
भीष्म–दुर्योधनसंवादः — शिखण्डिनं न हन्तुं कारणकथनम् (Amba-ākhyāna prologue)
Upa-parva: Bhīṣma–Duryodhana Saṃvāda (Śikhaṇḍin-hetu-kathā / Amba-ākhyāna context)
The chapter opens with Duryodhana questioning why Bhīṣma would not strike Śikhaṇḍin even when Śikhaṇḍin is seen in active combat readiness. Bhīṣma asks Duryodhana and assembled rulers to hear the reason and begins a retrospective account anchored in dynastic duty. He notes Śaṃtanu’s passing and describes how, maintaining his own vow and guardianship obligations, he consecrated Citrāṅgada and, after Citrāṅgada’s death, installed Vicitravīrya according to Satyavatī’s counsel. Seeking an appropriate marriage alliance for Vicitravīrya, Bhīṣma hears of the Kāśī king’s three daughters—Ambā (eldest), Ambikā (middle), Ambālikā (youngest)—at a svayaṃvara. He goes alone to Kāśī, observes the assembled kings, and forcibly carries the three princesses onto his chariot, repeatedly announcing his identity and intent. The gathered rulers respond with armed pursuit; Bhīṣma repels them with superior archery, disabling banners, mounts, and charioteers, and returns to Hāstinapura victorious. He states that he brought the princesses for his brother’s sake and reports the act to Satyavatī, establishing the causal background for later personal enmities and vow-bound constraints that will culminate in Bhīṣma’s stance regarding Śikhaṇḍin.
Chapter Arc: भीष्म धृतराष्ट्र के सम्मुख पाण्डव-पक्ष के रथी, महारथी और अतिरथी योद्धाओं का क्रमशः परिचय आरम्भ करते हैं—विशेषतः शिखण्डी जैसे नामों के साथ, जिनका आगमन कौरव-सेना के लिए पूर्व-अपयश के नाश और नये यश के उदय का संकेत बनता है। → एक-एक कर पाञ्चाल, प्रभद्रक, चेदि आदि जनपदों के महाबली धनुर्धरों का वर्णन बढ़ता जाता है; प्रत्येक के साथ उनकी सेना, रथवंश, अस्त्र-विद्या और युद्ध-लक्षणों का उल्लेख होता है, जिससे धृतराष्ट्र के मन में आसन्न महासंग्राम की भय-गंभीरता गाढ़ी होती जाती है। → भीष्म कुछ योद्धाओं को प्रलयकाल में क्रुद्ध पिनाकधारी रुद्र के तुल्य बताते हैं—ऐसे वर्णन से पाण्डव-पक्ष की मारक-क्षमता का चरम बोध होता है और कौरव-पक्ष के लिए यह स्पष्ट हो जाता है कि यह युद्ध साधारण नहीं, सर्वनाश की सीमा तक जा सकता है। → अध्याय का समापन पाण्डव-पक्ष के प्रमुख रथसत्तमों की समग्र गणना/प्रतिष्ठा-स्थापना के साथ होता है—भीष्म का निष्कर्ष यह कि ये सब युद्ध-लक्षणों से युक्त, शस्त्र-विद्या में निपुण और महात्मा माने जाते हैं। → धृतराष्ट्र के लिए प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है—ऐसी शक्ति-संपन्न पाण्डव-सेना के सामने दुर्योधन का हठ किस विनाश की ओर ले जाएगा?
Verse 1
अपन प्रात छा अंक एकसप्तत्याधिकशततमो< ध्याय: पाण्डवपक्षके रथी, महारथी एवं अतिरथी आदिका वर्णन भीष्म उवाच पडज्चालराजस्य सुतो राजन् परपुरंजय: । शिखण्डी रथमुख्यो मे मत: पार्थस्य भारत,भीष्मजी कहते हैं-राजन! भरतनन्दन! पांचालराज द्रुपदका पुत्र शिखण्डी शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला है, मैं उसे युधिष्ठिरकी सेनाका एक प्रमुख रथी मानता हूँ
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ହେ ଭରତବଂଶଜ! ପାଞ୍ଚାଳରାଜ ଦ୍ରୁପଦଙ୍କ ପୁତ୍ର ଶିଖଣ୍ଡୀ ଶତ୍ରୁପୁରଜୟୀ; ମୋ ମତରେ ସେ ପାର୍ଥ (ପାଣ୍ଡବ) ପକ୍ଷର ପ୍ରମୁଖ ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗଣ୍ୟ।
Verse 2
एष योत्स्यति संग्रामे नाशयन् पूर्वसंस्थितम् । परं यशो विप्रथयंस्तव सेनासु भारत,भारत! वह तुम्हारी सेनामें प्रवेश करके अपने पूर्व अपयशका नाश तथा उत्तम सुयशका विस्तार करता हुआ बड़े उत्साहसे युद्ध करेगा
ହେ ଭାରତ! ସେ ତୁମ ସେନାମଧ୍ୟରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ପୂର୍ବରୁ ଜମିଥିବା ଅପଯଶକୁ ନାଶ କରିବ ଏବଂ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯଶକୁ ବିସ୍ତାର କରି, ମହା ଉତ୍ସାହରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ।
Verse 3
एतस्य बहुला: सेना: पज्चालाश्च प्रभद्रका: । तेनासौ रथवंशेन महत् कर्म करिष्यति,८#दर न्स | कर है 5 5 कि २ पक बेड (२ ५ | ड्ं ; श ॥ उसके साथ पांचालों और प्रभद्रकोंकी बहुत बड़ी सेना है। वह उन रथियोंके समूहद्वारा युद्धमें महान् कर्म कर दिखायेगा
ତାହାର ପକ୍ଷରେ ପାଞ୍ଚାଳ ଓ ପ୍ରଭଦ୍ରକମାନଙ୍କର ବିପୁଳ ସେନା ଅଛି। ସେହି ରଥୀମାନଙ୍କ ଦଳର ଆଶ୍ରୟରେ ସେ ଯୁଦ୍ଧରେ ମହାନ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧିବ।
Verse 4
धृष्टय्युम्नश्व सेनानी: सर्वसेनासु भारत | मतो मे5तिरथो राजन् द्रोणशिष्यो महारथ:,भारत! जो पाण्डवोंकी सम्पूर्ण सेनाका सेनापति है, वह द्रोणाचार्यका महारथी शिष्य धृष्टद्युम्न मेरे विचारसे अतिरथी है
ହେ ଭାରତ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ସେନାର ସେନାପତି ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ—ଦ୍ରୋଣଙ୍କ ମହାରଥୀ ଶିଷ୍ୟ—ମୋ ମତରେ, ହେ ରାଜନ, ଅତିରଥ।
Verse 5
एष योत्स्यति संग्रामे सूदयन् वै परान् रणे । भगवानिव संक्रुद्ध: पिनाकी युगसंक्षये,जैसे प्रलयकालमें पिनाकधारी भगवान् रुद्र कुपित होकर प्रजाका संहार करते हैं, उसी प्रकार यह संग्राममें शत्रुओंका संहार करता हुआ युद्ध करेगा
ଏହି ଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ସଂହାର କରି କରି ଯୁଦ୍ଧ କରିବ—ଯେପରି ଯୁଗାନ୍ତେ ପିନାକଧାରୀ ଭଗବାନ ରୁଦ୍ର କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ବିନାଶ କରନ୍ତି।
Verse 6
एतस्य तद् रथानीकं॑ कथयन्ति रणप्रिया: । बहुत्वात् सागरप्रख्यं देवानामिव संयुगे,इसके पास रथियोंकी जो देवसेनाके समान विशाल सेना है, उसकी संख्या बहुत होनेके कारण युद्धप्रेमी सैनिक रणक्षेत्रमें उसे समुद्रके समान बताते हैं
ରଣପ୍ରିୟ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ତାହାର ରଥୀଦଳକୁ ସଂଖ୍ୟାର ବହୁଳତାରୁ ସମୁଦ୍ରସମାନ ବୋଲି କହନ୍ତି; ଯେପରି ଦେବମାନଙ୍କ ମହାସଂଯୁଗରେ ଦେବସେନା।
Verse 7
क्षत्रधर्मा तु राजेन्द्र मतो मे<र्थरथो नृप । धृष्टद्युम्नस्य तनयो बाल्यान्नातिकृतश्रम:,राजेन्द्र! धृष्टद्युम्नका पुत्र क्षत्रधर्मा मेरी समझमें अभी अर्धरथी है। बाल्यावस्था होनेके कारण उसने अस्त्र-विद्यामें अधिक परिश्रम नहीं किया है
ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କ ପୁତ୍ର କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମା ମୋ ମତରେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅର୍ଧରଥ। ବାଲ୍ୟାବସ୍ଥାରୁ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ସେ ଅଧିକ ପରିଶ୍ରମ କରିନାହିଁ।
Verse 8
शिशुपालसुतो वीरश्लेदिराजो महारथ: । धृष्टकेतुर्महेष्वास: सम्बन्धी पाण्डवस्य ह,शिशुपालका वीर पुत्र महाधनुर्धर चेदिराज धृष्टकेतु पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका सम्बन्धी एवं महारथी है
ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ବୀର ପୁତ୍ର ଧୃଷ୍ଟକେତୁ—ଚେଦିରାଜ—ମହାରଥୀ ଓ ମହାଧନୁର୍ଧର; ସେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ଆତ୍ମୀୟ।
Verse 9
एष चेदिपति: शूर: सह पुत्रेण भारत | महारथानां सुकरं महत् कर्म करिष्यति,भारत! यह शौर्यसम्पन्न चेदिराज अपने पुत्रके साथ आकर महारथियोंके लिये सहजसाध्य महान् पराक्रम कर दिखायेगा
ହେ ଭାରତ! ଏହି ଶୂର ଚେଦିପତି ପୁତ୍ରସହ ଆସି, ମହାରଥୀମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ମଧ୍ୟ ସହଜସାଧ୍ୟ ଏକ ମହତ୍ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧନ କରିବ।
Verse 10
क्षत्रधर्मरतो महां मत: परपुरंजय: । क्षत्रदेवस्तु राजेन्द्र पाण्डवेषु रथोत्तम:,राजेन्द्र! शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला क्षत्रियधर्मपरायण क्षत्रदेव मेरे मतमें पाण्डवसेनाका एक श्रेष्ठ रथी है
ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଶତ୍ରୁପୁରଜୟୀ, କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମପରାୟଣ କ୍ଷତ୍ରଦେବ ମୋ ମତରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥୀ।
Verse 11
जयन्तश्नामितौजाश्न सत्यजिच्च महारथ: । महारथा महात्मान: सर्वे पाउ्चालसत्तमा:
ଜୟନ୍ତ, ଅମିତୌଜ ଓ ମହାରଥୀ ସତ୍ୟଜିତ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ମହାତ୍ମା, ମହାବଳ ମହାରଥୀ; ପାଞ୍ଚାଳମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 12
योत्स्यन्ते समरे तात संरब्धा इव कुञ्जरा: । जयन्त, अमितौजा और महारथी सत्यजित--ये सभी पांचालशिरोमणि महामनस्वी वीर महारथी ही हैं। तात! ये सब-के-सब क्रोधमें भरे हुए गजराजोंकी भाँति समरभूमिमें युद्ध करेंगे ।। ११ है ।। अजो भोज क्ष विक्रान्तौ पाण्डवार्थे महारथौ
ତାତ! ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ସମରରେ କ୍ରୋଧାବିଷ୍ଟ ଗଜରାଜମାନଙ୍କ ପରି ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ। ଏବଂ ଅଜ ଓ ଭୋଜ—ଏହି ଦୁଇ ବିକ୍ରାନ୍ତ ମହାରଥୀ—ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହିତାର୍ଥେ ରଣକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଅବତରିବେ।
Verse 13
योत्स्येते बलिनौ शूरौ परं शक््त्या क्षयिष्यत: । पाण्डवोंके लिये महान् पराक्रम करनेवाले बलवान् शूरवीर अज और भोज दोनों महारथी हैं। वे सम्पूर्ण शक्ति लगाकर युद्ध करेंगे और अपने पुरुषार्थका परिचय देंगे ।। १२ £ शीघ्रास्त्राश्षित्रयोद्धार: कृतिनो दृढविक्रमा:,राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले, विचित्र योद्धा, युद्धकालमें निपुण और दृढ़ पराक्रमी जो पाँच भाई केकयराजकुमार हैं, वे सभी उदार रथी माने गये हैं। उन सबकी ध्वजा लाल रंगकी है
ସେଇ ଦୁଇ ବଳବାନ ଶୂର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶକ୍ତି ଲଗାଇ ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ ଏବଂ ରଣରେ ସଂହାର ସାଧିବାକୁ ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପ କରିବେ। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହିତାର୍ଥେ ମହାପରାକ୍ରମଶାଳୀ ବଳିଷ୍ଠ ଶୂରବୀର ଅଜ ଓ ଭୋଜ—ଉଭୟେ ମହାରଥୀ। ସେମାନେ ସମସ୍ତ ଶକ୍ତି ଦେଇ ଯୁଦ୍ଧ କରି ନିଜ ପୁରୁଷାର୍ଥ ପ୍ରକାଶ କରିବେ।
Verse 14
केकया: पज्च राजेन्द्र भ्रातरो दृढविक्रमा: । सर्वे चैव रथोदारा: सर्वे लोहितकध्वजा:,राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले, विचित्र योद्धा, युद्धकालमें निपुण और दृढ़ पराक्रमी जो पाँच भाई केकयराजकुमार हैं, वे सभी उदार रथी माने गये हैं। उन सबकी ध्वजा लाल रंगकी है
ରାଜେନ୍ଦ୍ର! କେକୟ ଦେଶର ପାଞ୍ଚ ଭାଇ ରାଜକୁମାର ଦୃଢ଼ ପରାକ୍ରମୀ। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଉଦାର ରଥୀ ଭାବେ ପରିଗଣିତ, ଏବଂ ସମସ୍ତଙ୍କର ଧ୍ୱଜା ଲୋହିତବର୍ଣ୍ଣ।
Verse 15
काशिक: सुकुमारश्न नीलो यश्चापरो नृप । सूर्यदत्तश्न शड्खश्न मदिराश्चश्व नामत:,सुकुमार, काशिक, नील, सूर्यदत्त, शंख और मदिराश्व नामक ये सभी योद्धा उदार रथी हैं। युद्ध ही इन सबका शौर्यसूचक चिह्न है। मैं इन सभीको सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता और महामनस्वी मानता हूँ
ନୃପ! କାଶିକ, ସୁକୁମାର, ନୀଳ, ସୂର୍ଯ୍ୟଦତ୍ତ, ଶଙ୍ଖ ଓ ମଦିରାଶ୍ୱ—ଏହେମାନେ ନାମରେ ପରିଚିତ ଯୋଦ୍ଧା।
Verse 16
सर्व एव रथोदारा: सर्वे चाहवलक्षणा: । सर्वस्त्रिविदुष: सर्वे महात्मानो मता मम,सुकुमार, काशिक, नील, सूर्यदत्त, शंख और मदिराश्व नामक ये सभी योद्धा उदार रथी हैं। युद्ध ही इन सबका शौर्यसूचक चिह्न है। मैं इन सभीको सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता और महामनस्वी मानता हूँ
ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଉଦାର ରଥୀ; ଯୁଦ୍ଧ ହିଁ ସେମାନଙ୍କର ଲକ୍ଷଣ। ମୋ ମତରେ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ସର୍ବାସ୍ତ୍ରବିଦ୍ ଏବଂ ମହାତ୍ମା।
Verse 17
वार्थक्षेमिर्महाराज मतो मम महारथ: । चित्रायुधश्न नृपतिर्मतो मे रथसत्तम:,महाराज! वार्धक्षेमिको मैं महारथी मानता हूँ तथा राजा चित्रायुध मेरे विचारसे श्रेष्ठ रथी हैं
ମହାରାଜ! ମୋ ମତରେ ୱାର୍ଥକ୍ଷେମି ମହାରଥୀ; ଏବଂ ରାଜା ଚିତ୍ରାୟୁଧ ମୋ ଦୃଷ୍ଟିରେ ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 18
स हि संग्रामशोभी च भक्तश्नापि किरीटिन: । चेकितान: सत्यधृति: पाण्डवानां महारथौ | द्वाविमौ पुरुषव्याप्रौ रथोदारौ मतौ मम,चित्रायुध संग्राममें शोभा पानेवाले तथा अर्जुनके भक्त हैं। चेकितान और सत्यधृति--ये दो पुरुषसिंह पाण्डव-सेनाके महारथी हैं। मैं इन्हें रथियोंमें श्रेष्ठ मानता हूँ
ଏହି ଦୁଇଜଣ ଯୁଦ୍ଧରେ ଶୋଭା ବଢ଼ାନ୍ତି ଏବଂ କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କର ଭକ୍ତ। ଚେକିତାନ ଓ ସତ୍ୟଧୃତି—ଏହି ଦୁଇଜଣ ପାଣ୍ଡବସେନାର ମହାରଥୀ। ମୋ ମତରେ ଏହି ଦୁଇ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 19
व्याप्रदत्तश्न राजेन्द्र चन्द्रसेनश्व भारत । मतौ मम रथोदारौ पाण्डवानां न संशय:,भरतनन्दन! महाराज! व्याप्रदत्त और चन्द्रसेन-ये दो नरेश भी मेरे मतमें पाण्डवसेनाके श्रेष्ठ रथी हैं, इसमें संशय नहीं है
ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ହେ ଭାରତବଂଶଜ! ବ୍ୟାପ୍ରଦତ୍ତ ଓ ଚନ୍ଦ୍ରସେନ—ଏହି ଦୁଇ ରାଜା ମଧ୍ୟ ମୋ ମତରେ ପାଣ୍ଡବପକ୍ଷର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥୀ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 20
सेनाबिन्दुश्न राजेन्द्र क्रोधहन्ता च नामतः । यः समो वासुदेवेन भीमसेनेन वा विभो
ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ସେନାବିନ୍ଦୁ ନାମରେ ଜଣେ ବୀର ଅଛନ୍ତି; ନାମରେ ମଧ୍ୟ ସେ ‘କ୍ରୋଧହନ୍ତା’ ବୋଲି ପରିଚିତ। ହେ ବିଭୋ! ପରାକ୍ରମରେ ସେ ବାସୁଦେବ କିମ୍ବା ଭୀମସେନ ସମାନ।
Verse 21
तुम मुझको, आचार्य द्रोणको तथा कृपाचार्यको जैसा समझते हो, युद्धमें दूसरे वीरोंसे स्पर्धा रखनेवाले तथा बहुत ही फुर्तीके साथ अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले प्रशंसनीय एवं उत्तम रथी नरश्रेष्ठ काशिराजको भी तुम्हें वैसा ही मानना चाहिये
ତୁମେ ଯେପରି ମୋତେ, ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ଓ କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ମାନ୍ୟ କର, ସେହିପରି କାଶିରାଜଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମାନ୍ୟ କର—ସେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପ୍ରଶଂସନୀୟ ଓ ଉତ୍ତମ ରଥୀ। ସମରରେ ସେ ଅନ୍ୟ ବୀରମାନଙ୍କ ସହ ସମାନ ଭାବେ ପ୍ରତିସ୍ପର୍ଧା କରନ୍ତି ଏବଂ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୀଘ୍ରତାରେ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ପ୍ରୟୋଗ କରନ୍ତି; ତାଙ୍କୁ ହୀନ ଭାବିବ ନାହିଁ।
Verse 22
तथा स समरश्लाघी मन्तव्यो रथसत्तम: । काश्य: परमशीदघ्रास्त्र: श्लाघनीयो नरोत्तम:,तुम मुझको, आचार्य द्रोणको तथा कृपाचार्यको जैसा समझते हो, युद्धमें दूसरे वीरोंसे स्पर्धा रखनेवाले तथा बहुत ही फुर्तीके साथ अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले प्रशंसनीय एवं उत्तम रथी नरश्रेष्ठ काशिराजको भी तुम्हें वैसा ही मानना चाहिये
ସେହିପରି କାଶିରାଜଙ୍କୁ ରଥସତ୍ତମ ଭାବେ ମନେ କରିବା ଉଚିତ—ସେ ସମରରେ ଗର୍ବ କରନ୍ତି, ଅସ୍ତ୍ରପ୍ରୟୋଗରେ ପରମ ଶୀଘ୍ର, ଏବଂ ନରୋତ୍ତମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ।
Verse 23
मां च द्रोणं कृपं चैव यथा सम्मन्यते भवान्,रथ एकगुणो महां ज्ञेय: परपुरंजय: । अयं च युधि विक्रान्तो मन्तव्योडष्टगुणो रथ: मेरी दृष्टिमें शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले काशिराजको साधारण अवस्थामें एक रथी समझना चाहिये; परंतु जिस समय ये युद्धमें पराक्रम प्रकट करने लगते हैं उस समय इन्हें आठ रथियोंके बराबर मानना चाहिये
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ତୁମେ ଯେପରି ମୋତେ, ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ଓ କୃପଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କର, ସେପରି ଶତ୍ରୁନଗର-ଜୟୀ ଏହି ମହାଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମୂଲ୍ୟାଙ୍କନ କର। ସାଧାରଣ ଅବସ୍ଥାରେ ସେ ଗୋଟିଏ ରଥୀ ସମାନ; କିନ୍ତୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ପରାକ୍ରମ ପ୍ରକାଶ କଲେ ସେ ଆଠ ରଥୀ ସମାନ ଗଣ୍ୟ।
Verse 24
सत्यजित् समरश्लाघी ट्रुपदस्यात्मजो युवा । गत: सो5तिरथत्वं हि धृष्टद्युम्नेन सम्मित:
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସମରରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ ପରାକ୍ରମୀ ଦ୍ରୁପଦଙ୍କ ଯୁବ ପୁତ୍ର ସତ୍ୟଜିତ୍, ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କ ସମାନ ଅତିରଥ ପଦକୁ ନିଶ୍ଚୟ ଲାଭ କରିଛି।
Verse 25
पाण्डवानां यशस्काम: परं कर्म करिष्यति । द्रपदका तरुण पुत्र सत्यजित् सदा युद्धकी स्पृहा रखनेवाला है। वह धृष्टद्युम्नके समान ही अतिरथीका पद प्राप्त कर चुका है। वह पाण्डवोंके यशोविस्तारकी इच्छा रखकर युद्धमें महान् कर्म करेगा | २४ ई ।। अनुरक्तश्न शूरश्ष रथो5यमपरो महान्,पाण्डवपक्षके धुरंधर वीर महापराक्रमी पाण्डयराज भी एक अन्य महारथी हैं। ये पाण्डवोंके प्रति अनुराग रखनेवाले और शूरवीर हैं। इनका धनुष महान् और सुदृढ़ है। ये पाण्डवसेनाके सम्माननीय महारथी हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଯଶ ବଢ଼ାଇବାକୁ ଆକାଂକ୍ଷୀ, ସଦା ଯୁଦ୍ଧସ୍ପୃହା ଧାରଣ କରୁଥିବା ଦ୍ରୁପଦଙ୍କ ତରୁଣ ପୁତ୍ର ସତ୍ୟଜିତ୍ ଯୁଦ୍ଧରେ ପରମ ମହାନ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବ। ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କ ସମାନ ସେ ଅତିରଥ ପଦକୁ ପୂର୍ବରୁ ଲାଭ କରିଛି; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ କୀର୍ତ୍ତି ବିସ୍ତାର ପାଇଁ ସେ ରଣେ ମହା ପରାକ୍ରମ କରିବ।
Verse 26
पाण्ड्यराजो महावीर्य: पाण्डवानां धुरंधर: । दृढ्धन्वा महेष्वास: पाण्डवानां महारथ:,पाण्डवपक्षके धुरंधर वीर महापराक्रमी पाण्डयराज भी एक अन्य महारथी हैं। ये पाण्डवोंके प्रति अनुराग रखनेवाले और शूरवीर हैं। इनका धनुष महान् और सुदृढ़ है। ये पाण्डवसेनाके सम्माननीय महारथी हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ପାଣ୍ଡ୍ୟଦେଶର ରାଜା ମହାବୀର୍ୟବାନ; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଭାର ବହନ କରୁଥିବା ଧୁରନ୍ଧର। ତାଙ୍କର ଧନୁ ଦୃଢ଼, ସେ ମହାଧନୁର୍ଧର; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଏକ ମହାରଥୀ।
Verse 27
श्रेणिमान् कौरवश्रेष्ठ वसुदानश्न पार्थिव: । उभावेतावतिरथौ मतौ परपुरंजयौ,कौरवश्रेष्ठ! राजा श्रेणिमान् और वसुदान--ये दोनों वीर अतिरथी माने गये हैं। ये शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेमें समर्थ हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ କୌରବଶ୍ରେଷ୍ଠ! ରାଜା ଶ୍ରେଣିମାନ୍ ଓ ବସୁଦାନ—ଏହି ଦୁଇଜଣ ଅତିରଥ ଭାବେ ଗଣ୍ୟ; ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ନଗର ଜୟ କରିବାରେ ସମର୍ଥ।
Verse 170
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ରଥାତିରଥ-ସଂଖ୍ୟାନପର୍ବର ଏକଶତ ସତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 171
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि एकसप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ ରଥାତିରଥ-ସଂଖ୍ୟାନପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଏକଶତ ଏକସତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ (ସମାପ୍ତ)।
Verse 206
स योत्स्यति हि विक्रम्य समरे तव सैनिकै: । राजेन्द्र! राजा सेनाबिन्दुका दूसरा नाम क्रोधहन्ता भी है। प्रभो! वे भगवान् श्रीकृष्ण तथा भीमसेनके समान पराक्रमी माने जाते हैं। वे समरांगणमें तुम्हारे सैनिकोंके साथ पराक्रम प्रकट करते हुए युद्ध करेंगे
ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ସେ ନିଶ୍ଚୟ ପରାକ୍ରମ କରି ସମରଭୂମିରେ ତୁମ ସୈନ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ।
The dilemma is whether battlefield efficiency permits targeting every armed opponent, or whether a commander must honor vow-derived and history-derived constraints even when the opponent is tactically threatening—raising a conflict between immediate martial advantage and long-standing ethical commitments.
The chapter teaches that present strategic choices in polity and conflict are not purely situational; they are conditioned by prior vows, institutional duties, and the moral residue of earlier actions, which together define the legitimate scope of action for a responsible agent.
No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-function is etiological—explaining how earlier dynastic and marital interventions generate later constraints and antagonisms within the epic’s causal framework.