
Udyoga Parva 142: Vidura’s warning to Kuntī and Kuntī’s resolve to meet Karṇa (Gaṅgātīra encounter begins)
Upa-parva: Kuntī–Karṇa Saṃvāda (Kuntī’s approach to Karṇa on the Gaṅgā bank)
Vaiśaṃpāyana narrates that, with Kṛṣṇa’s conciliation unsuccessful and the Pāṇḍavas returned from the Kurus, Vidura approaches Kuntī in grief and speaks of the worsening situation: Duryodhana refuses counsel; Yudhiṣṭhira, though settled at Upaplavya, still seeks kin-harmony; Dhṛtarāṣṭra’s age does not restrain him from partiality born of attachment to his son; and divisive influence is attributed to key partisans (including Karṇa, Jayadratha, Duḥśāsana, and Śakuni). Vidura anticipates a destructive course and sleeplessly worries about the resulting loss. Kuntī, distressed, reflects on the futility of wealth and victory purchased by kinsmen’s destruction, and fears formidable elders and teachers aligned with the Kauravas. She identifies Karṇa’s persistent hostility as especially consequential, then recalls the earlier boon granted by Durvāsā and her youthful invocation of Sūrya that led to Karṇa’s birth. Concluding that she must attempt to soften Karṇa toward the Pāṇḍavas, she goes to the Bhāgīrathī. Hearing Karṇa’s Vedic recitation at the riverbank, she stands behind him, waiting until he completes his japa; when he turns, he greets her with proper respect, and the encounter is formally set for the ensuing dialogue.
Chapter Arc: कृष्ण के समक्ष कर्ण अपने भीतर उठते अनिष्ट-संकेतों और स्वप्न-छायाओं का द्वार खोलता है—मानो युद्ध का भविष्य पहले ही आकाश में लिख दिया गया हो। → कर्ण कृष्ण से कहता है कि आप सब जानते हुए भी मुझे मोह में क्यों डालना चाहते हैं; विनाश उपस्थित है, और इस विनाश के निमित्त शकुनि, दुःशासन, दुर्योधन तथा धृतराष्ट्र-पुत्रों की हठधर्मिता है। फिर वह विचित्र अपशकुनों का क्रम गिनाता है—सेनाओं में वाद्यों का न बजना, संध्याओं में शिवा का घोर रुदन, दिशाओं का रक्त-शस्त्र-रंग होना, और देह-प्रकृति तक में विकृति के संकेत। → कर्ण निर्णायक स्वर में भविष्यवाणी-सा निष्कर्ष रखता है: ये लक्षण पाण्डवों की विजय और कौरवों की पराजय बताते हैं; स्वयं कर्ण भी भीतर से दीन-चित्त हो उठता है, फिर भी अपने पक्ष-बंधन को नहीं तोड़ता। → अपशकुनों की सूची और कारण-निर्देश के बाद संवाद एक कठोर सत्य पर टिकता है—पराजय का ज्ञान होते हुए भी कर्ण का संकल्प दुर्योधन के साथ बना रहता है; कृष्ण की नीति-भाषा और कर्ण की प्रतिज्ञा एक-दूसरे को काटती हुई आगे के निर्णयों की भूमि तैयार करती है। → कर्ण स्वर्ण-विभूषित रथ पर चढ़कर लौटता है; उधर कृष्ण सात्यकि सहित शीघ्र प्रस्थान करते हैं और सारथि से बार-बार कहते हैं—“चलो, चलो”—मानो अगले ही क्षण कोई निर्णायक कूटनीतिक मोड़ आने वाला हो।
Verse 1
अपन हत< बक। ] अंक: त्रिचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्रका वर्णन संजय उवाच केशवस्य तु तद् वाक्य कर्ण: श्रुत्वा हितं शुभम् । अब्रवीदभिसम्पूज्य कृष्णं तं मधुसूदनम्,संजय कहते हैं--राजन्! भगवान् केशवका वह हितकर एवं कल्याणकारी वचन सुनकर कर्ण मधुसूदन श्रीकृष्णके प्रति सम्मानका भाव प्रदर्शित करते हुए इस प्रकार बोला --
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! କେଶବଙ୍କ ସେହି ହିତକର ଓ ମଙ୍ଗଳମୟ ବଚନ ଶୁଣି କର୍ଣ୍ଣ ମଧୁସୂଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ପ୍ରତିଉତ୍ତର କଲେ।
Verse 2
जानन् मां कि महाबाहो सम्मोहयितुमिच्छसि । यो<यं पृथिव्या: कार्त्स्न्येन विनाश: समुपस्थित:,“महाबाहो! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझे मोहमें क्यों डालना चाहते हैं? यह जो इस भूतलका पूर्णरूपसे विनाश उपस्थित हुआ है, उसमें मैं, शकुनि, दुःशासन तथा धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन निमित्तमात्र हुए हैं
ହେ ମହାବାହୋ! ସବୁ ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଆପଣ କାହିଁକି ମୋତେ ମୋହରେ ପକାଇବାକୁ ଚାହୁଁଛନ୍ତି? ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଗ୍ରାସ କରୁଥିବା ବିନାଶ ଏବେ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ।
Verse 3
निमित्तं तत्र शकुनिरहं दुःशासनस्तथा । दुर्योधनश्व नृपतिर्धुतराष्ट्रसुतो5 भवत्,“महाबाहो! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझे मोहमें क्यों डालना चाहते हैं? यह जो इस भूतलका पूर्णरूपसे विनाश उपस्थित हुआ है, उसमें मैं, शकुनि, दुःशासन तथा धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन निमित्तमात्र हुए हैं
ସେହି ମହାବିପର୍ଯ୍ୟୟରେ ଶକୁନି, ମୁଁ, ଦୁଃଶାସନ ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ—ଆମେ ସମସ୍ତେ କେବଳ ନିମିତ୍ତମାତ୍ର ହୋଇଛୁ।
Verse 4
असंशयमिदं कृष्ण महद् युद्धमुपस्थितम् । पाण्डवानां कुरूणां च घोरं रुधिरकर्दमम्,“श्रीकृष्ण! इसमें संदेह नहीं कि कौरवों और पाण्डवोंका यह बड़ा भयंकर युद्ध उपस्थित हुआ है, जो रक्तकी कीच मचा देनेवाला है
ହେ କୃଷ୍ଣ! ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ—ପାଣ୍ଡବ ଓ କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏହି ମହାଯୁଦ୍ଧ ଏବେ ଉପସ୍ଥିତ; ଭୟଙ୍କର, ଯାହା ରଣଭୂମିକୁ ରକ୍ତର କାଦୁଆ କରିଦେବ।
Verse 5
राजानो राजपुत्राश्न दुर्योधनवशानुगा: । रणे शस्त्राग्निना दग्धा: प्राप्स्पन्ति यमसादनम्,“दुर्योधनके वशमें रहनेवाले जो राजा और राजकुमार हैं, वे रणभूमिमें अस्त्र-शस्त्रोंकी आगसे जलकर निश्चय ही यमलोकमें जा पहुँचेंगे
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ବଶାନୁଗ ରାଜା ଓ ରାଜପୁତ୍ରମାନେ ରଣଭୂମିରେ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରର ଅଗ୍ନିରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ନିଶ୍ଚୟ ଯମସଦନକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବେ।
Verse 6
स्वप्ना हि बहवो घोरा दृश्यन्ते मधुसूदन । निमित्तानि च घोराणि तथोत्पाता: सुदारुणा:,“मधुसूदन! मुझे बहुत-से भयंकर स्वप्न दिखायी देते हैं। घोर अपशकुन तथा अत्यन्त दारुण उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! ମୋତେ ବାରମ୍ବାର ଅନେକ ଭୟଙ୍କର ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖାଯାଉଛି। ଘୋର ଅପଶକୁନ ଓ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦାରୁଣ ଉତ୍ପାତମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୃଶ୍ୟମାନ ହେଉଛନ୍ତି।
Verse 7
पराजयं धार्तराष्ट्रे विजयं च युधिष्ठिरे । शंसन्त इव वार्ष्णेय विविधा रोमहर्षणा:,वृष्णिनन्दन! वे रोंगटे खड़े कर देनेवाले विविध उत्पात मानो दुर्योधनकी पराजय और युधिष्ठिरकी विजय घोषित करते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ଏହି ବିଭିନ୍ନ ରୋମାଞ୍ଚକର ଉତ୍ପାତମାନେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ପରାଜୟ ଓ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ବିଜୟକୁ ଘୋଷଣା କରୁଥିବା ପରି ଲାଗୁଛି।
Verse 8
प्राजापत्यं हि नक्षत्र ग्रहस्तीक्ष्णो महाद्युति: । शनैश्वर: पीडयति पीडयन् प्राणिनोडधिकम्,“महातेजस्वी एवं तीक्ष्ण ग्रह शनैश्षर प्रजापति-सम्बन्धी रोहिणीनक्षत्रको पीड़ित करते हुए जगतके प्राणियोंको अधिक-से-अधिक पीड़ा दे रहे हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାଦ୍ୟୁତି ଓ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଗ୍ରହ ଶନୈଶ୍ଚର ପ୍ରଜାପତି-ସମ୍ବନ୍ଧୀ ନକ୍ଷତ୍ରକୁ ପୀଡ଼ା ଦେଉଛି; ଏହି ପୀଡ଼ା ଦ୍ୱାରା ସେ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ଅଧିକାଧିକ ଦୁଃଖ ଦେଉଛି।
Verse 9
कृत्वा चाड्भरारको वक्रं ज्येष्ठायां मधुसूदन । अनुराधां प्रार्थयते मैत्रं संगमयज्निव
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଅଙ୍ଗାରକ (ମଙ୍ଗଳ) ବକ୍ରଗତି ଧାରଣ କରି ଜ୍ୟେଷ୍ଠାରେ ଥାଇ ଅନୁରାଧାକୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରୁଛି; ଯେପରି ମୈତ୍ରୀ-ସନ୍ଧି ସାଧିବାକୁ, ଯେପରି ସଙ୍ଗମ-ଯଜ୍ଞ ରଚୁଥାଏ।
Verse 10
“मधुसूदन! मंगल ग्रह ज्येष्ठाके निकटसे वक्रणतिका आश्रय ले अनुराधा नक्षत्रपर आना चाहते हैं। जो राज्यस्थ राजाके मित्रमण्डलका विनाश-सा सूचित कर रहे हैं ।। नूनं महद्धयं कृष्ण कुरूणां समुपस्थितम् । विशेषेण हि वार्ष्णेय चित्रां पीडयते ग्रह:,वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! निश्चय ही कौरवोंपर महान् भय उपस्थित हुआ है। विशेषत: “महापात” नामक ग्रह चित्राको पीड़ा दे रहा है (जो राजाओंके विनाशका सूचक है)
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! ମଙ୍ଗଳ ଗ୍ରହ ଜ୍ୟେଷ୍ଠାର ନିକଟରୁ ବକ୍ରଗତିର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଅନୁରାଧା ନକ୍ଷତ୍ରକୁ ଆସିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ଏହା ରାଜ୍ୟସ୍ଥ ରାଜାଙ୍କ ମିତ୍ରମଣ୍ଡଳର ବିନାଶକୁ ସୂଚାଉଥିବା ପରି। ହେ କୃଷ୍ଣ! କୌରବମାନଙ୍କ ଉପରେ ନିଶ୍ଚୟ ମହାଭୟ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇଛି। ବିଶେଷକରି, ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ, ଗ୍ରହ ପ୍ରଭାବ ଚିତ୍ରାକୁ ପୀଡ଼ା ଦେଉଛି।
Verse 11
सोमस्य लक्ष्म व्यावृत्तं राहुररकमुपैति च । दिवश्लोल्का: पतन्त्येता: सनिर्घाता: सकम्पना:,'चन्द्रमाका कलंक (काला चिह्न) मिट-सा गया है, राहु सूर्यके समीप जा रहा है। आकाशसे ये उल्काएँ गिर रही हैं, वजपातके-से शब्द हो रहे हैं और धरती डोलती-सी जान पड़ती है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଚନ୍ଦ୍ରର କଳଙ୍କଚିହ୍ନ ଯେନ ହଟିଗଲା, ଏବଂ ରାହୁ ସୂର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସୁଛି। ଆକାଶରୁ ଉଲ୍କା ପଡ଼ୁଛି; ବଜ୍ରପାତ ପରି ଘୋର ଶବ୍ଦ ହେଉଛି; ପୃଥିବୀ କମ୍ପୁଥିବା ପରି ଲାଗୁଛି।
Verse 12
निष्टनन्ति च मातड्ा मुज्चन्त्यश्रूणि वाजिन: । पानीयं यवसं चापि नाभिनन्दन्ति माधव,“माधव! गजराज परस्पर टकराते और विकृत शब्द करते हैं। घोड़े नेत्रोंसे आँसू बहा रहे हैं। वे घास और पानी भी प्रसन्नतापूर्वक नहीं ग्रहण करते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ମାଧବ! ଗଜରାଜମାନେ ବିକୃତ ଓ କଠୋର ଶବ୍ଦ କରି ଚିତ୍କାର କରୁଛନ୍ତି ଏବଂ ପରସ୍ପର ଟକ୍କର ଦେଉଛନ୍ତି। ଘୋଡ଼ାମାନେ ଆଖିରୁ ଲୁହ ଝରାଉଛନ୍ତି; ପାଣି ଓ ଘାସ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ଆନନ୍ଦରେ ଗ୍ରହଣ କରୁନାହାନ୍ତି।
Verse 13
प्रादुर्भूतेषु चैतेषु भयमाहुरुपस्थितम् । निमित्तेषु महाबाहो दारुणं प्राणिनाशनम्,“महाबाहो! कहते हैं, इन निमित्तों (उत्पातसूचक लक्षणों)-के प्रकट होनेपर प्राणियोंके विनाश करनेवाले दारुण भयकी उपस्थिति होती है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ମହାବାହୋ! ଏହିପରି ନିମିତ୍ତମାନେ ପ୍ରକଟ ହେଲେ ପ୍ରାଣୀନାଶକ ଦାରୁଣ ଭୟ ଉପସ୍ଥିତ ହୁଏ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 14
अल्पे भुक्ते पुरीषं च प्रभूतमिह दृश्यते । वाजिनां वारणानां च मनुष्याणां च केशव,“केशव! हाथी, घोड़े तथा मनुष्य भोजन तो थोड़ा ही करते है; परंतु उनके पेटसे मल अधिक निकलता देखा जाता है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ କେଶବ! ଏଠାରେ ଦେଖାଯାଉଛି ଯେ ହାତୀ, ଘୋଡ଼ା ଓ ମନୁଷ୍ୟ ଅଳ୍ପ ଭୋଜନ କରୁଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କଠାରୁ ମଳ ବହୁତ ଅଧିକ ପରିମାଣରେ ବାହାରୁଛି।
Verse 15
धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु सर्वेषु मधुसूदन । पराभवस्य तल्लिड्भरमिति प्राहुर्मनीषिण:,“मधुसूदन! दुर्योधनकी समस्त सेनाओंमें ये बातें पायी जाती हैं। मनीषी पुरुष इन्हें पराजयका लक्षण कहते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମସ୍ତ ସେନାମଧ୍ୟରେ ଏହି ଲକ୍ଷଣମାନେ ଦେଖାଯାଉଛି। ମନୀଷୀମାନେ ଏହାକୁ ଆସନ୍ନ ପରାଜୟର ଲକ୍ଷଣ-ସମୂହ ବୋଲି କହନ୍ତି।
Verse 16
प्रहृष्ट वाहनं कृष्ण पाण्डवानां प्रचक्षते | प्रदक्षिणा मृगाश्नैव तत् तेषां जयलक्षणम्,“श्रीकृष्ण! पाण्डवोंके वाहन प्रसन्न बताये जाते हैं और मृग उनके दाहिनेसे जाते देखे जाते हैं; यह लक्षण उनकी विजयका सूचक है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ବାହନଗୁଡ଼ିକ ପ୍ରସନ୍ନ ଓ ଉତ୍ସାହିତ ଦେଖାଯାଉଛି; ଏବଂ ମୃଗମାନେ ତାଙ୍କର ଡାହାଣ ପଟୁ ଯାଉଛନ୍ତି। ଏହା ତାଙ୍କର ବିଜୟର ଲକ୍ଷଣ।
Verse 17
अपस्व्या मृगा: सर्वे धार्तराष्ट्रस्य केशव । वाचश्नचाप्यशरीरिण्यस्तत् पराभवलक्षणम्,“केशव! सभी मृग दुर्योधनके बाँयेंसे निकलते हैं और उसे प्राय: ऐसी वाणी सुनायी देती है, जिसके बोलनेवालेका शरीर नहीं दिखायी देता। यह उसकी पराजयका चिह्न है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ କେଶବ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ବାମ ପଟୁ ସମସ୍ତ ମୃଗ ଯାଉଛନ୍ତି; ଏବଂ ସେ ପୁନଃପୁନଃ ଅଶରୀରୀ ବାଣୀ ଶୁଣୁଛି—ଯାହାର ବକ୍ତା ଦେଖାଯାଏ ନାହିଁ। ଏହା ତାଙ୍କର ପରାଜୟର ଲକ୍ଷଣ।
Verse 18
मयूरा: पुण्यशकुना हंससारसचातका: । जीवंजीवकसडसघाश्षाप्यनुगच्छन्ति पाण्डवान्,“मोर, शुभ शकुन सूचित करनेवाले मुर्गे, हंस, सारस, चातक तथा चकोरोंके समुदाय पाण्डवोंका अनुसरण करते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମୟୂର, ଶୁଭ ଶକୁନ ସୂଚକ ପକ୍ଷୀ, ହଂସ, ସାରସ, ଚାତକ ଏବଂ ଜୀବଂଜୀବକ ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କ ଦଳ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରୁଛି।
Verse 19
गृध्रा: कड़का बका: श्येना यातुधानास्तथा वृका: । मक्षिकाणां च सड्घाता अनुधावन्ति कौरवान्,“इसी प्रकार गीध, कंक, बक, श्येन (बाज), राक्षस, भेड़िये तथा मक्खियोंके समूह कौरवोंके पीछे दौड़ते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେହିପରି ଗୃଧ୍ର, କଙ୍କ, ବକ, ଶ୍ୟେନ (ବାଜ), ଯାତୁଧାନ (ରାକ୍ଷସ), ଭେଡ଼ିଆ ଏବଂ ମକ୍ଷିକାମାନଙ୍କ ଦଳ କୌରବମାନଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଧାଉଛି।
Verse 20
धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु भेरीणां नास्ति नि:ःस्वन: । अनाहता: पाण्डवानां नदन्ति पटहा: किल,“दुर्योधनकी सेनाओंमें बजानेपर भी भेरियोंके शब्द प्रकट नहीं होते हैं और पाण्डवोंके डंके बिना बजाये ही बज उठते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ସେନାରେ ଭେରୀ ବାଜାଇଲେ ମଧ୍ୟ ନାଦ ଉଠୁନାହିଁ; କିନ୍ତୁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ପଟହ ଅନାହତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଗର୍ଜନ କରୁଛି।
Verse 21
उदपानाश्ष नर्दन्ति यथा गोवृषभास्तथा । धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु तत् पराभवलक्षणम्,“दुर्योधनकी सेनाओंमें कुएँ आदि जलाशय गाय-बैलोंके समान शब्द करते हैं। यह उसकी पराजयका लक्षण है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସେନାମଧ୍ୟରେ କୂଆଁ ଓ ଅନ୍ୟ ଜଳାଶୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଗୋ-ବୃଷଭ ପରି ଗର୍ଜନ କରୁଛନ୍ତି; ଏହା ତାଙ୍କ ପରାଜୟର ଲକ୍ଷଣ।
Verse 22
मांसशोणितवर्ष च वृष्टं देवेन माधव । तथा गन्धर्वनगरं भानुमत् समुपस्थितम्,“माधव! बादल आकाशसे मांस और रक्तकी वर्षा करते हैं। अन्तरिक्षमें चहारदिवारी, खाईं, वप्र और सुन्दर फाटकोंसहित सूर्ययुक्त गन्धर्वनगर प्रकट दिखायी देता है। वहाँ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर एक काला परिघ प्रकट होता है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ମାଧବ! ଦେବତା ମାଂସ ଓ ରକ୍ତର ବର୍ଷା କରାଇଛନ୍ତି; ଏବଂ ଆକାଶରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ଗନ୍ଧର୍ବନଗର ମଧ୍ୟ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛି।
Verse 23
सप्राकारं सपरिखं सवप्रं चारुतोरणम् । कृष्णश्न परिघस्तत्र भानुमावृत्य तिकछति,“माधव! बादल आकाशसे मांस और रक्तकी वर्षा करते हैं। अन्तरिक्षमें चहारदिवारी, खाईं, वप्र और सुन्दर फाटकोंसहित सूर्ययुक्त गन्धर्वनगर प्रकट दिखायी देता है। वहाँ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर एक काला परिघ प्रकट होता है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଆକାଶରେ ପ୍ରାକାର, ପରିଖା, ବପ୍ର ଓ ସୁନ୍ଦର ତୋରଣସହିତ ଏକ ନଗର ଦେଖାଯାଉଛି; ସେଠାରେ ସୂର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ଘେରି କଳା ପରିଘ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇ ତାଙ୍କୁ ଆବୃତ କରୁଛି।
Verse 24
उदयास्तमने संध्ये वेदयन्ती महद्धयम् । शिवा च वाशते घोरं तत् पराभवलक्षणम्,'सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों संध्याओंके समय एक गीदड़ी महान् भयकी सूचना देती हुई भयंकर आवाजमें रोती है। यह भी कौरवोंकी पराजयका लक्षण है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସୂର୍ଯ୍ୟୋଦୟ ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟାସ୍ତ ସନ୍ଧ୍ୟାବେଳେ ଏକ ଶିଆଳ ମହାଭୟ ସୂଚାଇ ଭୟଙ୍କର ସ୍ୱରରେ ଚିତ୍କାର କରୁଛି; ଏହା ମଧ୍ୟ ପରାଜୟର ଲକ୍ଷଣ।
Verse 25
एकपक्षाक्षिचरणा: पक्षिणो मधुसूदन । उत्सृजन्ति महद् घोरं तत् पराभवलक्षणम्,“मधुसूदन! एक पाँख, एक आँख और एक पैरवाले पक्षी अत्यन्त भयंकर शब्द करते हैं। यह भी कौरवपक्षकी पराजयका ही लक्षण है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଗୋଟିଏ ପାଖ, ଗୋଟିଏ ଆଖି ଓ ଗୋଟିଏ ପାଦ ଥିବା ବିକୃତ ପକ୍ଷୀମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ନାଦ କରୁଛନ୍ତି; ଏହା ମଧ୍ୟ ପରାଜୟର ଲକ୍ଷଣ।
Verse 26
कृष्णग्रीवाश्व॒ शकुना रक्तपादा भयानका: । संध्यामभिमुखा यान्ति तत् पराभवलक्षणम्,'संध्याकालमें काली ग्रीवा और लाल पैरवाले भयानक पक्षी सामने आ जाते हैं, वह भी पराजयका ही चिह्न है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— କଳା ଗ୍ରୀବା ଓ ଲାଲ ପାଦ ଥିବା ଭୟଙ୍କର ପକ୍ଷୀମାନେ ସନ୍ଧ୍ୟାଦିଗକୁ ସିଧା ଯାଉଛନ୍ତି; ଏହା ପରାଜୟର ଲକ୍ଷଣ।
Verse 27
ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि गुरूंश्व मधुसूदन । भृत्यान् भक्तिमतश्चापि तत् पराभवलक्षणम्,“मधुसूदन! दुर्योधन पहले ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है; फिर गुरुजनोंसे तथा अपने प्रति भक्ति रखनेवाले भृत्योंसे भी द्रोह करने लगता है, यह उसकी पराजयका ही लक्षण है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ପ୍ରଥମେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଦ୍ୱେଷ କରେ; ପରେ ଗୁରୁଜନଙ୍କୁ ଅବମାନ କରେ; ନିଜ ପ୍ରତି ଭକ୍ତିଶୀଳ ଭୃତ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦ୍ରୋହ କରେ—ଏହା ପରାଜୟର ସ୍ପଷ୍ଟ ଲକ୍ଷଣ।
Verse 28
पूर्वा दिगू लोहिताकारा शस्त्रवर्णा च दक्षिणा । आमपात्रप्रतीकाशा पश्चिमा मधुसूदन । उत्तरा शड्खवर्णाभा दिशां वर्णा उदाह्वता:,“श्रीकृष्ण! पूर्व दिशा लाल, दक्षिण दिशा शस्त्रोंके समान रंगवाली (काली), पश्चिम दिशा मिट्टीके कच्चे बर्तनोंकी भाँति मटमैली तथा उत्तर दिशा शंखके समान श्वेत दिखायी देती है। इस प्रकार ये दिशाओंके पृथक्-पृथक् वर्ण बताये गये हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ହେ ମଧୁସୂଦନ! ପୂର୍ବ ଦିଗ ରକ୍ତିମ ଦେଖାଯାଏ; ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗ ଶସ୍ତ୍ରସଦୃଶ କଠୋର ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ; ପଶ୍ଚିମ ଦିଗ କାଚା ମାଟିପାତ୍ର ପରି ମଟମେଳା; ଉତ୍ତର ଦିଗ ଶଙ୍ଖ ପରି ଶ୍ୱେତ ଦୀପ୍ତ—ଏଭଳି ଦିଗମାନଙ୍କର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ବର୍ଣ୍ଣ ଉଦାହୃତ ହେଲା।
Verse 29
प्रदीप्ताश्न॒ दिश: सर्वा धार्तराष्ट्रस्य माधव । महद् भयं वेदयन्ति तस्मिन्नुत्पातदर्शने,“माधव! दुर्योधनको इन उत्पातोंका दर्शन तो होता ही है। उसके लिये सारी दिशाएँ भी प्रज्वलित-सी होकर महान् भयकी सूचना दे रही हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ହେ ମାଧବ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ପାଇଁ ସମସ୍ତ ଦିଗ ଯେନ ଜ୍ୱଳିତ; ସେହି ଉତ୍ପାତଦର୍ଶନରେ ସେମାନେ ମହାଭୟର ସୂଚନା ଦେଉଛନ୍ତି।
Verse 30
सहस्रपादं प्रासादं स्वप्रान्ते सम युधिष्ठिर: । अधिरोहन् मया दृष्ट: सह भ्रातृभिरच्युत,“अच्युत! मैंने स्वप्रके अन्तिम भागमें युधिष्ठिरकों एक हजार खंभोंवाले महलपर भाइयोंसहित चढ़ते देखा है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ହେ ଅଚ୍ୟୁତ! ସ୍ୱପ୍ନର ଶେଷ ଭାଗରେ ମୁଁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ, ନିଜ ପ୍ରାନ୍ତର ଅନ୍ତେ ଅବସ୍ଥିତ ସହସ୍ର-ସ୍ତମ୍ଭ ପ୍ରାସାଦରେ ଆରୋହଣ କରୁଥିବା ଦେଖିଛି।
Verse 31
श्वेतोष्णीषाश्व दृश्यन्ते सर्वे वै शुक्लवासस: । आसनानि च शुभ्राणि सर्वेषामुपलक्षये,“उन सबके सिरपर सफेद पगड़ी और अंगोंमें श्वेत वस्त्र शोभित दिखायी दिये हैं। मैंने उन सबके आसनोंको भी श्वेत वर्णका ही देखा है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଶ୍ୱେତ ପାଗଡ଼ି ଓ ଶ୍ୱେତ ବସ୍ତ୍ର ପରିଧାନ କରି ଦେଖାଯାଉଛନ୍ତି। ମୁଁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରୁଛି, ସମସ୍ତଙ୍କ ଆସନ ମଧ୍ୟ ଶୁଭ୍ର ଶ୍ୱେତ।
Verse 32
तव चापि मया कृष्ण स्वप्रान्ते रुधिराविला । अन्त्रेण पृथिवी दृष्टा परिक्षिप्ता जनार्दन,“'जनार्दन! श्रीकृष्ण! मैंने स्वप्रके अन्तमें आपकी इस पृथ्वीको भी रक्तसे मलिन और आँतसे लिपटी हुई देखा है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ, ହେ ଜନାର୍ଦନ! ମୋ ସ୍ୱପ୍ନର ଶେଷରେ ମୁଁ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ ମଧ୍ୟ ରକ୍ତରେ ମଲିନ ଏବଂ ଆନ୍ତ୍ରରେ ଜଡ଼ା ଦେଖିଲି।
Verse 33
अस्थिसंचयमारूढश्चामितौजा युधिष्ठिर: । सुवर्णपात्र्यां संहृष्टो भुक्ततवान् घृतपायसम्,“मैंने स्वप्रमें देखा, अमिततेजस्वी युधिष्ठिर सफेद हड्डियोंके ढेरपर बैठे हुए हैं और सोनेके पात्रमें रखी हुई घृतमिश्रित खीरको बड़ी प्रसन्नताके साथ खा रहे हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସ୍ୱପ୍ନରେ ମୁଁ ଦେଖିଲି, ଅମିତତେଜୀ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅସ୍ଥିର ଢେର ଉପରେ ବସି, ସୁବର୍ଣ୍ଣ ପାତ୍ରରେ ଥିବା ଘୃତମିଶ୍ରିତ ପାୟସକୁ ହର୍ଷରେ ଭୋଜନ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 34
युधिष्ठिरो मया दृष्टो ग्रसमानो वसुन्धराम् | त्वया दत्तामिमां व्यक्त भोक्ष्यते स वसुन्धराम्,“मैंने यह भी देखा कि युधिष्ठिर इस पृथ्वीको अपना ग्रास बनाये जा रहे हैं; अतः यह निश्चित है कि आपकी दी हुई वसुन्धराका वे ही उपभोग करेंगे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମୁଁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଯେନେ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ ଗ୍ରାସ କରୁଛନ୍ତି ଏମିତି ଦେଖିଲି; ତେଣୁ ଏହା ସ୍ପଷ୍ଟ ଯେ, ତୁମେ ଦେଇଥିବା ଏହି ବସୁନ୍ଧରାକୁ ସେଇ ଭୋଗ କରି ଶାସନ କରିବେ।
Verse 35
उच्च॑ पर्वतमारूढो भीमकर्मा वृकोदर: । गदापाणिर्नरिव्याप्रो ग्रसन्निव महीमिमाम्,“भयंकर कर्म करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेन भी हाथमें गदा लिये ऊँचे पर्वतपर आरूढ़ हो इस पृथ्वीको ग्रसते हुए-से स्वप्नमें दिखायी दिये हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସ୍ୱପ୍ନରେ ମୁଁ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଦେଖିଲି—ଭୟଙ୍କର କର୍ମକାରୀ ବୃକୋଦର, ହାତରେ ଗଦା ଧରି, ଉଚ୍ଚ ପର୍ବତ ଉପରେ ଆରୋହଣ କରି, ଯେନେ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ ଗ୍ରାସ କରିବାକୁ ଯାଉଛନ୍ତି।
Verse 36
क्षपयिष्यति न: सर्वान् स सुव्यक्त महारणे । विदितं मे हृषीकेश यतो धर्मस्ततो जय:,अतः यह स्पष्टरूपसे जान पड़ता है कि वे इस महायुद्धमें हम सब लोगोंका संहार कर डालेंगे। हृषीकेश! मुझे यह भी विदित है कि जहाँ धर्म है उसी पक्षकी विजय होती है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେଇ ମହାଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସ୍ପଷ୍ଟଭାବେ ସଂହାର କରିଦେବ। ହେ ହୃଷୀକେଶ! ମୋତେ ଏହା ମଧ୍ୟ ଜଣା—ଯେଉଁଠି ଧର୍ମ, ସେଉଁଠି ଜୟ।
Verse 37
पाण्डुरं गजमारूढो गाण्डीवी स धनंजय: । त्वया सार्थ हृषीकेश श्रिया परमया ज्वलन्,“श्रीकृष्ण! इसी प्रकार गाण्डीवधारी धनंजय भी आपके साथ श्वेत गजराजपर आरूढ़ हो अपनी परम कान्तिसे प्रकाशित होते हुए मुझे स्वप्रमें दृष्टिगोचर हुए हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ହୃଷୀକେଶ! ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଶ୍ୱେତ ଗଜରାଜ ଉପରେ ଆରୂଢ଼ ହୋଇ, ତୁମ ସହିତ ପରମ ଶ୍ରୀରେ ଜ୍ୱଳମାନ ଭାବେ ମୋତେ ଦେଖାଦେଲେ।
Verse 38
यूयं सर्वे वधिष्यध्वं तत्र मे नास्ति संशय: । पार्थिवान् समरे कृष्ण दुर्योधनपुरोगमान्,“अत: श्रीकृष्ण! आप सब लोग इस युद्धमें दुर्योधन आदि समस्त राजाओंका वध कर डालेंगे, इसमें मुझे संशय नहीं है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ତୁମେ ସମସ୍ତେ ନିଶ୍ଚୟ ତାଙ୍କୁ ବଧ କରିବ; ଏଥିରେ ମୋର କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ସମରରେ ଦୁର୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ଆସୁଥିବା ରାଜାମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ସଂହାର କରିବ।
Verse 39
नकुलः सहदेवश्व सात्यकिश्न महारथ: । शुक्लकेयूरकण्ठत्रा: शुक्लमाल्याम्बरावृता:,“नकुल, सहदेव तथा महारथी सात्यकि--ये तीन नरश्रेष्ठ मुझे स्वप्नमें श्वेत भुजबन्द, श्वेत कण्ठहार, श्वेत वस्त्र और श्वेत मालाओंसे विभूषित हो उत्तम नरयान (पालकी)-पर चढ़े दिखायी दिये हैं। ये तीनों ही श्वेत छत्र और श्वेत वस्त्रोंसे सुशोभित थे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ନକୁଳ, ସହଦେବ ଓ ମହାରଥୀ ସାତ୍ୟକି—ଏ ତିନିଜଣ—ଶ୍ୱେତ ଭୁଜବନ୍ଧ ଓ ଶ୍ୱେତ କଣ୍ଠାଭରଣ ଧାରଣ କରି, ଶ୍ୱେତ ମାଳା ଓ ଶ୍ୱେତ ବସ୍ତ୍ରରେ ଆବୃତ—ମୋତେ (ସ୍ୱପ୍ନରେ) ଦେଖାଦେଲେ।
Verse 40
अधिरूढा नरव्याप्रा नरवाहनमुत्तमम् | त्रय एते मया दृष्टा: पाण्डुरच्छत्रवासस:,“नकुल, सहदेव तथा महारथी सात्यकि--ये तीन नरश्रेष्ठ मुझे स्वप्नमें श्वेत भुजबन्द, श्वेत कण्ठहार, श्वेत वस्त्र और श्वेत मालाओंसे विभूषित हो उत्तम नरयान (पालकी)-पर चढ़े दिखायी दिये हैं। ये तीनों ही श्वेत छत्र और श्वेत वस्त्रोंसे सुशोभित थे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏ ତିନିଜଣ କ୍ରିୟାଶୀଳ ଧୀର ପୁରୁଷ ଉତ୍ତମ ନରବାହନ ଉପରେ ଅଧିରୂଢ଼ ଥିଲେ; ଶ୍ୱେତ ଛତ୍ରର ଛାୟାରେ, ପାଣ୍ଡୁର (ଧବଳ) ବସ୍ତ୍ରଧାରୀ ଭାବେ—ମୋତେ (ସ୍ୱପ୍ନରେ) ଦେଖାଦେଲେ।
Verse 41
श्वेतोष्णीषाश्न दृश्यन्ते त्रय एते जनार्दन | धार्तरष्टेषु सैन्येषु तान् विजानीहि केशव,“'जनार्दन! दुर्योधनकी सेनाओंमेंसे मुझे तीन ही व्यक्ति स्वप्नमें श्वेत पगड़ीसे सुशोभित दिखायी दिये हैं। केशव! आप उनके नाम मुझसे जान लें। वे हैं--अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा। माधव! अन्य सब नरेश मुझे लाल पगड़ी धारण किये दिखायी दिये हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଜନାର୍ଦନ! ସ୍ୱପ୍ନରେ ମୁଁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସେନାମଧ୍ୟରେ କେବଳ ତିନିଜଣଙ୍କୁ ଶ୍ୱେତ ପାଗଡ଼ିରେ ଶୋଭିତ ଦେଖିଲି। କେଶବ! ଦୟାକରି ସେମାନଙ୍କ ନାମ ମୋତେ କହନ୍ତୁ।
Verse 42
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वत: । रक्तोष्णीषाश्न दृश्यन्ते सर्वे माधव पार्थिवा:,“'जनार्दन! दुर्योधनकी सेनाओंमेंसे मुझे तीन ही व्यक्ति स्वप्नमें श्वेत पगड़ीसे सुशोभित दिखायी दिये हैं। केशव! आप उनके नाम मुझसे जान लें। वे हैं--अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा। माधव! अन्य सब नरेश मुझे लाल पगड़ी धारण किये दिखायी दिये हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ ଓ ସାତ୍ୱତ କୃତବର୍ମା—ଏ ତିନିଜଣ ମୋତେ ଶ୍ୱେତ ପାଗଡ଼ିଧାରୀ ଦେଖାଯାନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ମାଧବ! ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ରାଜା ମୋତେ ଲାଲ ପାଗଡ଼ି ପିନ୍ଧିଥିବା ପରି ଦେଖାଯାନ୍ତି।
Verse 43
उष्ट्प्रयुक्तमारूढौ भीष्मद्रोणी महारथौ | मया सार्ध महाबाहो धार्तराष्ट्रेण वा विभो,“महाबाहु जनार्दन! मैंने स्वप्नमें देखा, भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों महारथी मेरे तथा दुर्योधनके साथ ऊँट जुते हुए रथपर आरूढ़ हो दक्षिण दिशाकी ओर जा रहे थे। विभो! इसका फल यह होगा कि हमलोग थोड़े ही दिनोंमें यमलोक पहुँच जायँगे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ମହାବାହୁ ଜନାର୍ଦନ! ସ୍ୱପ୍ନରେ ମୁଁ ଦେଖିଲି, ମହାରଥୀ ଭୀଷ୍ମ ଓ ଦ୍ରୋଣ—ଉଷ୍ଟ୍ର ଯୁକ୍ତ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି—ମୋ ସହିତ କିମ୍ବା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ସହିତ ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗକୁ ଯାଉଛନ୍ତି।
Verse 44
अगस्त्यशास्तां च दिशं प्रयाता: सम जनार्दन । अचिरेणैव कालेन प्राप्स्यामो यमसादनम्,“महाबाहु जनार्दन! मैंने स्वप्नमें देखा, भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों महारथी मेरे तथा दुर्योधनके साथ ऊँट जुते हुए रथपर आरूढ़ हो दक्षिण दिशाकी ओर जा रहे थे। विभो! इसका फल यह होगा कि हमलोग थोड़े ही दिनोंमें यमलोक पहुँच जायँगे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଜନାର୍ଦନ! ଆମେ ଅଗସ୍ତ୍ୟ ଶାସିତ ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗକୁ ଯାଉଛୁ। ଅତି ଶୀଘ୍ର ଆମେ ଯମସଦନ (ଯମଲୋକ) ପ୍ରାପ୍ତ କରିବୁ।
Verse 45
अहं चान्ये च राजानो यच्च तत् क्षत्रमण्डलम् | गाण्डीवान्निं प्रवेक्ष्याम इति मे नास्ति संशय:,“'मैं' अन्यान्य नरेश तथा वह सारा क्षत्रियसममाज सब-के-सब गाण्डीवकी अम्निमें प्रवेश कर जायँगे, इसमें संशय नहीं है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ମୁଁ ଓ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ରାଜା—ସେ ସମଗ୍ର କ୍ଷତ୍ରମଣ୍ଡଳ—ଗାଣ୍ଡୀବର ଅଗ୍ନିରେ ପ୍ରବେଶ କରିବ; ଏଥିରେ ମୋର କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 46
श्रीकृष्ण उवाच उपस्थितविनाशेयं नूनमद्य वसुन्धरा । यथा हि मे वच: कर्ण नोपैति हृदयं तव,श्रीकृष्ण बोले--कर्ण! निश्चय ही अब इस पृथ्वीका विनाशकाल उपस्थित हो गया है; इसीलिये मेरी बात तुम्हारे हृदयतक नहीं पहुँचती है
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—କର୍ଣ୍ଣ! ନିଶ୍ଚୟ ଆଜି ଏହି ପୃଥିବୀରେ ବିନାଶକାଳ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇଛି; ସେହିପାଇଁ ତୋ ମଙ୍ଗଳ ପାଇଁ କହିଥିବା ମୋ କଥା ମଧ୍ୟ ତୋ ହୃଦୟରେ ପ୍ରବେଶ କରୁନାହିଁ।
Verse 47
सर्वेषां तात भूतानां विनाशे प्रत्युपस्थिते । अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति,तात! जब समस्त प्राणियोंका विनाश निकट आ जाता है, तब अन्याय भी न्यायके समान प्रतीत होकर हृदयसे निकल नहीं पाता है
ତାତ! ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ବିନାଶ ଯେତେବେଳେ ନିକଟ ଆସେ, ସେତେବେଳେ ଅନ୍ୟାୟ ମଧ୍ୟ ନ୍ୟାୟ ପରି ଦିଶି ହୃଦୟରୁ ସରେନାହିଁ।
Verse 48
कर्ण उवाच अपि त्वां कृष्ण पश्याम जीवन्तो5स्मान्महारणात् | समुत्तीर्णा महाबाहो वीरक्षत्रविनाशनात्,कर्ण बोला--महाबाह श्रीकृष्ण! वीर क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले इस महायुद्धसे पार होकर यदि हम जीवित बच गये तो पुनः: आपका दर्शन करेंगे
କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ବୀର କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ବିନାଶ କରୁଥିବା ଏହି ମହାଯୁଦ୍ଧକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ଯଦି ଆମେ ଜୀବିତ ରହିଯାଉ, ତେବେ ପୁନଃ ଆପଣଙ୍କ ଦର୍ଶନ କରିବୁ।
Verse 49
अथवा सड्म: कृष्ण स्वर्गे नो भविता ध्रुवम् तत्रेदानीं समेष्याम: पुनः सार्थ त्वयानघ,अथवा श्रीकृष्ण! अब हमलोग स्वर्गमें ही मिलेंगे, यह निश्चित है। अनघ! वहाँ आजकी ही भाँति पुन: आपसे हमारी भेंट होगी
ନଚେତ୍, ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଆମର ସଙ୍ଗମସ୍ଥଳ ନିଶ୍ଚୟ ସ୍ୱର୍ଗରେ ହେବ। ଅନଘ! ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ ଆଜି ପରି ପୁନଃ ଆପଣଙ୍କ ସହ ଆମର ଭେଟ ହେବ।
Verse 50
संजय उवाच इत्युक्त्वा माधवं कर्ण: परिष्वज्य च पीडितम् । विसर्जितः केशवेन रथोपस्थादवातरत्,संजय कहते हैं--ऐसा कहकर कर्ण भगवान् श्रीकृष्णका प्रगाढ़ आलिंगन करके उनसे विदा ले रथके पिछले भागसे उतर गया
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏପରି କହି ଅନ୍ତର୍ବେଦନାରେ ପୀଡିତ କର୍ଣ୍ଣ ମାଧବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲା। ପରେ କେଶବଙ୍କ ନିକଟରୁ ବିଦାୟ ପାଇ ରଥର ପଛ ଭାଗରୁ ଅବତରିଲା।
Verse 51
ततः स्वरथमास्थाय जाम्बूनदविभूषितम् । सहास्माभिननिववृते राधेयो दीनमानस:,तदनन्तर अपने सुवर्णभूषित रथपर आरूढ़ हो राधानन्दन कर्ण दीनचित्त होकर हमलोगोंके साथ लौट आया
ତାପରେ ଜାମ୍ବୂନଦ-ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ବିଭୂଷିତ ନିଜ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ରାଧେୟ କର୍ଣ୍ଣ ଦୀନମନେ ଆମ ସହିତ ପୁନଃ ଫେରିଆସିଲେ।
Verse 52
ततः शीघ्रतरं प्रायात् केशव: सहसात्यकि: । पुनरुच्चारयन् वाणीं याहि याहीति सारथिम्,तदनन्तर सात्यकिसहित श्रीकृष्ण सारथिसे बार-बार “चलो-चलो' ऐसा कहते हुए अत्यन्त तीव्र गतिसे उपप्लव्य नगरकी ओर चल दिये
ତାପରେ ସାତ୍ୟକି ସହିତ କେଶବ ଆହୁରି ଶୀଘ୍ର ଗତିରେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ସେ ପୁନଃପୁନଃ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ସାରଥିକୁ—“ଯାହି, ଯାହି!”—ବୋଲି କହି, ଏଭଳି ଉପପ୍ଲବ୍ୟ ନଗର ଦିଗକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବେଗରେ ଚାଲିଗଲେ।
Verse 143
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कर्णोपनिवादे कृष्णकर्णसंवादे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कर्णके द्वारा अपने अभिप्राय निवेदनके प्रसंगर्में भगवद््वाक्यविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ, କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ଅଭିପ୍ରାୟ-ନିବେଦନ ପ୍ରସଙ୍ଗରେ, କୃଷ୍ଣ-କର୍ଣ୍ଣ ସଂବାଦର ଏକଶେ ତେତାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Kuntī confronts whether any political gain can justify outcomes that entail broad kin-destruction, and whether personal responsibility and maternal disclosure can be used to avert collective harm when public diplomacy has failed.
The chapter emphasizes the ethical necessity of heeding counsel, restraining pride-driven decision-making, and prioritizing social cohesion; it also frames ritual discipline and respectful dialogue as prerequisites for serious moral negotiation.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as causal and ethical positioning—showing how counsel, memory, and identity shape later decisions within the epic’s broader dharma inquiry.