Adhyaya 167
Udyoga ParvaAdhyaya 16743 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं हुआ; पर प्रभात में युद्ध-घोषणा से तनाव चरम पर है और पक्ष-बल का आकलन निर्णायक बन रहा है।

Adhyaya 167

भीष्मकृतः पाण्डवपक्ष-महारथ-प्रशंसा (Bhishma’s appraisal of Pandava-aligned chariot-warriors)

Upa-parva: Sena-nirṇaya / Ratha-mahāratha-vicāra (Bhīṣma’s appraisal of allied chariot-warriors)

Bhīṣma addresses the king and enumerates major Pāṇḍava-aligned combat leaders, classifying them as eminent chariot-warriors (mahāratha / ratha-yūthapa-yūthapa). He identifies the five Draupadeyas and Uttara (of Virāṭa’s line) as formidable. Abhimanyu is characterized as a mobile, versatile fighter (laghv-astra, citra-yodhī), mentally resolute and firm in valor, capable of parity in battle with Arjuna or even Vāsudeva by reputation and command-role framing. Sātyaki is profiled as a leading Vṛṣṇi hero—fearless, unshaken, and energetically assertive. Uttamaujā and Yudhāmanyu are also marked as highly regarded chariot-warriors. Bhīṣma then emphasizes force depth—thousands of chariots, elephants, and horses—whose fighters are prepared to risk their bodies for the sake of the Pāṇḍavas, creating mutual challenge ‘like fire and wind’ within the opposing armies. Finally, he highlights the senior kings Virāṭa and Drupada as difficult to overcome despite age: steadfast in kṣatra-dharma, bound by alliance affection (sneha-pāśa) and shared cause, committed to preserving trust and kinship obligations, and prepared to undertake “great work” in the coming engagement.

Chapter Arc: कौरव-पक्ष के रथियों-अतिरथियों की गणना के बीच सभा में एक चिंगारी सुलगती है—भीष्म कर्ण के युद्ध-मूल्य पर रोषपूर्वक कठोर वचन कह उठते हैं, और दुर्योधन उसे रोकने का यत्न करता है। → भीष्म शत्रु-पक्ष की शक्ति-गणना और गान्धार-वीरों जैसे प्रमुख योद्धाओं का उल्लेख करते हुए युद्ध की निकटता को तीखा करते हैं; साथ ही कर्ण को ‘रणकर्कश’ मित्र बताकर दुर्योधन की आसक्ति और निर्भरता को भी उजागर करते हैं। → भीष्म का विस्फोट: वे कर्ण को ‘अर्धरथ’ ठहराते हैं—उसके घमंड, प्रमाद, और रण में विमुख होने की बात कहकर; कर्ण प्रतिवाद करता है कि भीष्म का यह मत जगत में फैल जाएगा और वह असत्य नहीं बोलते। → दुर्योधन दोनों स्तम्भों—भीष्म और कर्ण—को एकाग्र होकर ‘मेरे परम कल्याण’ पर विचार करने को कहता है, और फिर शत्रु-पक्ष के श्रेष्ठ रथियों-अतिरथियों तथा उनकी बलाबल-समीक्षा सुनने की इच्छा प्रकट करता है। → रात्रि के प्रभात होते ही युद्ध निश्चित है—अब शत्रु-पक्ष की पूरी शक्ति-सूची और रणनीतिक आकलन की ओर कथा मुड़ती है।

Shlokas

Verse 1

अत-४-णका+ अष्ट षष्ट्यांधिकशततमोब& ध्याय: कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक हक तथा दुर्योधनद्वारा उसका वारण भीष्म उवाच अचलो वृषकश्चैव सहितौ भ्रातरावुभौ । रथौ तव दुराधर्षो शत्रून्‌ विध्वंसयिष्यत:,भीष्म कहते हैं--अचल और वृषक--ये साथ रहनेवाले दोनों भाई दुर्धर्ष रथी हैं, जो तुम्हारे शत्रुओंका विध्वंस कर डालेंगे

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ଅଚଳ ଓ ବୃଷକ—ଏହି ଦୁଇ ଭାଇ ସଦା ସହିତ; ତୁମ ପକ୍ଷର ଦୁର୍ଧର୍ଷ ରଥୀ। ସେମାନେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ବିଧ୍ୱଂସ କରିଦେବେ।

Verse 2

बलवन्तौ नरव्याप्रौ दृढक्रोधौ प्रहारिणौ । गान्धारमुख्यौ तरुणौ दर्शनीयौं महाबलौ,गान्धारदेशके ये प्रधान वीर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी, बलवान, अत्यन्त क्रोधी, प्रहार करनेमें कुशल, तरुण, दर्शनीय एवं महाबली हैं

ସେ ଦୁଇଜଣ ବଳବାନ, ନରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବ୍ୟାଘ୍ରସମ; କ୍ରୋଧରେ ଦୃଢ଼, ପ୍ରହାରରେ ନିପୁଣ। ଗାନ୍ଧାରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ—ତରୁଣ, ଦର୍ଶନୀୟ ଓ ମହାବଳୀ।

Verse 3

सखा ते दयितो नित्यं य एष रणकर्कश: । उत्साहयति राजंस्त्वां विग्रहे पाण्डवैः सह,राजन! यह जो तुम्हारा प्रिय सखा कर्ण है, जो तुम्हें पाण्डवोंके साथ युद्धके लिये सदा उत्साहित करता रहता है और रणक्षेत्रमें सदा अपनी क्रूरताका परिचय देता है, बड़ा ही कटुभाषी, आत्मप्रशंसी और नीच है। यह कर्ण तुम्हारा मन्त्री, नेता और बन्धु बना हुआ है। यह अभिमानी तो है ही, तुम्हारा आश्रय पाकर बहुत ऊँचे चढ़ गया है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ! ରଣରେ କଠୋର ଏହି ତୁମ ପ୍ରିୟ ସଖା କର୍ଣ୍ଣ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ତୁମକୁ ସଦା ଉତ୍ସାହିତ କରେ।

Verse 4

परुष: कत्थनो नीच: कर्णो वैकर्तनस्तव । मन्त्री नेता च बन्धुश्न मानी चात्यन्तमुच्छित:,राजन! यह जो तुम्हारा प्रिय सखा कर्ण है, जो तुम्हें पाण्डवोंके साथ युद्धके लिये सदा उत्साहित करता रहता है और रणक्षेत्रमें सदा अपनी क्रूरताका परिचय देता है, बड़ा ही कटुभाषी, आत्मप्रशंसी और नीच है। यह कर्ण तुम्हारा मन्त्री, नेता और बन्धु बना हुआ है। यह अभिमानी तो है ही, तुम्हारा आश्रय पाकर बहुत ऊँचे चढ़ गया है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ତୁମର ବୈକର୍ତ୍ତନ କର୍ଣ୍ଣ କଠୋରଭାଷୀ, ଆତ୍ମପ୍ରଶଂସକ ଓ ନୀଚ ଆଚରଣବାନ୍। ତଥାପି ସେଇ ତୁମର ମନ୍ତ୍ରୀ, ନେତା ଓ ବନ୍ଧୁ ହୋଇ ବସିଛି; ଅଭିମାନୀ ହୋଇ ତୁମ ଆଶ୍ରୟରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉଚ୍ଚକୁ ଉଠିଛି।

Verse 5

एष नैव रथ: कर्णो न चाप्यतिरथो रणे | वियुक्त: कवचेनैष सहजेन विचेतन:,यह कर्ण युद्धभूमिमें न तो अतिरथी है और न रथी ही कहलानेयोग्य है, क्योंकि यह मूर्ख अपने सहज कवच तथा दिव्य कुण्डलोंसे हीन हो चुका है। यह दूसरोंके प्रति सदा घृणाका भाव रखता है। परशुरामजीके अभिशापसे, ब्राह्मणकी शापोक्तिसे तथा विजयसाधक उपर्युक्त उपकरणोंको खो देनेसे मेरी दृष्टिमें यह कर्ण अर्धरथी है। अर्जुनसे भिड़नेपर यह कदापि जीवित नहीं बच सकता

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଏହି କର୍ଣ୍ଣ ଏବେ ଯୁଦ୍ଧରେ ନ ରଥୀ, ନ ଅତିରଥୀ। ନିଜ ସହଜ କବଚରୁ ବିୟୁକ୍ତ ହୋଇ ସେ ଯେନ ଚେତନାହୀନ ହୋଇପଡ଼ିଛି।

Verse 6

कुण्डलाभ्यां च दिव्याभ्यां वियुक्त: सततं घृणी । अभिशापाच्च रामस्य ब्राह्मणस्य च भाषणात्‌,यह कर्ण युद्धभूमिमें न तो अतिरथी है और न रथी ही कहलानेयोग्य है, क्योंकि यह मूर्ख अपने सहज कवच तथा दिव्य कुण्डलोंसे हीन हो चुका है। यह दूसरोंके प्रति सदा घृणाका भाव रखता है। परशुरामजीके अभिशापसे, ब्राह्मणकी शापोक्तिसे तथा विजयसाधक उपर्युक्त उपकरणोंको खो देनेसे मेरी दृष्टिमें यह कर्ण अर्धरथी है। अर्जुनसे भिड़नेपर यह कदापि जीवित नहीं बच सकता

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଦିବ୍ୟ କୁଣ୍ଡଳଦ୍ୱୟରୁ ବିୟୁକ୍ତ ହୋଇ ଏହି କର୍ଣ୍ଣ ସଦା ତିରସ୍କାର-ଭାବୀ। ପରଶୁରାମଙ୍କ ଅଭିଶାପ ଓ ଏକ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଶାପବାକ୍ୟରୁ ତାହାର ପରାକ୍ରମ କ୍ଷୀଣ ହୋଇଛି।

Verse 7

करणानां वियोगाच्च तेन मे<र्थरथो मतः । नैष फाल्गुनमासाद्य पुनर्जीवन्‌ विमोक्ष्यते,यह कर्ण युद्धभूमिमें न तो अतिरथी है और न रथी ही कहलानेयोग्य है, क्योंकि यह मूर्ख अपने सहज कवच तथा दिव्य कुण्डलोंसे हीन हो चुका है। यह दूसरोंके प्रति सदा घृणाका भाव रखता है। परशुरामजीके अभिशापसे, ब्राह्मणकी शापोक्तिसे तथा विजयसाधक उपर्युक्त उपकरणोंको खो देनेसे मेरी दृष्टिमें यह कर्ण अर्धरथी है। अर्जुनसे भिड़नेपर यह कदापि जीवित नहीं बच सकता

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ବିଜୟସାଧକ ଉପକରଣମାନଙ୍କୁ ହରାଇଥିବାରୁ ମୁଁ ତାକୁ ଅର୍ଧରଥୀ ବୋଲି ମନେ କରେ। ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ସମ୍ମୁଖୀନ ହେଲେ ସେ ପୁଣି ଜୀବନ୍ତ ମୁକ୍ତି ପାଇବ ନାହିଁ।

Verse 8

ततोअब्रवीत्‌ पुनद्रोण: सर्वशस्त्रभृतां वर: । एवमेतद्‌ यथा<>त्थ त्वं न मिथ्यास्ति कदाचन,यह सुनकर समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य भी बोल उठे--“आप जैसा कहते हैं, बिलकुल ठीक है। आपका यह मत कदापि मिथ्या नहीं है

ତାପରେ ସମସ୍ତ ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ରୋଣ ପୁଣି କହିଲେ—“ଆପଣ ଯେପରି କହିଛନ୍ତି, ସେପରି ହିଁ। ଆପଣଙ୍କ ମତ କେବେ ମିଥ୍ୟା ନୁହେଁ।”

Verse 9

रणे रणे5भिमानी च विमुखश्चापि दृश्यते । घृणी कर्ण: प्रमादी च तेन मे<र्थरथो मत:,“यह प्रत्येक युद्धमें घमंड तो बहुत दिखाता है; परंतु वहाँसे भागता ही देखा जाता है। कर्ण दयालु और प्रमादी है। इसलिये मेरी रायमें भी यह अर्धरथी ही है'

ରଣେ ରଣେ ସେ ମହା ଅଭିମାନ ଦେଖାଏ; ତଥାପି ଯୁଦ୍ଧରୁ ବିମୁଖ ହେଉଥିବା ମଧ୍ୟ ଦେଖାଯାଏ। କର୍ଣ୍ଣ ଦୟାଳୁ ଓ ପ୍ରମାଦୀ; ତେଣୁ ମୋ ମତରେ ସେ କେବଳ ଅର୍ଧରଥୀ।

Verse 10

एतच्छुत्वा तु राधेय: क्रोधादुत्फाल्य लोचने । उवाच भीष्म राधेयस्तुदन्‌ वाग्भि: प्रतोदवत्‌,यह सुनकर राधानन्दन कर्ण क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगा और अपने वचनरूपी चाबुकसे पीड़ा देता हुआ भीष्मसे बोला--

ଏହା ଶୁଣି ରାଧେୟ କର୍ଣ୍ଣ କ୍ରୋଧରେ ଚକ୍ଷୁ ବିସ୍ତାର କରି ତାକିଲା। ପରେ ସତ୍ୟ କିମ୍ବା ସନ୍ଧି ନୁହେଁ, ଆଘାତ ଓ ଉତ୍ତେଜନା ପାଇଁ, ପ୍ରତୋଦ ସମ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାକ୍ୟରେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ବିଦ୍ଧ କରି କହିଲା।

Verse 11

पितामह यथेष्ट॑ मां वाकृशरैरुपकृन्तसि । अनागसं सदा द्वेषादेवमेव पदे पदे,'पितामह! यद्यपि मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है, तो भी सदा मुझसे द्वेष रखनेके कारण तुम इसी प्रकार पग-पगपर मुझे अपने वाग्बाणोंद्वारा इच्छानुसार चोट पहुँचाते रहते हो

ପିତାମହ! ତୁମେ ଇଚ୍ଛାମତେ ବାକ୍ୟବାଣରେ ମୋତେ କାଟୁଛ। ମୁଁ ନିର୍ଦୋଷ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ସଦା ଦ୍ୱେଷରୁ ପଦେ ପଦେ ଏଭଳି ମୋତେ ଆଘାତ କରୁଛ।

Verse 12

मर्षयामि च तत्‌ सर्व दुर्योधनकृतेन वै । त्वं तु मां मन्यसे मन्दं यथा कापुरुषं तथा,“मैं दुर्योधनके कारण यह सब कुछ चुपचाप सह लेता हूँ, परंतु तुम मुझे मूर्ख और कायरके समान समझते हो

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଇଁ ମୁଁ ଏସବୁ ନିରବରେ ସହୁଛି। କିନ୍ତୁ ତୁମେ ମୋତେ ମନ୍ଦ, ଯେନେ ମୁଁ କାପୁରୁଷ—ସେପରି ଭାବୁଛ।

Verse 13

भवानर्धरथो महां मतो वै नात्र संशय: । सर्वस्य जगतश्चैव गाड़ेयो न मृषा वदेत्‌,“तुम मेरे विषयमें जो अर्धरथी होनेका मत प्रकट कर रहे हो, इससे सम्पूर्ण जगत्‌को नि:संदेह ऐसा ही प्रतीत होने लगेगा; क्योंकि सब यही जानते हैं कि गंगानन्दन भीष्म झूठ नहीं बोलते

ତୁମେ ମୋ ବିଷୟରେ ‘ଅର୍ଧରଥୀ’ ବୋଲି ଯେ ମତ କହୁଛ, ତାହା ସମଗ୍ର ଜଗତ ନିଃସନ୍ଦେହେ ସତ୍ୟ ବୋଲି ଧରିନେବ; କାରଣ ସମସ୍ତେ ଜାଣନ୍ତି—ଗାଙ୍ଗେୟ ଭୀଷ୍ମ ମିଥ୍ୟା କହନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 14

कुरूणामहितो नित्य न च राजावबुध्यते । को हि नाम समानेषु राजसूदारकर्मसु,“तुम कौरवोंका सदा अहित करते हो; परंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझते हैं। तुम मेरे गुणोंके प्रति द्वेष रखनेके कारण जिस प्रकार राजाओंकी मुझपर विरक्ति कराना चाहते हो, वैसा प्रयत्न तुम्हारे सिवा दूसरा कौन कर सकता है? इस समय युद्धका अवसर उपस्थित है और समान श्रेणीके उदारचरित राजा एकत्र हुए हैं; ऐसे अवसरपर आपसमें भेद (फूट) उत्पन्न करनेकी इच्छा रखकर कौन पुरुष अपने ही पक्षके योद्धाका इस प्रकार तेज और उत्साह नष्ट करेगा?

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ତୁମେ କୌରବମାନଙ୍କର ସଦା ଅହିତ କରୁଛ; କିନ୍ତୁ ରାଜା ଏହା ବୁଝୁନାହାନ୍ତି। ଯୁଦ୍ଧର ସୁଯୋଗ ଉପସ୍ଥିତ, ସମମର୍ଯ୍ୟାଦାର ଉଦାରଚରିତ ରାଜାମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇଛନ୍ତି; ଏମିତି ସମୟରେ ଭେଦ ସୃଷ୍ଟି କରିବାକୁ ଚାହିଁ ନିଜ ପକ୍ଷର ଯୋଦ୍ଧାର ତେଜ ଓ ଉତ୍ସାହ କିଏ ନଷ୍ଟ କରିବ?

Verse 15

तेजोवधमिमं कुर्याद्‌ विभेदयिषुराहवे । यथा त्वं गुणविद्वेषादपरागं चिकीर्षसि,“तुम कौरवोंका सदा अहित करते हो; परंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझते हैं। तुम मेरे गुणोंके प्रति द्वेष रखनेके कारण जिस प्रकार राजाओंकी मुझपर विरक्ति कराना चाहते हो, वैसा प्रयत्न तुम्हारे सिवा दूसरा कौन कर सकता है? इस समय युद्धका अवसर उपस्थित है और समान श्रेणीके उदारचरित राजा एकत्र हुए हैं; ऐसे अवसरपर आपसमें भेद (फूट) उत्पन्न करनेकी इच्छा रखकर कौन पुरुष अपने ही पक्षके योद्धाका इस प्रकार तेज और उत्साह नष्ट करेगा?

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ରଣମଧ୍ୟରେ ଭେଦ ସୃଷ୍ଟି କରିବାକୁ ଚାହିଁ କିଏ ନିଜ ପକ୍ଷର ଯୋଦ୍ଧାର ତେଜକୁ ଏଭଳି ନଷ୍ଟ କରିବ? ଯେପରି ତୁମେ ମୋ ଗୁଣ ପ୍ରତି ଦ୍ୱେଷରୁ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ମୋଠାରୁ ବିମୁଖ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ସେପରି ଯୁଦ୍ଧାବସର ଆସିଥିବା ଏହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ—ସମମର୍ଯ୍ୟାଦାର ଉଦାର ରାଜାମାନେ ଏକତ୍ର ଥିବାବେଳେ—ତୁମେ ଫାଟ ସୃଷ୍ଟି କରୁଛ।

Verse 16

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तैर्न च बन्धुभि: । महारथत्वं संख्यातुं शक्‍यं क्षत्रस्य कौरव,“कौरव! केवल बड़ी अवस्था हो जाने, बाल पक जाने, अधिक धनका संग्रह कर लेने तथा बहुसंख्यक भाई-बन्धुओंके होनेसे ही किसी क्षत्रियको महारथी नहीं गिना जा सकता

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ କୌରବ! କେବଳ ବୟସ ବଢ଼ିବା, କେଶ ପକିବା, ଅଧିକ ଧନ, କିମ୍ବା ବହୁ ବନ୍ଧୁ-ଭାଇ ଥିବାରୁ ମାତ୍ର କୌଣସି କ୍ଷତ୍ରିୟକୁ ‘ମହାରଥୀ’ ବୋଲି ଗଣାଯାଇପାରେ ନାହିଁ।

Verse 17

बलज्येष्ठं स्मृतं क्षत्रं मन्त्रज्येष्ठा द्विजातय: । धनज्येष्ठा: स्मृता वैश्या: शूद्रास्तु ववसाधिका:,'क्षत्रियजातिमें जो बलमें अधिक हो, वही श्रेष्ठ माना गया है। ब्राह्मण वेदमन्त्रोंके ज्ञानसे, वैश्य अधिक धनसे और शूद्र अधिक आयु होनेसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं

କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବଳରେ ଯେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୋଲି ସ୍ମୃତ; ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମନ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନରେ, ବୈଶ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଧନରେ, ଏବଂ ଶୂଦ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଧିକ ବୟସରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠତା ମନାଯାଇଛି।

Verse 18

यथेच्छकं स्वयं ब्रूया रथानतिरथांस्तथा । कामद्वेषसमायुक्तो मोहात्‌ प्रकुरुते भवान्‌

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ରଥୀ ଓ ଅତିରଥୀ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଯେପରି ଇଚ୍ଛା ସେପରି କହୁଛ। କିନ୍ତୁ ଏବେ ତୁମେ ଯାହା କରୁଛ, ସେ ମୋହରୁ—କାମ ଓ ଦ୍ୱେଷରେ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ—ହେଉଛି।

Verse 19

“तुम राग-द्वेषसे भरे हुए हो; अतः मोहवश मनमाने ढंगसे रथी-अतिरथियोंका विभाग कर रहे हो ।। दुर्योधन महाबाहो साधु सम्यगवेक्ष्यताम्‌ त्यज्यतां दुष्टभावो<यं भीष्म: किल्बिषकृत्‌ तव,“महाबाहु दुर्योधन! तुम अच्छी तरह विचार करके देख लो। ये भीष्म दुर्भावसे दूषित होकर तुम्हारी बुराई कर रहे हैं। तुम इन्हें अभी त्याग दो

ତୁମେ ରାଗ-ଦ୍ୱେଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ; ତେଣୁ ମୋହବଶେ ମନମାନି ଭାବେ ରଥୀ-ଅତିରଥୀଙ୍କ ବିଭାଗ କରୁଛ। ମହାବାହୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଭଲଭାବେ ବିଚାର କରି ସ୍ପଷ୍ଟ ଦେଖ; ‘ଭୀଷ୍ମ ତୋ ବିରୋଧରେ ପାପ କରୁଛନ୍ତି’—ଏହି ଦୁଷ୍ଟ ଧାରଣା ତ୍ୟାଗ କର।

Verse 20

भिन्ना हि सेना नृपते दुःसंधेया भवत्युत । मौला हि पुरुषव्यात्र किमु नानासमुत्थिता:,“नरेश्वर! पुरुषसिंह! एक बार सेनामें फ़ूट पड़ जानेपर उसमें पुनः: मेल कराना कठिन हो जाता है। उस दशामें मौलिक (पीढ़ियोंसे चले आनेवाले) सेवक भी हाथसे निकल जाते हैं। फिर जो भिन्न-भिन्न स्थानोंके लोग किसी एक कार्यके लिये उद्यत होकर एकत्र हुए हों, उनकी तो बात ही कया है?

ନୃପତେ, ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର! ଏକଥର ସେନାରେ ଫୁଟ ପଡିଲେ ତାହାକୁ ପୁଣି ଏକତ୍ର କରିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟକର ହୁଏ। ସେ ଅବସ୍ଥାରେ ପିଢ଼ିପିଢ଼ି ଚାଲିଆସିଥିବା ମୌଳିକ ସେବକମାନେ ମଧ୍ୟ ହାତଛାଡ଼ ହୋଇଯାନ୍ତି; ତେବେ ନାନା ସ୍ଥାନରୁ କେବଳ ଗୋଟିଏ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ପାଇଁ ଏକତ୍ର ହୋଇଥିବାମାନଙ୍କ କଥା କ’ଣ କହିବା!

Verse 21

एषां द्वैधं समुत्पन्नं योधानां युधि भारत । तेजोवधो न: क्रियते प्रत्यक्षेण विशेषत:,'भारत! इन योद्धाओंमें युद्धूके अवसरपर दुविधा उत्पन्न हो गयी है। तुम प्रत्यक्ष देख रहे हो, हमारे तेज और उत्साहकी विशेषरूपसे हत्या की जा रही है

ହେ ଭାରତ! ଯୁଦ୍ଧବେଳେ ଏହି ଯୋଧାମାନଙ୍କ ମନରେ ଦ୍ୱିଧା ଉତ୍ପନ୍ନ ହୋଇଛି। ତୁମେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖୁଛ—ଆମ ତେଜ ଓ ଉତ୍ସାହକୁ ବିଶେଷଭାବେ ହତ୍ୟା କରାଯାଉଛି।

Verse 22

रथानां क्‍्व च विज्ञानं क्‍्व च भीष्मोडल्पचेतन: । अहमावारयिष्यामि पाण्डवानामनीकिनीम्‌,“कहाँ रथियोंको समझना और कहाँ अल्पबुद्धि भीष्म? मैं अकेला ही पाण्डवोंकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा

ରଥୀମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ସଠିକ୍ ବିବେକ କେଉଁଠି, ଆଉ ଅଳ୍ପବୁଦ୍ଧି ଭୀଷ୍ମ କେଉଁଠି! ତଥାପି ମୁଁ ଏକା ହୋଇ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ଆଗେ ବଢ଼ିବାରୁ ରୋକିଦେବି।

Verse 23

आसाद्य माममोधेषुं गमिष्यन्ति दिशो दश । पाण्डवा: सहपज्चाला: शार्दूलं वृषभा इव,“मेरे बाण अमोघ हैं। मेरे सामने आकर पाण्डव और पांचाल उसी प्रकार दसों दिशाओंमें भाग जायँगे, जैसे सिंहको देखकर बैल भागते हैं

ମୋର ବାଣ ଅମୋଘ। ମୋ ସମ୍ମୁଖକୁ ଆସିଲେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ପାଞ୍ଚାଳମାନଙ୍କ ସହ ଦଶଦିଗକୁ ଛିଟିକି ପଳାଇବେ—ଯେପରି ଶାର୍ଦ୍ଦୂଳକୁ ଦେଖି ବୃଷଭମାନେ ପଳାନ୍ତି।

Verse 24

क्व च युद्ध विमर्दो वा मन्त्रे सुव्याहृतानि च । क्व च भीष्मो गतवया मन्दात्मा कालचोदित:,“कहाँ युद्ध, मारकाट और गुप्त मन्त्रणामें अच्छी बातें बतानेका कार्य और कहाँ कालप्रेरित मन्दबुद्धि भीष्म, जिनकी आयु समाप्त हो चुकी है

କେଉଁଠି ଯୁଦ୍ଧର ମର୍ଦ୍ଦନମୟ ଘର୍ଷଣ, କେଉଁଠି ଗୁପ୍ତ ମନ୍ତ୍ରଣାରେ ସୁବାକ୍ୟ କହିବାର କାର୍ଯ୍ୟ? ଆଉ କେଉଁଠି ମୁଁ—ଆୟୁ ଶେଷ, ମନ୍ଦସଙ୍କଳ୍ପ ଭୀଷ୍ମ—କାଳପ୍ରେରିତ ହୋଇ ଆଗକୁ ଚାଲିଛି।

Verse 25

एकाकी स्पर्धते नित्यं सर्वेण जगता सह । न चान्यं पुरुषं कंचिन्मन्यते मोघदर्शन:,'ये अकेले ही सदा सम्पूर्ण जगत्‌के साथ स्पर्धा रखते हैं और अपनी व्यर्थ दृष्टिके कारण दूसरे किसीको पुरुष ही नहीं समझते हैं

ସେ ଏକାକୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ସଦା ସମଗ୍ର ଜଗତ ସହ ସ୍ପର୍ଧା କରେ; ଏବଂ ମୋଘ ଓ ଭ୍ରାନ୍ତ ଦୃଷ୍ଟିରେ ସେ ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ମଧ୍ୟ ‘ପୁରୁଷ’ ବୋଲି ମାନେ ନାହିଁ।

Verse 26

श्रोतव्यं खलु वृद्धानामिति शास्त्रनिदर्शनम्‌ | न त्वेव हातिवृद्धानां पुनर्बाला हि ते मता:,“वृद्धोंकी बातें सुननी चाहिये; यह शास्त्रका आदेश है। परंतु जो अत्यन्त बूढ़े हो गये हैं, उनकी बातें श्रवण करनेयोग्य नहीं हैं; क्योंकि वे तो फिर बालकोंके ही समान माने गये हैं

ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ କଥା ଶୁଣିବା ଉଚିତ—ଏହା ଶାସ୍ତ୍ରର ନିର୍ଦ୍ଦେଶ; କିନ୍ତୁ ଯେମାନେ ଅତିବୃଦ୍ଧ, ସେମାନଙ୍କ କଥା ଶୁଣିବାଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ, କାରଣ ସେମାନେ ପୁନଃ ବାଳକସମ ମନାଯାନ୍ତି।

Verse 27

अहमेको हनिष्यामि पाण्डवानामनीकिनीम्‌ | सुयुद्धे राजशार्दूल यशो भीष्मं गमिष्यति

ରାଜଶାର୍ଦ୍ଦୂଲ! ମୁଁ ଏକାକୀ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ସଂହାର କରିଦେବି; କିନ୍ତୁ ସୁଯୁଦ୍ଧରେ ଯଶ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ହିଁ ଯିବ।

Verse 28

“नृपश्रेष्ठ! मैं इस युद्धमें अकेला ही पाण्डवोंकी सेनाका विनाश करूँगा; परंतु सारा यश भीष्मको मिल जायगा ।। कृत: सेनापतिस्त्वेष त्वया भीष्मो नराधिप | सेनापतौ यशो गनन्‍्ता न तु योधान्‌ कथंचन,“नरेश्वर! तुमने इन भीष्मको ही सेनापति बनाया है। विजयका यश सेनापतिको ही प्राप्त होता है; योद्धाओंको किसी प्रकार नहीं मिलता

ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି ଯୁଦ୍ଧରେ ମୁଁ ଏକାକୀ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ବିନାଶ କରିଦେବି; କିନ୍ତୁ ଯଶ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ହିଁ ମିଳିବ। ନରାଧିପ! ତୁମେ ଏହି ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ହିଁ ସେନାପତି କରିଛ। ବିଜୟର ଯଶ ସେନାପତିଙ୍କୁ ଯାଏ; ଯୋଧାମାନଙ୍କୁ କେବେ ନୁହେଁ—ସେମାନେ ଯେତେ ଚେଷ୍ଟା କରୁନ୍।

Verse 29

नाहं जीवति गाड़ेये योत्स्ये राजन्‌ कथंचन । हते भीष्मे तु योद्धास्मि सर्वरेव महारथै:,“अतः राजन! मैं भीष्मके जीते-जी किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा; परंतु भीष्मके मारे जानेपर सम्पूर्ण महारथियोंके साथ टक्कर लूँगा”

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଗଙ୍ଗାପୁତ୍ର ଭୀଷ୍ମ ଜୀବିତ ଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୁଁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି ନାହିଁ; କିନ୍ତୁ ଭୀଷ୍ମ ହତ ହେଲେ ମୁଁ ସମସ୍ତ ମହାରଥୀଙ୍କ ସହିତ ସମରେ ମୁହାଁମୁହିଁ ହେବି।

Verse 30

भीष्म उवाच समुद्यतो<यं भारो मे सुमहान्‌ सागरोपम: । धार्रराष्ट्रस्य संग्रामे वर्षपूगाभिचिन्तित:,भीष्मने कहा--सूतपुत्र! इस युद्धमें दुर्योधनका यह समुद्रके समान अत्यन्त गुरुतर भार मैंने अपने कंधोंपर उठाया है। जिसके लिये मैं बहुत वर्षोंसे चिन्तित हो रहा था, वह संतापदायक रोमांचकारी समय अब आकर उपस्थित हो ही गया, ऐसे अवसरमें मुझे यह पारस्परिक भेद नहीं उत्पन्न करना चाहिये, इसीलिये तू अभीतक जी रहा है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ସୂତପୁତ୍ର! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଏହି ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ମୁଁ ସାଗର ସମାନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ୍ ଭାର ନିଜ ଉପରେ ଉଠାଇଛି; ଯାହାକୁ ମୁଁ ବର୍ଷର ପରେ ବର୍ଷ ମନେ ଚିନ୍ତା କରିଆସୁଥିଲି। ଏବେ ସେଇ ଦୀର୍ଘଦିନର ପୂର୍ବଚିନ୍ତିତ, ଦାହକ ଓ ରୋମାଞ୍ଚକର ଘଡ଼ି ଆସିପହଞ୍ଚିଛି; ଏମିତି ସମୟରେ ନିଜ ପକ୍ଷରେ ଭେଦ ସୃଷ୍ଟି କରିବା ମୋ ପାଇଁ ଉଚିତ ନୁହେଁ—ସେହିପାଇଁ ତୁମେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଜୀବିତ।

Verse 31

तस्मिन्नभ्यागते काले प्रतप्ते लोमहर्षणे । मिथो भेदो न मे कार्यस्तेन जीवसि सूतज,भीष्मने कहा--सूतपुत्र! इस युद्धमें दुर्योधनका यह समुद्रके समान अत्यन्त गुरुतर भार मैंने अपने कंधोंपर उठाया है। जिसके लिये मैं बहुत वर्षोंसे चिन्तित हो रहा था, वह संतापदायक रोमांचकारी समय अब आकर उपस्थित हो ही गया, ऐसे अवसरमें मुझे यह पारस्परिक भेद नहीं उत्पन्न करना चाहिये, इसीलिये तू अभीतक जी रहा है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ସେଇ ଦୀର୍ଘଦିନର ପ୍ରତୀକ୍ଷିତ, ଦାହକ ଓ ରୋମାଞ୍ଚକର ସମୟ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି, ସେତେବେଳେ ନିଜ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପରସ୍ପର ଭେଦ ସୃଷ୍ଟି କରିବା ମୋ ପାଇଁ ଉଚିତ ନୁହେଁ; ତେଣୁ, ହେ ସୂତପୁତ୍ର, ତୁମେ ଜୀବିତ।

Verse 32

न हाहं त्वद्य विक्रम्प स्थविरोडपि शिशोस्तव । युद्धश्रद्धामहं छिन्द्यां जीवितस्य च सूतज,सूतकुमार! यदि ऐसी बात न होती तो मैं वृद्ध होनेपर भी पराक्रम करके आज तुझ बालककी युद्ध-विषयक श्रद्धा और जीवनकी आशाका एक ही साथ उच्छेद कर डालता

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ସୂତପୁତ୍ର! ଯଦି ଏହି ସଂୟମ ନ ଥାଆନ୍ତା, ତେବେ ମୁଁ ବୃଦ୍ଧ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଆଜି ପରାକ୍ରମ କରି, ଏକାଥରେ ତୁମର ଶିଶୁସୁଲଭ ଯୁଦ୍ଧ-ଶ୍ରଦ୍ଧା ଓ ଜୀବନର ଆଶା—ଦୁହେଁକୁ ଛେଦ କରିଦେଇଥାଆନ୍ତି।

Verse 33

जामदग्न्येन रामेण महास्त्राणि विमुज्चता । न मे व्यथा कृता काचितू त्वं तु मे कि करिष्यसि,जमदग्निनन्दन परशुरामने मेरे ऊपर बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्रयोग किया था; परंतु वे भी मुझे कोई पीड़ा न दे सके। फिर तू तो मेरा कर ही क्या लेगा?

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମୋ ଉପରେ ମହାସ୍ତ୍ର ପ୍ରୟୋଗ କରିଥିଲେ; ତଥାପି ସେଗୁଡ଼ିକ ମୋତେ ଅଳ୍ପମାତ୍ରେ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟଥା ଦେଇପାରିଲା ନାହିଁ। ତେବେ ତୁମେ ମୋର କ’ଣ କରିପାରିବ?

Verse 34

काम नैतत्‌ प्रशंसन्ति सन्त: स्वबलसंस्तवम्‌ । वक्ष्यामि तु त्वां संतप्तो निहीनकुलपांसन,नीचकुलांगार! साधु पुरुष अपने बलकी प्रशंसा करना कदापि अच्छा नहीं मानते हैं, तथापि तेरे व्यवहारसे संतप्त होकर मैं अपनी प्रशंसाकी बात भी कह रहा हूँ

ସଜ୍ଜନମାନେ ନିଜ ବଳର ଆତ୍ମ-ପ୍ରଶଂସାକୁ ଭଲ ମାନନ୍ତି ନାହିଁ; ତଥାପି ତୋର ଆଚରଣରେ ସନ୍ତପ୍ତ ହୋଇ ମୁଁ ତୋତେ ସେହି ଭାବରେ କହୁଛି। ହେ ପତିତ କୁଳର ଧୂଳି, ହେ ନୀଚ କୁଳର ଅଙ୍ଗାର!

Verse 35

समेतं पार्थिव क्षत्रं काशिराजस्वयंवरे । निर्जित्यैकरथेनैव या: कन्यास्तरसा हृता:,काशिराजके यहाँ स्वयंवरमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रियनरेश एकत्र हुए थे, परंतु मैंने केवल एक रथपर ही आरूढ़ होकर उन सबको जीतकर बलपूर्वक काशिराजकी कन्याओंका अपहरण किया था

କାଶୀରାଜଙ୍କ ସ୍ୱୟଂବରରେ ପୃଥିବୀର ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟ ନରେଶମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଏକା, ଏକମାତ୍ର ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି, ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଜୟ କରି, ତ୍ୱରାରେ ବଳପୂର୍ବକ କାଶୀର କନ୍ୟାମାନଙ୍କୁ ହରଣ କରିଥିଲି।

Verse 36

ईदृशानां सहस्राणि विशिष्टानामथो पुन: । मयैकेन निरस्तानि ससैन्यानि रणाजिरे,यहाँ जो लोग एकत्र हुए हैं, ऐसे तथा इनसे भी बढ़-चढ़कर पराक्रमी हजारों नरेश वहाँ एकत्र थे; परंतु मैंने समरांगणमें अकेले ही उन सबको सेनाओंसहित परास्त कर दिया था

ସେଠାରେ ଏମିତି ଏବଂ ଏମାନଙ୍କଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ବିଶିଷ୍ଟ ପରାକ୍ରମୀ ହଜାରେ ନରେଶ ଏକତ୍ର ଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ରଣାଙ୍ଗଣରେ ମୁଁ ଏକା ତାଙ୍କ ସେନାସହିତ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପରାସ୍ତ କରିଥିଲି।

Verse 37

त्वां प्राप्प वैरपुरुषं कुरूणामनयो महान्‌ | उपस्थितो विनाशाय यतस्व पुरुषो भव,तू वैरका मूर्तिमान्‌ स्वरूप है। तेरा सहारा पाकर कुरुकुलके विनाशके लिये बहुत बड़ा अन्याय उपस्थित हो गया है। अब तू रक्षाका प्रबन्ध कर और पुरुषत्वका परिचय दे

ତୁ କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବୈରର ମୂର୍ତ୍ତିମାନ ରୂପ। ତୋର ଆଶ୍ରୟ ପାଇ ଧ୍ୱଂସ ପାଇଁ ଏକ ମହା ଅନ୍ୟାୟ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇଛି। ତେଣୁ ଚେଷ୍ଟା କର—ରକ୍ଷାର ବ୍ୟବସ୍ଥା କରି ପୁରୁଷୋଚିତ ଦୃଢତା ଦେଖା।

Verse 38

युद्धयस्व समरे पार्थ येन विस्पर्थसे सह | द्रक्ष्यामि त्वां विनिर्मुक्तमस्माद्‌ युद्धात्‌ सुदुर्मते,दुर्मते! तू जिसके साथ सदा स्पर्धा रखता है, उस अर्जुनके साथ समरभूमिमें युद्ध कर। मैं देखूँगा कि तू इस संग्रामसे किस प्रकार बच पाता है?

ହେ ଦୁର୍ମତି! ଯାହା ସହିତ ତୁ ସଦା ସ୍ପର୍ଧା କରୁଛୁ, ସେହି ଅର୍ଜୁନ ସହ ରଣଭୂମିରେ ଯୁଦ୍ଧ କର। ଏହି ଯୁଦ୍ଧରୁ ତୁ କିପରି ମୁକ୍ତି ପାଉଛୁ, ମୁଁ ଦେଖିବି।

Verse 39

तमुवाच ततो राजा धारतराष्ट्र: प्रतापवान्‌ | मां समीक्षस्व गाड़ेय कार्य हि महदुद्यतम्‌,तदनन्तर प्रतापी राजा दुर्योधनने भीष्मजीसे कहा--“गंगानन्दन! आप मेरी ओर देखिये; क्योंकि इस समय महान्‌ कार्य उपस्थित है

ତେବେ ପ୍ରତାପବାନ୍ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ତାଙ୍କୁ କହିଲେ— “ହେ ଗାଙ୍ଗେୟ! ମୋ ପ୍ରତି ଦୃଷ୍ଟି କର; କାରଣ ଏହି ସମୟରେ ଏକ ମହାକାର୍ଯ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଅଛି।”

Verse 40

चिन्त्यतामिदमेकाग्रं मम नि:श्रेयसं परम्‌ | उभावपि भवन्तौ मे महत्‌ कर्म करिष्यत:,“आप एकाग्रचित्त होकर मेरे परम कल्याणकी बात सोचिये। आप और कर्ण दोनों ही मेरा महान्‌ कार्य सिद्ध करेंगे

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— “ଏକାଗ୍ରଚିତ୍ତ ହୋଇ ମୋର ପରମ ଶ୍ରେୟସ୍‌ ବିଷୟରେ ଚିନ୍ତା କର। ତୁମେ ଓ କର୍ଣ୍ଣ—ତୁମେ ଉଭୟ—ମୋ ପାଇଁ ଏହି ମହତ୍ ଓ ଗୁରୁତର କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧିବ।”

Verse 41

भूयश्व श्रोतुमिच्छामि परेषां रथसत्तमान्‌ | ये चैवातिरथास्तत्र ये चैव रथयूथपा:,“अब मैं पुनः शत्रुपक्षके श्रेष्ठ रथियों, अतिरथियों तथा रथयूथपतियोंका परिचय सुनना चाहता हूँ

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— “ମୁଁ ପୁନର୍ବାର ପ୍ରତିପକ୍ଷର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥୀମାନଙ୍କ ବିଷୟ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି—ସେଠାରେ କେଉଁମାନେ ଅତିରଥ, ଏବଂ କେଉଁମାନେ ରଥୟୂଥପତି (ରଥଦଳନାୟକ)?”

Verse 42

बलाबलममित्राणां श्रोतुमिच्छामि कौरव । प्रभातायां रजन्यां वै इदं युद्ध भविष्यति,“कुरुनन्दन! शत्रुओंके बलाबलको सुननेकी मेरी इच्छा है। आजकी रात बीतते ही कल प्रातःकाल यह युद्ध प्रारम्भ हो जायगा”

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— “ହେ କୌରବ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କର ବଳ ଓ ଅବଳର ଯଥାର୍ଥ ବିବରଣୀ ମୁଁ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି। ଏହି ରାତି ଶେଷ ହୋଇ ପ୍ରଭାତ ହେଲେ ଏହି ଯୁଦ୍ଧ ନିଶ୍ଚୟ ହେବ।”

Verse 168

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि भीष्मकर्णसंवादे अष्टषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ ରଥାତିରଥସଂଖ୍ୟାନପର୍ବରେ, ଭୀଷ୍ମ-କର୍ଣ୍ଣ ସଂବାଦରେ, ଏକଶ ଅଠଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The implicit dilemma is the reconciliation of personal affection and kinship bonds (sneha, saṃbandha) with the impersonal demands of kṣatra-dharma: warriors and kings are portrayed as choosing high-risk duty in defense of alliance commitments despite foreseeable harm.

Competent governance requires two concurrent disciplines: ethical justification (dharma language) and sober capability assessment (bala-nirṇaya). The chapter models how moral commitments are operationalized through loyalty, preparedness, and realistic evaluation of opponents.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-commentary is functional—Bhīṣma’s catalog serves as an evidentiary register within the larger narrative of mobilization, underscoring that understanding strength, motive, and alliance duty is integral to interpreting subsequent events.