
Kaurava Mobilization at Kurukṣetra (Duryodhana Orders War Preparations) / कुरुक्षेत्रे धार्तराष्ट्र-सैन्यसज्जा
Upa-parva: Kurukṣetra-śibira-nirmāṇa (War-camp Mobilization Episode)
Janamejaya asks for a detailed account of events in the turbulent Kurujāṅgala region upon hearing that Yudhiṣṭhira, supported by Vāsudeva and allied kings (Virāṭa, Drupada, Kekayas, Vṛṣṇis, and many rulers), has taken position at Kurukṣetra with formidable warriors. Vaiśaṃpāyana responds that after Kṛṣṇa’s departure without completing the intended political task, Duryodhana anticipates escalation and interprets Kṛṣṇa as likely to speak against the Kauravas. He asserts that Vāsudeva favors conflict with him and that Bhīma and Arjuna align with Kṛṣṇa’s view; he recalls prior injuries inflicted upon the Pāṇḍavas and notes Virāṭa and Drupada as hostile commanders. Duryodhana then instructs Karṇa, Duḥśāsana, and Śakuni to execute comprehensive war preparations: building well-spaced, defensible camps on Kurukṣetra; ensuring access to water and wood; securing supply routes; stockpiling valuables and equipment; and readying standards, banners, armor, weapons, chariots, horses, and elephants. The chapter closes with a vivid civic tableau: rulers and warriors rise, adjust attire and ornaments, and the city becomes a roaring, ocean-like mass of troops and instruments—an administrative-military mobilization rendered as an organized public surge toward campaign.
Chapter Arc: Vaishampayana recalls that the Pandavas have already heard every detail of what transpired in the Kuru court—Krishna’s words, the temper of the assembly, and the closing of peace—so the hour turns from counsel to marching. → Yudhishthira is urged to order the division and arrangement of the army: seven akshauhinis are to be set in disciplined formation, with renowned leaders named and assigned, each capable of crushing the foe and even striking fear into Indra in battle. → The Pandava host surges forward into Kurukshetra: the earth seems to tremble under the tumult of horses, elephants, and chariots; conches and kettledrums roar from every side as banners rise and armor is fastened in haste. → The march becomes a complete war-camp in motion—wagons, markets, tents, treasury, engines, weapons, physicians and veterinarians—an entire kingdom converted into a fighting body, now fully committed to the field. → With the Pandava formations established on the sacred plain, the inevitable question hangs: how will the Kauravas answer this thunder with their own, and who will be the first to break the stillness into slaughter?
Verse 1
अत-#--#क्रञ (सैन्यनिर्याणपर्व) एकपज्चाशदधिकशततमो< ध्याय: पाण्डवपक्षके है 2000 05208 2 नाव तथा पाण्डव-सेनाका कुरुक्षेत्रमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच जनार्दनवच: श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिर: । भ्रातृनुवाच धर्मात्मा समक्षं केशवस्य ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर धर्ममें ही मन लगाये रखनेवाले धर्मराज युधिष्ठिरने भगवानके सामने ही अपने भाइयोंसे कहा --
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଜନାର୍ଦ୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କେଶବଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ନିଜ ଭାଇମାନଙ୍କୁ କହିଲେ—
Verse 2
श्रुतं भवद्धिर्यद् वृत्त सभायां कुरुसंसदि । केशवस्यापि यद् वाक््यं तत् सर्वमवधारितम्,“कौरवसभामें जो कुछ हुआ है वह सब वृत्तान्त तुमलोगोंने सुन लिया। फिर भगवान् श्रीकृष्णने भी जो बात कही है, उसे भी अच्छी तरह समझ लिया होगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୁରୁସଭାରେ ଯାହା କିଛି ଘଟିଥିଲା, ସେ ସବୁ ତୁମେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଶୁଣିଛ; ଏବଂ କେଶବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ସେଠାରେ ଯେ ଵାକ୍ୟ କହିଥିଲେ, ତାହା ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ବୁଝିଛ।
Verse 3
तस्मात् सेनाविभागं मे कुरुध्वं नरसत्तमा: । अक्षौहिण्यश्व सप्तैता: समेता विजयाय वै,“अत: नरश्रेष्ठ वीरो! अब तुमलोग भी अपनी सेनाका विभाग करो। ये सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हो गयी हैं, जो अवश्य ही हमारी विजय करानेवाली होंगी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହେତୁ, ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ, ମୋ କହିବାନୁସାରେ ସେନାର ବିଭାଗ କର। ଏହି ସାତ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଏକତ୍ର ହୋଇଛି—ବିଜୟ ପାଇଁ ନିଶ୍ଚୟ।
Verse 4
तासां ये पतयः सप्त विख्यातास्तान् निबोधत । द्रुपदश्न विराटश्न धृष्टदुम्नशिखण्डिनौ,“इन सातों अक्षौहिणियोंके जो सात विख्यात सेनापति हैं, उनके नाम बताता हूँ, सुनो। द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सात्यकि, चेकितान और पराक्रमी भीमसेन। ये सभी वीर हमारे लिये अपने शरीरका भी त्याग कर देनेको उद्यत हैं; अतः ये ही पाण्डवसेनाके संचालक होनेयोग्य हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି ସାତ ସେନାର ସାତଜଣ ବିଖ୍ୟାତ ନାୟକଙ୍କୁ ଶୁଣ: ଦ୍ରୁପଦ ଓ ବିରାଟ, ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଓ ଶିଖଣ୍ଡୀ।
Verse 5
सात्यकिश्नलेकितानश्नव भीमसेनश्न वीर्यवान् । एते सेनाप्रणेतारो वीरा: सर्वे तनुत्यज:,“इन सातों अक्षौहिणियोंके जो सात विख्यात सेनापति हैं, उनके नाम बताता हूँ, सुनो। द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सात्यकि, चेकितान और पराक्रमी भीमसेन। ये सभी वीर हमारे लिये अपने शरीरका भी त्याग कर देनेको उद्यत हैं; अतः ये ही पाण्डवसेनाके संचालक होनेयोग्य हैं
ସାତ୍ୟକି, ଚେକିତାନ ଓ ବୀର୍ୟବାନ ଭୀମସେନ—ଏମାନେ ହେଉଛନ୍ତି ସେନାନେତା; ଏ ସମସ୍ତ ବୀର ଦେହତ୍ୟାଗ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସ୍ତୁତ।
Verse 6
सर्वे वेदविद: शूरा: सर्वे सुचरितव्रता: । ह्वीमन्तो नीतिमन्तश्न सर्वे युद्धविशारदा:,“ये सब-के-सब वेदवेत्ता, शूरवीर, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, लज्जाशील, नीतिज्ञ और युद्धकुशल हैं
ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ବେଦବିଦ୍, ଶୂରବୀର ଓ ସୁଚରିତ୍ର ବ୍ରତପାଳକ; ହ୍ରୀମାନ, ନୀତିଜ୍ଞ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ।
Verse 7
इष्वस्त्रकुशला: सर्वे तथा सर्वास्त्रयोधिन: । सप्तानामपि यो नेता सेनानां प्रविभागवित्,“इन सबने धरनुर्वेदमें निपुणता प्राप्त की है तथा ये सब प्रकारके अस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेमें समर्थ हैं। अब यह विचार करना चाहिये कि इन सातोंका भी नेता कौन हो? जो सभी सेना- विभागोंको अच्छी तरह जानता हो तथा युद्धमें बाणरूपी ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भीष्मका आक्रमण सह सकता हो। पुरुषसिंह कुरुनन्दन सहदेव! पहले तुम अपना विचार प्रकट करो। हमारा प्रधान सेनापति होनेयोग्य कौन है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ଧନୁର୍ବିଦ୍ୟାରେ ନିପୁଣ ଏବଂ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଅସ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ଯୁଦ୍ଧ କରିବାରେ ସମର୍ଥ। ଏବେ ବିଚାର ହେଉ—ଏହି ସାତଜଣଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ନେତା କିଏ? ଯେ ସେନାର ବିଭାଗ ଓ ବିନ୍ୟାସକୁ ଭଲଭାବେ ଜାଣେ।”
Verse 8
यः सहेत रणे भीष्मं शरार्चि: पावकोपमम् | त॑ तावत् सहदेवात्र प्रब्रूहि कुरुनन्दन । स्वमतं पुरुषव्याप्र को नः सेनापति: क्षम:,“इन सबने धरनुर्वेदमें निपुणता प्राप्त की है तथा ये सब प्रकारके अस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेमें समर्थ हैं। अब यह विचार करना चाहिये कि इन सातोंका भी नेता कौन हो? जो सभी सेना- विभागोंको अच्छी तरह जानता हो तथा युद्धमें बाणरूपी ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भीष्मका आक्रमण सह सकता हो। पुरुषसिंह कुरुनन्दन सहदेव! पहले तुम अपना विचार प्रकट करो। हमारा प्रधान सेनापति होनेयोग्य कौन है
“ଯେ ରଣରେ ବାଣଜ୍ୱାଳାରେ ଅଗ୍ନିସମ ଦୀପ୍ତ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ସହିପାରିବ—ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ ସହଦେବ, ପ୍ରଥମେ ତୁମେ ଏଠାରେ ନିଜ ମତ କହ। ହେ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର, ଆମ ସେନାପତି ହେବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ କିଏ?”
Verse 9
सहदेव उवाच संयुक्त एकदुःखश्न वीर्यवांश्व महीपति: । यं समाश्रित्य धर्मज्ञं स्वमंशमनुयुञ्ज्महे,सहदेव बोले--जो हमारे सम्बन्धी हैं, दुःखमें हमारे साथ एक होकर रहनेवाले और पराक्रमी भूपाल हैं, जिन धर्मज्ञ वीरका आश्रय लेकर हम अपना राज्यभाग प्राप्त कर सकते हैं तथा जो बलवान, अस्त्रविद्यामें निपुण और युद्धमें उन््मत्त होकर लड़नेवाले हैं, वे मत्स्यनरेश विराट संग्रामभूमिमें भीष्म तथा अन्य महारथियोंका सामना अच्छी तरह सहन कर सकेंगे
ସହଦେବ କହିଲେ—“ଏକ ପରାକ୍ରମୀ ରାଜା ଅଛନ୍ତି—ଆମ ଆତ୍ମୀୟ—ଯିଏ ଦୁଃଖରେ ଆମ ସହ ଏକାତ୍ମ ହୋଇ ରହିଛନ୍ତି। ସେଇ ଧର୍ମଜ୍ଞ, ବିବେକୀ ବୀରଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେଲେ ଆମେ ରାଜ୍ୟର ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଅଂଶ ପୁନଃ ପାଇପାରିବୁ।”
Verse 10
मत्स्यो विराटो बलवान कृतास्त्रो युद्धदुर्मद: । प्रसहिष्यति संग्रामे भीष्म तांश्ष॒ महारथान्,सहदेव बोले--जो हमारे सम्बन्धी हैं, दुःखमें हमारे साथ एक होकर रहनेवाले और पराक्रमी भूपाल हैं, जिन धर्मज्ञ वीरका आश्रय लेकर हम अपना राज्यभाग प्राप्त कर सकते हैं तथा जो बलवान, अस्त्रविद्यामें निपुण और युद्धमें उन््मत्त होकर लड़नेवाले हैं, वे मत्स्यनरेश विराट संग्रामभूमिमें भीष्म तथा अन्य महारथियोंका सामना अच्छी तरह सहन कर सकेंगे
ସହଦେବ କହିଲେ—“ମତ୍ସ୍ୟରାଜ ବିରାଟ ବଳବାନ, ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପ୍ରଶିକ୍ଷିତ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧରେ ଉଗ୍ର ଉତ୍ସାହରେ ଲଢ଼େ। ସେ ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ଭୀଷ୍ମ ଓ ସେଇ ମହାରଥୀମାନଙ୍କ ଆଘାତ ସହିପାରିବ।”
Verse 11
वैशम्पायन उवाच तथोक्ते सहदेवेन वाक्ये वाक्यविशारद: । नकुलो<नन्तरं तस्मादिदं वचनमाददे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! सहदेवके इस प्रकार कहनेपर प्रवचनकुशल नकुलने उनके बाद यह बात कही--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସହଦେବ ଏପରି କହି ସାରିବା ପରେ, ବାକ୍ଚାତୁର୍ୟରେ ନିପୁଣ ନକୁଳ ତାଙ୍କ ପରେ ସହସା ଏହି କଥା କହିଲେ।”
Verse 12
वयसा शाम्त्रतो धैर्यात् कुलेनाभिजनेन च । ह्वीमान् बलान्वित: श्रीमान् सर्वशास्त्रविशारद:
ସେ ବୟସର ପକ୍ୱତାରେ ଯୁକ୍ତ, ଶାସ୍ତ୍ରପ୍ରମାଣରେ ନିଷ୍ଠ, ଧୈର୍ୟରେ ଅଚଳ, କୁଳ ଓ ଅଭିଜନରେ ବିଶିଷ୍ଟ ଥିଲେ। ଲଜ୍ଜାଶୀଳ, ବଳବାନ, ଶ୍ରୀସମ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ସର୍ବଶାସ୍ତ୍ରବିଶାରଦ—ଧର୍ମରକ୍ଷାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ନେତା ଥିଲେ।
Verse 13
वेद चास्त्रं भरद्वाजाद् दुर्धर्ष: सत्यसड्गर: । यो नित्यं स्पर्धते द्रोणं भीष्मं चैव महाबलम्
ସେ ଭରଦ୍ୱାଜଙ୍କ ଠାରୁ ବେଦ ଓ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟା ଶିଖିଥିଲେ। ସେ ଦୁର୍ଧର୍ଷ, ସତ୍ୟସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ଅଚଳ; ଯିଏ ନିତ୍ୟ ଦ୍ରୋଣ ଓ ମହାବଳୀ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ ସ୍ପର୍ଧା କରୁଥିଲେ।
Verse 14
श्लाघ्य: पार्थिववंशस्य प्रमुखे वाहिनीपति: । पुत्रपौत्रै: परिवृत: शतशाख इव द्रुम:
ସେ ପାର୍ଥିବବଂଶର ଶ୍ଲାଘ୍ୟ ପୁରୁଷ, ଅଗ୍ରଭାଗରେ ବାହିନୀପତି ଥିଲେ। ପୁତ୍ର-ପୌତ୍ରମାନେ ଘେରି ରହିଥିବା ସେ ଶତଶାଖୀ ବୃକ୍ଷ ପରି ଶୋଭିତ ହେଉଥିଲେ।
Verse 15
यस्तताप तपो घोर सदार: पृथिवीपति: । रोषाद द्रोणविनाशाय वीर: समितिशोभन:
ସେ ପୃଥିବୀପତି ପତ୍ନୀସହିତ ଘୋର ତପ କଲେ। ରୋଷବଶ ଦ୍ରୋଣବିନାଶ ପାଇଁ ସେ ବୀର—ସମିତିରେ ଶୋଭିତ—କଠୋର ତପରେ ଲୀନ ରହିଲେ।
Verse 16
पितेवास्मान् समाधत्ते यः सदा पार्थिवर्षभ: । श्वशुरो द्रुपदो5स्माकं सेनाग्रं स प्रकर्षतु
ଯିଏ ସଦା ପିତା ପରି ଆମକୁ ସମ୍ଭାଳି ଓ ସ୍ଥିର କରନ୍ତି, ସେ ରାଜବୃଷଭ—ଆମ ଶ୍ୱଶୁର ଦ୍ରୁପଦ—ଏବେ ସେନାର ଅଗ୍ରଭାଗ ଧରି ତାହାକୁ ଆଗେଇ ନେଉନ୍ତୁ।
Verse 17
स द्रोणभीष्मावायातौ सहेदिति मतिर्मम । स हि दिव्यास्त्रविद् राजा सखा चाड्रिरसो नृप:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଦ୍ରୋଣ ଓ ଭୀଷ୍ମ ଯଦି ମୋ ବିରୋଧରେ ଆସନ୍ତି, ତଥାପି ମୁଁ ସହିବି—ଏହି ମୋର ସଙ୍କଳ୍ପ। କାରଣ ସେ ରାଜା ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ରବିଦ୍, ଏବଂ, ହେ ନୃପ, ପର୍ବତଜ (ଯୋଦ୍ଧା)ଙ୍କର ସଖା ମଧ୍ୟ।”
Verse 18
“जो अवस्था, शास्त्रज्ञान, धैर्य, कुल और स्वजनसमूह सभी दृष्टियोंसे बड़े हैं, जिनमें लज्जा, बल और श्री तीनों विद्यमान हैं, जो समस्त शास्त्रोंके ज्ञानमें प्रवीण हैं, जिन्हें महर्षि भरद्वाजसे अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त हुई है, जो सत्यप्रतिज्ञ एवं दुर्धर्ष योद्धा हैं, महाबली भीष्म और द्रोणाचार्यसे सदा स्पर्धा रखते हैं, जो समस्त राजाओंके समूहकी प्रशंसाके पात्र हैं और युद्धके मुहानेपर खड़े हो समस्त सेनाओंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, बहुत-से पुत्र-पौत्रोंद्वारा घिरे रहनेके कारण जिनकी सैकड़ों शाखाओंसे सम्पन्न वृक्षकी भाँति शोभा होती है, जिन महाराजने रोषपूर्वक द्रोणाचार्यके विनाशके लिये पत्नीसहित घोर तपस्या की है, जो संग्रामभूमिमें सुशोभित होनेवाले शूरवीर हैं और हमलोगोंपर सदा ही पिताके समान स्नेह रखते हैं, वे हमारे श्वशुर भूपालशिरोमणि ट्रुपद हमारी सेनाके प्रमुख भागका संचालन करें। मेरे विचारसे राजा ट्रुपद ही युद्धके लिये सम्मुख आये हुए द्रोणाचार्य और भीष्मपितामहका सामना कर सकते हैं; क्योंकि वे दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और द्रोणाचार्यके सखा हैं || १२-- १७ || माद्रीसुताभ्यामुक्ते तु स््वमते कुरुनन्दन: । वासविर्वासवसम: सव्यसाच्यब्रवीद् वच:,माद्रीकुमारोंक इस प्रकार अपना विचार प्रकट करनेपर कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले इन्द्रके समान पराक्रमी, इन्द्रपुत्र सव्यसाची अर्जुनने इस प्रकार कहा--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମାଦ୍ରୀଙ୍କ ଦୁଇ ପୁତ୍ର ନିଜ ଭଲଭାବେ ବିଚାରିତ ମତ ପ୍ରକାଶ କରିବା ପରେ, କୁରୁବଂଶକୁ ଆନନ୍ଦ ଦେଇଥିବା, ଇନ୍ଦ୍ରସମ ପରାକ୍ରମୀ ଇନ୍ଦ୍ରପୁତ୍ର ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।
Verse 19
यो<यं तपःप्रभावेण ऋषिसंतोषणेन च । दिव्य: पुरुष उत्पन्नो ज्वालावर्णो महाभुज:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ତପସ୍ୟାର ପ୍ରଭାବରେ ଏବଂ ଋଷିମାନଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରିବାରେ, ଅଗ୍ନିଜ୍ୱାଳା ସଦୃଶ ଦୀପ୍ତିମାନ ଓ ମହାବାହୁ ଏହି ଦିବ୍ୟ ପୁରୁଷ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୋଇଛି।”
Verse 20
धनुष्मान् कवची खड्गी रथमारुहा[ दंशित: । दिव्यैरहयवरैर्युक्तमग्निकुण्डात् समुत्थित:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧନୁ ଧାରଣ କରି, କବଚ ପିନ୍ଧି, ଖଡ୍ଗ ନେଇ, ଯୁଦ୍ଧସଜ୍ଜ ହୋଇ ସେ ରଥରେ ଆରୋହଣ କଲା। ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦିବ୍ୟ ଅଶ୍ୱମାନେ ଯୁକ୍ତ ରଥ ସହିତ ସେ ଅଗ୍ନିକୁଣ୍ଡରୁ ଉଦ୍ଭବ ହୋଇଥିଲା।
Verse 21
गर्जन्निव महामेघो रथघोषेण वीर्यवान् । सिंहसंहननो वीर: सिंहतुल्यपराक्रम:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବୀର୍ୟବାନ ସେ ବୀର ରଥଘୋଷରେ ମହାମେଘ ଗର୍ଜନ କରୁଥିବା ପରି ଗର୍ଜେ। ସିଂହସଦୃଶ ଦେହଗଠନ ଥିବା ସେ ଯୋଦ୍ଧା ସିଂହତୁଲ୍ୟ ପରାକ୍ରମୀ।
Verse 22
सिंहोरस्क: सिंहभुज: सिंहवक्षा महाबल: । सिंहप्रगर्जनो वीर: सिंहस्कन्धो महाद्युति:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है
ସେ ସିଂହ-ଉରସ୍କ, ସିଂହ-ଭୁଜ, ସିଂହ-ବକ୍ଷ ଓ ମହାବଳୀ। ସିଂହସଦୃଶ ଗର୍ଜନ କରୁଥିବା ସେ ବୀର ସିଂହ-ସ୍କନ୍ଧ ଓ ମହାଦ୍ୟୁତିମାନ।
Verse 23
सुभू: सुदंष्ट्र: सुहनु: सुबाहु: सुमुखो5कृश: । सुजन्रु: सुविशालाक्ष: सुपाद: सुप्रतिक्तित:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है
ସେ ଶୁଭଦେହୀ, ସୁଦଂଷ୍ଟ୍ର, ସୁହନୁ, ସୁବାହୁ, ସୁମୁଖ ଓ ଅକୃଶ। ସୁଜାନୁ, ବିଶାଳାକ୍ଷ, ସୁପାଦ; ସୁପ୍ରତିଷ୍ଠିତ (ଅଭେଦ୍ୟ ଭାବେ ସୁରକ୍ଷିତ)।
Verse 24
अभेद्य: सर्वशस्त्राणां प्रभिन्न इव वारण: । जज्ञे द्रोणविनाशाय सत्यवादी जितेन्द्रिय:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है
ସେ ସମସ୍ତ ଶସ୍ତ୍ରରେ ଅଭେଦ୍ୟ—ବନ୍ଧନ ଭାଙ୍ଗି ଧାଉଥିବା ଗଜରାଜ ପରି। ସତ୍ୟବାଦୀ ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ସେ ଦ୍ରୋଣବିନାଶ ପାଇଁ ଜନ୍ମିଲା।
Verse 25
धृष्टद्युम्नमहं मन््ये सहेद् भीष्मस्य सायकान् । वज्जाशनिसमस्पर्शान् दीप्तास्यथानुरगानिव,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है
ମୁଁ ମନେ କରେ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସେହି ସାୟକମାନଙ୍କୁ ସହିପାରିବ—ଯାହାର ସ୍ପର୍ଶ ବଜ୍ର ଓ ଅଶନି ସମ, ଏବଂ ଯେଉଁମାନେ ଦୀପ୍ତମୁଖ ସର୍ପ ପରି ଝପଟି ଆସନ୍ତି।
Verse 26
यमदूतसमान् वेगे निपाते पावकोपमान् | रामेणाजौ विषहितान् वज्ननिष्पेषदारुणान्,“पितामह भीष्मके बाण आघात करनेमें अग्निके समान तेजस्वी एवं यमदूतोंके समान प्राणोंका हरण करनेवाले हैं। वज्की गड़गड़ाहटके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उन बाणोंको पहले युद्धमें परशुरामजीने ही सहा था। राजन! मैं धृष्टद्युम्नके सिवा ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता, जो महान् व्रतधारी भीष्मका वेग सह सके। मेरा तो यही निश्चय है
ବେଗରେ ସେମାନେ ଯମଦୂତ ସମାନ, ଆଘାତରେ ପାବକ ସମାନ। ବଜ୍ରର ନିଷ୍ପେଷଣକାରୀ ପ୍ରହାର ପରି ଦାରୁଣ ସେହି ବାଣମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଏକଦା ସହିଥିଲେ।
Verse 27
पुरुषं तं॑ न पश्यामि य: सहेत महाव्रतम् । धृष्टद्युम्नमृते राजन्निति मे धीयते मति:,“पितामह भीष्मके बाण आघात करनेमें अग्निके समान तेजस्वी एवं यमदूतोंके समान प्राणोंका हरण करनेवाले हैं। वज्की गड़गड़ाहटके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उन बाणोंको पहले युद्धमें परशुरामजीने ही सहा था। राजन! मैं धृष्टद्युम्नके सिवा ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता, जो महान् व्रतधारी भीष्मका वेग सह सके। मेरा तो यही निश्चय है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ମହାବ୍ରତଧାରୀ ଭୀଷ୍ମଙ୍କର ପ୍ରଚଣ୍ଡ ବେଗକୁ ସହିପାରିବା ଏମିତି କୌଣସି ପୁରୁଷକୁ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ। ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ମୁଁ ତାଙ୍କ ବଳ ସହିବାରେ ସମର୍ଥ ମନେ କରେନି—ଏହି ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଷ୍କର୍ଷ।
Verse 28
क्षिप्रहस्तश्चित्रयोधी मत: सेनापतिर्मम । अभेद्यकवच: श्रीमान् मातड़ इव यूथप:,'जो शीघ्रतापूर्वक हस्तसंचालन करनेवाला, विचित्र पद्धतिसे युद्ध करनेमें कुशल, अभेद्य कवचसे सम्पन्न एवं यूथयति गजराजकी भाँति सुशोभित होनेवाला है, मेरी सम्मतिमें वह श्रीमान् धृष्टद्युम्न ही सेनापति होनेके योग्य है”
ମୋ ମତରେ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ହିଁ ସେନାପତି ହେବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ—ସେ ଶୀଘ୍ରହସ୍ତ, ବିଚିତ୍ର କୌଶଳରେ ଯୁଦ୍ଧନିପୁଣ, ଅଭେଦ୍ୟ କବଚଧାରୀ, ଏବଂ ଦଳର ଅଗ୍ରଣୀ ଗଜରାଜ ପରି ଶୋଭାମୟ।
Verse 29
(वैशग्पायन उवाच अर्जुनेनैवमुक्ते तु भीमो वाक्यं समाददे ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर भीमसेनने अपना विचार इस प्रकार प्रकट किया। भीमसेन उवाच वधार्थ य: समुत्पन्न: शिखण्डी द्रुपदात्मज: । वदन्ति सिद्धा राजेन्द्र ऋषयश्च॒ समागता:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଅର୍ଜୁନ ଏପରି କହିବା ପରେ ଭୀମ ଏହି କଥା କହିଲେ। ଭୀମସେନ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଦ୍ରୁପଦପୁତ୍ର ଶିଖଣ୍ଡୀ ବଧାର୍ଥେ ହିଁ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୋଇଛି। ସିଦ୍ଧମାନେ ଓ ସମାଗତ ଋଷିମାନେ ଏହି କଥା କହନ୍ତି।
Verse 30
यस्य संग्राममध्ये तु दिव्यमस्त्र प्रकुर्वत: । रूप॑ द्रक्ष्यन्ति पुरुषा रामस्येव महात्मन:
ସଙ୍ଗ୍ରାମମଧ୍ୟରେ ସେ ଯେତେବେଳେ ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ର ପ୍ରୟୋଗ କରିବ, ଲୋକେ ତାହାର ରୂପ ମହାତ୍ମା ରାମଙ୍କ ପରି ଦେଖିବେ।
Verse 31
नतं युद्धे प्रपश्यामि यो भिन्द्यात् तु शिखण्डिनम् । शस्त्रेण समरे राजन् संनद्ध॑ स्यन्दने स्थितम्
ହେ ରାଜନ! ସମରରେ ଶସ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ଶିଖଣ୍ଡୀକୁ ଭେଦିପାରିବା ଏମିତି କାହାକୁ ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଦେଖୁନାହିଁ—ସେ ତ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସନ୍ନଦ୍ଧ ହୋଇ ରଥରେ ଅବସ୍ଥିତ।
Verse 32
द्वैरथे समरे नान्यो भीष्म॑ हन्यान्महाव्रतम् । शिखण्डिनमृते वीर॑ स मे सेनापतिर्मत:
ଭୀମସେନ କହିଲେ—ବୀର! ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ରଥଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱ ସମୟରେ ମହାବ୍ରତଧାରୀ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ଶିଖଣ୍ଡୀ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କେହି ବଧ କରିପାରିବେ ନାହିଁ। ତେଣୁ ମୋ ମତରେ ସେଇ ଆମ ସେନାପତି।
Verse 33
भीमसेनने कहा--राजेन्द्र! ट्रपदकुमार शिखण्डी पितामह भीष्मका वध करनेके लिये ही उत्पन्न हुआ है। यह बात यहाँ पधारे हुए सिद्धों एवं महर्षियोंने बतायी है! संग्रामभूमिमें जब वह अपना दिव्यास्त्र प्रकट करता है, उस समय लोगोंको उसका स्वरूप महात्मा परशुरामके समान दिखायी देता है। मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें शिखण्डीको मार सके। राजन! जब महाव्रती भीष्म रथपर बैठकर अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो सामने आयेंगे, उस समय द्वैरथ युद्धमें शूरवीर शिखण्डीके सिवा दूसरा कोई योद्धा उन्हें नहीं मार सकता। अतः मेरे मतमें वही प्रधान सेनापति होनेके योग्य है ।। २९-- ३२ || युधिषछिर उवाच सर्वस्य जगतस्तात सारासारं बलाबलम् | सर्व जानाति धर्मात्मा मतमेषां च केशव:,युधिष्ठिर बोले--तात! धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्के समस्त सारासार और बलाबलको जानते हैं तथा इस विषयमें इन सब राजाओंका क्या मत है--इससे भी ये पूर्ण परिचित हैं
ଭୀମସେନ କହିଲେ—ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଦ୍ରୁପଦପୁତ୍ର ଶିଖଣ୍ଡୀ ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ବଧ ପାଇଁ ହିଁ ଜନ୍ମିଛି—ଏହି କଥା ଏଠାକୁ ଆସିଥିବା ସିଦ୍ଧ ଓ ମହର୍ଷିମାନେ କହିଛନ୍ତି। ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ସେ ଯେତେବେଳେ ନିଜ ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ର ପ୍ରକାଶ କରେ, ସେତେବେଳେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ତାହାର ରୂପ ମହାତ୍ମା ପରଶୁରାମଙ୍କ ସମାନ ଦିଶେ। ଯୁଦ୍ଧରେ ଶିଖଣ୍ଡୀକୁ ମାରିପାରିବା ଏମିତି କୌଣସି ବୀରକୁ ମୁଁ ଦେଖୁନି। ରାଜନ! ମହାବ୍ରତଧାରୀ ଭୀଷ୍ମ ଯେତେବେଳେ ରଥାରୂଢ ହୋଇ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସଜ୍ଜିତ ହୋଇ ସମ୍ମୁଖେ ଆସିବେ, ସେତେବେଳେ ରଥଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱ ଯୁଦ୍ଧରେ ଶୂର ଶିଖଣ୍ଡୀ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କେହି ତାଙ୍କୁ ବଧ କରିପାରିବେ ନାହିଁ। ତେଣୁ ମୋ ମତରେ ସେଇ ମୁଖ୍ୟ ସେନାପତି ହେବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ। ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ତାତ! ଧର୍ମାତ୍ମା କେଶବ ସମଗ୍ର ଜଗତର ସାର-ଅସାର ଓ ବଳ-ଅବଳ ଜାଣନ୍ତି; ଏହି ବିଷୟରେ ଏହି ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ମତ ମଧ୍ୟ ସେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଜାଣନ୍ତି।
Verse 34
यमाह कृष्णो दाशार्ह: सो<स्तु सेनापतिर्मम । कृतास्त्रो5प्यकृतास्त्रो वा वृद्धो वा यदि वा युवा,अतः दशाहकुलभूषण श्रीकृष्ण जिसका नाम बतावें, वही हमारी सेनाका प्रधान सेनापति हो। फिर वह अस्त्र-विद्यामें निपुण हो या न हो, वृद्ध हो या युवा हो (इसकी चिन्ता अपने लोगोंको नहीं करनी चाहिये)
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଦାଶାର୍ହ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯାହାଙ୍କ ନାମ କହିବେ, ସେଇ ମୋର ସେନାପତି ହେଉନ୍ତୁ। ସେ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ ହେଉନ୍ତୁ କି ନ ହେଉନ୍ତୁ, ବୃଦ୍ଧ ହେଉନ୍ତୁ କି ଯୁବ—ଏହିପରି ଭାବନାରେ ଆମ ଲୋକମାନେ ଚିନ୍ତିତ ହେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।
Verse 35
एष नो विजये मूलमेष तात विपर्यये । अत्र प्राणाश्न राज्यं च भावाभावौ सुखासुखे,तात! ये भगवान् ही हमारी विजय अथवा पराजयके मूल कारण हैं। हमारे प्राण, राज्य, भाव, अभाव तथा सुख और दु:ख इन्हींपर अवलम्बित हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ତାତ! ସେଇ ଆମ ବିଜୟର ମୂଳ, ସେଇ ଆମ ବିପର୍ୟୟର ମୂଳ ମଧ୍ୟ। ଆମ ପ୍ରାଣ, ଆମ ରାଜ୍ୟ, ଲାଭ-ହାନି, ସୁଖ-ଦୁଃଖ—ସବୁ ତାଙ୍କ ଉପରେ ନିର୍ଭର।
Verse 36
एष धाता विधाता च सिद्धिरत्र प्रतिष्ठिता । यमाह कृष्णो दाशार्ह: सो<स्तु नो वाहिनीपति:,यही सबके कर्ता-धर्ता हैं। हमारे समस्त कार्योंकी सिद्धि इन्हींपर निर्भर करती है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण जिसके लिये प्रस्ताव करें, वही हमारी विशाल वाहिनीका प्रधान अधिनायक हो
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସେଇ ଧାତା ଓ ବିଧାତା; ଆମ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟର ସିଦ୍ଧି ତାଙ୍କଠାରେ ହିଁ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ତେଣୁ ଦାଶାର୍ହ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯାହାଙ୍କୁ କହିବେ, ସେଇ ଆମ ବିଶାଳ ବାହିନୀର ପତି ହେଉନ୍ତୁ।
Verse 37
ब्रवीतु वदतां श्रेष्ठो निशा समभिवर्तते । ततः सेनापतिं कृत्वा कृष्णस्य वशवर्तिन:,अतः वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण अपना विचार प्रकट करें। इस समय रात्रि है। हम अभी सेनापतिका निर्वाचन करके रात बीतनेपर अस्त्र-शस्त्रोंका अधिवासन (गन्ध आदि उपचारोंद्वारा पूजन), कौतुक (रक्षाबन्धन आदि) तथा मंगलकृत्य (स्वस्तिवाचन आदि) करनेके अनन्तर श्रीकृष्णके अधीन हो समरांगणकी यात्रा करेंगे
ବକ୍ତାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ନିଜ ମତ ପ୍ରକାଶ କରନ୍ତୁ; ରାତ୍ରି ନିକଟ ଆସୁଛି। ତାପରେ ସେନାପତି ନିଯୁକ୍ତ କରି ଆମେ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଅଧୀନ ରହିବୁ; ରାତ୍ରି ଅତିକ୍ରାନ୍ତ ହେଲେ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରର ଅଧିବାସନ, କୌତୁକ-ରକ୍ଷା ଓ ମଙ୍ଗଳକର୍ମ ସମ୍ପନ୍ନ କରି ଶୃଙ୍ଖଳାବଦ୍ଧ ଭାବେ ରଣଭୂମିକୁ ଯାତ୍ରା କରିବୁ।
Verse 38
रात्रे: शेषे व्यतिक्रान्ते प्रयास्यामो रणाजिरम् । अधिवासितश्त्राश्व॒ कृतकौतुकमड़ला:,अतः वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण अपना विचार प्रकट करें। इस समय रात्रि है। हम अभी सेनापतिका निर्वाचन करके रात बीतनेपर अस्त्र-शस्त्रोंका अधिवासन (गन्ध आदि उपचारोंद्वारा पूजन), कौतुक (रक्षाबन्धन आदि) तथा मंगलकृत्य (स्वस्तिवाचन आदि) करनेके अनन्तर श्रीकृष्णके अधीन हो समरांगणकी यात्रा करेंगे
ରାତ୍ରିର ଶେଷ ଭାଗ ଅତିକ୍ରାନ୍ତ ହେଲେ ଆମେ ରଣଭୂମିକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବୁ। ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଓ ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କର ଅଧିବାସନ କରି, କୌତୁକ-ରକ୍ଷା ଓ ମଙ୍ଗଳକର୍ମ ସମ୍ପନ୍ନ କରି, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଦେଶରେ ଯୁଦ୍ଧକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଅଗ୍ରସର ହେବୁ।
Verse 39
वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचन श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमत: । अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षो धनंजयमवेक्ष्य ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी ओर देखते हुए कहा--“महाराज! आपलोगोंने जिन-जिन वीरोंके नाम लिये हैं, ये सभी मेरी रायमें भी सेनापति होनेके योग्य हैं; क्योंकि ये सभी बड़े पराक्रमी योद्धा हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେହି କଥା ଶୁଣି, ପଦ୍ମନୟନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ଦିଗକୁ ଚାହିଁ କହିଲେ।
Verse 40
ममाप्येते महाराज भवद्धिर्य उदाहता: । नेतारस्तव सेनाया मता विक्रान्तयोधिन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी ओर देखते हुए कहा--“महाराज! आपलोगोंने जिन-जिन वीरोंके नाम लिये हैं, ये सभी मेरी रायमें भी सेनापति होनेके योग्य हैं; क्योंकि ये सभी बड़े पराक्रमी योद्धा हैं
ମହାରାଜ! ଆପଣ ଯେଯେ ନାମ ଉଚ୍ଚାରଣ କରିଛନ୍ତି, ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ମୋ ମତରେ ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କ ସେନାର ନେତା ହେବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ; କାରଣ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ପରାକ୍ରମୀ ଯୋଦ୍ଧା।
Verse 41
सर्व एव समर्था हि तव शत्रु प्रबाधितुम् । इन्द्रस्यापि भयं होते जनयेयुर्महाहवे
ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଆପଣଙ୍କ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରିବାକୁ ସମର୍ଥ। ମହାଯୁଦ୍ଧରେ ସେମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ମନରେ ମଧ୍ୟ ଭୟ ଜନ୍ମାଇପାରିବେ।
Verse 42
मयापि हि महाबाहो त्वत्प्रियार्थ महाहवे,“महाबाहु भरतनन्दन! मैंने भी महान् युद्धकी सम्भावना देखकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये शान्ति-स्थापनके निमित्त महान् प्रयत्न किया था। इससे हमलोग धर्मके ऋणसे भी उऋण हो गये हैं। दूसरोंके दोष बतानेवाले लोग भी अब हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं कर सकते
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମହାବାହୁ! ମହାଯୁଦ୍ଧର ସମ୍ଭାବନା ପୂର୍ବରୁ ଦେଖି, ତୁମ ପ୍ରିୟାର୍ଥେ ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପନ ପାଇଁ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ମହା ପ୍ରୟାସ କରିଥିଲି। ତାହାଦ୍ୱାରା ଆମେ ଧର୍ମଋଣରୁ ମଧ୍ୟ ମୁକ୍ତ ହେଲୁ; ଏବେ ଯେମାନେ ସଦା ଅନ୍ୟର ଦୋଷ କହନ୍ତି, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଆମ ଉପରେ ଦୋଷାରୋପ କରିପାରିବେ ନାହିଁ।
Verse 43
कृतो यत्नो महांस्तत्र शम: स्यथादिति भारत । धर्मस्य गतमानृण्यं न सम वाच्या विवक्षताम्,“महाबाहु भरतनन्दन! मैंने भी महान् युद्धकी सम्भावना देखकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये शान्ति-स्थापनके निमित्त महान् प्रयत्न किया था। इससे हमलोग धर्मके ऋणसे भी उऋण हो गये हैं। दूसरोंके दोष बतानेवाले लोग भी अब हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं कर सकते
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ସେଠାରେ ଶାନ୍ତି ହେଉ—ଏହି ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ମହା ପ୍ରୟାସ କରାଗଲା। ତାହାଦ୍ୱାରା ଆମେ ଧର୍ମର ଅବଶିଷ୍ଟ ଋଣରୁ ମଧ୍ୟ ମୁକ୍ତ ହେଲୁ; ତେଣୁ ଯେମାନେ ଅନ୍ୟର ଦୋଷ କହିବାକୁ ଉତ୍ସୁକ, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଏବେ ଆମ ଉପରେ ସମାନ ଦୋଷ ଲଗାଇପାରିବେ ନାହିଁ।
Verse 44
कृतास्त्रं मन्यते बाल आत्मानमविचक्षण: । धार्तराष्ट्रो बलस्थं च पश्यत्यात्मानमातुर:,धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन युद्धके लिये आतुर हो रहा है। वह मूर्ख और अयोग्य होकर भी अपनेको अस्त्रविद्यामें पारंगत मानता है और दुर्बल होकर भी अपनेको बलवान् समझता है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆତୁର। ଅବିଚକ୍ଷଣ ସେ ବାଳକ ନିଜକୁ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ସିଦ୍ଧ ବୋଲି ମନେ କରେ; ଏବଂ ଦୁର୍ବଳ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ନିଜକୁ ବଳବାନ ବୋଲି ଦେଖେ।
Verse 45
युज्यतां वाहिनी साधु वधसाध्या हि मे मता: । न धार॑राष्ट्रा: शक्ष्यन्ति स्थातुं दृष्टवा धनंजयम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେନାକୁ ଭଲଭାବେ ବ୍ୟୁହବଦ୍ଧ କର। ମୋ ମତରେ ସେମାନେ ବଧଯୋଗ୍ୟ। ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)କୁ ଦେଖିଲେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନେ ଠିଆ ରହିପାରିବେ ନାହିଁ।
Verse 46
भीमसेनं च संक्रुद्धं यमौ चापि यमोपमौ । युयुधानद्वितीयं च धृष्टद्युम्नममर्षणम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିତ ଭୀମସେନକୁ, ଯମ ସମ ପରାକ୍ରମୀ ଯମଜ ଦୁଇଭାଇକୁ, ଯୁଦ୍ଧରେ ଅଦ୍ୱିତୀୟ ଯୁୟୁଧାନ (ସାତ୍ୟକି)କୁ ଏବଂ ଅପମାନ ସହିନଥିବା ଉଗ୍ର ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନକୁ ଦେଖିଲା।
Verse 47
अभिमन्यु द्रौपदेयान् विराटद्रुपदावपि । अक्षौहिणीपतीं क्षान्यान् नरेन्द्रान् भीमविक्रमान्
ଅଭିମନ୍ୟୁ, ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ, ଏବଂ ବିରାଟ ଓ ଦ୍ରୁପଦ—ତଥା ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାର ଅଧିପତି ଅନ୍ୟ ଭୀମବିକ୍ରମ ନରେନ୍ଦ୍ରମାନେ—ସେଠାରେ ସମବେତ ଥିଲେ।
Verse 48
अतः आप अपनी सेनाको युद्धके लिये अच्छी तरहसे सुसज्जित कीजिये; क्योंकि मेरे मतमें वे शत्रुवधसे ही वशीभूत हो सकते हैं। वीर अर्जुन, क्रोधमें भरे हुए भीमसेन यमराजके समान नकुल-सहदेव, सात्यकिसहित अमर्षशील धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, विराट, द्रुपद तथा अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति अन्यान्य भयंकर पराक्रमी नरेशोंको युद्धके लिये उद्यत देखकर धृतराष्ट्रके पुत्र रणभूमिमें टिक नहीं सकेंगे || ४५-- ४७ || सारवद् बलमस्माकं दुष्प्रधर्ष दुरासदम् । धार्तराष्ट्रबलं संख्ये हनिष्पति न संशय:
ଆମ ବଳ ସାରବତ, ସୁସଂଗଠିତ, ଦୁଷ୍ପ୍ରଧର୍ଷ ଓ ଦୁରାସଦ। ସମରରେ ଏହା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ନିଶ୍ଚୟ ନିହତ କରିବ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 49
धृष्टद्युम्नमहं मन््ये सेनापतिमरिंदम । “हमारी सेना अत्यन्त शक्तिशाली, दुर्धर्ष और दुर्गम है। वह युद्धमें धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाका संहार कर डालेगी, इसमें संशय नहीं है। शत्रुदमन! मैं धृष्टद्युम्नको ही प्रधान सेनापति होनेयोग्य मानता हूँ || ४८ है ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्ते तु कृष्णेन सम्प्राह्ष्यन्नरोत्तमा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। फिर तो युद्धके लिये 'सुसज्जित हो जाओ, सुसज्जित हो जाओ' ऐसा कहते हुए समस्त सैनिक बड़ी उतावलीके साथ दौड़-धूप करने लगे। उस समय प्रसन्न चित्तवाले उन वीरोंका महान् हर्षनबाद सब ओर गूँज उठा
ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ! ମୁଁ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କୁ ହିଁ ସେନାପତି ଭାବେ ମନେ କରେ।
Verse 50
तेषां प्रहषमनसां नाद: समभवन्महान् । योग इत्यथ सैन्यानां त्वरतां सम्प्रधावताम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। फिर तो युद्धके लिये 'सुसज्जित हो जाओ, सुसज्जित हो जाओ' ऐसा कहते हुए समस्त सैनिक बड़ी उतावलीके साथ दौड़-धूप करने लगे। उस समय प्रसन्न चित्तवाले उन वीरोंका महान् हर्षनबाद सब ओर गूँज उठा
ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରହୃଷ୍ଟ ମନରୁ ମହାନାଦ ଉଠିଲା। ତାପରେ ତ୍ୱରାରେ ଧାଉଥିବା ସେନାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ‘ଯୋଗ! ଯୋଗ!’—ଅର୍ଥାତ୍ ‘ଜୋତ, ସୁସଜ୍ଜିତ ହେ’—ବୋଲି ଘୋଷ ଗୁଞ୍ଜିଲା।
Verse 51
हयवारणशब्दाशक्ष नेमिघोषाश्ष सर्वतः | शड्खदुन्दुभिघोषाश्व तुमुला: सर्वतो5भवन्,सब ओर घोड़े, हाथी और रथोंका घोष होने लगा। सभी ओर शंख और दुन्दुभियोंकी भयानक ध्वनि गूँजने लगी
ସବୁଦିଗରୁ ଘୋଡ଼ା-ହାତୀର ଶବ୍ଦ ଓ ରଥଚକ୍ରର ଗର୍ଜନ ଉଠିଲା। ସର୍ବତ୍ର ଶଙ୍ଖ ଓ ଦୁନ୍ଦୁଭିର ତୁମୁଳ ଧ୍ୱନି ଗୁଞ୍ଜିଲା।
Verse 52
तदुग्र॑ सागरनिभ क्षुब्धं बलसमागमम् | रथपात्तिगजोदग्रं महोर्मिभिरिवाकुलम्,रथ, पैदल और हाथियोंसे भरी हुई वह भयंकर सेना उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त महासागरके समान क्षुब्ध हो उठी
ରଥ, ପଦାତି ଓ ହାତୀରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସେଇ ଭୟଙ୍କର ସେନାସମାଗମ ଉଚ୍ଚ ତରଙ୍ଗରେ ଆକୁଳ ମହାସାଗର ପରି କ୍ଷୁବ୍ଧ ହୋଇ ଉଠିଲା।
Verse 53
धावतामाद्दयानानां तनुत्राणि च बध्नताम् | प्रयास्यतां पाण्डवानां ससैन्यानां समन्तत:
ପାଣ୍ଡବମାନେ ସେନାସହିତ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ, ସେତେବେଳେ ଭାରି ହଡ଼ବଡ଼ି ହେଲା—କେହି ଦୌଡ଼ୁଥିଲେ, କେହି ଯାନରେ ଚଢ଼ୁଥିଲେ, କେହି କବଚ ବାନ୍ଧୁଥିଲେ।
Verse 54
अग्रानीके भीमसेनो माद्रीपुत्रो च दंशितो,सेनाके आगे-आगे भीमसेन, कवचधारी माद्रीकुमार नकुल-सहदेव, सुभद्राकुमार अभिमन्यु, द्रौपदीके सभी पुत्र, ट्रपदकुमार धृष्टद्युम्न, प्रभद्रकमण और पांचालदेशीय क्षत्रिय वीर चले। इन सबने भीमसेनको अपने आगे कर लिया था
ସେନାର ଅଗ୍ରଭାଗରେ ଭୀମସେନ ଥିଲେ, ତାଙ୍କ ସହ କବଚଧାରୀ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ଥିଲେ। ସୁଭଦ୍ରାପୁତ୍ର ଅଭିମନ୍ୟୁ, ଦ୍ରୌପଦୀପୁତ୍ରମାନେ, ଦ୍ରୁପଦପୁତ୍ର ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ପ୍ରଭଦ୍ରକ ଯୋଧା ଓ ପାଞ୍ଚାଳର କ୍ଷତ୍ରିୟ ବୀରମାନେ—ସମସ୍ତେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଅଗ୍ରଣୀ କରି ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 55
सौभद्रो द्रौपदेयाश्न धृष्टय्युम्नश्न पार्षतः । प्रभद्रकाश्नव पडचाला भीमसेनमुखा ययु:,सेनाके आगे-आगे भीमसेन, कवचधारी माद्रीकुमार नकुल-सहदेव, सुभद्राकुमार अभिमन्यु, द्रौपदीके सभी पुत्र, ट्रपदकुमार धृष्टद्युम्न, प्रभद्रकमण और पांचालदेशीय क्षत्रिय वीर चले। इन सबने भीमसेनको अपने आगे कर लिया था
ସୌଭଦ୍ର ଅଭିମନ୍ୟୁ, ଦ୍ରୌପଦେୟମାନେ, ପୃଷତପୁତ୍ର ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ପ୍ରଭଦ୍ରକମାନେ ଓ ପାଞ୍ଚାଳ ବୀରମାନେ—ସମସ୍ତେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 56
तत: शब्द: समभवत् समुद्रस्येव पर्वणि । हृष्टानां सम्प्रयातानां घोषो दिवमिवास्पृशत्,तदनन्तर जैसे पूर्णिमाके दिन बढ़ते हुए समुद्रका कोलाहल सुनायी देता है, उसी प्रकार हर्ष और उत्साहमें भरकर युद्धके लिये यात्रा करनेवाले उन सैनिकोंका महान् घोष सब ओर फैलकर मानो स्वर्गलोकतक जा पहुँचा
ତାପରେ ପର୍ବଦିନରେ ଉଠୁଥିବା ସମୁଦ୍ରଗର୍ଜନ ପରି ଏକ ମହାଶବ୍ଦ ହେଲା। ହର୍ଷ-ଉତ୍ସାହରେ ଯୁଦ୍ଧଯାତ୍ରାକୁ ବେରିଥିବା ସେ ସେନାମାନଙ୍କର ମହାଘୋଷ ସବୁଦିଗରେ ପ୍ରସାରିତ ହୋଇ ମନେ ହେଲା ଯେ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ପର୍ଶ କଲା।
Verse 57
प्रह्दश् दंशिता योधा: परानीकविदारणा: । तेषां मध्ये ययौ राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:,हर्षमें भरे हुए और कवच आदिसे सुसज्जित वे समस्त सैनिक शत्रु-सेनाको विदीर्ण करनेका उत्साह रखते थे। कदुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर समस्त सैनिकोंके बीचमें होकर चले
ହର୍ଷରେ ଉତ୍ସାହିତ ଓ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶସ୍ତ୍ରସଜ୍ଜ ଥିବା ସେ ସମସ୍ତ ଯୋଧା ଶତ୍ରୁସେନାର ବ୍ୟୂହକୁ ଭେଦିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟଦ୍ୱାରା କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 58
शकटापणवेशाश्व यानयुग्यं च सर्वश: । कोशं यन्त्रायुधं चैव ये च वैद्याश्विकित्सका:,सामान ढोनेवाली गाड़ी, बाजार, डेरे-तम्बू, रथ आदि सवारी, खजाना, यन्त्रचालित अस्त्र और चिकित्साकुशल वैद्य भी उनके साथ-साथ चले
ସେମାନଙ୍କ ସହ ସେନାର ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ସହାୟକ ସାମଗ୍ରୀ ମଧ୍ୟ ଚାଲିଲା—ଭାର ବୋହିବା ଗାଡ଼ି, ବଜାର-ରସଦ ଓ ଶିବିର ସାମଗ୍ରୀ, ଯୋଗ୍ୟ ଅଶ୍ୱ ଓ ଯାନ, ଖଜାନା, ଯନ୍ତ୍ରଚାଳିତ ଅସ୍ତ୍ର, ଏବଂ ଅଶ୍ୱଚିକିତ୍ସାରେ ନିପୁଣ ବୈଦ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ।
Verse 59
फल्गु यच्च बल॑ किंचिद् यच्चापि कृशदुर्बलम् । तत् संगृह ययौ राजा ये चापि परिचारका:,राजा युधिष्ठिरने जो कोई भी सेना सारहीन, कृशकाय अथवा दुर्बल थी, सबको एवं अन्य परिचारकोंको उपप्लव्यमें एकत्र करके वहाँसे प्रस्थान कर दिया
ରାଜା ଯେଉଁ ଅଳ୍ପବଳୀ, କୃଶ ଓ ଦୁର୍ବଳ ସେନା ଥିଲେ, ଏବଂ ଯେ ପରିଚାରକମାନେ ଥିଲେ—ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସଂଗ୍ରହ କଲେ; ତାପରେ ସେମାନଙ୍କୁ ନେଇ ଉପପ୍ଲବ୍ୟକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 60
उपप्लव्ये तु पाञ्चाली द्रौपदी सत्यवादिनी । सह स्त्रीभिर्निववृते दासीदाससमावृता,पांचालराजकुमारी सत्यवादिनी द्रौपदी दास-दासियोंसे घिरी हुई कुछ दूरतक महाराजके साथ गयी। फिर सभी स्त्रियोंके साथ उपप्लव्य नगरमें लौट आयी
ଉପପ୍ଲବ୍ୟରେ ସତ୍ୟବାଦିନୀ ପାଞ୍ଚାଳୀ ଦ୍ରୌପଦୀ, ଦାସ-ଦାସୀ ଓ ପରିଚାରିକାମାନଙ୍କ ଘେରାରେ, ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ପୁନଃ ଫେରିଆସିଲେ।
Verse 61
कृत्वा मूलप्रतीकारं गुल्मै: स्थावरजड़मै: । स्कन्धावारेण महता प्रययु: पाण्डुनन्दना:,पाण्डवलोग दुर्गकी रक्षाके लिये आवश्यक स्थावर (परकोटे और खाईं आदि) तथा जंगम (पहरेदार सैनिकोंकी नियुक्ति आदि) उपायोंद्वारा स्त्रियों और धन आदिकी सुरक्षाकी समुचित व्यवस्था करके बहुत-से खेमे और तम्बू आदि साथ लेकर प्रस्थित हुए
ସ୍ଥାବର ଓ ଜଙ୍ଗମ—ଉଭୟ ପ୍ରକାର ବ୍ୟବସ୍ଥାରେ ପ୍ରଥମେ ଆବଶ୍ୟକ ରକ୍ଷା-ପ୍ରତିକାର କରି, ଏବଂ ବିଶାଳ ସ୍କନ୍ଧାବାର (ଶିବିର) ସହିତ, ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନମାନେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 62
ददतो गां हिरण्यं च ब्राह्म॒णैरभिसंवृता: । स्तूयमाना ययू राजन् रथैर्मणिविभूषितै:,राजन! ब्राह्मणलोग चारों ओरसे घेरकर पाण्डवोंके गुण गाते और पाण्डवलोग उन्हें गौओं तथा सुवर्ण आदिका दान देते थे। इस प्रकार वे मणिभूषित रथोंपर बैठकर यात्रा कर रहे थे
ହେ ରାଜନ! ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ତାଙ୍କର ସ୍ତୁତି କରୁଥିବାବେଳେ, ପାଣ୍ଡବମାନେ ଗୋଦାନ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣାଦି ଦାନ ଦେଇ ଦେଇ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ; ମଣିଭୂଷିତ ରଥରେ ଆରୁଢ଼ ହୋଇ ସେମାନେ ଯାତ୍ରା କଲେ।
Verse 63
केकया धृष्टकेतुश्च पुत्र: काश्यस्य चाभिभू: । श्रेणिमान् वसुदानश्व शिखण्डी चापराजित:,(पाँचों भाई) केकयराजकुमार, धृष्टकेतु, काशिराजके पुत्र अभिभू, श्रेणिमान्, वसुदान और अपराजित वीर शिखण्डी--ये सब लोग आभूषण और कवच धारण करके हाथेोंमें शस्त्र लिये हर्ष और उल्लासमें भरकर राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनके साथ- साथ जा रहे थे
କେକୟର ରାଜକୁମାରମାନେ, ଧୃଷ୍ଟକେତୁ, କାଶିରାଜଙ୍କ ପୁତ୍ର ଅଭିଭୂ, ଶ୍ରେଣିମାନ, ବସୁଦାନ ଏବଂ ଅପରାଜିତ ବୀର ଶିଖଣ୍ଡୀ—ଏ ସମସ୍ତେ ଆଭୂଷଣରେ ଶୋଭିତ, କବଚଧାରୀ, ହାତରେ ଶସ୍ତ୍ର ଧରି, ହର୍ଷୋଲ୍ଲାସରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ତାଙ୍କ ସହିତ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 64
ह्ृष्ास्तुष्टा: कवचिन: सशस्त्रा: समलंकृता: । राजानमन्वयु: सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम्,(पाँचों भाई) केकयराजकुमार, धृष्टकेतु, काशिराजके पुत्र अभिभू, श्रेणिमान्, वसुदान और अपराजित वीर शिखण्डी--ये सब लोग आभूषण और कवच धारण करके हाथेोंमें शस्त्र लिये हर्ष और उल्लासमें भरकर राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनके साथ- साथ जा रहे थे
ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ହର୍ଷିତ ଓ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ, କବଚଧାରୀ, ଶସ୍ତ୍ରସଜ୍ଜ ଏବଂ ଆଭୂଷଣରେ ଅଲଙ୍କୃତ ହୋଇ ରାଜାଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କଲେ; ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ସେମାନେ ତାଙ୍କ ସହିତ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 65
जघनार्धे विराटश्न याज्ञसेनिश्ष॒ सौमकि: । सुधर्मा कुन्तिभोजश्व धृष्टद्युम्नस्य चात्मजा:,सेनाके पिछले आधे भागमें राजा विराट, सोमकवंशी द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, सुधर्मा, कुन्तिभोज और धृष्टद्युम्नके पुत्र जा रहे थे। इनके साथ चालीस हजार रथ, दो लाख घोड़े, चार लाख पैदल और साठ हजार हाथी थे
ସେନାର ପଛ ଭାଗରେ ରାଜା ବିରାଟ, ଯାଜ୍ଞସେନୀ, ସୌମକ, ସୁଧର୍ମା, କୁନ୍ତିଭୋଜ ଏବଂ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଅଗ୍ରସର ହେଉଥିଲେ।
Verse 66
रथायुतानि चत्वारि हया: पञ्चगुणास्तथा । पत्तिसैन्यं दशगुणं गजानामयुतानि षट्,सेनाके पिछले आधे भागमें राजा विराट, सोमकवंशी द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, सुधर्मा, कुन्तिभोज और धृष्टद्युम्नके पुत्र जा रहे थे। इनके साथ चालीस हजार रथ, दो लाख घोड़े, चार लाख पैदल और साठ हजार हाथी थे
ରଥ ଚାରି ଅୟୁତ; ଘୋଡ଼ା ତାହାର ପାଞ୍ଚଗୁଣ; ପଦାତି ସେନା ଦଶଗୁଣ; ଏବଂ ହାତୀ ଛଅ ଅୟୁତ ଥିଲେ।
Verse 67
अनाधष्टिश्वेकितानो धृष्टकेतुश्च सात्यकि: । परिवार्य ययु: सर्वे वासुदेवधनंजयौ,अनाधृष्टि, चेकितान, धृष्टकेतु तथा सात्यकि--ये सब लोग भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनको घेरकर चल रहे थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଅନାଦୃଷ୍ଟି, ଚେକିତାନ, ଧୃଷ୍ଟକେତୁ ଓ ସାତ୍ୟକି—ସମସ୍ତେ ମିଶି ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଓ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି, ନିଷ୍ଠାବାନ ରକ୍ଷକ-ସହଚର ହୋଇ ଆଗେଇଲେ।
Verse 68
आसाद्य तु कुरुक्षेत्र व्यूढानीका: प्रहारिण: । पाण्डवा: समदृश्यन्त नर्दन्तो वृषभा इव,इस प्रकार सेनाकी व्यूहरचना करके प्रहार करनेके लिये उद्यत हुए पाण्डवसैनिक कुरक्षेत्रमें पहँचकर साँड़ोंके समान गर्जन करते हुए दिखायी देने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ପହଞ୍ଚି, ବ୍ୟୂହବଦ୍ଧ ଓ ପ୍ରହାର ପାଇଁ ସଜ୍ଜ ପାଣ୍ଡବସେନା ବୃଷଭମାନଙ୍କ ପରି ଗର୍ଜନ କରୁଥିବା ଦେଖାଗଲା।
Verse 69
तेडवगाहा कुरुक्षेत्र शड्खान् दध्मुररिंदमा: | तथैव दश्मतु: शड्खं वासुदेवधनंजयौ,उन शत्रुदमन वीरोंने कुरुक्षेत्रकी सीमामें पहुँचकर अपने-अपने शंख बजाये। इसी प्रकार श्रीकृष्ण और अर्जुनने भी शंखध्वनि की
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରର ସୀମାକୁ ପ୍ରବେଶ କରି, ସେଇ ଶତ୍ରୁଦମନ ବୀରମାନେ ନିଜ-ନିଜ ଶଙ୍ଖ ଫୁଙ୍କିଲେ; ସେହିପରି ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଓ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ମଧ୍ୟ ଶଙ୍ଖନାଦ କଲେ।
Verse 70
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशने: । निशम्य सर्वसैन्यानि समहृष्यन्त सर्वश:,बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान पांचजन्यका गम्भीर घोष सुनकर सब ओर फैले हुए समस्त पाण्डवसैनिक हर्षसे उललसित एवं रोमांचित हो उठे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ବିଜୁଳିର ଗର୍ଜନ ପରି ପାଞ୍ଚଜନ୍ୟର ଗମ୍ଭୀର ନିର୍ଘୋଷ ଶୁଣି, ସେନାର ସମସ୍ତ ଦଳ ସବୁଦିଗରୁ ହର୍ଷ ଓ ରୋମାଞ୍ଚରେ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲିତ ହେଲେ।
Verse 71
शड्खदुन्दुभिसंसृष्ट: सिंहनादस्तरस्विनाम् । पृथिवीं चान्तरिक्षं च सागरांश्वान्चनादयत्,शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिला हुआ वेगवान् वीरोंका सिंहनाद पृथ्वी, आकाश तथा समुद्रोंतक फैलकर उन सबको प्रतिध्वनित करने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଶଙ୍ଖ ଓ ଦୁନ୍ଦୁଭିର ଧ୍ୱନି ସହ ମିଶିଥିବା ବେଗବାନ ବୀରମାନଙ୍କ ସିଂହନାଦ ପୃଥିବୀ, ଆକାଶ ଓ ସମୁଦ୍ରମାନଙ୍କ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସାରିତ ହୋଇ, ସବୁକୁ ପ୍ରତିଧ୍ୱନିତ କରିଦେଲା।
Verse 150
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକଶ ପଞ୍ଚାଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 151
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि कुरुक्षेत्रप्रवेशे एकपज्चाशदधिकशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ, ବିଶେଷତଃ ସୈନ୍ୟନିର୍ୟାଣପର୍ବରେ, କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରପ୍ରବେଶ ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ଏକଶ ଏକାବନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 413
कि पुनर्धात॑राष्ट्राणां लुब्धानां पापचेतसाम् । “आपके शत्रुओंको परास्त करनेकी शक्ति इन सबमें विद्यमान है। ये महान् संग्राममें इन्द्रके मनमें भी भय उत्पन्न कर सकते हैं; फिर पापात्मा और लोभी धृतराष्ट्रपुत्रोंकी तो बात ही क्या है?
ତେବେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଆଉ କ’ଣ କହିବା—ଯେମାନେ ଲୋଭୀ ଓ ପାପଚେତସ! ଏହି ସମସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣଙ୍କ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିବାର ଶକ୍ତି ବିଦ୍ୟମାନ। ମହାସଂଗ୍ରାମରେ ସେମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ମନରେ ମଧ୍ୟ ଭୟ ଉତ୍ପନ୍ନ କରିପାରନ୍ତି; ତେବେ ପାପାତ୍ମା ଓ ଲୋଭୀ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କ କଥା ଅଲଗା କରି କହିବାର ଆବଶ୍ୟକତା କ’ଣ!
Verse 536
गड्ेव पूर्णा दुर्धर्षा समदृश्यत वाहिनी । रणयात्राके लिये उद्यत हुए पाण्डव और उनके सैनिक सब ओर दौड़ते, पुकारते और कवच बाँधते दिखायी दिये। उनकी वह विशाल वाहिनी जलसे परिपूर्ण गंगाके समान दुर्गम दिखायी देती थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାଙ୍କର ବାହିନୀ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଜ୍ଜିତ ଓ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ଦିଶୁଥିଲା। ରଣଯାତ୍ରା ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଓ ତାଙ୍କ ସୈନିକମାନେ ସବୁଦିଗରେ ଦୌଡ଼ୁଥିବା, ପରସ୍ପରକୁ ଡାକୁଥିବା ଏବଂ କବଚ ବାନ୍ଧୁଥିବା ଦେଖାଗଲେ। ସେଇ ବିଶାଳ ସେନା ଜଳରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, ଉଫାନ ଗଙ୍ଗା ପରି ଦୁର୍ଗମ ଲାଗୁଥିଲା।
The dilemma is implicit in leadership choice: whether to interpret an incomplete diplomatic outcome as a cue for renewed negotiation or as justification for immediate mobilization, thereby increasing the likelihood of large-scale harm.
The chapter illustrates how perception, prior wrongdoing, and counsel shape policy: preparedness and administrative competence can be ethically neutral tools, but when driven by resentment or fear, they accelerate conflict and magnify consequences.
No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as narrative causality and institutional description, emphasizing how strategic decisions and logistics become the enabling conditions for later events.