
उद्योगपर्व अध्याय १३३ — संजये मातृउपदेशः (Udyoga Parva Adhyaya 133 — A Mother’s Counsel to Saṃjaya)
Upa-parva: Saṃjaya–Mātṛsaṃvāda (Counsel of a Mother to Saṃjaya) — within Udyoga Parva
Adhyāya 133 is structured as a sharp intergenerational dialogue. The son opens with grievance, accusing the mother of hardness and questioning the value of wealth, adornment, and life without him (1–3). The mother answers by grounding speech in dharma and artha: wise undertakings begin from ethical and practical causes, and the present is a decisive time requiring action (4–6). She urges abandonment of socially condemned conduct and ignorance, defining genuine affection as approval of disciplined character rather than indulgence (7–10). The discourse then frames kṣatriya vocation as oriented to protection and contest, with victory or honorable loss both situated within a reward logic of warrior ideology (11–14). She adds a sober psychology of desire and displeasure—minimal attachment reduces inevitable suffering—and warns that lack of the ‘pleasant’ can lead to decline (15–16). The son objects that such counsel lacks compassion, but the mother reorients compassion as rigorous exhortation and predicts success if he commits fully (17–19). The son admits constraints (no treasury, no allies) and requests concrete means (20–21). The mother teaches impermanence of fortunes, cautions against rash action driven by mere anger, yet insists that non-action yields no becoming; effort doubles possible outcomes even if success is uncertain (22–25). She prescribes vigilance, auspicious preparation with learned and powerful supporters, and systematic coalition work: assess the angry, greedy, weakened, insulted, and competitive; divide opposing groups; be generous, punctual, and courteous to be placed at the front (26–32). Finally, she emphasizes deterrence through demonstrated resolve, the strategic value of reputation, and the economic-social feedback loop whereby resources attract allies while failure repels them—even among relatives—closing with the possibility of gaining power through calibrated trust and alliance shifts (33–37).
Chapter Arc: विदुला अपने पुत्र के सामने कठोर सत्य रखती है—इस संकट-घड़ी में यदि तू पौरुष छोड़कर जीवन-लोभ में झुकेगा, तो यह जीना भी पराजय ही है। → वह उसे बताती है कि क्षत्रिय का तेज और विक्रम छिपाना चोरी के समान है; उपदेश भी उस पर औषधि की तरह निष्फल हो जाते हैं जो भीतर से मरने को तैयार हो। वह पुराने संकेतों और नीति-वचनों से उसे झकझोरती है—बाल्यकाल में ब्राह्मण की भविष्यवाणी, अर्थ-सिद्धि के नियम, और दरिद्रता/अपमान की पापमय स्थिति का स्मरण। → विदुला का निर्णायक प्रहार: युद्ध को स्वर्ग-द्वार और राज्य/अमृत-तुल्य फल का एकमात्र पथ मान—शत्रु के आगे मीठी बातें कर पीछे-पीछे चलना इस कुल के लिए असह्य है; तू पराये का अनुचर बनकर जीने योग्य नहीं। → वह पुत्र को विषाद और ‘पापजीविका’ (कायरतापूर्ण जीवन-यापन) छोड़कर आत्मबल जगाने का आदेश देती है—यदि जीवन-आसक्ति घटे तो शत्रु-विजय संभव है; नीति का सार यही कि मान, स्वातंत्र्य और धर्म की रक्षा हेतु साहस ही औषधि है। → क्या पुत्र विदुला की वाणी को शस्त्र बनाकर उठ खड़ा होगा, या जीवन-लोभ उसे फिर शत्रु की छाया में ले जाएगा?
Verse 1
अपना छा |: चतुस्त्रिंशर्दाधिकशततमो< ध्याय: विदुलाका अपने पुत्रको युद्धके लिये उत्साहित करना विदुलोवाच अथैतस्यामवस्थायां पौरुष॑ हातुमिच्छसि । निहीनसेवितं मार्ग गमिष्यस्यचिरादिव,विदुला बोली--संजय! यदि तू इस दशामें पौरुषको छोड़ देनेकी इच्छा करता है तो शीघ्र ही नीच पुरुषोंके मार्गपर जा पहुँचेगा
ବିଦୁଳା କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ! ଏହି ଅବସ୍ଥାରେ ଯଦି ତୁମେ ପୌରୁଷ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ତେବେ ଶୀଘ୍ର ତୁମେ ନୀଚମାନେ ଚାଲୁଥିବା ପଥରେ ପଡ଼ିଯିବ—ଅଧମ ଓ କାୟରମାନଙ୍କ ରାସ୍ତାରେ।
Verse 2
यो हि तेजो यथाशक्ति न दर्शयति विक्रमात् । क्षत्रियो जीविताकाडुक्षी स्तेन इत्येव तं विदु:,जो क्षत्रिय अपने जीवनके लोभसे यथाशक्ति पराक्रम प्रकट करके अपने तेजका परिचय नहीं देता है, उसे सब लोग चोर मानते हैं
ଯେ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଜୀବନଲୋଭରେ ଯଥାଶକ୍ତି ପରାକ୍ରମ ଦେଖାଇ ନିଜ ତେଜ ପ୍ରକାଶ କରେନାହିଁ, ଲୋକେ ତାକୁ ଚୋର ବୋଲି ଜାଣନ୍ତି।
Verse 3
अर्थवन्त्युपपन्नानि वाक्यानि गुणवन्ति च | नैव सम्प्राप्तुवन्ति त्वां मुमूर्षमिव भेषजम्,जैसे मरणासन्न पुरुषको कोई भी दवा लागू नहीं होती, उसी प्रकार ये युक्तियुक्त, गुणकारी और सार्थक वचन भी तेरे हृदयतक पहुँच नहीं पाते हैं (यह कितने दुःखकी बात है)
ଅର୍ଥବତୀ, ଯୁକ୍ତିଯୁକ୍ତ ଓ ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ବାକ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ ତୁମ ହୃଦୟକୁ ପହଞ୍ଚୁନାହାନ୍ତି—ଯେପରି ମରଣାସନ୍ନ ଲୋକଙ୍କୁ ଔଷଧ କାମ କରେନାହିଁ।
Verse 4
सन्ति वै सिन्धुराजस्य संतुष्टा न तथा जना: | दौर्बल्यादासते मूढा व्यसनौघप्रतीक्षिण:,देख, सिन्धुराजकी प्रजा उससे संतुष्ट नहीं है, तथापि तेरी दुर्बलताके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो उदासीन बैठी हुई है और सिन्धुराजपर विपत्तियोंके आनेकी बाट जोह रही है
ଦେଖ, ସିନ୍ଧୁରାଜଙ୍କ ପ୍ରଜା ତାଙ୍କୁ ନେଇ ସତ୍ୟରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ନୁହେଁ; ତଥାପି ତୁମ ଦୁର୍ବଳତାରୁ ସେମାନେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟବିମୂଢ ହୋଇ ନିଷ୍କ୍ରିୟ ହୋଇ ବସିଛନ୍ତି ଏବଂ ସିନ୍ଧୁରାଜ ଉପରେ ବିପତ୍ତିର ପ୍ରବାହ ଆସିବାକୁ ପ୍ରତୀକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି।
Verse 5
सहायोपचितिं कृत्वा व्यवसाय्य ततस्तत: । अनुदुष्येयुरपरे पश्यन्तस्तव पौरुषम्,दूसरे राजा भी तेरा पुरुषार्थ देखकर इधर-उधरसे विशेष चेष्टापूर्वक सहायक साधनोंकी वृद्धि करके सिन्धुराजके शत्रु हो सकते हैं
ସହାୟ ସାଧନ ଓ ମିତ୍ରତା ବଢ଼ାଇ, ପରେ ପୁନଃପୁନଃ ଦୃଢ଼ ଉଦ୍ୟମ କଲେ, ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ—ତୁମ ପୌରୁଷ ଦେଖି—ସିନ୍ଧୁରାଜଙ୍କ ଶତ୍ରୁ ହୋଇପାରନ୍ତି।
Verse 6
तैः कृत्वा सह संघातं गिरिदुर्गालयं चर । काले व्यसनमाकाड्क्षन् नैवायमजरामर:,तू उन सबके साथ मैत्री करके यथासमय अपने शत्रु सिन्धुराजपर विपत्ति आनेकी प्रतीक्षा करता हुआ पर्वतोंकी दुर्गम गुफामें विचरता रह; क्योंकि यह सिन्धुराज कोई अजर, अमर तो है नहीं
ସେମାନଙ୍କ ସହ ସଂଘ ବାନ୍ଧି, ପର୍ବତ-ଦୁର୍ଗର ଗୁହା ଓ ଦୁର୍ଗମ ଆଶ୍ରୟରେ ବିଚର; ଯଥାକାଳେ ତୋର ଶତ୍ରୁ ସିନ୍ଧୁରାଜଙ୍କ ଉପରେ ବିପତ୍ତି ପଡ଼ିବାକୁ ପ୍ରତୀକ୍ଷା କର। କାରଣ ଏହି ସିନ୍ଧୁରାଜ ନ ଅଜର, ନ ଅମର।
Verse 7
संजयो नामततश्न त्वं न च पश्यामि तत् त्वयि । अन्वर्थनामा भव मे पुत्र मा व्यर्थनामक:,तेरा नाम तो संजय है, परंतु तुझमें इस नामके अनुसार गुण मैं नहीं देख रही हूँ। बेटा! युद्धमें विजय प्राप्त करके अपना नाम सार्थक कर, व्यर्थ संजय नाम न धारण कर
ତୋର ନାମ ‘ସଞ୍ଜୟ’, କିନ୍ତୁ ସେହି ନାମକୁ ସାର୍ଥକ କରିବା ଗୁଣ ମୁଁ ତୋରେ ଦେଖୁନି। ପୁତ୍ର, ଯୁଦ୍ଧରେ ବିଜୟ ଲାଭ କରି ନାମକୁ ସାର୍ଥକ କର; ବ୍ୟର୍ଥ ‘ସଞ୍ଜୟ’ ନାମ ଧାରଣ କରନି।
Verse 8
सम्यग्दृष्टिमहाप्राज्ञो बाल त्वां ब्राह्मणो<ब्रवीत् । अयं प्राप्प महत् कृच्छू पुनर्वद्धिं गमिष्यति,जब तू बालक था, उस समय एक उत्तम दृष्टिवाले, परम बुद्धिमान ब्राह्मणने तेरे विषयमें कहा था कि “यह महान् संकटमें पड़कर भी पुनः वृद्धिको प्राप्त होगा”
ତୁ ଯେତେବେଳେ ଶିଶୁ ଥିଲୁ, ସମ୍ୟକ୍ ଦୃଷ୍ଟି ଓ ମହାପ୍ରଜ୍ଞାବାନ ଜଣେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ତୋ ବିଷୟରେ କହିଥିଲେ—“ଏହିଜଣ ମହା ସଙ୍କଟରେ ପଡ଼ିଲେ ମଧ୍ୟ ପୁନଃ ବୃଦ୍ଧିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବ।”
Verse 9
तस्य स्मरन्ती वचनमाशंसे विजयं तव । तस्मात् तात ब्रवीमि त्वां वक्ष्यामि च पुनः पुनः:,उस ब्राह्णकी बातको याद करके मैं यह आशा करती हूँ कि तेरी विजय होगी। तात! इसीलिये मैं बार-बार तुझसे कहती हूँ और कहती रहूँगी
ସେହି ବଚନ ସ୍ମରଣ କରି ମୁଁ ତୋର ବିଜୟ ଆଶା କରୁଛି। ତେଣୁ, ତାତ, ମୁଁ ତୋତେ କହୁଛି—ଏବଂ ପୁନଃପୁନଃ କହିବି।
Verse 10
यस्य हार्थाभिनिर्वत्तौ भवन्त्याप्यायिता: परे | तस्यार्थसिद्धिर्नियता नयेष्वर्थानुसारिण:,जिसके प्रयोजनकी सिद्धि होनेपर उससे सम्बन्ध रखनेवाले दूसरे लोग भी संतुष्ट एवं उन्नतिको प्राप्त होते हैं, नीतिमार्गपर चलकर अर्थसिद्धिके लिये प्रयत्न करनेवाले उस पुरुषको निश्चय ही अपने अभीष्टकी सिद्धि होती है
ଯାହାର କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧି ହେଲେ ତାଙ୍କ ସହ ସମ୍ବନ୍ଧିତ ଅନ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ ପୋଷିତ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ହୁଅନ୍ତି, ନୀତି-ଧର୍ମାନୁସାରେ ଅର୍ଥସାଧନରେ ପ୍ରୟତ୍ନଶୀଳ ସେ ପୁରୁଷଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ ଇଷ୍ଟସିଦ୍ଧି ମିଳେ।
Verse 11
समृद्धिरसमृद्धिर्वा पूर्वेषां मम संजय । एवं विद्वान् युद्धमना भव मा प्रत्युपाहर,संजय! युद्धसे हमारे पूर्वजोंका अथवा मेरा कोई लाभ हो या हानि, युद्ध करना क्षत्रियोंका धर्म है, ऐसा समझकर उसीमें मन लगा, युद्ध बंद न कर
ସଞ୍ଜୟ! ଆମ ପୂର୍ବଜମାନଙ୍କୁ କିମ୍ବା ମୋତେ ଲାଭ ହେଉ କି ହାନି—ଯୁଦ୍ଧ କରିବା କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମ ବୋଲି ଜାଣି, ଯୁଦ୍ଧରେ ମନ ଦୃଢ଼ କର; ପଛକୁ ହଟିବୁ ନାହିଁ।
Verse 12
नात: पापीयसीं कांचिदवस्थां शम्बरो<ब्रवीत् । यत्र नैवाद्य न प्रातर्भोजनं प्रतिदृश्यते
ଏହା ପରେ ଶମ୍ବର କହିଲା—ଏହାଠାରୁ ଅଧିକ ପାପମୟ/ଦୁଃଖଦ ଅବସ୍ଥା ନାହିଁ; ଯେଉଁଠାରେ ଆଜିର ଭୋଜନ ମଧ୍ୟ ଦିଶେ ନାହିଁ, କାଲି ସକାଳର ଭୋଜନ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 13
जहाँ आजके लिये और कल सबेरेके लिये भी भोजन दिखायी नहीं देता, उससे बढ़कर महान् पापपूर्ण कोई दूसरी अवस्था नहीं है, ऐसा शम्बरासुरका कथन है ।। पतिपुत्रवधादेतत् परमं दुःखमत्रवीत् | दारिद्रयमिति यत् प्रोक्त पर्यायमरणं हि तत्,जिसका नाम दरिद्रता है, उसे पति और पुत्रके वधसे भी अधिक दुःखदायक बताया गया है। दरिद्रता मृत्युका समानार्थक शब्द है
ଆଜି ପାଇଁ ଓ କାଲି ସକାଳ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଭୋଜନ ଦିଶୁନଥିବା ଅବସ୍ଥାଠାରୁ ବଡ଼ ପାପମୟ ଅବସ୍ଥା ନାହିଁ—ଏହା ଶମ୍ବରଙ୍କ ବଚନ। ଏଠାରେ ‘ଦାରିଦ୍ର୍ୟ’କୁ ପରମ ଦୁଃଖ କୁହାଯାଇଛି; ତାହାକୁ ପତି-ପୁତ୍ରବଧଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ଦୁଃଖଦ ବୋଲି ବର୍ଣ୍ଣନା କରାଯାଇଛି। ସତ୍ୟକୁ କହିଲେ ଦାରିଦ୍ର୍ୟ ମୃତ୍ୟୁର ପର୍ୟାୟ ଅଟେ।
Verse 14
अहं महाकुले जाता हृदाद्ध्रदमिवागता । ईश्वरी सर्वकल्याणी भर्त्रां परमपूजिता,मैं उच्चकुलमें उत्पन्न हो हंसीकी भाँति एक सरोवरसे दूसरे सरोवरमें आयी और इस राज्यकी स्वामिनी, समस्त कल्याणमय साधनोंसे सम्पन्न तथा पतिदेवके परम आदरकी पात्र हुई
ମୁଁ ମହାକୁଳରେ ଜନ୍ମିଛି। ଯେପରି ହଂସ ଗୋଟିଏ ସରୋବରରୁ ଅନ୍ୟ ସରୋବରକୁ ଯାଏ, ସେପରି ମୁଁ ଏଠାକୁ ଆସିଛି। ମୁଁ ଏହି ରାଜ୍ୟର ଅଧିଷ୍ଠାତ୍ରୀ ହେଲି—ସମସ୍ତ ମଙ୍ଗଳସାଧନରେ ସମ୍ପନ୍ନ—ଏବଂ ପତିଙ୍କ ପରମ ସମ୍ମାନର ପାତ୍ର ହେଲି।
Verse 15
महाहमाल्याभरणां सुमृष्टाम्बरवाससम् | पुरा हृष्ट: सुहृद्र्गो मामपश्यत् सुहृदूगताम्,पूर्वकालमें मेरे सुह्दोंने जब मुझे सगे सम्बन्धियोंके बीच बहुमूल्य हार एवं आभूषणोंसे विभूषित तथा परम सुन्दर स्वच्छ वस्त्रोंस आच्छादित देखा, तब उन्हें बड़ा हर्ष हुआ
ପୂର୍ବକାଳରେ ଯେତେବେଳେ ମୋର ହିତେଷୀ ସୁହୃଦମାନେ ମୋତେ ନିଜ ସ୍ୱଜନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୂଲ୍ୟବାନ ମାଳା-ହାର ଓ ଆଭୂଷଣରେ ଭୂଷିତ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁନ୍ଦର ଓ ନିର୍ମଳ ବସ୍ତ୍ରରେ ଆବୃତ ହୋଇ ଆସୁଥିବା ଦେଖିଲେ, ସେମାନେ ମହା ହର୍ଷରେ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲିତ ହେଲେ।
Verse 16
यदा मां चैव भार्या च द्रष्टासि भृशदुर्बलाम् | न तदा जीवितेनार्थो भविता तव संजय,संजय! अब जिस समय तू मुझे और अपनी पत्नीको चिन्ताके कारण अत्यन्त दुर्बल देखेगा, उस समय तुझे जीवित रहनेकी इच्छा नहीं होगी
ସଞ୍ଜୟ! ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ମୋତେ ଓ ତୁମ ଭାର୍ଯ୍ୟାକୁ ମଧ୍ୟ ଚିନ୍ତାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ଷୀଣ ଓ ଦୁର୍ବଳ ହୋଇଥିବା ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ତୁମ ପାଇଁ ଜୀବନଧାରଣର କୌଣସି ମୂଲ୍ୟ ରହିବ ନାହିଁ।
Verse 17
दासकर्मकरान् भृत्यानाचार्यतत््विक्ृपुरोहितान् । अवृत्त्यास्मान् प्रजहतो दृष्टवा कि जीवितेन ते
ଦାସ, କର୍ମକର, ଭୃତ୍ୟ, ଆଚାର୍ଯ୍ୟ, ଋତ୍ୱିକ ଓ ପୁରୋହିତ—ଆମ ଉପରେ ନିର୍ଭର କରୁଥିବା ଏମାନଙ୍କୁ ଜୀବିକାହୀନ କରି ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ଆମକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିବ, ସେଥି ଦେଖି ତୁମ ପାଇଁ ଜୀବନର କ’ଣ ଉପଯୋଗ?
Verse 18
जब सेवाका काम करनेवाले दास, भरण-पोषण पानेवाले कुट॒म्बी, आचार्य, ऋत्विक् और पुरोहित जीविकाके अभावमें हमें छोड़कर जाने लगेंगे, उस समय उन्हें देखकर तुझे जीवन-धारणका कोई प्रयोजन नहीं दिखायी देगा ।। यदि कृत्यं न पश्यामि तवाद्याहं यथा पुरा | श्लाघनीयं यशस्यं च का शान्तिहवदयस्य मे,यदि पहलेके समान आज भी मैं तेरे यशकी वृद्धि करनेवाले प्रशंसनीय कर्मोंको नहीं देखूँगी तो मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी?
ଯେତେବେଳେ ସେବାକାର୍ଯ୍ୟ କରୁଥିବା ଦାସ, କର୍ମକର, ପୋଷଣରେ ନିର୍ଭର କୁଟୁମ୍ବୀ, ଏବଂ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ, ଋତ୍ୱିକ ଓ ପୁରୋହିତ—ଜୀବିକାର ଅଭାବରେ—ଆମକୁ ଛାଡ଼ି ଯିବାକୁ ଲାଗିବେ, ସେତେବେଳେ ସେମାନଙ୍କୁ ଯାଉଥିବା ଦେଖି ତୁମ ପାଇଁ ଜୀବନଧାରଣର କୌଣସି ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ରହିବ ନାହିଁ। ଆଉ ଯଦି ପୂର୍ବବତ୍ ଆଜି ମଧ୍ୟ ମୁଁ ତୁମ ଯଶକୁ ବଢ଼ାଇବା ଯୋଗ୍ୟ ପ୍ରଶଂସନୀୟ କାର୍ଯ୍ୟ ନ ଦେଖିବି, ତେବେ ମୋ ହୃଦୟକୁ କେଉଁ ଶାନ୍ତି ମିଳିବ?
Verse 19
नेति चेद् ब्राह्मण ब्रूयां दीयेंत हृदयं मम । नहाहं न च मे भर्ता नेति ब्राह्मणमुक्तवान्,यदि किसी ब्राह्मणके माँगनेपर मैं उसकी अभीष्ट वस्तुके लिये “नाहीं” कह दूँगी तो उसी समय मेरा हृदय विदीर्ण हो जायगा। आजतक मैंने या मेरे पतिदेवने किसी ब्राह्मणसे नाहीं नहीं की है
ଯଦି କୌଣସି ବ୍ରାହ୍ମଣ ମାଗିଲେ ମୁଁ ତାଙ୍କ ଇଚ୍ଛିତ ବସ୍ତୁ ପାଇଁ ‘ନା’ କହିଦେବି, ତେବେ ସେଇ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ମୋ ହୃଦୟ ଭାଙ୍ଗିଯିବ; କାରଣ ନ ମୁଁ କେବେ, ନ ମୋ ସ୍ୱାମୀ କେବେ, କୌଣସି ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ‘ନା’ କହିଛୁ।
Verse 20
वयमाश्रयणीया: सम नाश्रितार: परस्य च | सान्यमासाद्य जीवन्ती परित्यक्ष्यामि जीवितम्,हम सदा लोगोंके आश्रयदाता रहे हैं, दूसरोंके आश्रित कभी नहीं रहे; परंतु अब यदि दूसरेका आश्रय लेकर जीवन धारण करना पड़े तो मैं ऐसे जीवनका परित्याग ही कर दूँगी
ଆମେ ସଦା ଲୋକଙ୍କୁ ଆଶ୍ରୟ ଦେଇଆସିଛୁ, କେବେ ଅନ୍ୟର ଆଶ୍ରିତ ହୋଇନାହିଁ; କିନ୍ତୁ ଏବେ ଯଦି ଅନ୍ୟର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଜୀବନ ଧାରଣ କରିବାକୁ ପଡେ, ତେବେ ଏମିତି ଜୀବନକୁ ମୁଁ ତ୍ୟାଗ କରିଦେବି।
Verse 21
बेटा! अपार समुद्रमें डूबते हुए हमलोगोंको तू पार लगानेवाला हो। नौकाविहीन अगाध जलराशि (महान् संकट)-में तू हमारे लिये नौका हो जा। हमारे लिये कोई स्थान नहीं रह गया है, तू स्थान बन जा और हम मृतप्राय हो रहे हैं, तू हमें जीवन दान कर
ପୁଅ! ଅପାର ସମୁଦ୍ରରେ ଡୁବୁଥିବା ଆମକୁ ତୁମେ ପାର କରାଅ। ନୌକାବିହୀନ ଏହି ଅଗାଧ ସଙ୍କଟଜଳରେ ତୁମେ ଆମ ପାଇଁ ନୌକା ହେଅ। ଆମ ପାଇଁ ଆଉ କୌଣସି ଆଶ୍ରୟ ନାହିଁ—ତୁମେ ଆଶ୍ରୟ ହେଅ। ଆମେ ମୃତପ୍ରାୟ—ତୁମେ ଆମକୁ ଜୀବନଦାନ ଦିଅ।
Verse 22
सर्वे ते शत्रव: शक््या न चेज्जीवितुमिच्छसि । अथ चेदीदृशीं वृत्ति क्लीबामभ्युपपद्यसे
ପୁଅ କହିଲା—ତୁମେ ଯଦି ଆଉ ବଞ୍ଚିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁନାହ, ତେବେ ତୁମ ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ ଦମନ କରାଯାଇପାରିବ। କିନ୍ତୁ ଯଦି ତୁମେ ଏପରି ଆଚରଣ—ଏହି କାୟରତାର ପଥ—ଗ୍ରହଣ କର, ତେବେ ଶତ୍ରୁତାକୁ ସାହସ ଓ ଦାୟିତ୍ୱ ସହ ମୁହାଁ ଦେବା ଯେଉଁ ସଙ୍କଳ୍ପ ଆବଶ୍ୟକ, ସେଥିକୁ ତୁମେ ତ୍ୟାଗ କରୁଛ।
Verse 23
अपारे भव न: पारमप्लवे भव न: प्लवः । कुरुष्व स्थानमस्थाने मृतान् संजीवयस्व न:,एकशगत्रुवधेनैव शूरो गच्छति विश्रुतिम् एक शत्रुका वध करनेसे ही शूरवीर पुरुष सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात हो जाता है। देवराज इन्द्र केवल वृत्रासुरका वध करके ही “महेन्द्र' नामसे प्रसिद्ध हो गये। उन्हें रहनेके लिये इन्द्रभवन प्राप्त हुआ और वे तीनों लोकोंके अधीश्वर हो गये
ଆମେ ତୀରହୀନ ବିସ୍ତାରରେ ପଡିଲେ ତୁମେ ଆମ ପାର ହେଅ; ନୌକା ନଥିଲେ ତୁମେ ଆମ ନୌକା ହେଅ। ଯେଉଁଠି ଆଧାର ନାହିଁ, ସେଠି ଆମ ପାଇଁ ଆଧାର ତିଆରି କର; ଏବଂ ମୃତମାନଙ୍କୁ ଜୀବନ ଦେବା ପରି ଆମକୁ ପୁନଃ ଜୀବନ୍ତ କର। କାରଣ ଗୋଟିଏ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ବଧ କରିଲେ ମଧ୍ୟ ବୀର ପୁରୁଷ ବିଶାଳ କୀର୍ତ୍ତି ଲାଭ କରେ।
Verse 24
इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्र: समपद्यत । माहेन्द्रं च गृहं लेभे लोकानां चेश्वरो5भवत्,एक शत्रुका वध करनेसे ही शूरवीर पुरुष सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात हो जाता है। देवराज इन्द्र केवल वृत्रासुरका वध करके ही “महेन्द्र' नामसे प्रसिद्ध हो गये। उन्हें रहनेके लिये इन्द्रभवन प्राप्त हुआ और वे तीनों लोकोंके अधीश्वर हो गये
ବୃତ୍ରବଧ ଦ୍ୱାରା ହିଁ ଇନ୍ଦ୍ର ‘ମହେନ୍ଦ୍ର’ ପଦକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ। ‘ମାହେନ୍ଦ୍ର’ ନାମକ ଦିବ୍ୟ ଭବନକୁ ନିବାସରୂପେ ପାଇଲେ ଏବଂ ଲୋକମାନଙ୍କର ଅଧୀଶ୍ୱର ହେଲେ।
Verse 25
नाम विश्राव्य वै संख्ये शत्रूनाहूय दंशितान् । सेनाग्रं चापि विद्राव्य हत्वा वा पुरुषं वरम्,वीर पुरुष युद्धमें अपना नाम सुनाकर, कवचधारी शत्रुओंको ललकारकर, सेनाके अग्रभागको खदेड़कर अथवा शत्रुपक्षके किसी श्रेष्ठ पुरुषका वध करके जभी उत्तम युद्धके द्वारा महान् यश प्राप्त कर लेता है, तभी उसके शत्रु व्यथित होते और उसके सामने मस्तक झुकाते हैं
ରଣର ଘନଘୋର ମଧ୍ୟରେ ବୀର ପ୍ରଥମେ ନିଜ ନାମ ଗୁଞ୍ଜାଇ, କବଚଧାରୀ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଆହ୍ୱାନ କରେ, ଶତ୍ରୁସେନାର ଅଗ୍ରଭାଗକୁ ଖେଦାଇ ଦିଏ, କିମ୍ବା ପ୍ରତିପକ୍ଷର କୌଣସି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୋଦ୍ଧାକୁ ବଧ କରେ। ଏମିତି ଉତ୍ତମ ଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ମହାଯଶ ଲାଭ କରେ; ତେବେ ଶତ୍ରୁମାନେ ବ୍ୟଥିତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ମସ୍ତକ ନମାନ୍ତି।
Verse 26
यदैव लभते वीर: सुयुद्धेन महद् यश: । तदैव प्रव्यथन्ते5स्य शत्रवों विनमन्ति च,वीर पुरुष युद्धमें अपना नाम सुनाकर, कवचधारी शत्रुओंको ललकारकर, सेनाके अग्रभागको खदेड़कर अथवा शत्रुपक्षके किसी श्रेष्ठ पुरुषका वध करके जभी उत्तम युद्धके द्वारा महान् यश प्राप्त कर लेता है, तभी उसके शत्रु व्यथित होते और उसके सामने मस्तक झुकाते हैं
ବୀର ଯେତେବେଳେ ଉତ୍ତମ ଯୁଦ୍ଧରେ ମହାଯଶ ଲାଭ କରେ, ସେତେବେଳେ ହିଁ ତାଙ୍କ ଶତ୍ରୁମାନେ ବ୍ୟଥିତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ମସ୍ତକ ନମାନ୍ତି।
Verse 27
त्यक्त्वा$5त्मानं रणे दक्ष शूरं कापुरुषा जना: । अवशास्तर्पयन्ति सम सर्वकामसमृद्धिभि:,कायर मनुष्य विवश हो युद्धमें अपने शरीरका त्याग करके युद्धकुशल शूरवीरको सम्पूर्ण मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाली अपनी समृद्धियोंके द्वारा तृप्त करते हैं
କାପୁରୁଷମାନେ ରଣରେ ନିଜ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କରି ଶେଷରେ ଯୁଦ୍ଧକୁଶଳ ଶୂରକୁ—ସମସ୍ତ କାମନା ପୂରଣକାରୀ ସମୃଦ୍ଧିଦ୍ୱାରା—ତୃପ୍ତ କରାନ୍ତି।
Verse 28
राज्यं चाप्युग्रविभ्रंशं संशयो जीवितस्य वा । न लब्धस्य हि शत्रोर्व शेषं कुर्वन्ति साधव:,जिसका भयानक रूपसे पतन हुआ है, वह राज्य प्राप्त हो जाय या जीवन ही संकटमें पड़ जाय, किसी भी दशामें अपने हाथमें आये हुए शत्रुको श्रेष्ठ पुरुष शेष नहीं रहने देते हैं
ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ଡଗମଗାଇଥିବା ରାଜ୍ୟ ମିଳୁ କି ଜୀବନ ନିଜେ ସଙ୍କଟରେ ପଡ଼ୁ—ଯେ କୌଣସି ଅବସ୍ଥାରେ ମଧ୍ୟ, ସାଧୁଜନ ହାତରେ ପଡ଼ିଥିବା ଶତ୍ରୁକୁ ଶେଷ ରହିବାକୁ ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 29
स्वर्गद्वारोपमं राज्यमथवाप्यमृतोपमम् | युद्धमेकायनं मत्वा पतोल्मुक इवारिषु,युद्धको स्वर्गद्वारके सदृश उत्तम गति अथवा अमृतके सदृश राज्यकी प्राप्तिका एकमात्र मार्ग मानकर तू जलते हुए काठकी भाँति शत्रुओंपर टूट पड़
ଯୁଦ୍ଧକୁ ସ୍ୱର୍ଗଦ୍ୱାରସଦୃଶ ଉତ୍ତମ ଗତି—କିମ୍ବା ଅମୃତସଦୃଶ ରାଜ୍ୟ—ଲାଭର ଏକମାତ୍ର ପଥ ବୋଲି ମାନି, ଜ୍ୱଳନ୍ତ କାଠଦଣ୍ଡ ପରି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଉପରେ ଝାପି ପଡ଼।
Verse 30
जहि शत्रून् रणे राजन् स्वधर्ममनुपालय । मा त्वादृशं सुकृपणं शत्रूणां भयवर्धनम्,राजन! तू युद्धमें शत्रुओंको मार और अपने धर्मका पालन कर। शत्रुओंका भय बढ़ानेवाले तुझ वीर पुत्रको मैं अत्यन्त दीन या कायरके रूपमें न देखूँ
ରାଜନ୍, ରଣରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ସଂହାର କରି ନିଜ ସ୍ୱଧର୍ମ ପାଳନ କର। ଶତ୍ରୁଙ୍କର ସାହସ ବଢ଼ାଏ ଏମିତି ଦୀନ କାୟରତାରେ ତୁମ ପରି ବୀରକୁ ମୁଁ ଦେଖିବାକୁ ଚାହେଁ ନାହିଁ।
Verse 31
अस्मदीयैश्व शोचद्धिर्नदद्धिश्न परैर्वृतम् अपि त्वां नानुपश्येयं दीनादू दीनमिव स्थितम्,मैं तुओ दीनसे भी दीनके समान दयनीय अवस्थामें पड़ा हुआ तथा शोकमग्न हुए अपने पक्षके और गर्जन-तर्जन करते हुए शत्रुपक्षेके लोगोंसे घिरा हुआ नहीं देखना चाहती
ମୁଁ ତୁମକୁ ଦୀନଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଦୀନ ଭଳି, ଦୟନୀୟ ଅବସ୍ଥାରେ ପଡ଼ିଥିବା—ଏକ ପଟେ ଶୋକମଗ୍ନ ଆମ ଲୋକମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ପଟେ ଗର୍ଜନ-ଚିତ୍କାର କରୁଥିବା ଶତ୍ରୁଦଳ—ଏଭଳି ଘେରାଯାଇଥିବା—ଦେଖିବାକୁ ଚାହେଁ ନାହିଁ।
Verse 32
हृष्य सौवीरकन्याभि: श्लाघस्वार्थर्यथा पुरा । मा च सैन्धवकन्यानामवसन्नो वशं गम:,तू सौवीरदेशकी कन्याओं (अपनी पत्नियों)-के साथ हर्षका अनुभव कर। पहलेकी भाँति अपने धनकी अधिकताके लिये गर्व कर। विपत्तिमें पड़कर सिन्धुदेशीय (शत्रुदेशकी) कन्याओंके वशमें न हो जा
ସୌବୀର ଦେଶର କନ୍ୟାମାନଙ୍କ ସହ—ତୁମ ପତ୍ନୀମାନଙ୍କ ସହ—ହର୍ଷ କର। ପୂର୍ବବତ୍ ଅର୍ଜିତ ଐଶ୍ୱର୍ୟରେ ଗର୍ବ କର। କିନ୍ତୁ ବିପଦରେ ପଡ଼ି ସୈନ୍ଧବ କନ୍ୟାମାନଙ୍କ (ଶତ୍ରୁଦେଶର ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ) ବଶକୁ ଯାଅ ନାହିଁ।
Verse 33
युवा रूपेण सम्पन्नो विद्ययाभिजनेन च । यत् त्वादृशो विकुर्वीत यशस्वी लोकविश्रुत:
ତୁମେ ଯୌବନ ଓ ରୂପରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ବିଦ୍ୟା ଓ କୁଳମର୍ଯ୍ୟାଦାରେ ମଧ୍ୟ ଯୁକ୍ତ; ତେବେ ଲୋକବିଖ୍ୟାତ ଯଶସ୍ବୀ ପୁରୁଷ ହୋଇ ତୁମ ପରି ଜଣେ ଏବେ ତୁମେ ଦେଖାଉଥିବା ଏପରି ଆଚରଣ କିପରି କରିପାରିବ?
Verse 34
अधुर्यवच्च वोढव्ये मन््ये मरणमेव तत् | तू रूप, यौवन, विद्या और कुलीनतासे सम्पन्न है, यशस्वी तथा लोकमें विख्यात है। तुझ-जैसा वीर पुरुष यदि पराक्रमके अवसरपर डर जाय, भार ढोनेके समय बिना नथे हुए बैलके समान बैठ रहे या भाग जाय तो मैं इसे तेरा मरण ही समझती हूँ ।। ३३ ह ।। यदि त्वामनुपश्यामि परस्य प्रियवादिनम्
ଏପରି ଅପମାନଜନକ ଅବସ୍ଥା ବହନ କରିବାକୁ ମୁଁ ମୃତ୍ୟୁ ସମାନ ମନେ କରେ। ଏବଂ ଯଦି ମୁଁ ତୁମକୁ ଶତ୍ରୁ ପାଖରେ ପ୍ରିୟବାଦୀ ହୋଇ—ତାହାର ପ୍ରସନ୍ନତା ଖୋଜୁଥିବା—ଦେଖେ, ତେବେ ସେହିଟା ତୁମ ଯଶର ମୃତ୍ୟୁ ହେବ।
Verse 35
नास्मिन् जातु कुले जातो गच्छेद् यो$न्यस्थ पृष्ठत:
ଏହି କୁଳରେ ଜନ୍ମିଥିବା କେହି କେବେ ପିଠ ଫେରାଇ, ଅନ୍ୟଦିଗକୁ ମୁହଁ କରି, ଚାଲିଯାଏ ନାହିଁ।
Verse 36
अहं हि क्षत्रहददयं वेद यत् परिशाश्वतम्,स्वयं विधाताने जिसकी सृष्टि की है, प्राचीन और अत्यन्त प्राचीन पुरुषोंने जिसका वर्णन किया है, परवर्ती और अतिपरवर्ती सत्पुरुष जिसका वर्णन करेंगे तथा जो चिरन्तन एवं अविनाशी है, उस सनातन और उत्तम क्षत्रिय-हृदयको मैं जानती हूँ
ସ୍ୱୟଂ ବିଧାତା ଯାହାକୁ ସୃଷ୍ଟି କରିଛନ୍ତି, ପ୍ରାଚୀନ ଓ ଅତିପ୍ରାଚୀନ ପୁରୁଷମାନେ ଯାହାକୁ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଛନ୍ତି—ସେହି ସନାତନ ଓ ଉତ୍ତମ କ୍ଷତ୍ରିୟ-ହୃଦୟକୁ ମୁଁ ଜାଣେ।
Verse 37
पूर्व: पूर्वतरै: प्रोक्ते परै: परतरैरपि । शाश्व॒तं चाव्ययं चैव प्रजापतिविनिर्मितम्,स्वयं विधाताने जिसकी सृष्टि की है, प्राचीन और अत्यन्त प्राचीन पुरुषोंने जिसका वर्णन किया है, परवर्ती और अतिपरवर्ती सत्पुरुष जिसका वर्णन करेंगे तथा जो चिरन्तन एवं अविनाशी है, उस सनातन और उत्तम क्षत्रिय-हृदयको मैं जानती हूँ
ପୂର୍ବମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ପୂର୍ବମାନେ ଯାହା କହିଛନ୍ତି, ପରବର୍ତ୍ତୀ ଓ ଅତିପରବର୍ତ୍ତୀ ସତ୍ପୁରୁଷମାନେ ମଧ୍ୟ ଯାହା କହିବେ; ଯାହା ଶାଶ୍ୱତ ଓ ଅବ୍ୟୟ, ପ୍ରଜାପତି-ନିର୍ମିତ—ସେହି ସନାତନ ଓ ଉତ୍ତମ କ୍ଷତ୍ରିୟ-ହୃଦୟକୁ ମୁଁ ଜାଣେ।
Verse 38
यो वै कश्चिदिहाजात: क्षत्रिय: क्षत्रकर्मवित् । भयाद् वृत्तिसमीक्षो वा न नमेदिह कस्यचित्,इस जगतमें जो कोई भी क्षत्रिय उत्पन्न हुआ है और क्षत्रियधर्मको जाननेवाला है, वह भयसे अथवा आजीविकाकी ओर दृष्टि रखकर भी किसीके सामने नतमस्तक नहीं हो सकता
ଏହି ଜଗତରେ ଯେ କେହି କ୍ଷତ୍ରିୟ ଭାବେ ଜନ୍ମିଛି ଏବଂ କ୍ଷତ୍ରିୟ-କର୍ମ ଜାଣେ, ସେ ଭୟରୁ ହେଉ କି ଜୀବିକାକୁ ଦେଖି—କାହା ପାଖରେ ମୁଣ୍ଡ ନମାଏ ନାହିଁ।
Verse 39
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो होव पौरुषम् । अप्यपर्वणि भज्येत न नमेतेह कस्यचित्,सदा उद्यम करे, किसीके आगे सिर न झुकावे। उद्यम ही पुरुषार्थ है। असमयमें नष्ट भले ही हो जाय, परंतु किसीके आगे नतमस्तक न हो
କାଟିଦିଆଯାଉ ତଥାପି ମୁଣ୍ଡ ନମାଅ ନାହିଁ; ଉଦ୍ୟମ ହିଁ ପୌରୁଷ। ଅସମୟରେ ଭାଙ୍ଗିପଡ଼ିଲେ ମଧ୍ୟ, ଏଠାରେ କାହା ପାଖରେ ନମିବା ନୁହେଁ।
Verse 40
मातड़ो मत्त इव च परीयात् सुमहामना: । ब्राह्मणेभ्यो नमेन्नित्यं धर्मायैव च संजय,संजय! महामनस्वी क्षत्रिय मदमत्त हाथीके समान सर्वत्र निर्भय विचरण करे और सदा ब्राह्मणोंको तथा धर्मको ही नमस्कार करे
ପୁତ୍ର କହିଲା—“ହେ ସଞ୍ଜୟ, ସଞ୍ଜୟ! ମହାମନା କ୍ଷତ୍ରିୟ ମଦମତ୍ତ ହାତୀ ପରି ସର୍ବତ୍ର ନିର୍ଭୟ ଭାବେ ବିଚରଣ କରୁ; କିନ୍ତୁ ସେ ସଦା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଏବଂ କେବଳ ଧର୍ମକୁ ହିଁ ପ୍ରଣାମ କରୁ।”
Verse 41
नियच्छन्नितरान् वर्णान् विनिध्नन् सर्वदुष्कृत: । ससहायो<5सहायो वा यावज्जीवं तथा भवेत्,क्षत्रिय ससहाय हो अथवा असहाय, वह अन्य वर्ण-के लोगोंको काबूमें रखता और समस्त पापियोंको दण्ड देता हुआ जीवनभर वैसा ही उद्यमशील बना रहे
“ସେ ଅନ୍ୟ ବର୍ଣ୍ଣମାନଙ୍କୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣରେ ରଖୁ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଦୁଷ୍କର୍ମୀଙ୍କୁ ଦଣ୍ଡ ଦିଅ। ସହାୟ ଥାଉ କି ନ ଥାଉ—କ୍ଷତ୍ରିୟ ଜୀବନଭର ଏହି କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଓ ଉଦ୍ୟମରେ ଅଟୁଟ ରହୁ।”
Verse 134
इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि विदुलापुत्रानुशासने चतुस्त्रिंशदाधिकशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ, ବିଦୁଳାଙ୍କ ପୁତ୍ରାନୁଶାସନ ବିଷୟକ ଏକଶେ ଚଉତିରିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 226
निर्विण्णात्मा हतमना मुज्चैतां पापजीविकाम् । यदि तुझे जीवनके प्रति अधिक आसक्ति न हो तो तू अपने सभी शत्रुओंको परास्त कर सकता है और यदि इस प्रकार विषादग्रस्त एवं हतोत्साह होकर ऐसी कायरोंकी-सी वृत्ति अपना रहा है तो तुझे इस पापपूर्ण जीविकाको त्याग देना चाहिये
“ବିଷଣ୍ଣ ହୃଦୟ ଓ ହତୋତ୍ସାହ ହୋଇ ଏହି ପାପମୟ ଜୀବିକାକୁ ଛାଡ଼ିଦେ। ଯଦି ଜୀବନ ପ୍ରତି ତୋର ଅତ୍ୟଧିକ ଆସକ୍ତି ନଥାଏ, ତେବେ ତୁ ତୋର ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିପାରିବୁ; କିନ୍ତୁ ଯଦି ଏଭଳି ଦୁଃଖାକୁଳ, ନିରୁତ୍ସାହ ହୋଇ କାୟରମାନଙ୍କ ପରି ବୃତ୍ତି ଧରି ରହୁଛୁ, ତେବେ ଏହି ପାପଜୀବିକା ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ।”
Verse 346
पृष्ठतो<नुव्रजन्तं वा का शान्तिहदयस्य मे । यदि मैं यह देखूँ कि तू शत्रुसे मीठी-मीठी बातें करता तथा उसके पीछे-पीछे जाता है तो मेरे हृदयमें क्या शान्ति मिलेगी?
“କିମ୍ବା ମୁଁ ଯଦି ଦେଖେ ଯେ ତୁ ଶତ୍ରୁ ସହ ମିଠାମିଠା କଥା କହୁଛୁ ଏବଂ ତାହାର ପଛେ ପଛେ ଯାଉଛୁ—ତେବେ ମୋ ହୃଦୟକୁ କେଉଁ ଶାନ୍ତି ମିଳିବ? ମୋ ମନ କିପରି ଶାନ୍ତ ହେବ?”
Verse 356
न त्वं परस्यानुचरस्तात जीवितुमहसि । इस कुलमें कभी कोई ऐसा पुरुष नहीं उत्पन्न हुआ, जो दूसरेके पीछे-पीछे चला हो। तात! तू दूसरेका सेवक होकर जीवित रहनेके योग्य नहीं है
ପୁତ୍ର କହିଲା—ହେ ପିତା, ଅନ୍ୟର ଅନୁଚର ହୋଇ ବଞ୍ଚିବାକୁ ତୁମେ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହଁ। ଆମ କୁଳରେ କେବେ ଏମିତି ପୁରୁଷ ଜନ୍ମ ହୋଇନାହିଁ ଯେ ଅନ୍ୟର ପଛେ ପଛେ ଚାଲିଥାଏ। ହେ ପିତା, ଅନ୍ୟର ସେବକ ହୋଇ ଜୀବନ ଧାରଣ କରିବା ତୁମ ପାଇଁ ଉଚିତ ନୁହଁ।
The dilemma is whether resignation and withdrawal (citing lack of treasury and support) is ethically acceptable, or whether duty requires disciplined initiative despite uncertainty and personal risk.
Outcomes are impermanent and not fully controllable, but ethical agency lies in timely, methodical effort aligned with dharma and artha—non-action guarantees failure, while action preserves possibility and integrity.
No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-logic is pragmatic-moral: understanding duty, impermanence, and reputation-guided effort is presented as instrumentally beneficial for stability and as ethically consonant with kṣatra norms.