु:खित: । मा गा: पितुर्गहं भद्रे मातुस्ते जनको हाहम्‌,और अत्यन्त दुःखी हो काँपते हुए ही उन्होंने उस दु:खिनी कन्यासे इस प्रकार कहा --'भद्रे! (यदि) तू पिताके घर (नहीं जाना चाहती हो तो) न जा। मैं तेरी माँका पिता हूँ

ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖରେ କମ୍ପିତ ହୋଇ ସେ ଦୁଃଖିତ କନ୍ୟାକୁ କହିଲେ— “ଭଦ୍ରେ! ଯଦି ତୁମେ ପିତୃଗୃହକୁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁନାହ, ତେବେ ଯାଅନି। ମୁଁ ତୁମ ମାତାଙ୍କର ପିତା।”

Verse 24

दुःखं छिन्द्यामहं ते वै मयि वर्तस्व पुत्रिके । पर्याप्तं ते मनो वत्से यदेवं परिशुष्यसि,“बेटी! मैं तेरा दुःख दूर करूँगा, तू मेरे पास रह। वत्से! तेरे मनमें बड़ा संताप है, तभी तो इस प्रकार सूखी जा रही है

“ପୁତ୍ରିକେ! ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ତୋର ଦୁଃଖ କାଟିଦେବି; ମୋ ପାଖରେ ରୁହ। ବତ୍ସେ! ତୋର ମନ ଭାରି ସନ୍ତାପରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ, ସେଥିପାଇଁ ତୁ ଏଭଳି କ୍ଷୀଣ ହେଉଛୁ।”

Verse 25

गच्छ मद्वचनादू रामं जामदग्न्यं तपस्विनम्‌ । रामस्ते समुहद्‌ दुःखं शोकं चैवापनेष्यति,'तू मेरे कहनेसे तपस्यापरायण जमदग्निनन्दन परशुरामजीके पास जा। वे तेरे महान्‌ दुःख और शोकको अवश्य दूर करेंगे

“ମୋ କଥାମତେ ତପସ୍ବୀ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ ରାମ—ପରଶୁରାମଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ। ରାମ ତୋର ମହାଦୁଃଖ ଓ ଶୋକ ନିଶ୍ଚୟ ଦୂର କରିବେ।”

Verse 26

हनिष्यति रणे भीष्मं न करिष्यति चेद्‌ वच: । त॑ गच्छ भार्गवश्रेष्ठ कालाग्निसमतेजसम्‌,“यदि भीष्म उनकी बात नहीं मानेंगे तो वे युद्धमें उन्हें मार डालेंगे। भार्गवश्रेष्ठ परशुराम प्रलय-कालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं। तू उन्‍्हींकी शरणमें जा

“ଭୀଷ୍ମ ଯଦି ତାଙ୍କ କଥା ନ ମାନନ୍ତି, ତେବେ ସେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ବଧ କରିବେ। ତେଣୁ ପ୍ରଳୟକାଳର ଅଗ୍ନି ସମ ତେଜସ୍ବୀ ଭାର୍ଗବଶ୍ରେଷ୍ଠ ପରଶୁରାମଙ୍କ ଶରଣକୁ ଯାଅ।”

Verse 27

प्रतिष्ठापयिता स त्वां समे पथि महातपा: । ततस्तु सुस्वरं बाष्पमुत्सृजन्ती पुन: पुन:,“वे महातपस्वी राम तुझे न्यायोचित मार्गपर प्रतिष्ठित करेंगे।। यह सुनकर अम्बा बारंबार आँसू बहाती हुई अपने नाना होत्रवाहनको मस्तक नवाकर प्रणाम करके मधुर स्वरमें इस प्रकार बोली--“नानाजी! मैं आपकी आज्ञासे वहाँ अवश्य जाऊँगी

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସେ ମହାତପସ୍ବୀ ତୁମକୁ ଧର୍ମର ସମ ପଥରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ କରିବେ। ଏହା ଶୁଣି ଅମ୍ବା ପୁନଃପୁନଃ ଅଶ୍ରୁ ଝରାଇ, ମଧୁର ସ୍ୱରରେ, ମାତୃପକ୍ଷୀୟ ଠାକୁରଦା ହୋତ୍ରବାହନଙ୍କୁ ଶିର ନମାଇ ପ୍ରଣାମ କରି କହିଲା।

Verse 28

अब्रवीत्‌ पितरं मातु: सा तदा होत्रवाहनम्‌ । अभिवादयित्वा शिरसा गमिष्ये तव शासनात्‌,“वे महातपस्वी राम तुझे न्यायोचित मार्गपर प्रतिष्ठित करेंगे।। यह सुनकर अम्बा बारंबार आँसू बहाती हुई अपने नाना होत्रवाहनको मस्तक नवाकर प्रणाम करके मधुर स्वरमें इस प्रकार बोली--“नानाजी! मैं आपकी आज्ञासे वहाँ अवश्य जाऊँगी

ତେବେ ଅମ୍ବା ମାତୃପକ୍ଷୀୟ ଠାକୁରଦା ହୋତ୍ରବାହନଙ୍କୁ ଶିର ନମାଇ ଅଭିବାଦନ କରି କହିଲା—“ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ମୁଁ ସେଠାକୁ ଯିବି।”

Verse 29

अपि नामाद्य पश्येयमार्य तं लोकविश्रुतम्‌ । कथं च तीव्र दुःखं मे नाशयिष्यति भार्गव: । एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं यथा यास्यामि तत्र वै,'परंतु मैं आज उन विश्वविख्यात श्रेष्ठ महात्माका दर्शन कैसे कर सकूँगी और वे भृगुनन्दन परशुरामजी मेरे इस दुःसह दुःखका नाश किस प्रकार करेंगे? मैं यह सब जानना चाहती हूँ, जिससे वहाँ जा सकूँ”

“ମୁଁ କି ଆଜି ହିଁ ସେ ଲୋକବିଶ୍ରୁତ ଆର୍ୟ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇପାରିବି? ଏବଂ ଭାର୍ଗବ ପରଶୁରାମ ମୋର ଏହି ତୀବ୍ର ଦୁଃଖକୁ କିପରି ନାଶ କରିବେ? ମୁଁ ଏହା ସବୁ ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଯାହାଦ୍ୱାରା ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ସେଠାକୁ ଯାଇପାରିବି।”

Verse 30

होत्रवाहन उवाच राम॑ द्रक्ष्यसि भद्रे त्वं जामदग्न्यं महावने । उग्रे तपसि वर्तन्तं सत्यसंधं महाबलम्‌,होत्रवाहन बोले--भद्रे! जमदग्निनन्दन परशुराम एक महान्‌ वनमें उग्र तपस्या कर रहे हैं। वे महान्‌ शक्तिशाली और सत्यप्रतिज्ञ हैं। तुझे अवश्य ही उनका दर्शन प्राप्त होगा

ହୋତ୍ରବାହନ କହିଲେ—“ଭଦ୍ରେ! ତୁମେ ମହାବନରେ ଜମଦଗ୍ନିନନ୍ଦନ ରାମ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇବ। ସେ ଉଗ୍ର ତପସ୍ୟାରେ ରତ—ମହାବଳୀ ଓ ସତ୍ୟସଙ୍କଳ୍ପ। ତୁମକୁ ନିଶ୍ଚୟ ତାଙ୍କ ସାକ୍ଷାତ୍କାର ମିଳିବ।”

Verse 31

परशुरामजी सदा पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्रपर रहा करते हैं। वहाँ वेदवेत्ता महर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराओंका भी निवास है

ହୋତ୍ରବାହନ କହିଲେ—“ପରଶୁରାମ ସଦା ପର୍ବତଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହେନ୍ଦ୍ର ପର୍ବତରେ ବସବାସ କରନ୍ତି। ସେହି ପବିତ୍ର ଅଞ୍ଚଳରେ ବେଦବିଦ୍ ମହର୍ଷିମାନେ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଅପ୍ସରାମାନେ ମଧ୍ୟ ନିବାସ କରନ୍ତି।”

Verse 32

तत्र गच्छस्व भद्र ते ब्रूयाश्लैनं वचो मम । अभिवाद्य च त॑ मूर्थ्ना तपोवृद्ध दृढब्रतम्‌,बेटी! तेरा कल्याण हो। तू वहीं जा और उन दृढ़व्रती तपोवृद्ध महात्माको अभिवादन करके पहले उनसे मेरी बात कहना

ସେଠାକୁ ଯାଅ, ଭଦ୍ରେ—ତୋର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ତପୋବୃଦ୍ଧ, ଦୃଢବ୍ରତ ତପସ୍ବୀଙ୍କୁ ମସ୍ତକ ନମାଇ ଅଭିବାଦନ କରି ପ୍ରଥମେ ମୋର ଏହି କଥା ତାଙ୍କୁ କହ।

Verse 33

महेन्द्रं वै गिरिश्रेष्ठ रामो नित्यमुपास्ति ह | ऋषयो वेददविद्वांसो गन्धर्वाप्सरसस्तथा,ब्रूयाश्वैनं पुनर्भद्रे यत्‌ ते कार्य मनीषितम्‌ | मयि संकीर्तिते राम: सर्व ततू ते करिष्यति भद्रे! तत्पश्चात्‌ तेरे मनमें जो अभीष्ट कार्य है वह सब उनसे निवेदन करना। मेरा नाम लेनेपर परशुरामजी तेरा सब कार्य करेंगे

ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଗିରିଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହେନ୍ଦ୍ରକୁ ନିତ୍ୟ ଉପାସନା କରନ୍ତି; ବେଦବିଦ୍ ଋଷିମାନେ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଅପ୍ସରାମାନେ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି କରନ୍ତି। ତେଣୁ ଭଦ୍ରେ, ତାଙ୍କୁ ପୁନଃ କହ—ତୋ ମନେ ନିଶ୍ଚିତ କରିଥିବା କାର୍ଯ୍ୟ ଯାହା, ସବୁ ନିବେଦନ କର। ମୋ ନାମ ସ୍ମରଣ କଲେ ରାମ ତୋର ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧିଦେବେ, ଭଦ୍ରେ।

Verse 34

मम राम: सखा वत्मे प्रीतियुक्त: सुहृच्च मे । जमदग्निसुतो वीर: सर्वशस्त्रभृतां वर:,वत्से! सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन वीरवर परशुराम मेरे सखा और प्रेमी सुहृद हैं

ବତ୍ସେ, ଜମଦଗ୍ନିପୁତ୍ର ବୀର ରାମ (ପରଶୁରାମ)—ସମସ୍ତ ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ମୋର ସଖା, ପଥସହଚର, ଏବଂ ପ୍ରୀତିଯୁକ୍ତ ସୁହୃଦ।

Verse 35

एवं ब्रुवति कन्यां तु पार्थिवे होत्रवाहने । अकृतद्रण: प्रादुरासीदू्‌ रामस्यानुचर: प्रिय:,राजा होत्रवाहन जब राजकन्या अम्बासे इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय परशुरामजीके प्रिय सेवक अकृतत्रण वहाँ प्रकट हुए

ପାର୍ଥିବ ହୋତ୍ରବାହନ ରାଜା କନ୍ୟାଙ୍କୁ ଏପରି କହୁଥିବା ସମୟରେ, ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ରାମ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ପ୍ରିୟ ଅନୁଚର ଅକୃତଦ୍ରଣ ସେଠାରେ ପ୍ରକଟ ହେଲେ।

Verse 36

ततस्ते मुनयः सर्वे समुत्तस्थु: सहस्रश: । सच राजा वयोवृद्ध: सृञ्जयो होत्रवाहन:

ତାପରେ ସେ ସମସ୍ତ ମୁନି ହଜାର ହଜାର କରି ଏକାସାଥି ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲେ; ଏବଂ ବୟୋବୃଦ୍ଧ ରାଜା ସୃଞ୍ଜୟ ମଧ୍ୟ—ହେ ହୋତ୍ରବାହନ—ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲେ।

Verse 37

उन्हें देखते ही वे सहस्रों मुनि तथा सूंजयवंशी वयोवृद्ध राजा होत्रवाहन सभी उठकर खड़े हो गये ।। ततो दृष्टवा कृतातिथ्यमन्योन्यं ते वनौकस: । सहिता भरतमश्रेष्ठ निषेदु: परिवार्य तम्‌,भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उनका आदर-सत्कार किया गया; फिर वे वनवासी महर्षि एक- दूसरेकी ओर देखते हुए एक साथ उन्हें घेरकर बैठे

ତାପରେ ଯଥୋଚିତ ଅତିଥି-ସତ୍କାର ହୋଇଛି ବୋଲି ଦେଖି, ବନବାସୀ ମହର୍ଷିମାନେ ପରସ୍ପର ସମ୍ମତିରେ ଏକାପରକୁ ଚାହିଁ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏକସାଥି ତାଙ୍କୁ ଘେରି ବସିଲେ।

Verse 38

ततस्ते कथयामासु: कथास्तास्ता मनोरमा: । धन्या दिव्याश्व राजेन्द्र प्रीतिहर्षमुदा युता:,राजेन्द्र! तत्पश्चात्‌ वे सब लोग प्रेम और हर्षके साथ दिव्य, धन्य एवं मनोरम वार्तालाप करने लगे

ତାପରେ, ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ସେମାନେ ପ୍ରେମ, ହର୍ଷ ଓ ଆନନ୍ଦରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ଧନ୍ୟ, ଦିବ୍ୟ ଓ ମନୋହର ନାନା କଥା କହିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 39

ततः कथान्ते राजर्षिमिहात्मा होत्रवाहन: । राम॑ श्रेष्ठ महर्षीणामपृच्छदकृतव्रणम्‌,बातचीत समाप्त होनेपर राजर्षि महात्मा होत्रवाहन-ने महर्षियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीके विषयमें अकृतव्रणसे पूछा--

କଥାବାର୍ତ୍ତା ଶେଷ ହେବା ପରେ, ଏଠାରେ ରାଜର୍ଷି ମହାତ୍ମା ହୋତ୍ରବାହନ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ବିଷୟରେ ଅକୃତବ୍ରଣଙ୍କୁ ପଚାରିଲେ।

Verse 40

क्व सम्प्रति महाबाहो जामदग्न्य: प्रतापवान्‌ । अकृतत्रण शकयो वै द्रष्टर वेदविदां वर:,“महाबाहु अकृतव्रण! इस समय वेददवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और प्रतापी जमदग्निनन्दन परशुरामजीका दर्शन कहाँ हो सकता है?”

ହୋତ୍ରବାହନ କହିଲେ—“ହେ ମହାବାହୁ ଅକୃତବ୍ରଣ! ଏହି ସମୟରେ ବେଦବିଦମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପ୍ରତାପଶାଳୀ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ଦର୍ଶନ କେଉଁଠି ହେବ?”

Verse 41

अकृतव्रण उवाच भवन्तमेव सततं राम: कीर्तयति प्रभो । सृञ्जयो मे प्रियसखो राजर्षिरिति पार्थिव,अकृतव्रणने कहा--राजन्‌! परशुरामजी तो सदा आपकी ही चर्चा किया करते हैं। उनका कहना है कि सूंजयवंशी राजर्षि होत्रवाहन मेरे प्रिय सखा हैं

ଅକୃତବ୍ରଣ କହିଲେ—“ପ୍ରଭୋ! ରାମ (ପରଶୁରାମ) ସଦା ଆପଣଙ୍କର ହିଁ କୀର୍ତ୍ତି କରନ୍ତି। ସେ କହନ୍ତି—‘ସୃଞ୍ଜୟବଂଶୀୟ ରାଜର୍ଷି (ହୋତ୍ରବାହନ) ମୋର ପ୍ରିୟ ସଖା’, ହେ ପାର୍ଥିବ।”

Verse 42

इह राम: प्रभाते श्वो भवितेति मतिर्मम । द्रष्टास्येनमिहायान्तं तव दर्शनकाड्क्षया

ଅକୃତବ୍ରଣ କହିଲେ—ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ, ଆସନ୍ତାକାଲି ପ୍ରଭାତେ ରାମ ଏଠାରେ ଥିବେ। ତୁମ ଦର୍ଶନର ଆକାଙ୍କ୍ଷାରେ ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଏଠାକୁ ଆସିବେ, ଏବଂ ସେ ଆସିଲେ ତୁମେ ତାଙ୍କୁ ଦେଖିବ।

Verse 43

मेरा विश्वास है कि कल सबेरेतक परशुरामजी यहाँ उपस्थित हो जायँगे। वे आपसे ही मिलनेके लिये आ रहे हैं। अत: आप यहीं उनका दर्शन कीजियेगा ।। इयं च कन्या राजर्षे किमर्थ वनमागता । कस्य चेयं तव च का भवतीच्छामि वेदितुम्‌,राजर्षे! मैं यह जानना चाहता हूँ कि यह कन्या किसलिये वनमें आयी है? यह किसकी पुत्री है और आपकी क्‍या लगती है?

ଅକୃତବ୍ରଣ କହିଲେ—ମୋର ବିଶ୍ୱାସ, ଆସନ୍ତାକାଲି ସକାଳ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପରଶୁରାମ ଏଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେବେ। ସେ ବିଶେଷକରି ଆପଣଙ୍କୁ ଭେଟିବାକୁ ଆସୁଛନ୍ତି; ତେଣୁ ଆପଣ ଏଠାରେ ରହି ତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ କରନ୍ତୁ। ଏବଂ, ରାଜର୍ଷେ, ଏହି କନ୍ୟା କେଉଁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ବନକୁ ଆସିଛି? ଏହା କାହାର କନ୍ୟା, ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ସହ ତାହାର କି ସମ୍ପର୍କ? ରାଜର୍ଷେ, ମୁଁ ଏହା ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି।

Verse 44

होत्रवाहन उवाच दौहित्रीयं मम विभो काशिराजसुता प्रिया । ज्येष्ठा स्वयंवरे तस्थौ भगिनी भ्यां सहानघ,होत्रवाहन बोले--प्रभो! यह मेरी दौहित्री (पुत्रीकी पुत्री) है। अनघ! काशिराजकी परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्री अपनी दो छोटी बहिनोंके साथ स्वयंवरमें उपस्थित हुई थी। उनमेंसे यही अम्बा नामसे विख्यात काशिराजकी ज्येष्ठ पुत्री है। तपोधन! इसकी दोनों छोटी बहिनें अम्बिका और अम्बालिका कहलाती हैं

ହୋତ୍ରବାହନ କହିଲେ—ହେ ବିଭୋ! ଏହି ମୋର ଦୌହିତ୍ରୀ, କାଶୀରାଜଙ୍କ ପ୍ରିୟ କନ୍ୟା। ହେ ଅନଘ! ଜ୍ୟେଷ୍ଠା ରାଜକୁମାରୀ ତାଙ୍କ ଦୁଇ ଭଗିନୀ ସହ ସ୍ୱୟଂବରରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ। ଏହି ଅମ୍ବା ନାମରେ ବିଖ୍ୟାତ; ତାଙ୍କ ଦୁଇ କନିଷ୍ଠା ଭଗିନୀ ‘ଅମ୍ବିକା’ ଓ ‘ଅମ୍ବାଲିକା’।

Verse 45

इयमम्बेति विख्याता ज्येष्ठा काशिपते: सुता । अम्बिकाम्बालिके कन्ये कनीयस्यौ तपोधन,होत्रवाहन बोले--प्रभो! यह मेरी दौहित्री (पुत्रीकी पुत्री) है। अनघ! काशिराजकी परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्री अपनी दो छोटी बहिनोंके साथ स्वयंवरमें उपस्थित हुई थी। उनमेंसे यही अम्बा नामसे विख्यात काशिराजकी ज्येष्ठ पुत्री है। तपोधन! इसकी दोनों छोटी बहिनें अम्बिका और अम्बालिका कहलाती हैं

ଏହି ‘ଅମ୍ବା’ ନାମରେ ବିଖ୍ୟାତ—କାଶିପତିଙ୍କ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ କନ୍ୟା। ହେ ତପୋଧନ! ତାଙ୍କ ଦୁଇ କନିଷ୍ଠା ଭଗିନୀ କନ୍ୟା ‘ଅମ୍ବିକା’ ଓ ‘ଅମ୍ବାଲିକା’।

Verse 46

समेत पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्या ततो5भवत्‌ । कन्यानिमित्तं विप्रर्षे तत्रासीदुत्सवो महान्‌,ब्रह्मर्ष! काशीपुरीमें इन्हीं कन्‍्याओंके लिये भूमण्डलका समस्त क्षत्रियसमुदाय एकत्र हुआ था। उस अवसरपर वहाँ महान्‌ स्वयंवरोत्सवका आयोजन किया गया था

ତାପରେ କାଶୀପୁରୀରେ ଏହି କନ୍ୟାମାନଙ୍କ ନିମିତ୍ତେ ସମସ୍ତ ରାଜକ୍ଷତ୍ରିୟ ସମୁଦାୟ ଏକତ୍ର ହେଲା। ହେ ବିପ୍ରର୍ଷେ! ସେଠାରେ ମହାନ ଉତ୍ସବ—ସ୍ୱୟଂବର—ଆୟୋଜିତ ହୋଇଥିଲା।

Verse 47

ततः किल महावीर्यों भीष्म: शान्तनवो नृपान्‌ | अधिक्षिप्य महातेजास्तिस्र: कन्या जहार ता:,कहते हैं उस अवसरपर महातेजस्वी और महा-पराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म सब राजाओंको जीतकर इन तीनों कन्याओंको हर लाये

ତେବେ କୁହାଯାଏ—ମହାତେଜସ୍ବୀ ଓ ମହାବୀର୍ୟ ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ସମବେତ ରାଜମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରି ଅପମାନିତ କରି ସେଇ ତିନି କନ୍ୟାକୁ ହରି ନେଲେ।

Verse 48

निर्जित्य पृथिवीपालानथ भीष्मो गजाह्नयम्‌ | आजगाम विशुद्धात्मा कन्याभि: सह भारत:,भरतनन्दन भीष्मका हृदय इन कन्याओंके प्रति सर्वथा शुद्ध था। वे समस्त भूपालोंको परास्त करके कन्याओंको साथ लिये हस्तिनापुरमें आये

ପୃଥିବୀପାଳମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରି, ବିଶୁଦ୍ଧାତ୍ମା ଭରତନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ସେଇ କନ୍ୟାମାନଙ୍କ ସହ ଗଜାହ୍ନବ (ହସ୍ତିନାପୁର)କୁ ଆସିଲେ।

Verse 49

सत्यवत्यै निवेद्याथ विवाहं समनन्तरम्‌ | भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य समाज्ञापयत प्रभु:,वहाँ आकर शक्तिशाली भीष्मने सत्यवतीको ये कन्याएँ सौंप दीं और इनके साथ अपने छोटे भाई विचित्रवीर्यका विवाह करनेकी आज्ञा दे दी

ସେଠାକୁ ପହଞ୍ଚି ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଭୀଷ୍ମ ସେଇ କନ୍ୟାମାନଙ୍କୁ ସତ୍ୟବତୀଙ୍କୁ ନିବେଦନ କରି, ସଙ୍ଗେସଙ୍ଗେ ନିଜ ଛୋଟ ଭାଇ ବିଚିତ୍ରବୀର୍ୟଙ୍କ ସହ ତାଙ୍କର ବିବାହ କରିବାକୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଲେ।

Verse 50

तं तु वैवाहिकं दृष्टवा कन्येयं समुपार्जितम्‌ । अब्रवीत्‌ तत्र गाड़ेय॑ं मन्त्रिमध्ये द्विजर्षभ,द्विजश्रेष्ठ! वहाँ वैवाहिक आयोजन आरम्भ हुआ देख यह कन्या मन्त्रियोंके बीचमें गंगानन्दन भीष्मसे बोली--

ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଠାରେ ବିବାହକାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହେଉଥିବା ଦେଖି, ଏହି କନ୍ୟା ବିବାହ ପାଇଁ ଅର୍ଜିତ ବୋଲି ଜାଣି, ସେ କନ୍ୟା ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗଙ୍ଗାନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ କହିଲା—

Verse 51

मया शाल्वपतिर्वीरो मनसाभिवृत: पति: । न मामहसि धर्मज्ञ दातुं भ्रात्रेडनयमानसाम्‌,“धर्मज्ञ! मैंने मन-ही-मन वीरवर शाल्वराजको अपना पति चुन लिया है; अतः मेरा मन अन्यत्र अनुरक्त होनेके कारण आपको अपने भाईके साथ मेरा विवाह नहीं करना चाहिये”

ଧର୍ମଜ୍ଞ! ମୁଁ ମନେମନେ ବୀର ଶାଲ୍ୱରାଜଙ୍କୁ ନିଜ ପତି ଭାବେ ବରଣ କରିସାରିଛି; ତେଣୁ ମୋ ମନ ଅନ୍ୟତ୍ର ଆସକ୍ତ—ଆପଣ ମୋତେ ନିଜ ଭାଇଙ୍କୁ ବିବାହରେ ଦେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।

Verse 52

तच्छुत्वा वचन भीष्म: सम्मन्त्रय सह मन्सत्रिभि: । निश्चित्य विससर्जेमां सत्यवत्या मते स्थित:,अम्बाका यह वचन सुनकर भीष्मने मन्त्रियोंक साथ सलाह करके माता सत्यवतीकी सम्मति प्राप्त करके एक निश्चयपर पहुँचकर इस कन्याको छोड़ दिया

ସେ କଥା ଶୁଣି ଭୀଷ୍ମ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ପରାମର୍ଶ କଲେ। ସତ୍ୟବତୀଙ୍କ ମତକୁ ମାନି ଦୃଢ଼ ନିଷ୍ପତ୍ତି କରି ସେଇ କନ୍ୟାକୁ ଛାଡ଼ିଦେଲେ।

Verse 53

अनुज्ञाता तु भीष्मेण शाल्वं सौभपतिं ततः । कन्येयं मुदिता तत्र काले वचनमब्रवीत्‌,भीष्मकी आज्ञा पाकर यह कन्या मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हो सौभ विमानके स्वामी शाल्वके यहाँ गयी और वहाँ उस समय इस प्रकार बोली--

ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଅନୁମତି ପାଇ ସେ କନ୍ୟା ମନେ ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ସୌଭର ଅଧିପତି ଶାଲ୍ୱଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲା ଏବଂ ଯଥାସମୟରେ ଏହିପରି କହିଲା।

Verse 54

विसर्जितास्मि भीष्मेण धर्म मां प्रतिपादय । मनसाभिवृत: पूर्व मया त्वं पार्थिवर्षभ,“नृपश्रेष्ठ! भीष्मने मुझे छोड़ दिया है; क्योंकि पूर्वकालमें मैंने अपने मनसे आपको ही पति चुन लिया था, अत: आप मुझे धर्मपालनका अवसर दें"

“ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଭୀଷ୍ମ ମୋତେ ଛାଡ଼ିଦେଇଛନ୍ତି। ତେଣୁ ଧର୍ମସମ୍ମତ ପଥ ମୋତେ ଦିଅନ୍ତୁ; କାରଣ ପୂର୍ବରୁ ମୁଁ ମନେମନେ ଆପଣଙ୍କୁ ହିଁ ବରିଥିଲି, ହେ ରାଜର୍ଷଭ!”

Verse 55

प्रत्याचख्यौ च शाल्वो<स्याश्चारित्रस्याभिशड्कित: । सेयं तपोवन प्राप्ता तापस्येडभिरता भृशम्‌,शाल्वराजको इसके चरित्रपर संदेह हुआ; अतः उसने इसके प्रस्तावको ठुकरा दिया है। इस कारण तपस्यामें अत्यन्त अनुरक्त होकर यह इस तपोवनमें आयी है

ତାହାର ଚରିତ୍ର ଉପରେ ସନ୍ଦେହ କରି ଶାଲ୍ୱ ତାହାର ପ୍ରସ୍ତାବକୁ ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ କଲା। ତେଣୁ ତପସ୍ୟାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆସକ୍ତ ହୋଇ ସେ ଏହି ତପୋବନକୁ ଆସିଛି।

Verse 56

मया च प्रत्यभिज्ञाता वंशस्य परिकीर्तनात्‌ । अस्य दुःखस्य चोत्पत्तिं भीष्ममेवेह मन्‍्यते,इसके कुलका परिचय प्राप्त होनेसे मैंने इसे पहचाना है। यह अपने इस दुःखकी प्राप्तिमें भीष्मको ही कारण मानती है

ତାହାର ବଂଶ ପରିଚୟ କହିବାରୁ ମୁଁ ତାକୁ ଚିହ୍ନିଲି। ଏବଂ ଏହି ଦୁଃଖର ଉତ୍ପତ୍ତି ପାଇଁ ସେ ଏଠାରେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ହିଁ କାରଣ ମାନୁଛି।

Verse 57

अम्बोवाच भगवन्नेवमेवेह यथा55ह पृथिवीपति: । शरीरकर्ता मातुर्मे सृज्जयो होत्रवाहन:,अम्बा बोली--भगवन्‌! जैसा कि मेरी माताके पिता सूंजयवंशी महाराज होत्रवाहनने कहा है, ठीक ऐसी ही मेरी परिस्थिति है

ଅମ୍ବା କହିଲା—ଭଗବନ୍, ରାଜା ଯେପରି କହିଛନ୍ତି, ଏଠାରେ ମୋର ଅବସ୍ଥା ଠିକ୍ ସେପରି। ମୋର ମାତାମହ—ସୂଞ୍ଜୟ ବଂଶୀୟ ହୋତ୍ରବାହନ, ଯିଏ ମୋ ଦେହଧାରଣର କାରଣ—ସେ ମଧ୍ୟ ଏହିପରି କହିଛନ୍ତି।

Verse 58

न होत्सहे स्वनगरं प्रतियातुं तपोधन । अपमानभयाच्चैव व्रीडया च महामुने

ହେ ତପୋଧନ, ମହାମୁନି! ଅପମାନର ଭୟ ଓ ଲଜ୍ଜାର କାରଣରୁ ମୁଁ ମୋ ନଗରକୁ ଫେରିବାକୁ ସାହସ କରୁନାହିଁ।

Verse 59

तपोधन! महामुने! लज्जा और अपमानके भयसे अपने नगरको जानेके लिये मेरे मनमें उत्साह नहीं है ।। यत्‌ तु मां भगवान्‌ रामो वक्ष्यति द्विजसत्तम | तन्मे कार्यतमं कार्यमिति मे भगवन्‌ मति:,भगवन! द्विजश्रेष्ठस अब भगवान्‌ परशुराम मुझसे जो कुछ कहेंगे, वही मेरे लिये सर्वोत्तम कर्तव्य होगा, यही मैंने निश्चय किया है

ହେ ତପୋଧନ, ମହାମୁନି! ଲଜ୍ଜା ଓ ଅପମାନର ଭୟରୁ ମୋ ମନରେ ନିଜ ନଗରକୁ ଯିବାର ଉତ୍ସାହ ନାହିଁ। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏବେ ଭଗବାନ୍ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମୋତେ ଯାହା କହିବେ, ସେଇ ମୋ ପାଇଁ ସର୍ବୋତ୍ତମ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ—ଭଗବନ୍—ଏହି ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ।

Verse 96

आश्रमे वै वसन्त्यास्ते न भवेयु: पितुर्गहि । 'भामिनि! एक तो तुम राजकुमारी और दूसरे स्वभावतः सुकुमारी हो, अतः सुन्दरी! यहाँ आश्रममें तुम्हारे रहनेसे अनेक दोष प्रकट हो सकते हैं। पिताके घरमें वे दोष नहीं प्राप्त होंगे!

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ତୁମେ ଯଦି ଆଶ୍ରମରେ ରହ, ତେବେ ପିତୃଗୃହରେ ଯେଉଁ ଦୋଷ ଓ ସନ୍ଦେହ କେବେ ଉପଜେନାହିଁ, ସେଗୁଡ଼ିକ ଉପଜିପାରେ। ହେ ଭାମିନି! ତୁମେ ରାଜକୁମାରୀ, ଏବଂ ସ୍ୱଭାବତଃ ସୁକୁମାରୀ। ତେଣୁ, ସୁନ୍ଦରୀ! ଏଠାରେ ଆଶ୍ରମବାସରୁ ଅନେକ ଅନୁଚିତତା ଓ ଲୋକନିନ୍ଦା ଉଠିପାରେ; କିନ୍ତୁ ପିତାଙ୍କ ଘରେ ସେହି କଳଙ୍କ ଲାଗିବ ନାହିଁ।

Verse 176

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि होत्रवाहनाम्बासंवादे षट्सप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବରେ ହୋତ୍ରବାହନ-ଅମ୍ବା ସଂବାଦର ଏକଶେ ଛଅସତ୍ତରିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

Amba’s status becomes contested between prior choice (Śālva), coercive abduction (Bhīṣma), and subsequent rejection—raising the dilemma of legitimate marital resolution and social restoration when customary processes produce reputational harm.

The narrative models procedural ethics: establish facts, honor formal reverence, seek competent adjudication, and pursue resolution through recognized authority rather than unilateral retaliation or social withdrawal.

No explicit phalaśruti appears in this segment; its meta-function is archival and juridical—assembling testimony and context so Paraśurāma’s forthcoming judgment can be read within a documented chain of claims and obligations.