Adhyaya 141
Udyoga ParvaAdhyaya 14122 Versesयुद्ध आरम्भ-पूर्व; पर परिणाम की दिशा कृष्ण द्वारा ‘पाण्डव-विजय’ के रूप में निश्चित घोषित।

Adhyaya 141

उद्योगपर्व — अध्याय १४१: कर्ण–कृष्णसंवादः, उत्पात-स्वप्न-लक्षणानि (Karna–Krishna Dialogue: Omens and Dream-Signs)

Upa-parva: Karna–Kṛṣṇa Saṃvāda (Dialogue of Karṇa and Kṛṣṇa) — Omens and War-Portents Unit

Saṃjaya reports Karṇa’s response after hearing Kṛṣṇa’s beneficial counsel. Karṇa respectfully addresses Kṛṣṇa yet questions whether Kṛṣṇa seeks to unsettle him (1). He frames the impending destruction as already present, naming Śakuni, himself, Duḥśāsana, and Duryodhana as causal instruments within the Kaurava polity (2), and states that a massive, blood-mired conflict between Pāṇḍavas and Kurus is certain (3–4). Karṇa then catalogs ominous indicators: terrifying dreams, harsh portents, and celestial disturbances (5–10), alongside abnormal animal behavior and battlefield-signs interpreted as forecasting Dhārtarāṣṭra defeat and Yudhiṣṭhira’s victory (11–20). He adds extraordinary phenomena (e.g., violent atmospheric events and fearful apparitions) and moral-psychological markers of decline (e.g., hostility toward brāhmaṇas, teachers, and loyal servants) as additional defeat-signs (21–26). Karṇa recounts dream-visions favoring the Pāṇḍavas—Yudhiṣṭhira’s ascent and prosperity, Bhīma’s dominance, Arjuna’s radiance with Kṛṣṇa, and the white-clad allies—contrasted with red-omened figures on the Kaurava side and a trajectory toward the ‘southern’ realm of death (27–42). Kṛṣṇa concludes that ruin is imminent because Karṇa’s heart cannot receive counsel when destruction approaches and unjust policy appears as policy (43–44). Karṇa responds with either survival or a certain reunion in heaven, embraces Kṛṣṇa, and departs; Kṛṣṇa leaves swiftly with Sātyaki (45–49).

Chapter Arc: कर्ण के कठोर वचनों के उत्तर में श्रीकृष्ण स्वयं उसके सामने पाण्डव-पक्ष की ‘निश्चित विजय’ का उद्घोष करते हैं—यह केवल भविष्यवाणी नहीं, धर्म-बल का निर्णय है। → कृष्ण कर्ण को समझाते हैं कि राज्य-लाभ का जो अवसर और जो ‘पृथ्वी’ (धर्मसम्मत अधिकार) उन्हें दिया जा रहा है, उसे वह स्वीकार नहीं कर रहा; फिर वे कर्ण के सामने युद्ध का सजीव चित्र रखते हैं—भीष्म, द्रोण, कृप, दुर्योधन, जयद्रथ आदि को रणभूमि में देखकर उसके भीतर उठने वाले भय और विवेक-क्षोभ का संकेत करते हैं। → कृष्ण का निर्णायक वाक्य: ‘पाण्डवों की विजय ध्रुव है; इसमें संशय नहीं’—और पाण्डव-ध्वज पर उग्र वानरराज (हनुमान) का ‘जयध्वज’ बनकर उठना, विजय-चिह्न की तरह कर्ण के सामने खड़ा हो जाता है। → कृष्ण युद्ध के अनिवार्य परिणाम को नैतिक भाषा में बाँधते हैं: दुर्योधन-वश में रहने वाले राजा-राजकुमार शस्त्र-मृत्यु पाकर ‘उत्तम गति’ को प्राप्त होंगे; यह अध्याय कर्ण के निर्णय को तोड़ता नहीं, पर उसके परिणाम को अटल कर देता है। → कर्ण क्या इस चेतावनी के बाद भी दुर्योधन का साथ छोड़ेगा, या उसी मार्ग पर चलते हुए विनाश को चुन लेगा?

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्रात [छ। आर: द्विचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: भगवान्‌ श्रीकृष्णका कर्णसे पाण्डवपक्षकी निश्चित विजयका प्रतिपादन संजय उवाच कर्णस्य वचन श्रुत्वा केशव: परवीरहा । उवाच प्रहसन्‌ वाक्‍्यं स्मितपूर्वमिदं यथा,संजय कहते हैं--राजन्‌! विपक्षी वीरोंका वध करनेवाले भगवान्‌ केशव कर्णकी उपर्युक्त बात सुनकर ठठाकर हँस पड़े और मुसकराते हुए इस प्रकार बोले

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ପରବୀରହା କେଶବ ଠହାକାର କରି ହସିଲେ, ତାପରେ ସ୍ମିତପୂର୍ବକ ଏହିପରି କହିଲେ।

Verse 2

श्रीभगवानुवाच अपि त्वां न लभेत्‌ कर्ण राज्यलम्भोपपादनम्‌ | मया दत्तां हि पृथिवीं न प्रशासितुमिच्छसि,श्रीभगवान्‌ बोले--कर्ण! मैं जो राज्यकी प्राप्तिका उपाय बता रहा हूँ, जान पड़ता है वह तुम्हें ग्राह्म नहीं प्रतीत होता है। तुम मेरी दी हुई पृथ्वीका शासन नहीं करना चाहते हो

ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—ହେ କର୍ଣ୍ଣ! ରାଜ୍ୟଲାଭ ପାଇଁ ମୁଁ ଯେ ଉପାୟ କହୁଛି, ତାହା କି ତୁମେ ଗ୍ରହଣ କରୁନାହ? ମୁଁ ଯେ ପୃଥିବୀ ତୁମ ହାତରେ ଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ତାହାର ଶାସନ କରିବାକୁ ତୁମେ ଇଚ୍ଛା କରୁନାହ।

Verse 3

ध्रुवो जय: पाण्डवानामितीदं न संशय: कश्नन विद्यतेडत्र । जयध्वजो दृश्यते पाण्डवस्य समुच्छितो वानरराज उग्र:,पाण्डवोंकी विजय अवश्यम्भावी है। इस विषयमें कोई भी संशय नहीं है। पाण्डुनन्दन अर्जुनका वानरराज हनुमानसे उपलक्षित वह भयंकर विजयध्वज बहुत ऊँचा दिखायी देता है

ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ଜୟ ଧ୍ରୁବ—ଏଥିରେ କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଅର୍ଜୁନଙ୍କର ସେଇ ଉଗ୍ର ଜୟଧ୍ୱଜ, ଯାହାର ଶିରୋପରି ବାନରରାଜ ହନୁମାନ ବିରାଜିତ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉଚ୍ଚ ଦିଶେ।

Verse 4

दिव्या माया विहिता भौमनेन समुच्छिता इन्द्रकेतुप्रकाशा । दिव्यानि भूतानि जयावहानि दृश्यन्ति चैवात्र भयानकानि,विश्वकर्माने उस ध्वजमें दिव्य मायाकी रचना की है। वह ऊँची ध्वजा इन्द्रध्वजके समान प्रकाशित होती है। उसके ऊपर विजयकी प्राप्ति करानेवाले दिव्य एवं भयंकर प्राणी दृष्टिगोचर होते हैं

ଭୌମନ (ବିଶ୍ୱକର୍ମା) ସେଇ ଧ୍ୱଜରେ ଦିବ୍ୟ ମାୟାର ରଚନା କରିଛନ୍ତି; ସେ ଉଚ୍ଚ ଧ୍ୱଜ ଇନ୍ଦ୍ରଧ୍ୱଜ ସମ ପ୍ରକାଶିତ ହୁଏ। ତାହାରେ ଜୟ ଆଣିଦେବା ଦିବ୍ୟ ସତ୍ତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଦିଶନ୍ତି, ଏବଂ ଭୟଙ୍କର ରୂପମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୃଶ୍ୟମାନ।

Verse 5

न सज्जते शैलवनस्पति भ्य ऊर्ध्व॑ तिर्यग्योजनमात्ररूप: । श्रीमान्‌ ध्वज: कर्ण धनंजयस्य समुच्छित: पावकतुल्यरूप:,कर्ण! धनंजयका वह अग्निके समान तेजस्वी तथा कान्तिमान्‌ ऊँचा ध्वज एक योजन लम्बा है। वह ऊपर अथवा अगल-बगलनमें पर्वतों तथा वृक्षोंसे कहीं अटकता नहीं है

କର୍ଣ୍ଣ! ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କର ସେଇ ଶ୍ରୀମାନ୍, ଅଗ୍ନିସଦୃଶ ତେଜସ୍ବୀ ଧ୍ୱଜ ଏକ ଯୋଜନ ପରିମାଣ ଲମ୍ବା ହୋଇ ଉଚ୍ଚରେ ଉଠିଛି। ଉପରେ କିମ୍ବା ପାଶେ—ପର୍ବତ ଓ ମହାବୃକ୍ଷମାନଙ୍କୁ କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ ଅଟକେ ନାହିଁ।

Verse 6

यदा द्रक्ष्यसि संग्रामे श्वेताश्व॑ं कृष्णसारथिम्‌ | ऐन्द्रमस्त्रं विकुर्वाणमुभे चाप्यग्निमारुते,कर्ण! जब युद्धमें मुझ श्रीकृष्णको सारथि बनाकर आये हुए श्वेतवाहन अर्जुनको तुम ऐन्द्र, आग्नेय तथा वायव्य अस्त्र प्रकट करते देखोगे और जब गाण्डीवकी वज्र-गर्जनाके समान भयंकर टंकार तुम्हारे कानोंमें पड़ेगी, उस समय तुम्हें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरकी प्रतीति नहीं होगी (केवल कलहस्वरूप भयंकर कलि ही दृष्टिगोचर होगा)

କର୍ଣ୍ଣ! ଯେତେବେଳେ ଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମେ ଶ୍ୱେତ ଅଶ୍ୱଯୁକ୍ତ ରଥରେ, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ସାରଥି କରି ଆସିଥିବା ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଦେଖିବ—ସେ ଐନ୍ଦ୍ର ଅସ୍ତ୍ର ପ୍ରୟୋଗ କରୁଥିବେ ଏବଂ ଆଗ୍ନେୟ ଓ ବାୟବ୍ୟ ଅସ୍ତ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରକାଶ କରୁଥିବେ—

Verse 7

गाण्डीवस्य च निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशने: । न तदा भविता त्रेता न कृत॑ द्वापरं न च,कर्ण! जब युद्धमें मुझ श्रीकृष्णको सारथि बनाकर आये हुए श्वेतवाहन अर्जुनको तुम ऐन्द्र, आग्नेय तथा वायव्य अस्त्र प्रकट करते देखोगे और जब गाण्डीवकी वज्र-गर्जनाके समान भयंकर टंकार तुम्हारे कानोंमें पड़ेगी, उस समय तुम्हें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरकी प्रतीति नहीं होगी (केवल कलहस्वरूप भयंकर कलि ही दृष्टिगोचर होगा)

ଏବଂ ଗାଣ୍ଡୀବର ସେଇ ନିର୍ଘୋଷ ବଜ୍ରଗର୍ଜନା ପରି ତୁମ କାନରେ ପଡିଲେ, ସେତେବେଳେ ତୁମ ପାଇଁ ନ ତ୍ରେତା ରହିବ, ନ କୃତ (ସତ୍ୟ), ନ ଦ୍ୱାପର—ମନେ ହେବ କେବଳ କଲହସ୍ୱରୂପ ଭୟଙ୍କର କଲି ମାତ୍ର ସମ୍ମୁଖରେ।

Verse 8

यदा द्रक्ष्यसि संग्रामे कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्‌ । जपहोमसमायुक्तं स्वां रक्षन्तं महाचमूम्‌,जब जप और होममें लगे हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको संग्राममें अपनी विशाल सेनाकी रक्षा करते तथा सूर्यके समान दुर्धर्ष होकर शत्रुसेनाको संतप्त करते देखोगे, उस समय तुम्हें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरकी प्रतीति नहीं होगी

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ରଣଭୂମିରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଜପ ଓ ହୋମରେ ନିମଗ୍ନ ହୋଇ, ନିଜର ବିଶାଳ ସେନାକୁ ରକ୍ଷା କରୁଥିବା ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ଯୁଦ୍ଧମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ରାଜାଙ୍କୁ ଦେଖି ତୁମର ଯୁଗଭେଦବୋଧ ମଧ୍ୟ ଲୁପ୍ତ ହେବ।

Verse 9

आदित्यमिव दुर्धर्ष तपन्तं शत्रुवाहिनीम्‌ । न तदा भविता त्रेता न कृत॑ द्वापरं न च,जब जप और होममें लगे हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको संग्राममें अपनी विशाल सेनाकी रक्षा करते तथा सूर्यके समान दुर्धर्ष होकर शत्रुसेनाको संतप्त करते देखोगे, उस समय तुम्हें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरकी प्रतीति नहीं होगी

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସୂର୍ଯ୍ୟସମ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ହୋଇ ଶତ୍ରୁସେନାକୁ ଦହାଇ ଦେଉଥିବା ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ତୁମ ପାଇଁ ନ ତ୍ରେତା, ନ କୃତ (ସତ୍ୟ), ନ ଦ୍ୱାପର—ଯୁଗବୋଧ ମାନେ ଉଲଟିଯିବ।

Verse 10

यदा द्रक्ष्यसि संग्रामे भीमसेनं॑ महाबलम्‌ | दुःशासनस्य रुधिरं पीत्वा नृत्यन्तमाहवे,जब तुम युद्धमें महाबली भीमसेनको दुःशासनका रक्त पीकर नाचते तथा मदकी धारा बहानेवाले गजराजके समान उन्हें शत्रुपक्षकी गजसेनाका संहार करते देखोगे, उस समय तुम्हें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरकी प्रतीति नहीं होगी

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ରଣରେ ମହାବଳୀ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଦୁଃଶାସନର ରକ୍ତ ପିଇ ସମରମଧ୍ୟରେ ନୃତ୍ୟ କରୁଥିବା ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ତୁମ ପାଇଁ ସତ୍ୟଯୁଗ, ତ୍ରେତା, ଦ୍ୱାପର—କୌଣସି ଯୁଗବୋଧ ରହିବ ନାହିଁ; ସେ ଦୃଶ୍ୟ ପ୍ରତିଶୋଧର କଠୋରତାକୁ ଘୋଷଣା କରିବ।

Verse 11

प्रभिन्नमिव मातड़ुं प्रतिद्विरदघातिनम्‌ । न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च,जब तुम युद्धमें महाबली भीमसेनको दुःशासनका रक्त पीकर नाचते तथा मदकी धारा बहानेवाले गजराजके समान उन्हें शत्रुपक्षकी गजसेनाका संहार करते देखोगे, उस समय तुम्हें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरकी प्रतीति नहीं होगी

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ ଭୟଙ୍କର ଦୃଶ୍ୟ ମଦୋନ୍ମତ୍ତ ମାତଙ୍ଗ ଛୁଟି ପଡ଼ି ପ୍ରତିଦ୍ୱିରଦମାନଙ୍କୁ ସଂହାର କରୁଥିବା ପରି ହେବ। ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଦୁଃଶାସନର ରକ୍ତ ପିଇ ନୃତ୍ୟ କରୁଥିବା ଏବଂ ମଦଧାରା ବହାଉଥିବା ଗଜରାଜ ପରି ଶତ୍ରୁର ଗଜସେନାକୁ ଚୂର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ତୁମ ପାଇଁ ନ ତ୍ରେତା, ନ କୃତ, ନ ଦ୍ୱାପର—କୌଣସି ଯୁଗପ୍ରତୀତି ରହିବ ନାହିଁ।

Verse 12

यदा द्रक्ष्यसि संग्रामे द्रोणं शान्तनवं कृपम्‌ । सुयोधनं च राजानं सैन्धवं च जयद्रथम्‌,जब तुम देखोगे कि युद्धमें आचार्य द्रोण, शान्तनुनन्दन भीष्म, कृपाचार्य, राजा दुर्योधन और सिन्धुराज जयद्रथ ज्यों ही युद्धके लिये आगे बढ़े हैं त्यों ही सव्यसाची अर्जुनने तुरंत उन सबकी गति रोक दी है, तब तुम हक्‍्के-बक्केसे रह जाओगे और उस समय तुम्हें सत्ययुग, त्रेता और द्वापर कुछ भी सूझ नहीं पड़ेगा

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ରଣଭୂମିରେ ଦ୍ରୋଣ, ଶାନ୍ତନବ ଭୀଷ୍ମ, କୃପ, ରାଜା ସୁଯୋଧନ ଏବଂ ସିନ୍ଧୁରାଜ ଜୟଦ୍ରଥଙ୍କୁ ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ (ସେମାନେ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆଗେଇ ଆସି ତାଙ୍କର ଗତି ରୋକାଯାଇଥିବା ଦେଖି) ତୁମେ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟରେ ନିଷ୍ପନ୍ନ ହେବ; ସେ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ସତ୍ୟ, ତ୍ରେତା, ଦ୍ୱାପର—ଯୁଗଭେଦ ମଧ୍ୟ ମନେ ପଡ଼ିବ ନାହିଁ।

Verse 13

युद्धायापततस्तूर्ण वारितान्‌ सव्यसाचिना । न तदा भविता त्रेता न कृत॑ द्वापरं न च,जब तुम देखोगे कि युद्धमें आचार्य द्रोण, शान्तनुनन्दन भीष्म, कृपाचार्य, राजा दुर्योधन और सिन्धुराज जयद्रथ ज्यों ही युद्धके लिये आगे बढ़े हैं त्यों ही सव्यसाची अर्जुनने तुरंत उन सबकी गति रोक दी है, तब तुम हक्‍्के-बक्केसे रह जाओगे और उस समय तुम्हें सत्ययुग, त्रेता और द्वापर कुछ भी सूझ नहीं पड़ेगा

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ଦେଖିବ ଯେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ତ୍ୱରାନ୍ୱିତ ଭାବେ ଧାଉଥିବାମାନେ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ରୋକାଯାଇଛନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ତୁମେ ହତବାକ୍ ହୋଇ ରହିବ; ସେ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ତୁମ ମନେ ନ କୃତଯୁଗ, ନ ତ୍ରେତା, ନ ଦ୍ୱାପର—କିଛି ମଧ୍ୟ ଆସିବ ନାହିଁ।

Verse 14

यदा द्रक्ष्यसि संग्रामे माद्रीपुत्रो महाबलौ । वाहिनी धार्तराष्ट्राणां क्षोभयन्तौ गजाविव,जब युद्धस्थलमें अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार प्रगाढ़ अवस्थाको पहुँच जायगा (जोर-जोरसे होने लगेगा) और शत्रुवीरोंके रथको नष्ट-भ्रष्ट करनेवाले महाबली माद्रीकुमार नकुल-सहदेव दो गजराजोंकी भाँति धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाको क्षुब्ध करने लगेंगे तथा जब तुम अपनी आँखोंसे यह अवस्था देखोगे, उस समय तुम्हारे सामने न सत्ययुग होगा, न त्रेता और न द्वापर ही रह जायगा

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ଦୁଇ ମହାବଳୀ ନକୁଳ ଓ ସହଦେବଙ୍କୁ ଦୁଇ ଗଜରାଜ ପରି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ଉଥଳାଇ ଅସ୍ଥିର କରୁଥିବା ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ଯୁଦ୍ଧର କଠୋର ସତ୍ୟ ତୁମ ଚକ୍ଷୁସାମ୍ନାରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ତୀବ୍ରତାରେ ପ୍ରକଟ ହେବ।

Verse 15

विगाढे शस्त्रसम्पाते परवीररथारुजौ । न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च,जब युद्धस्थलमें अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार प्रगाढ़ अवस्थाको पहुँच जायगा (जोर-जोरसे होने लगेगा) और शत्रुवीरोंके रथको नष्ट-भ्रष्ट करनेवाले महाबली माद्रीकुमार नकुल-सहदेव दो गजराजोंकी भाँति धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाको क्षुब्ध करने लगेंगे तथा जब तुम अपनी आँखोंसे यह अवस्था देखोगे, उस समय तुम्हारे सामने न सत्ययुग होगा, न त्रेता और न द्वापर ही रह जायगा

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ଶସ୍ତ୍ରସମ୍ପାତ ଘନ ଓ ଉଗ୍ର ହୋଇଯିବ, ଏବଂ ପରବୀରମାନଙ୍କ ରଥକୁ ଭାଙ୍ଗିଦେଉଥିବା ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ମହାବଳୀ ନକୁଳ-ସହଦେବ ଦୁଇ ଗଜରାଜ ପରି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସେନାକୁ ମଥିବାକୁ ଲାଗିବେ, ଏବଂ ତୁମେ ଏହି ଅବସ୍ଥାକୁ ନିଜ ଚକ୍ଷୁରେ ଦେଖିବ—ସେତେବେଳେ ତୁମ ସାମ୍ନାରେ ନ କୃତଯୁଗ ରହିବ, ନ ତ୍ରେତା, ନ ଦ୍ୱାପର।

Verse 16

ब्रूया: कर्ण इतो गत्वा द्रोणं शान्तनवं कृपम्‌ | सौम्यो<यं वर्तते मास: सुप्रापपवसेन्धन:,कर्ण! तुम यहाँसे जाकर आचार्य द्रोण, शान्तनुनन्दन भीष्म और कृपाचार्यसे कहना कि “यह सौम्य (सुखद) मास चल रहा है। इसमें पशुओंके लिये घास और जलानेके लिये लकड़ी आदि वस्तुएँ सुगमतासे मिल सकती हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କର୍ଣ୍ଣ! ଏଠାରୁ ଯାଇ ଦ୍ରୋଣ, ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ଓ କୃପଙ୍କୁ କହ—“ଏହି ମାସ ଶାନ୍ତ ଓ ଅନୁକୂଳ; ପଶୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଚାରା ଓ ଇନ୍ଧନ (କାଠ ଆଦି) ସହଜରେ ମିଳେ।”

Verse 17

सर्वौषधिवनस्फीत: फलवानल्पमक्षिक: । निष्पड़को रसवत्तोयो नात्युष्णशिशिर: सुख:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏହା ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଔଷଧିରେ ସମୃଦ୍ଧ, ବନ-ବନସ୍ପତିରେ ପୁଷ୍ଟ; ଫଳ ପ୍ରଚୁର, ଡ଼ଙ୍କ ମାରୁଥିବା କୀଟ ଅତି ଅଳ୍ପ। ଜଳ ନିର୍ମଳ ଓ ରସାଳ; ପାଗା ନ ଅତି ଗରମ, ନ ଅତି ଶୀତ—ସମଗ୍ରେ ସୁଖଦ।

Verse 18

“सब प्रकारकी ओषधियों तथा फल-फूलोंसे वनकी समृद्धि बढ़ी हुई है, धानके खेतोंमें खूब फल लगे हुए हैं, मक्खियाँ बहुत कम हो गयी हैं, धरतीपर कीचड़का नाम नहीं है। जल स्वच्छ एवं सुस्वादु प्रतीत होता है, इस सुखद समयमें न तो अधिक गरमी है और न अधिक सर्दी ही (यह मार्गशीर्षमास चल रहा है) ।। सप्तमाच्चापि दिवसादमावास्या भविष्यति | संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहु: शक्रदेवताम्‌,“आजसे सातवें दिनके बाद अमावास्या होगी। उसके देवता इन्द्र कहे गये हैं। उसीमें युद्ध आरम्भ किया जाय'

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଆଜିଠାରୁ ସପ୍ତମ ଦିନେ ଅମାବାସ୍ୟା ହେବ। ତାହାର ଅଧିଦେବତା ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ବୋଲି କୁହାଯାଏ। ସେହି ଦିନେ ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ କରାଯାଉ।

Verse 19

तथा राज्ञो वदे: सर्वान्‌ ये युद्धायाभ्युपागता: । यद्‌ वो मनीषितं तद्‌ वै सर्व सम्पादयाम्यहम्‌,इसी प्रकार जो युद्धके लिये यहाँ पधारे हैं, उन समस्त राजाओंसे भी कह देना “आपलोगोंके मनमें जो अभिलाषा है, वह सब मैं अवश्य पूर्ण करूँगा”

ଏହିପରି ରାଜାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ କହ—ଯେଉଁ ସମସ୍ତ ରାଜା ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଏଠାକୁ ଆସିଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ସେ କହୁନ୍ତୁ: ‘ତୁମେ ମନରେ ଯାହା ନିଶ୍ଚୟ କରିଛ, ସେ ସବୁକୁ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ସମ୍ପାଦନ କରିଦେବି।’

Verse 20

राजानो राजपृत्राश्न दुर्योधनवशानुगा: । प्राप्प शस्त्रेण निधन प्राप्स्यन्ति गतिमुत्तमाम्‌

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ବଶାନୁଗ ରାଜା ଓ ରାଜକୁମାରମାନେ ଶସ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ମୃତ୍ୟୁ ପାଇ ମଧ୍ୟ ଉତ୍ତମ ଗତି ଲାଭ କରିବେ।

Verse 141

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कर्णके द्वारा अपने निश्चित विचारका प्रतिपादनविषयक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ନିଶ୍ଚିତ ମତ ପ୍ରତିପାଦନ ବିଷୟକ ଏକଶେ ଏକଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 142

दुर्योधनके वशमें रहनेवाले जितने राजा और राजकुमार हैं, वे शस्त्रोंद्वारा मृत्युको प्राप्त होकर उत्तम गति लाभ करेंगे ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कर्णोपनिवादे भगवद्धाक्ये द्विचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कर्णके द्वारा अपने अभिप्रायनिवेदनके प्रसंगरें भगवद्वाक्यविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ବଶରେ ଥିବା ସମସ୍ତ ରାଜା ଓ ରାଜକୁମାର ଶସ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ମୃତ୍ୟୁ ପାଇ ଉତ୍ତମ ଗତି ଲାଭ କରିବେ। ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ଅଭିପ୍ରାୟ-ନିବେଦନ ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ଭଗବଦ୍ବାକ୍ୟ ବିଷୟକ ଏକଶେ ବୟାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

Karṇa faces a conflict between recognizing impending collective harm (and the credibility of Kṛṣṇa’s counsel) and maintaining factional loyalty; he acknowledges causality and portents yet refuses to pivot ethically or politically.

When societal collapse nears, the mind can misrecognize unjust strategy (anaya) as sound strategy (naya); thus, receptivity to ethical counsel is itself a moral capacity that can degrade under entrenched wrongdoing.

No formal phalaśruti is stated; the meta-commentary appears as Kṛṣṇa’s diagnostic observation about the failure of counsel at the threshold of destruction, positioning the chapter as a reflective lens on ethical cognition in crisis.